Saturday, October 23, 2021

बहे काव्य की धारा अविरल

काव्य कल्पना की वायवीय उड़ान है तो गद्य वस्तविकता की ठोस भूमि पर चलना। दोनों के क्षण मानव के जीवन में आते रहते हैं। किसी अनोखे आनंद को पाकर, कुछ ऐसा जानकर जो पहले कभी  जाना नहीं गया था अथवा कुछ ऐसा जानकर जो इस जगत का भी जान नहीं पड़ता, मन उस अलौकिक लोक में विचरण करता है। उस रस को व्यक्त करना गद्य में सम्भव ही नहीं है। वह इतना सूक्ष्म है कि शब्दों में भी नहीं समाता, तब कुछ परिचित शब्दों में उसे बहाया जाता है जैसे भूमि पर कोई लकीर खींच दे और बहता हुआ जल उधर की तरफ़ बह जाए। कवि केवल उस अनाम अनुभव को एक रास्ता देता है और वह जो उसके मन को घेरे हुए था, वह ऊर्जा शब्दों के रूप में बह जाती है। शब्द ऊर्जा ही तो हैं, जिनमें भावों का परिवर्तन होता है,  फिर वे स्थित हो जाते हैं। गतिमय ऊर्जा स्थाई हो जाती है। दूसरी ओर जब भीतर का अनुभव स्थायी हो गया हो तो मन में वेग नहीं उठता और अब स्थायी ऊर्जा को गतिमान बनाना है तो गद्य का जन्म होता है। भीतर एक स्थिरता है, शांति है और भाव भी शांत हो गये हैं। कौतूहल अब पहले की तरह ज़मीन से उखाड़ नहीं देता आकाश में उड़ने के लिए, इसलिए शब्द थम- थम कर आते हैं। 


Wednesday, October 20, 2021

जीवन में जब लय जगेगी

जीवन की सम्भावनाएँ अनंत हैं। हमारे अनंत जन्म हो चुके हैं फिर भी हम बार-बार इस जगत में लौटते हैं क्योंकि जीने के सही तरीक़े हमने सीखे नहीं हैं। यदि जीवन स्वकेंद्रित होगा तो अन्यों के साथ अन्याय होने की सम्भावना बनी ही रहेगी। यह मानव देह हमें उपहार में मिली है, श्वासें अनमोल हैं। हमारे भीतर अनछुई शक्ति के भंडार हैं जिन्हें माँगने पर ही दिया जाएगा। कुछ ही पल ऐसे होते हैं जब हम पूर्ण होश में होते हैं, ऐसा होश जो हमें हमारी स्मृति दिला देता है, देह से परे देखने की क्षमता देता है।यदि जीवन में एक लय हो, आगे बढ़ने की ललक हो तो हर पल कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।


Wednesday, October 13, 2021

जीवन ही जब बने साधना

साधना के द्वारा जब जीवन से जड़ता और प्रमाद चले जाते हैं, तभी किसी न किसी नवीन  सृजन का कार्य आरम्भ होता है। मन से परिग्रह का उन्माद भी खो जाता है और सहज संतोष अनुभव होता है। भय तभी होता है जब कुछ बचाए रखने की कामना रहे, इसलिए अपरिग्रह सधते ही अभय का जन्म साधक के जीवन में होता है। ऐसा व्यक्ति ही निस्वार्थ  प्रेम दे सकता है। उसके मन में कृतज्ञता की भावना पनपती है और हर उपलब्धि को वह ईश्वर का अनुग्रह मानकर स्वीकार करता है।अब  राग-द्वेष की आँच नहीं जलाती अपितु निरंतर एक सजगता बनी रहती है। उसके कर्म अब बंधन का कारण नहीं बनते बल्कि  मन को शुद्ध करने के हेतु बनते हैं। चित्तशुद्धि होते-होते  साधक एक न एक दिन समाधि के परम आनंद  को प्राप्त होता है। 


Sunday, October 10, 2021

उसको अपना माना जिसने


संत कहते हैं, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीवन जीने की कला है. हम  स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से हम सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. तब कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को हमसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है,  विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा सभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !


Friday, October 8, 2021

समरसता जब सध जाएगी

 जीवन में सामंजस्यऔर समरसता की साधना करने के लिए शरीर का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है. शरीर का यदि पूरा ज्ञान हो और शरीर के अंगों पर ध्यान किया जाये तो अपने आप ही सामंजस्य की भावना भीतर आने लगती है. शरीर के विभिन्न अंग मिलजुल कर मस्तिष्क की सहायता से काम करते हैं, उसी प्रकार हम समाज में तथा परिवार में रहकर सामंजस्य बना सकते हैं, सबसे जरूरी है हमारा अपने साथ सम्बन्ध अर्थात हमारे मन, बुद्धि  का आत्मा के साथ सम्बन्ध, फिर हमारा अपने निकटवर्ती जनों के साथ सम्बन्ध. जब हमारे शरीर की शक्ति का बोध हो जाता है तो प्रमाद, जड़ता तथा आलस्य नहीं रहता, भीतर एक स्फूर्ति का उदय होता है, वह स्फूर्ति हमारे सम्बन्धों में झलक उठती है, तब मन हर क्षण नया-नया सा रहता है, सम्बन्धों में बासीपन नहीं आता, कोई दुराग्रह नहीं रहता, मन तब एक अनोखी स्वतन्त्रता का अनुभव करता है, मन की ऐसी स्थिति कितनी अद्भुत है, कहीं कोई उहापोह नहीं, विरोध नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बिना किसी प्रतिकार व अपेक्षा के द्रष्टा भाव में जीना आ जाता है.

Sunday, October 3, 2021

मन असीम की शरण में जाए

हम जगत के लिए कैसे उपयोगी बनें यदि मन इसका चिंतन करे तो उसके सारे भय, आशंकाएँ और द्वंद्व खो जाएँगे। अहंकार केवल स्वयं के बारे में सोचता है और जैसे ही मन का विस्तार होता है, अहंकार के लिए कोई जगह नहीं बचती। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है सीमित में दुःख है, असीम में विश्राम है। अनंत ही हमारे मन को समाधान दे सकता है। स्वयं को जगत से पृथक मानना व जगत को स्वयं का विरोधी मानना ही तनाव का कारण है। तनाव से ही तन व मन के कई रोग होते हैं। जब हम सारे अस्तित्त्व को अपना ही विस्तार देखते हैं तो मन खो जाता है। देह पंच तत्त्वों के स्थूल भाग से बना है और मन उन्हीं के सूक्ष्म भाग से। इस प्रकार देह सृष्टि का ही एक छोटा अंश है और मन इस विशाल मन का। चेतना भी विश्व चेतना का ही भाग है। यहाँ हर वस्तु दूसरे से संयुक्त है। यह पूरा ब्रह्मांड एक ही जीवित इकाई है। यदि हम स्वयं को इसका एक अंश मानते हैं तो कोई विरोध या प्रतिद्वंदिता नहीं रह जाती। मन से सारा विषाद खो जाता है और एक अपूर्व शांति का अनुभव होता है। 


Thursday, September 30, 2021

निज स्वभाव में टिक जाए जो

ईश्वर से यदि हमें प्रेम है तो यह सबसे सहज कार्य है, यह तो होना ही है, इसमें प्रयास करना पड़े तो हम असहज हो जाते हैं. ईश्वर है और हम हैं, और हममें प्रेम ही प्रेम है. जैसे सूरज है, दिन है, प्रकाश है. हमारा होना उतना ही सहज हो जाये जैसे साँस का आना-जाना तो हमें कोई अभाव नहीं रहता निज स्वभाव में रहते हैं, और प्रेम करना उसी तरह हमारा स्वभाव है जैसे कोयल का गाना और फूलों का खुशबू फैलाना. हमारे भीतर से दिव्य संगीत का फूटना भी उतना ही स्वाभाविक है और बंद आँखों को प्रकाश का दर्शन होना भी. स्वभाव में टिकते ही कुछ करना नहीं होता सब कुछ होने लगता है. कर्ता भाव नहीं रहता तो थकान का नाम भी नहीं रहता. अहंकार ही हमें विषाद ग्रस्त करता है, थकाता है दूसरों से पृथक करता है. अहंकार शून्य होते ही हम निर्भार हो जाते हैं फूल की तरह, हवा की तरह, आकाश की तरह. तब कोई प्रतिवाद नहीं, प्रतिरोध नहीं, आक्षेप नहीं, हम तब हम प्रकृति से अभिन्न हो जाते हैं.

असलियत को जो पहचाने


मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि अंतर में प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी परमात्मा का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग हम करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो हमें उससे अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बन सकता है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा रूप में सबके भीतर है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है। बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुख और सुविधा मिलती है वह कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. हमें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी हम मुक्त हैं.


Tuesday, September 21, 2021

तीन गुणों का जो साक्षी

इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति के रूप में  काली, लक्ष्मी और सरस्वती हमारे भीतर विद्यमान हैं। ये तीनों ही तमोगुण, रजो गुण तथा सतो गुण का भी प्रतीक हैं। तीनों गुणों के ऊपर एक ही ब्रह्म तत्व है। अलग-अलग नाम-रूप में वही एक तत्त्व समाया है। तीनों गुणों से पार जा कर ही मानव अपने सहज धर्म या स्वभाव का अनुभव करता है। सहज धर्म में स्थित रहना मानव को इन शक्तियों के शुद्ध रूप से जोड़कर रखता है। सहज धर्म से विचलन ही अहंकार है। आत्मा जब तीनों गुणों की साक्षी हो जाती है तो ब्रह्म तत्त्व में स्थित हो जाती है। उसे जानना ही आत्मसाक्षात्कार है। 



Saturday, September 18, 2021

ध्यान साधना होगा मन को

 ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. यह ज्ञात होता है कि हमारे भीतर कितनी सुंदरता छिपी है, जहाँ ईश्वर का वास है वहाँ सौंदर्य  बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इन अनुभवों से बल मिलता है. शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो, सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. अनंत धैर्य के साथ धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये भी कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से ईश्वर का स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष  से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. संत कहते हैं, मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. जबकि परमशक्ति  शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाती नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है. जो

Wednesday, September 8, 2021

मन जब खाली हो जायेगा

अनात्म का चिंतन न करना ही आत्मा में स्थित रहना है। जो संसार पल भर के लिए भी स्थिर नहीं रहता, उसको कितना भी संभाला जाए वह छूट ही जाएगा, पर जो इसे देख रहा है वह मन मृत्यु के बाद भी साथ जाएगा। मन में यदि कोई अभाव है तो उसे पूर्ण करने के लिए वह संसार का आश्रय लेता है. थोड़ी देर के लिए लगता है मन भर गया पर फिर रिक्त हो जाता है. जैसे भोजन के कुछ घण्टों बाद पुनः भूख सताती है. मन को यदि यह ज्ञात हो जाये कि उसका स्वभाव ही खाली रहना है तो वह उसे स्वीकार लेगा और उस अभाव की गहराई में जाकर पूर्णता का अनुभव करेगा. जब मन को भरने की हर चाह गिर जाती है तब भी कुछ  बचता है, वही आत्मा है. वह एक उपस्थिति मात्र है शांत और आनंद से भरी उपस्थिति. साधक जब संसार का चिंतन छोड़कर कुछ पलों के लिए चुपचाप बैठ जाता है, तो वह खालीपन दिव्यता से भरने लगता है. 


 

Wednesday, September 1, 2021

मुक्ति का जो मार्ग चुनेगा

जब मन सीमित होता है  तब असीम को जान नहीं पाता। उधेड़बुन में लगा रहता है तो विश्राम नहीं पाता । जब कुछ न कुछ चाहता है तब उतना ही पाता है। जिस क्षण भी हर चाह  खो जाती है,  अस्तित्त्व बरस जाता है। ध्यान का अर्थ है हर चाह, हर क्रिया, हर पहचान  खो जाए, वही रहे  जो सदा से है और सदा रहेगा। वहीं से प्रेम और शांति का दरिया बहेगा । उन पलों में कोई बोझ नहीं उठाना होगा, किसी को कुछ करके नहीं दिखाना होगा। ऊर्जा निर्बाध तन में बहेगी, प्रकृति  जिसका उपयोग सहज ही करेगी। कृत्य होंगे पर कर्ता नहीं होगा। ध्यान मुक्ति का मार्ग दिखाता है और  स्वयं से मिलाता है। 


Monday, August 30, 2021

जीवन में जब ध्यान घटेगा

घनीभूत चेतना हमारी सम्भावना है. हमारे चारों ओर जो प्रकाश बिखरा है, यदि उसे केंद्रित किया जाये तो अग्नि पैदा हो जाती है. चेतना का सागर हमारे चारों ओर लहर रहा है. ध्यान के अभ्यास के द्वारा उसे घनीभूत कर दें तो भीतर नए जगत का निर्माण हो जाता है. चैतन्य की अनुभूति ऐसे ही क्षणों में होती है, वह आनंद घन है, रसपूर्ण है, प्रतिपल नूतन है. वह सहज और सरल है. उसी से जीवन का प्राकट्य हुआ है.

Thursday, August 26, 2021

निज संस्कृति का सम्मान करे जो

भारतीय संस्कृति अनूठी है, यहाँ जीवन को उसकी समग्रता में  सम्मानित करने का भाव है. जीवन के आरम्भ होने से पूर्व ही उसे संस्कार के द्वारा परिष्कृत करने की व्यवस्था है. यदि सही अर्थ के साथ वेद मन्त्रों का पाठ तथा अध्ययन किया जाये तो जीवन को दिशा देने वाले सूत्र उनमें छिपे हैं. हमारी प्रार्थनाएं विश्व कल्याण की कामना लिए हुए हैं. सर्वे भवन्तु सुखिनः.. यदि हम नित्य प्रति अर्थ की प्रतीति करते हुए गाते हैं तो संसार के समस्त जीवों की शुभ भावना से भर जाते हैं. असतो मा सद गमय.. आदि तीन प्रार्थनाएं जीवन को उसके अंतिम लक्ष्य मोक्ष की तरफ ले जाने वाली हैं और त्वमेव माता च पिता त्वमेव.. परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना का भीतर सहज ही संचार करती है, जिससे भीतर अभय का जन्म होता है. या देवी सर्वभूतानां... में देवी को विद्या, निद्रा, क्षुधा, शक्ति आदि जीवन के हर रंग के रूप में देखा गया है. हमारी पाचन अग्नि के रूप में स्वयं कृष्ण भोजन को पचाते हैं तथा वाणी के रूप में वाग देवी कंठ में निवास करती हैं. हमारे मूलाधार में गणेश का वास है. यहां शरीर को देवालय कहा गया है. जिसके नौ द्वार बाहर की ओर खुलते हैं तथा दसवां द्वार भीतर की ओर. जीवन का इतना सम्मान जहाँ हो वहाँ प्रेम, करुणा और उदारता के उदहारण हजारों के रूप में मिलते हैं इसमें आश्चर्य कैसा ? 


Monday, August 23, 2021

जो जैसा मन जाने न वैसा

 

हम जो हैं जैसे हैं, उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करना होगा, क्योंकि चुनाव करने वाला मन या बुद्धि अभी स्वयं ही बंटे हुए हैं, उनके द्वारा लिया गया निर्णय अनिर्णीत ही रह जायेगा. जब मन पूर्ण विश्रांति में होगा, भीतर शुद्ध चेतना का आविर्भाव होगा.  जहाँ कोई दूसरा नहीं होता ऐसी स्थिति में स्वयं को स्वयं की अनुभूति होती है. वहाँ कोई अस्वीकार नहीं है, सब कुछ एक से ही प्रकट हुआ है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति है. ऐक्य की उस अवस्था में स्वयं को तथा जगत को वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकारने की क्षमता प्रकट होती है. 


Thursday, August 19, 2021

ध्यान फलित हो जब जीवन में

जब मन सीमित होता है  तब असीम को जान नहीं पाता। उधेड़बुन में लगा रहता है तो विश्राम नहीं पाता । जब कुछ न कुछ चाहता है तब उतना ही पाता है। जिस क्षण भी हर चाह  खो जाती है,  अस्तित्त्व बरस जाता है। ध्यान का अर्थ है हर चाह, हर क्रिया, हर पहचान  खो जाए, वही रहे  जो सदा से है और सदा रहेगा। वहीं से प्रेम और शांति का दरिया बहेगा । उन पलों में कोई बोझ नहीं उठाना होगा, किसी को कुछ करके नहीं दिखाना होगा। ऊर्जा निर्बाध तन में बहेगी, प्रकृति  जिसका उपयोग सहज ही करेगी। कृत्य होंगे पर कर्ता नहीं होगा। ध्यान मुक्ति का मार्ग दिखाता है और  स्वयं से मिलाता है। 


Sunday, August 1, 2021

शिव-शक्ति से भरा जगत यह


शिव और शक्ति जगत के माता-पिता हैं, शिव अर्थात शुद्ध चैतन्य और शक्ति,  उसमें निहित अनंत शक्तियाँ। सृष्टि में जो भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थ हमें दिखाई पड़ते हैं, वे शिव की संकल्प शक्ति से ही जन्मे हैं। हमारे भीतर भी शिव तत्व है जिसका अनुभव ध्यान में किया जा सकता है, क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और इच्छा शक्ति जिसमें निहित हैं। जब ये तीनों शक्तियाँ एक होकर शांत हो जाती हैं तब केवल चैतन्य ही शेष रहता है। श्वास का लेना यदि शक्ति का कार्य है तो श्वास छोड़ने के बाद की विश्रांति शिव का अनुभव है। दिन में हम कार्य करते हैं जिसमें हर तरह की शक्ति की आवश्यकता होती है, पर रात्रि में विश्राम के लिए सब कुछ छोड़ देना होता है, इसलिए रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है। ध्यान में भी कुछ करना नहीं है केवल विश्राम करना होता  है, तभी शुद्ध चेतना का अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह कर्ता भाव से मुक्त होकर ही हम स्वयं में विश्राम पा सकते हैं।

Tuesday, July 13, 2021

मुक्त हुआ जो प्रेम करे वही

 प्रेम वहां नहीं होता जहाँ कोई उसका प्रतिदान चाहता है, वहाँ तो व्यापार होता है और जब किसी का मन अपनी ख़ुशी के लिए किसी अन्य पर निर्भर करता है तो वह आजाद नहीं है, वह प्रेम नहीं कर सकता. यह खुबसूरत दुनिया और इसमें बसने वाली हर शै से हमें प्यार तो करना है पर उन पर निर्भर नहीं होना है. आत्मनिर्भरता ही निडरता को जन्म देती है, जब हम किसी पर निर्भर नहीं रहेंगे तो भयभीत होने की भी जरूरत नहीं, एक नाजुक, बेसहारा, कमजोर और आश्रित होकर जीने से कहीं बेहतर है मजबूत आत्मशक्ति के साथ जीना, क्योंकि वह शक्ति कहीं बाहर से मिलने वाली नहीं है, हमारे अंदर ही मौजूद है. जगत में सच का सामना करते हुए निर्भयता पूर्वक अपनी बात कह देने का आत्मविश्वास लिए जीना ही सही मायनों में आजाद होकर जीना कहा जायेगा.

Sunday, July 11, 2021

जैसे कर्म करेगा मानव

प्रारब्ध ने हमें जो भी दिया है उसे सहर्ष स्वीकार करके हम जीवन को जीते हैं तो कई मुश्किलों से सहज ही बचे रहते  हैं। जो भी बीज हमने अतीत में बोए हैं उनकी फसल हमें ही काटनी होगी। जिस मन में राग जगाया था, उसी में द्वेष की दीवार भी अपने आप खड़ी हो जाती है, जिसे हमें ही पाटना होगा। कोई भी कर्म देर-सवेर अपना फल दिए बिना नहीं मिटता है। जो भी हमें मिला है यदि उसे सबके साथ साझा करने की मंशा के साथ जीवन को जिएँ तो यह स्वतः ही सुंदर बन जाता है। एक परम शक्ति जो परम ज्ञानमयी भी है सदा ही इस सृष्टि का लालन-पालन कर रही है, उसका हाथ सदा ही हमारे सिर पर है, वह हमसे दूर नहीं है, इतना भरोसा मन में रखकर यदि हम जीवन के पथ पर कदम रखते हैं तो हर बाधा अपने आप ही मिट जाती है। अपने अंतर की गहराई में जाकर ही सच्चे जीवन से परिचय होता है और तब यह ज्ञान होता कि दुःख के बीज बोना या सुख के बीज बोना हमारे अपने हाथ में है। सजग होकर जीने की कला जिसने सीख ली है वही योग को प्राप्त हो सकता है।   

Thursday, July 8, 2021

करत करत अभ्यास ते

 हम प्रतिदिन अपने घर और आसपास की सफ़ाई करते हैं, वस्त्रों को स्वच्छ करते हैं किंतु गंदगी अपने आप ही आ जाती है। इसी तरह देह को स्वस्थ रखने और मन को प्रसन्न रखने का हमें अभ्यास करना होता है, मन में दुःख या चिंता अपने आप ही जाती है। यदि हमने साधना के द्वारा सुखी या संतुष्ट होने का अभ्यास नहीं किया तो मन स्वतः नकार की ओर जाता है। यदि मन में कामना है तो दुःख आने ही वाला है, यदि स्वयं में सुख लेने की कला सीख ली है तो कामनाएँ अपने आप ही सूखे पुष्पों की तरह झर जाती हैं। ज्ञान में स्थिर होने का अर्थ ही यही है कि हर परिस्थिति में मन की समता बनाए रखें। सुख में सुखी और दुःख में दुखी तो सभी होते हैं लेकिन जिसने अभ्यास किया है वही विचलित नहीं होता। 


Saturday, July 3, 2021

कर्म यदि निष्काम हो सकें

 जब हम अपने भीतर शक्ति के स्रोत से जुड़ जाते हैं तब हमसे सहज ही ऐसे कर्म होते हैं जिनमें कर्ता भाव नहीं होता. निष्काम कर्म अथवा सेवा कर्म ऐसे ही कर्मों को कहते हैं. जगत को सुंदर बनाने के लिए अथवा किसी की सहायता के लिए किये गए ऐसे कर्मों से कोई कर्म बन्धन नहीं होता. आत्मा की शक्ति अनायास ही हमें ऐसे कर्मों को करने के लिए प्रेरित करती है. श्रम की महत्ता को समझकर हम कामगारों व मजदूरों के प्रति सम्मान की भावना भी जगाते हैं. ध्यान के द्वारा स्वयं के वास्तविक स्वरूप का परिचय पाना साधना की पहली सीढ़ी है. इसके बाद जगत कल्याण के लिए उस ऊर्जा का उपयोग अगला पड़ाव है. इससे हम प्रारब्ध से मिलने वाले सुख के प्रभाव से अछूते रह जाते हैं और अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं. सृष्टि के आयोजन में परमात्मा के साथ मिलकर हम भी अपना योगदान दे रहे हैं ऐसी भावना हमें सदा प्रसन्नचित्त रखती है. 


Monday, June 14, 2021

स्वधर्म में जो टिक पाए

 भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से स्वधर्म में स्थित होकर युद्ध करने के लिए कहते हैं. स्वधर्म यानि आत्मा का धर्म, प्रेम और शांति का धर्म ! हृदय में प्रेम रहे और अंतर की गहराई में स्थित शांति का अनुभव होता रहे, उसके बाद ही कोई जीवन के संघर्ष में बिना किसी भय के उतर सकता है. यदि भीतर क्रोध है और मन अशांत है तो जीवन का संघर्ष हम लड़े बिना ही हार सकते हैं. यदि लड़ते भी हैं तो हमारी आधी ऊर्जा अपने आपको संभालने में ही व्यय होती है. हम अपने जीवन में कई धर्म निभाते हैं, एक मानव का धर्म, नागरिक का धर्म, पुत्र या पिता का धर्म, पति या पत्नी, शिष्य या शिक्षक का अथवा अपनी आजीविका कमाते समय अधिकारी या कर्मचारी का धर्म. ये सभी धर्म कभी-कभी एकदूसरे के विरोधी हो सकते हैं. देश सेवा करते हुए कोई अपने परिवार के प्रति उपेक्षा कर सकता है. कोई अपने काम में इतना खो जाता है कि परिवार स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है. किन्तु यदि कोई आत्मा के धर्म में स्थित रहकर इन्हें निभाये तो सभी धर्म स्वतः ही निभने लगते हैं. जीवन में प्रेम और शांति के फूल खिले हों तो कोई भी कर्म सहज होता है उसके लिए विशेष श्रम नहीं करना पड़ता. इसी कारण श्रीकृष्ण अर्जुन को योगी होने का उपदेश देते हैं. 


Monday, June 7, 2021

शुभता का जो वरण करेगा

 आज तक हमने जो भी किया उसका फल तो हमें मिलने ही वाला है, वह हमारा भाग्य बन गया है जो एक न एक दिन सम्मुख आएगा, किन्तु इस क्षण के बाद हम मनसा, वाचा, कर्म जो भी करने वाले हैं, वह अभी हमारे हाथ में है. हम यदि चाहें तो अपने कर्मों के प्रवाह को शुभ की तरफ मोड़ सकते हैं और अपने भाग्य को अपने अनुकूल गढ़ सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा सहायक है भीतर का अखण्ड विश्वास और सत्य को जानने का अभिलाषा. परमात्मा परम शुभता का प्रतीक है, वह शांति, आनंद और प्रेम का अनंत सागर है, यदि हम उसका स्मरण मात्र करते हैं तो अंतर को उतनी देर के लिए उसके गुणों से भर लेते हैं. धीरे-धीरे कर्मों को करते समय भी उसका स्मरण बना रह सकता है. मन क्रोध या लोभ का शिकार नहीं होता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दिखावे की अग्नि में नहीं जलता. सदा स्वयं को औरों से बेहतर बताने की संसारी प्रवृत्ति अपने आप छूटने लगती है. मन सात्विक बल और साहस से भर जाता है और पुराने किसी कर्म का प्रतिकूल फल आने पर भी वह भीतर समता भाव बनाये रखता है. उपासना ऐसा कर्म है जो करते समय व भविष्य में भी सुख से भर देने वाला है. 


Wednesday, June 2, 2021

जाकी रही भावना जैसी

 श्रद्धा की पूर्णता तभी है जब हम स्वयं के प्रति पूर्ण आश्वस्त हो जाएँ, हम अपनी क्षमताओं के प्रति, अपने इरादों के प्रति तिल मात्र भी संदेह नहीं रखें। हमारा मन पूर्ण श्रद्धा से भरा है तो जगत का व्यवहार स्वयं ही बदल जाता है। यह सारा जगत एक ही तत्व  से बना है, यहाँ एक के प्रति किया गया संदेह पूर्ण के प्रति ही सिद्ध होता है। इसका आरम्भ स्वयं से ही होता है। अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते हुए जब हम जीते हैं तो संदेह कैसा ?स्वयं के प्रति किया अविश्वास ही जगत के प्रति हमारे संदेह का कारण है, और वही औरों के द्वारा हमारे प्रति किए गये व्यवहार में प्रतिफलित होता है। दूसरे हमारे साथ जो भी व्यवहार करते हैं, वह हमारे खुद के प्रति व्यवहार को ही दर्शाता है।


Tuesday, May 25, 2021

बुद्धम शरणम गच्छामि

 बुद्ध कहते हैं, जगत परिवर्तनशील है, यहाँ सब कुछ नश्वर है, वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है और संबंधों के पीछे भी, भीतर की शांति और आनंद को यदि स्थिर रखना है तो अपने भीतर ही उसका अथाह स्रोत खोजना होगा। शांति और आनंद से मन को भरकर ही करुणा के पुष्प खिलाए जा सकते हैं ! हमारे पास यदि स्वयं ही प्रेम नहीं है तो हम किसी को दे कैसे सकते हैं ! बुद्ध ध्यान पर बहुत जोर देते हैं और शील के पालन पर भी। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अलोभ और अक्रोध पर साथ ही प्रज्ञा पर भी। वे अनुभव करके स्वयं जानने को कहते हैं न कि किसी की बात पर भरोसा करके ! पहले मन को सभी इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से ऊपर ले जाकर खाली करना होगा। यशेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेष्णा और जीवेषणा से ऊपर उठकर भीतर के आनंद को पहले स्वयं अनुभव करना होगा फिर उसे बाहर वितरित करना होगा। वह कहते हैं, जगत में अपार दुख है, दुख का कारण अज्ञान है, अज्ञान को दूर करने का उपाय ध्यान है, ध्यान से ही दुख और शोक के पार जाया जा सकता है। अहंकार को मिटाकर ही कोई इस पथ का यात्री बनता है । धरती, पवन, अनल और जल की तरह धैर्यवान, सहनशील, परोपकारी और पावन बनकर ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों के जीवन को सुख की राह पर ला दिया था।


Monday, May 24, 2021

ज्योतिपुंज है कोई भीतर

 शास्त्रों में ईश्वर की तुलना आकाश से, आत्मा की सूर्य से, मन की चंद्रमा से और देह की पृथ्वी से की गई है। जिसमें सब कुछ टिका है, पर जो किसी पर आश्रित नहीं है, जब कुछ भी नहीं था तब भी जो था और कुछ नहीं होगा जो तब भी रहेगा वही आकाश है । जैसे कोई भव्य इमारत यदि खड़ी हो जाए तो आकाश की सत्ता जस की तस रहती है और गिर जाए तो भी कोई परिवर्तन नहीं होता। सूर्य के होने से ही धरती पर जीवन संभव है, इसी प्रकार आत्मा से ही देह में चेतनता है। जैसे चंद्रमा  सूर्य के प्रकाश को ही परावर्तित करता है, मन, आत्मा का ही प्रतिबिंब है। मन बाहरी  परिस्थितियों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है।  कभी कभी सूर्य के सामने बादल आ जाते हैं और धरती पर अंधकार छा जाता है। अहंकार ही वह बादल है जो देह को आत्मा के प्रकाश से वंचित रखता है। यदि मन सदा समता में रहे तो आत्मजयोति उसमें एक सी प्रकाशित होगी और देह भी उस ज्योति से वंचित नहीं होगी। 


Wednesday, May 19, 2021

एक सनातन वृक्ष है जगत

 भागवत पुराण में यह वर्णन आता है. यह संसार एक सनातन वृक्ष है, इस वृक्ष का आश्रय है एक प्रकृति. इसके दो फल हैं - सुख और दुःख; तीन जड़ें हैं, सत्व, रज और तम. चार रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. इसको जानने के पांच प्रकार हैं-कर्ण, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका. इसके छह स्वभाव हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट हो जाना. इस वृक्ष की छाल हैं सात धातुएं - रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र. इसकी आठ शाखाएँ हैं - पंचमहाभूत, मन, बुद्धि और अहंकार. मुख, दो आँखें आदि नव द्वार इसमें बने हुए खोड़र हैं. प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, देवदत्त, कूर्म, कृकल, नाग और धनजंय - ये दस प्राण ही इसके पत्ते हैं. इस संसार रूपी वृक्ष पर दो पक्षी हैं - जीव और ईश्वर . इस वृक्ष की उत्पत्ति का आधार भी ईश्वर है. यदि जीव अपना ध्यान इस वृक्ष से हटाकर ईश्वर पर लगाए तो सहज ही सुख-दुःख रूपी फलों के आकर्षण से बच सकता है, जिसके बाद ही उसे ईश्वरीय आनंद का अनुभव होता है. 


Monday, May 17, 2021

जब समाज में सत्व बढ़ेगा

 पुराणों में कथा आती है, जब-जब पृथ्वी पर असुरों का भार बढ़ गया तो उनके विनाश के उपाय करने पड़े. असुरों के सींग नहीं होते, वे भी मानव ही होते हैं. उनमें दैवीय अथवा मानवीय गुणों की अपेक्षा आसुरी प्रवृत्तियां अधिक प्रकट होती हैं. सात्विक भावों से भरे मानव देवता होते हैं. सात्विक व राजसिक दोनों गुणों से युक्त मानव तथा राजसिक व तामसिक गुणों से भरे हुए लोग असुर कहलाते हैं. जब जीवन में सत्व की कमी हो जाती है, लोग ईमानदारी को अपवाद तथा बेईमानी को जीवन व व्यापार का सहज अंग मानने लगते हैं, मिलावट, कालाबाजारी बढ़ जाती है. रिश्वत लेकर या देकर काम निकालना बुरा नहीं समझा जाता. जब विद्यालयों में अध्ययन के साथ साथ व्यसनाधीन होने की सुविधा भी मिलती है, तब आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगने लगती है. अहंकार, धन या बल का प्रदर्शन आसुरी गुण हैं. मानव को सन्मार्ग पर लाने के लिए अस्तित्त्व द्वारा समय-समय पर उपाय किये जाते हैं. सम्भवतः आज हम उसी दौर से गुजर रहे हैं, यदि मानव अब भी नहीं संभला तो भविष्य में और भी कठिन समय से गुजरना पड़ सकता है. 


प्रकृति का भी मूल वही है

जैसा हमारा ज्ञान होता है, वह निर्धारित करता है कि हम क्या हैं ? यह जगत एक परिधि है और आत्मा उसके केंद्र पर है। हमें दोनों जगह रहना होता है। जितना हम केंद्र की तरफ जाते हैं, मन शांत होता है।  विचारों के पार जाकर  ही सत्य की अनुभूति होती है। एक महाज्ञान पूर्ण सत्ता के रहते हुए भी हम अज्ञानी का सा व्यवहार क्यों करते हैं, क्योंकि हमें पूर्ण  स्वतंत्रता है अपने को किधर ले जायें। ‘मैं’  प्रकृति  और चेतन  के सम्मिलित रूप का प्रतीक है। इस सम्मिलित रूप में जितना-जितना चेतनता का ज्ञान बढ़ता जाता है, ‘मैं मुक्ति की तरफ बढ़ता है।  जब ‘मैं’ प्रकृति के साथ जुड़ा होता है तब सुखी-दुखी होता है। प्रकृति ज्ञान देने को तैयार है, बुद्धि प्रकृति है. बुद्धि जब अपने मूल से जुड़ती है, तब हम अपने मूल को पहचानते हैं. स्वयं की पहचान होने पर भीतर की सामर्थ्य का ज्ञान होता है. अज्ञान की स्थिति में  हम स्वयं को असमर्थ समझते हैं। 


Saturday, May 15, 2021

भक्ति करे कोई सूरमा

 जब जीवन में उत्कृष्टता की चाह जगती है, तब भक्ति के प्रति जिज्ञासा मन में जगती है. जिनके जीवन में भक्ति रस प्रकट हुआ है वही भक्ति के बारे में बता सकता है. नारद कहते हैं, भक्ति प्रेम स्वरूपा है, प्रेम के बिना इस जगत में कोई रह नहीं सकता. प्रेम से ही सब कुछ प्रकट होता है पर  प्रेम विकारों के बिना नहीं मिलता. भक्ति वह प्रेम है जो अविकारी है, वह अमृतस्वरूप है. प्रेम का लक्षण है शाश्वतता का अनुभव होना. ईश्वर को प्रेम करना भक्ति का प्रथम लक्षण है, जो दिखता नहीं उस अदृश्य से प्रेम करने पर तृप्ति का अनुभव होता है. जब तक समय की अनुभूति होती है तब तक हम अमरता का अनुभव नहीं करते. ईश्वर के प्रति प्रेम जगते ही भीतर एक शांत, प्रसन्न चेतना जगती है. भक्त के जीवन में द्वेष नहीं रहता, शोक नहीं रहता. ज्ञान मन के विकारों को दूर करता है पर ज्ञान के ऊपर है भक्ति. ज्ञान हमें पूर्णता का अनुभव नहीं कराता. भक्त अपने भीतर एक मस्ती का अनुभव करता है, स्तब्धता का अनुभव करता है. ज्ञान का उदय होता है और क्षय होता है पर भक्ति कभी कम नहीं होती जो नित वृद्धि को प्राप्त होती है.

Monday, May 10, 2021

सहज मिले जो सुख टिकता है

सन्त और शास्त्र बार-बार कहते हैं, जो सुख किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से हमें प्राप्त होता है, वह सीमित है तथा उसकी कीमत भी हमें चुकानी पड़ती है. हर सुख के पीछे उतनी ही मात्रा का दुःख छिपा है, जो देर-सबेर हमें सहन करना होगा. जो आज मित्र की तरह व्यवहार कर रहा है, वह कब क्रोध से भर जाये, कौन जानता है ? जो वस्तुएं आज हमारे पास हैं, जो व्यापार आज खड़ा किया है, उनके लिए कितना श्रम किया है. जो बगीचा आज बनाया है, उसको बनाते समय कितनी रातों की नींद गंवाई होगी. अब कुछ लोग जो यह बात समझते हैं, वे दुःख को दुःख नहीं मानते, सुख की प्राप्ति का एक साधन मानते हैं और हँसते-हँसते हर दुःख उठा लेते हैं, पर वे ये भूल जाते हैं जिसके लिए इतना श्रम कर रहे हैं वह सुख कितनी देर टिकेगा ? एक कीमती वस्तु या कोई आभूषण पाने के लिए श्रम किया पर जब मिल गया तो कुछ क्षण या कुछ दिन उसकी ख़ुशी मिली फिर तो वह तिजोरी में बन्द पड़ा है. उसकी सुध भी नहीं आती. यह सुख जो शर्तों पर टिका है, वह ऐसा ही होता है. आनंद जो बेशर्त है, वह असीम है. वह हमारा स्वभाव है, जब मन में कोई कामना न हो ऐसे किसी क्षण में वह सहज सुख भीतर ही भीतर रिसता है, पर हम उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते, हमारा ध्यान तो बाहरी संसार पर ही अटका रहता है. 

 

Sunday, May 9, 2021

अमर आत्मा नश्वर है तन

 अर्जुन जिस विषाद योग में स्थित था आज उसी में हममें से हरेक स्थित है. युद्ध की स्थिति जितनी भयावह हो सकती है, उसी तरह की एक स्थिति, एक अदृश्य विषाणु से युद्ध की स्थिति ही तो आज विश्व के सम्मुख खड़ी है. अर्जुन को अपने गुरु, पितामह, चाचा, मामा, श्वसुर, भाइयों  तथा अन्य संबंधियों की मृत्यु का भय था. वह कहता है जब ये सब ही नहीं रहेंगे तब मैं युद्ध जीतकर भी क्या करूंगा. युद्ध न करने की बात कहकर जब वह धनुष रख देता है तब कृष्ण उसे आत्मा की अमरता का संदेश देते हैं. आत्मज्ञान पाना हो तो जीवन में ऐसा ही तीव्र संवेग चाहिए. जब कोई भी संवेदना चरम पर पहुंच जाती है तब मन ठहर जाता है और ग्रहणशील बनता है. आज हमारा मन ऐसी ही पीड़ा का अनुभव कर रहा है. कितने ही परिचित, अपरिचित जब सदा के लिए मौन हो रहे हैं तब भीतर यह प्रश्न उठता है कि अब क्या होने वाला है. गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ये सब राजा इस जन्म से पहले भी थे, और बाद में भी रहेंगे. जीवन पहले अप्रकट होता है मध्य में प्रकट होता है फिर अप्रकट हो जाता है. ज्ञानी जीवित और मृत दोनों के लिए शोक नहीं करते. युद्ध में जहाँ लाखों लोग अपने प्राण हथेली पर लेकर आये थे, ऐसा उपदेश देकर कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की शाश्वतता का बोध कराया. आज हरेक को उस ज्ञान को याद करना है. मानवता के इतिहास में ऐसी भीषण परिस्थितियां यदा-कदा ही आती हैं जो सामान्य जन को जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं. 


Thursday, May 6, 2021

गहराई में जो जा पाए

 आज दुनिया एक महामारी से जूझ रही है, किन्तु क्या यह पहली बार हुआ है, क्या इतिहास में हमें इसकी गवाही नहीं मिलती. कुछ वर्ष पहले भी सार्स, इबोला और भी कितने ही वायरस का मुकाबला मानवता ने किया है. यह सही है कि इस बार का हमला अभूतपूर्व है पर यह बिलकुल ही अचानक नहीं हुआ है. वैज्ञानिक इसकी चेतावनी देते रहे हैं, इस पर शोध कार्य भी दुनिया की कितनी प्रयोगशालाओं में चल रहा था. अब हमें लगता है सब कुछ खत्म हो गया है, किन्तु संत कहते हैं, दुनिया केवल सतह पर ही अपूर्ण दिखाई देती है। पूर्णता छिपी रहती है, अपूर्णता प्रकट होती है। ज्ञानी सतह पर नहीं रहता बल्कि गहराई में खोज करता है। जब हालात कठिन हों और जिनमें परिवर्तन करना हमारे बस में न हो तब परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करने के बजाय हमें अपनी धारणाओं को बदलने की जरूरत है। ऐसे समय में आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यह है कि हम अपना निर्धारित कार्य करते रहें और स्थितियों को उसी तरह स्वीकार करें, जैसी वे हैं. जिस क्षण हम किसी स्थिति को स्वीकार करते हैं, मन शांत हो जाता है और हमें प्रतिक्रिया के बजाय सोचने और कार्य करने के लिए एक स्पष्ट स्थान मिल जाता है। हम अपनी ऊर्जा का सही उपयोग कर सकते हैं. वर्तमान में हम कोरोना के प्रोटोकॉल का अनुसरण करके तथा जीवनशैली में उचित परिवर्तन करके स्वयं को स्वस्थ बनाये रख सकते हैं. 


Wednesday, May 5, 2021

श्वासों को जो साध सकेगा

 आज के वातावरण में जब चारों तरफ भय और आशंका का वातावरण है , मन को शांत रखना अति आवश्यक है. जब हमारा मन शांत और सहज होगा, तो हम अपने व परिवार के लिए सही निर्णय लेने की स्थिति में होंगे।  श्वास  लेने की विधि और ध्यान के अभ्यास ऐसी परिस्थितियों में मन को डूबने से बचाने के लिए अति आवश्यक हैं। ध्यान में हम वर्तमान में रहना सीखते हैं, यह हमें भविष्य की आशंका से मुक्त करता है। यह हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है. मन में स्थिरता के लिए, हमें अपनी जीवनी-शक्ति या जीवन ऊर्जा के मूल सिद्धांतों को जानना चाहिए। यही प्राणायाम का पूरा विज्ञान है। जब हमारे प्राण या जीवनी शक्ति में उतार-चढ़ाव होता रहता है, तो हमारा मन भी भावनाओं के प्रवाह में ऊपर-नीचे होता रहता है। श्वास की लय को समझने से हमें मन में स्थिरता बनाए रखने में भी मदद मिलती है। हमारी श्वास में एक बहुत बड़ा रहस्य छुपा है। मन की हर भावना के अनुरूप  श्वास में एक समान लय होती है, और प्रत्येक लय शरीर के कुछ भागों को शारीरिक रूप से प्रभावित करती है। जब हम आनंदित होते हैं तो हम विस्तार की भावना महसूस करते हैं और दुखी होने पर संकुचन की भावना। जरूरत पड़ने पर हमें दृढ़ता दिखाने में सक्षम होना चाहिए और साथ ही क्षमा करना भी आना चाहिए। यह क्षमता सभी के भीतर मौजूद है, और इन अवस्थाओं में सहज रूप से प्रवेश करने व बाहर आने के लिए आवश्यक कौशल को ध्यान उजागर करता है।ध्यान से हमारे भीतर ब्रह्मांडीय चेतना का उदय होता है । जब हम खुद को जगत के अंश के रूप में देखते हैं, तो जगत और हमारे मध्य प्रेम दृढ़ता से बहता है। यह प्रेम हमें विरोधी ताकतों और हमारे जीवन की परेशानियों को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है। क्रोध, चिंता और निराशा क्षणिक व विलीन हो जाने वाली क्षणभंगुर भावनाएँ बन जाती हैं. 


Sunday, May 2, 2021

नाम रूप के बनें साक्षी

 नाम और रूप से यह सारा जगत बना है, आत्मा उनसे परे है. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद  और मत्सर हमें आत्मपद से नीचे उतार देते हैं, हमारी गरिमा से हमें च्युत कर देते हैं. रूप के प्रति आसक्ति को ही काम कहते है. कामना जगते ही लोभ उत्पन्न होता है, इच्छित वस्तु न मिलने पर या मिलकर टिके न रहने पर क्रोध होता है. क्रोध से अच्छे-बुरे का विवेक जाता रहता है. इस मोह से बुद्धि का विनाश हो जाता है. मन पर मद यानि एक बेहोशी छा जाती है और तब भीतर द्वेष का जन्म होता है और सारा सुख-चैन क्षण भर में हवा हो जाता है. आनंद में बने रहना आत्मा के निकट रहना है और दुःख, चिंता में बने रहना आत्मा से दूर चले जाना है. आँखें, रूप को देखती हैं, दोनों ही प्रकृति के अंग हैं और तीन गुणों से निर्मित हैं. आँखों के पीछे मन देखकर प्रसन्न होता है, आत्मा भी यदि स्वयं को मन या आँखें अर्थात देह मानकर प्रसन्न होने लगे तो वह अपने पद से नीचे आ गया, वह साक्षी मात्र बना रहे, मन व आँखों को प्रसन्न देखकर उसी तरह प्रसन्न हो जैसे दादाजी अपने पुत्र को उसके पुत्र से खेलते हुए देखते हैं. आत्मा तो स्वयं ही आनंद स्वरूप है, उसे जगत से सुख लेने की क्या आवश्यकता है ? वह स्वयं को भूली हुई है इसलिए कामनाओं के वशीभूत होकर सुख-दुःख का अनुभव करती है. यही तो अज्ञान है, जिससे गुरू हमें दूर करना चाहते हैं. गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, भगवद्गीता का यह वाक्य तब समझ में आता है. प्रकृति ही प्रकृति के साथ खेल रही है, पुरुष की उपस्थिति में. उसकी उपस्थिति के बिना कुछ भी सम्भव नहीं, पर वह स्वयं में पूर्ण है यह मानते हुए लीला मात्र समझकर जगत को देखना है.  जैसे रात का स्वप्न टूट जाता है वैसे ही दिन का स्वप्न भी मृत्यु के एक झटके में टूट जाने वाला है.  


Monday, April 26, 2021

मिलकर जब सब करें सामना

 कोरोना के खिलाफ जो जंग भारत ने लगभग जीत ही ली थी, सकुचाते हुए जिसकी विजय का जश्न भी मनाया था. उसे फिर हार न जाएं ऐसा डर आज हम सभी के मनों में समाया है। ऐसा लग रहा है जैसे हम सोते ही रहे और दुश्मन घर तक आ गया, और देखते ही देखते हर शहर, हर गली मोहल्ले में छा गया. आज सब ओर भय का वातावरण है लेकिन हमें याद रखना होगा, जो भयभीत है वह मन है। जो  उस भय को देखता है, वह हम हैं। जब हम कहते हैं मुझे भय लग रहा है, हम मन के साथ एकात्म हो जाते हैं. मन माया है. हम माया से बंध जाते हैं. जो जानता है, वह हम हैं जानने में एक दूरी है। इस दूरी का अनुभव करते हुए हम पुन: जीतेंगे इस दुगने विश्वास से लड़ना है. लॉक डाउन का पालन बड़ी सख्ती से करना है जीवनचर्या में प्राणायाम को शामिल कर प्राणों में नैसर्गिक वायु भरनी है. न कि अस्पतालों में आक्सीजन के लिए लंबी कतारें खड़ी करनी हैं.  हम भूल गए कि वायरस अभी जिंदा है, हर मौत जो किसी की कहीं हुई, उसके लिए हर भारतीय शर्मिंदा है। किन्तु हमें इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने देना है। हर नागरिक हर नियम का कड़ाई से पालन करे, इस मुश्किल घड़ी में हमें मिलकर सुरक्षित निकलना है। अगली लहर आए उससे पहले ही मुस्तैदी से तैयार रहना है। स्वच्छता का दामन थाम पौष्टिकता का ध्यान रखना है। वैक्सीन लगवा कर प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना है। सब उपाय करके अब घर-घर से वायरस को विदा करना  है। 



Thursday, April 22, 2021

तन, मन में जब एक्य सधेगा

 देह और मन एक-दूसरे के विरोधी जान पड़ते हैं , देह को विश्राम चाहिए और मन विचारों की रेल चला देता है, नींद गायब हो जाती है.  देह को काम करना है, व्यायाम करना है, मन आलस्य का तीर छोड़ देता है, कल से करेंगे, कहकर टाल जाता है. इसी तरह मन जब विश्राम चाहता है, ध्यान के लिए बैठता है तो देह साथ नहीं देती, यहाँ-वहाँ दर्द होता है और अदृश्य चीटियां काटने लगती हैं. मन जब अध्ययन के लिए बैठना है तो देह थकान का बहाना बनाती है. देह को भूख नहीं है पर स्वादिष्ट भोजन देखकर मन नहीं भरता. मन ऊर्जा है, अग्नि तत्व से बना है. देह में पृथ्वी, जल दोनों तत्व हैं और आग व पानी तो वैसे भी एक-दूसरे के विरोधी हैं. यदि देह व मन में समझौता हो जाये, एकत्व हो जाये, समन्वय हो जाये तो वे अग्नि और जल से मिलकर बनी भाप की तरह कितनी ऊर्जा को जन्म दे सकते हैं. देह भौतिक है, मन आध्यात्मिक, यदि दोनों में सामंजस्य हो जाये तो जीवन में एक नया ही आयाम प्रकट होता है. ऐसा होने पर काम के समय मन, तन को सहयोग देता है, विश्राम के समय देह भी मन को सहयोग देती है. दो होते हुए भी वे दोनों एक की तरह कर्म करते हैं, तब कोई द्वंद्व शेष नहीं रहता. स्वाध्याय तथा प्राणायाम का निरंतर अभ्यास इस लक्ष्य की ओर ले जाने में अति सहायक है.  यही अद्वैत की ओर पहला कदम है. 


Sunday, April 18, 2021

'है' को जो मन स्वीकार करे

 जो ‘है’ उस हम चाहते नहीं. क्योंकि वह है ही, जो ‘नहीं’ है उसे हम चाहते हैं और वह चाह हमें अशुद्ध करती है। कोई भी इच्छा हमें अपने स्वरूप से नीचे लाती है। तो क्या हम इच्छा करना ही छोड़ दें, नहीं, यदि छोड़ना ही है तो देहाभिमान को छोड़ना होगा। हर इच्छा देह से आरंभ होती है। जीव भाव छोड़ना होगा, यश की इच्छा जीव से जुड़ी होती है। अहंकार को छोड़ना होगा, कर्ता भाव अहंकार से जुड़ा है। मोक्ष कुछ करके हासिल नहीं किया जा सकता। यह एक भावदशा का नाम है, ऐसी भाव दशा का, जिसमें मन पूर्णत: रिक्त होता है, भूत या भविष्य का कोई विचार उसे प्रभावित नहीं करता, कोई चाह उसे अशुद्ध नहीं करती। मन जो निपट वर्तमान में है और स्वयं के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, वह मुक्त ही है।  


Monday, April 12, 2021

काली दुर्गा नमो नम:

आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक जगत में ये तीन प्रकार के ताप हैं जिनमें मानव जल रहा है। इस जलन से उसके अंतर की सारी सरसता सूख गई है, प्रेम भाव झुलस गया है, आनंद का स्रोत भी शुष्क हो गया है। जो मन शीतल जल की धारा के समान गतिमान हो सकता था वह एक छोटा पोखर बन गया है जिसमें पानी कम और कीचड़ अधिक है। इसी प्रकार बहती हुई एक नदी पहले नाला बनती है फिर एक दिन उसका जल भी सूख जाता है और वहाँ केवल निशान भर रह जाता है।  मन में यदि सरसता हो, उसकी माटी कोमल हो तो उसे मनचाहा आकार दिया जा सकता है। ऐसा लचीला मन किसी भी आघात को सह सकता है, भीतर समा लेता है, पर यदि मिट्टी सूख गई हो, तप गई हो तो जरा से आघात से टूट जाती है। मन की तुलना घट से भी की जाती है, जिसे साधना की शीतल आंच में जितना तपाया जाए वह उसे एक साथ कोमल व मजबूत बनाए रखती है । मन एक साथ सरस भी हो और बलशाली भी। कायर की अहिंसा का क्या महत्व और बलशाली की हिंसा किस काम की। हमें अपने मन को देवी के समान एक साथ दोनों गुणों से भरना है। देवी का गौरी रूप माँ का कोमल रूप है, जिसमें वात्सल्य, प्रेम, करुणा के भाव झलकते हैं पर उसका एक काली रूप भी है, वह निडरता से असुरों का नाश करती है। हमें किसी भी आपदा का मुकाबला करने के लिए एक तरफ समर्पण चाहिए, नियमों का पालन करना है, दूसरी तरफ हृदय की दृढ़ता से उसका मुकाबला भी करना है। नवरात्रि का पर्व यही संदेश लेकर आता है।    

 

Sunday, April 4, 2021

जब आवै संतोष धन

 कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा  सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है. 


Friday, April 2, 2021

चिर वसन्त की चाह जिसे है

 साधना में कुछ पाना नहीं है, खोना है. तन, मन दोनों से पसीना बहाकर विषैले तत्वों को बाहर निकालना है. जीवन एक पुष्प की तरह खिले इसके लिए मन की माटी में भक्ति का बीज बोना होगा, श्रद्धा का बीज, आस्था का बीज, जो धीरे-धीरे जड़ें फैलाएगा और स्वार्थ के सारे कूड़े-करकट को खाद बनाकर उसे सुंदर आकार, रंग और गन्ध में बदल देगा. धरती में वह क्षमता है , वैसे ही मन की माटी में भी. हम जो भी सच्चे मन से चाहते हैं वह हमें दिया ही जाता है. यहां कोई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती. सुख उत्तेजना का नाम है या आसक्ति का, दुःख द्वेष का नाम है अपनी इच्छा पूरी न होने का. आनंद तो एक विशेष मन:स्थिति है जो किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या घटना पर आधारित नहीं है. वह तो सदा ही एक रस है. साधक को जब अपनी निर्विकार स्थिति का भान होता है, तभी आनंद का अनुभव होता है. हम जो भी देखते हैं वह हमसे बाहर है, यदि हमें स्वयं को देखना हो तो कैसे देखेंगे ? पतंजलि कहते हैं जब देखे हुए और सुने हुए के प्रति आकर्षण न रहे तब चेतना स्वयं में लौट आती है, तब स्वयं के द्वारा ही स्वयं को देखा जाता है. तब साधक के जीवन में चिर बसंत का पदार्पण होता है


Monday, March 29, 2021

सत की नाव खेवटिया सदगुरू

हर वह कर्म जो निज सुख की चाह में किया जाता है, हमें बांधता है. जो स्वार्थ पर आधारित हों वे संबंध हमें दुःख देने के कारण बनते हैं. जब हम अपना सुख भीतर से लेने लगते हैं तब स्वार्थ उसी तरह झर जाता है जैसे पतझड़ में पत्ते, तभी जीवन में सेवा और प्रेम की नयी कोंपलें फूटती हैं. जब संबंधों का आधार प्रेम हो तभी उनकी ख़ुशबू जीवन को महका देती है. रजस हमें अपने ही सुख की चिंता करना सिखाता है, तमस उसके लिए असत्य का सहारा लेने से भी नहीं झिझकता. सत का पदार्पण ही ज्ञान की मशाल लेकर वास्तविकता का परिचय कराता है. जीवन में सत्व की वृद्धि करनी हो तो सत्संग उसकी पहली सीढ़ी है. शास्त्रों का अध्ययन व नियमित साधना उसके सिद्ध  मार्ग हैं. सत्व हमें अपने आप से जोड़े रखता है. यह अनावश्यक कर्मों से हमने बचाता है और कर्म हीनता से भी दूर रखता है. सत ही आत्मबल और मेधा को बढ़ाता है. 


Tuesday, March 23, 2021

चोर न लूटे, खर्च न फूटे

 हम एक बेशकीमती रत्न  को अपने भीतर कहीं मन की गहराई में छिपाकर भूल गए हैं, जो अनमोल है और जिसे जितना भी खर्च किया जाये चुकेगा नहीं. नानक तभी कहते हैं वह बेअंत है. हजारों-हजारों संतों, ऋषियों ने उसी अनमोल धरोहर से संपदा पायी, पा रहे हैं और लुटा रहे हैं। यह जो संतों के यहाँ लाखों की भीड़ जुटती है वह उस हीरे की चौंध की झलक मात्र पाने हेतु ही तो, जबकि वह हीरा अपने भीतर भी है। संत इसी चमक का स्मरण कराते हैं। हम हवा के घोड़े पर सवार रहते हैं। सांसारिक कामों को निपटाने की बड़ी जल्दी रहती है हमें। सब कुछ पा लेने की फिराक में, जल्दी से जल्दी गाड़ी, बंगला, रुतबा, शोहरत इन्हें पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, बिना सोचे कि ये सब हमें ले जाने वाले हैं एक दिन अग्नि की लपटों में। हमारी मंजिल यदि शमशान घाट ही है, चाहे वह आज हो या पचास वर्ष बाद, तो क्या हासिल किया। एक रहस्य जिसे दुनिया भगवान कहती है, हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट करने हेतु सदा ही निकट है। वही जो प्रकृति के कण-कण से व्यक्त हो रहा है। वह एक अजेय मुस्कान की तरह हमारे अधरों पर टिकना चाहता है और करुणा की तरह आँखों से बहना चाहता है। वह प्रियतम बनकर गीतों में बसना चाहता है। संगीत बनकर स्वरों में गूंजना चाहता है। वही कला है, वही शिल्प है, वही नृत्य है, पूजा है। वही अंतरतम में बसने वाली समाधि है। वही प्रज्ञा और मेधा है।

Sunday, March 21, 2021

उमा कहउँ मैं अनुभवअपना

 रामचरितमानस में एक जगह शिव उमा से कहते हैं, यह जगत एक सपना है और जो इसका आधार भूत  है, वह परम तत्व ही एकमात्र सत्य है। यह जानते हुए भी हम सभी को यह जगत न केवल सत्य प्रतीत होता है, बल्कि अपना भी प्रतीत होता है। पुराणों में कहा गया है शिव समाधिस्थ रहते हैं और आदिशक्ति से यह सारा जगत प्रकट हो रहा है। किन्तु शिव और शक्ति दो नहीं हैं. शिव की शक्ति ही प्रकृति के रूप में व्यक्त हो रही है। नाम और रूप से यह सारा जगत परिपूर्ण है, पर ये दोनों जहाँ से आये हैं, वह शिव की ही शक्ति है। ज्ञान शक्ति भी वहीं से प्रकटी है, जिसे मन यानि इच्छा शक्ति अपने पीछे चलाती है। अहंकार यानि क्रिया शक्ति भी उसी शिव की है पर व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र कर्ता मानकर सुखी-दुखी होता रहता है।ध्यान के जिस क्षण ये तीनों शक्तियां एक होकर अपने मूल स्रोत से  जुड़ जाती हैं तो जीवन में भक्ति और श्रद्धा के फूल सहज ही खिलते हैं। तभी साधक यह जान पाता है कि नित्य बदलने वाला जगत कभी मिलता नहीं और जो सदा एक सा है वह शिव स्वरूप आत्मा कभी नष्ट होता नहीं। 


Tuesday, March 16, 2021

हीरा जन्म अमोल है

 जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है। एक ज्ञानी उसे अपना ही विस्तार मानता है, भक्त उसे परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में देखता है।सामान्य जन उसे अपने सुख का साधन मानता है। कोई पत्थर में भी ईश्वर को देख लेता है तो किसी को जीवित मनुष्य में भी  जीवन नजर नहीं आता। यह दुनिया हमें वैसी ही नजर आती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यदि हमारा मन श्रद्धा से भरा है तो ऐसे ही लोगों की तरफ हमारा झुकाव होगा। संतों, महात्माओं व ईश्वर के प्रति सहज ही भीतर आकर्षण होगा। उनकी संगति से भीतर का कलुष धुल जाएगा और एक दिन वह सत्य जो सदा ही सबके भीतर विराजमान है, प्रकट हो जाएगा। अध्यात्म का अर्थ है आत्म जागृति, यानि स्वयं के बारे में सही-सही ज्ञान प्राप्त करना। उस स्वयं के बारे में जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, जिसमें दुनिया का ज्ञान कोई इजाफा नहीं करता, बल्कि जो भी हमने उसके ऊपर परत दर परत चढ़ा लिया है, उसे उतार देना है। जैसे कोई हीरा यदि मिट्टी की परतों से ढका हो तो उसे साफ करते हैं वैसे ही साधना के द्वारा स्वयं पर चढ़े इच्छाओं, अपेक्षाओं आदि के आवरण को धो भर देना है। 


Sunday, March 14, 2021

भए प्रकट गोपला दीन दयाला

 जीवन में यदि सत्य नहीं है तो हृदय में सत्यनारायण का वास कैसे होगा। हम कई बार मन में कुछ और होने पर अन्यों से कुछ और ही कहते हैं, इस तरह हम दूसरों को ही नहीं स्वयं को भी धोखा दे रहे होते होते हैं। परमात्मा हर घड़ी हमारे माध्यम से प्रकट होने के लिए व्याकुल है। वह राह ही देख रहा है। मानव का अंतर झूठ की परतों इतना ढक गया है कि उस पावन को वहाँ आश्रय ही नहीं मिलता। हम उसके होने के प्रमाण खोजते हैं और वह हमारी शुद्धता की राह देखता है। कोरोना का वायरस मानवता को शुद्ध बनाने के लिए ही संभवत: आया है। धरती, पानी, हवा सभी को अशुद्ध बना चुका है मानव क्योंकि मन की शुद्धता ही कहीं दब गई है। प्रकृति शुद्ध होगी जब मन पवित्र होगा। मन शुद्ध होगा जब भीतर कपट नहीं रहेगा। प्रकट तथा कपट कितने मिलते-जुलते शब्द हैं पर कितना विपरीत अर्थ रखते हैं। जो प्रकट है अर्थात सम्मुख है वह परमात्मा है पर कपट भरे मन के लिए वह अप्रकट ही रह जाता है। जीवन में जितनी पारदर्शिता व सत्य हो उतना ही देवत्व प्रकट होने में देर नहीं करता। 


Monday, March 8, 2021

एक यात्रा है यह जीवन

 जीवन एक यात्रा ही तो है। क्या यह यात्रा मात्र जन्म से मृत्यु तक की यात्रा है ? नहीं, यह यात्रा है जीवन से महाजीवन की, जड़ता से चैतन्यता की। विषाद से प्रसाद की, मूलाधार से सहस्रार की, जीवन से ब्रह्म की यात्रा है यह ! सुख-दुख के द्वन्द्व से आनंद की यात्रा, सापेक्षता से निरपेक्षता की भी। विभाजन से अखंडता की, द्वैत से अद्वैत की यात्रा है। उहापोह से परम विश्रांति की यात्रा भी है। लोभ से उदारता की यात्रा है, क्रोध से होश की भी। कामना से वैराग्य की यात्रा है जीवन तो माया से मायापति की यात्रा भी ! देह का जन्म एक वरदान है, देह की मृत्यु महा-वरदान है। मन का मिटना साधना का परिणाम है। जब मन थम जाता है तब आत्मा की अमरता का परिचय होता है। जिसके बाद लेने का भाव समाप्त हो जाता है और देने का भाव जन्म लेता है। वास्तविक जीवन का आरंभ तभी होता है, जिसे महाजीवन भी कह सकते हैं। 


शिव की करे जो मन उपासना

 शिवलिंग पत्थर से बनाया जाता है। जबकि शिव पदार्थ नहीं हैं, वे निराकार हैं, अमर हैं, शाश्वत हैं।  पत्थर का प्रयोग शायद इसी अमर्त्य को दिखाने के लिए किया जाता है क्योंकि   देह की अपेक्षा पत्थर अनंत काल तक रह सकता है। शिव का ज्योतिर्लिंग हमारी आत्मा का प्रतीक है। देहें ठोस दिखती हैं उनका रूप और आकार है। जो बना है वह मिटेगा ही। जो जन्मा है वह मरेगा ही। देह जन्मती है फिर मिटती है। इसके भीतर रहने वाली ज्योति ही शिवलिंग का प्रतीक है,  जो वास्तव में ठोस है. खुदाई में न जाने कब से बनाए शिवलिंग मिलते हैं, वे नहीं मरते। जब तक सृष्टि है, शिवलिंग की सत्ता रहेगी। उस आत्मज्योति को  ही जल चढ़ाते हैं। वही चेतना प्रेम और क्रोध दोनों है। शिव में समाई है शक्ति, जो सृजन करती है। पत्थर के एक-एक परमाणु में में अपार शक्ति है। हमारे भीतर भी अपार शक्ति है, विध्वंसात्मक और सृजनात्मक दोनों ही। दोनों को समुचित उपयोग में लाना है। तीनों गुणों से सम्पन्न है वह शक्ति, इसलिए बेल पत्र चढ़ाते हैं। कंटक चढ़ाते हैं ताकि तमस सीमा में  रहे, जल चढ़ाते हैं, ताकि रजस सीमा में रहे। शिव के साथ सभी भूत -प्रेत भी  दिखाते हैं, भूत अतीत  का प्रतीक है, मन में न जाने कितने जन्मों मे संस्कार हैं, अतृप्त कामनायें हैं जो राक्षस की भांति पीछे लगी हैं। शक्ति उन्हीं का संहार करती है। हर आत्मा का जीवन शिव और शक्ति की लीला है।

Friday, March 5, 2021

तोर मन दर्पण कहलाये

 मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है।  अपनी समझ के अनुसार ही हम निर्णायक बनते हैं, हमारी समझ कोई पूर्ण तो है नहीं। यदि भीतर क्रोध है तो वह बाहर आने का रास्ता खोजेगा। यदि भीतर काम है तो वह जगत में उसी को आरोपित करेगा। दृष्टि जैसी होगी सृष्टि वैसा ही रूप धर लेती है। यदि कोई दृष्टिकोण ही न हो तो दुनिया जैसी है वैसी ही दिखेगी, इससे हमारी शांति भंग नहीं होगी। इसलिए संत कहते हैं अहंकार को छोड़े बिना सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता। अहंकार है किसी भी उपाधि से स्वयं को पहचानना।  उपाधि का अर्थ है किसी वस्तु को स्वयं पर आरोपित कर लेना। आत्मा मुक्त है नित्य है उस पर देह को आरोपित करके स्वयं को मोटा, पतला, काला, गोरा, स्वस्थ, अस्वस्थ मानने लगते हैं। मन व बुद्धि को आरोपित करके स्वयं को सुखी-दुखी मानने लगते हैं। यदि न भीतर कोई आरोपण हो न बाहर ही, तो जीवन फूल की तरह हल्का व सुगंध बिखेरने वाला बन जाएगा।

Monday, March 1, 2021

समता यदि साध ले कोई

जीवन फूल की तरह नाजुक है तो चट्टान की तरह कठोर भी। पथरीले रस्तों के किनारे कोमल पुष्प खिले होते हैं और कोमल पौधों पर तीक्ष्ण कांटे उग आते हैं। यहाँ विपरीत साथ-साथ रहता है। शिव के परिवार में बैल और सिंह दोनों हैं, सर्प और मोर में सामीप्य है। जो विपरीत में समता बनाए रखना जानता है वह जीवन के मर्म को छू लेता है। हम ज्यादातर एक की तरफ झुक जाते हैं, जो संवेदनशील है वह छोटी-छोटी बातों को दिल से लगा लेता है और इसके विपरीत जो किसी बात की परवाह ही नहीं करता वह अहंकारी हो जाता है । यदि मध्य में रहना हो तो हमें एक साथ संवेदनशील और बेपरवाह होना सीखना होगा, दोनों जिस बिन्दु पर मिलते हैं उस मध्य में ठहरना सीखना होगा। उस मध्य के बिन्दु पर हम दोनों में से कुछ भी नहीं होते, लेकिन जिस क्षण जैसी आवश्यकता हो हम तत्क्षण वैसा व्यवहार करने में सक्षम होते हैं। इसके विपरीत यदि कोई एक सीमा पर है तो उसे दूसरी तरफ जाने में कितना समय लगेगा नहीं कहा जा सकता। इसी तरह कुछ लोग  बहुत ज्यादा बोलते रहते हैं, उन्हें अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रह जाता और कुछ को थोड़ा सा बोलना भी नागवार गुजरता है, वे दूसरी अति पर हैं। मध्य में स्थित हुआ जरूरत पड़ने पर घंटों बोल सकता है और जरूरत न होने पर मौन भी रह सकता है। समता का यह गुण ही योग साधना की सिद्धि है। 

 

Tuesday, February 23, 2021

सुख की जिसे न रहे कामना

हमारे कर्म बांधने वाले न हों, इसके लिए आवश्यक है कि हम उनसे न फल की आशा रखें और न ही उनका कोई संस्कार मन पर पड़ने दें। दो ही तरह से कर्म बंधनकारी है यदि वह भविष्य में कोई फल दे या बाध्य  होकर हमें पुन: उस कर्म को करना पड़े। उदाहरण के लिए यदि हमने किसी अखाद्य पदार्थ का सेवन किया तो उसका परिणाम रोग के रूप में मिलेगा तथा उसकी छाप मन पर पड़ जाएगी तथा भविष्य में हम पुन: उसे ग्रहण करने के लिए लालायित होंगे। यदि हमारी आदतें आज दुख का कारण हैं तो हमने ही उन्हें करते समय सुख की कामना की थी और इससे उनका संस्कार गहरा हो गया था। वास्तव में बांधती है सुख की कामना। यदि कोई चीनी का कण कहे, मुझे मीठा खाना है, तो कोई क्या कहेगा ? यदि कोयल कहे, मुझे पंचम राग सीखना है तो ? यदि फूल कहे मुझे खिलना है तो ? जो मिठास है वही तो चीनी है, जो पंचम सुर में गा सकती है वही तो कोयल है। पर हम सुख स्वरूप हैं इसे भुलाकर हमें सुख चाहिए का राग अलापते हैं। आत्मा स्वयं प्रेम स्वरूप है और इसके उसके दो मीठे बोलों की कामना करती रहती है। यदि कोई न दे तो हम अपमानित महसूस करते हैं। यह अपमानित महसूस करना ही कर्म का बंधन है जो हमने किसी से मीठे बोल बोलते समय अपने हृदय पर बांधा था। जबकि हृदय में प्रेम का सागर भरा है, पर उस बंधन के कारण वह गहराई में ही रह जाता है और हम जीवन के उत्सव में शामिल होने से वंचित ही रह जाते हैं। 

 

Sunday, February 14, 2021

मन की ताकत जो पहचाने

 

हमने न जाने कितनी बार यह पढ़ा है और सुना है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। हमारा भाग्य पल-पल हमारी सोच के द्वारा ही लिखा जाता है। अपने विचारों में यदि उच्चता, दृढ़ता और एकाग्रता हो तो हमारा जीवन स्वयं के लिए व औरों के लिए भी सहज, सरल और सुंदर होगा। किन्तु अक्सर हम पाते हैं विचार बिखरे हुए हैं, एक-दूसरे के विरोधी हैं और दृढ़ नहीं रह पाते। इसलिए जीवन भी उलझा हुआ, अस्पष्ट तथा दुरूह प्रतीत होने लगता है। इसका कारण है कि हमने मन की शक्तियों को कभी समझा ही नहीं, शास्त्र कहते हैं मन परमात्मा की तीन शक्तियों से सम्पन्न है, वे हैं इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति। जैसी इच्छा हमने जगायी, उसी के अनुरूप क्रिया जाने-अनजाने होने लगती है। उदाहरण के लिए यदि किसी के भीतर चोरी की इच्छा जगी तो उसके लिए वैसी ही परिस्थतियों का निर्माण हो जाएगा। बाद में वह कहता है कि उसने ऐसा नहीं किया, न जाने कैसे उससे हो गया, क्योंकि उस क्षण वह मन की उस कामना से बाहर था। मन जितना सकारात्मक होगा, जीवन में वैसी ही परिस्थितियाँ प्रकट होंगी, यदि नकार की तरफ झुका होगा तो उन्हीं घटनाओं व व्यक्तियों को जीवन में आकर्षित कर लेगा जो नकारात्मक हैं। वास्तव में हम मन नहीं हैं, आत्मा हैं, किन्तु जब तक यह अनुभव के रूप में नहीं आता, जब तक हम मन के घाट पर ही जीते हैं, पल-पल सचेत रहना होगा। जाने-अनजाने जो विचार भीतर चलते हैं वे ही वस्तु, व्यक्ति और घटना बनकर हमारे सम्मुख आते रहेंगे।

Monday, February 8, 2021

निज संस्कृति का सम्मान करे जो

 आज भारत में कोरोना से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या अन्य देशों की तुलना में काफी कम है और स्वस्थ होने की दर भी अधिक है. काफी हद तक इसका श्रेय जन-जन में बसे आयुर्वेद के ज्ञान को दिया जा सकता है. हम बचपन से ही घरेलू वस्तुओं जैसे अदरक, हल्दी, हींग, तुलसी, त्रिफला, मुलेठी, अजवायन, जीरा, सौंफ आदि का  सामान्य रोगों के लिए उपयोग करते आ रहे हैं. किसी वस्तु की तासीर या प्रकृति गर्म है या ठंडी इसका निर्देश वास्तव में आयुर्वेद में ही दिया गया है.  भारतीय संस्कृति विश्व की पुरातन संस्कृति होने के साथ-साथ अपने भीतर ज्ञान के अथाह सागर को समेटे हुए है. इसके मूल स्रोत और आधार वेद हैं. इन्हीं वेदों का एक उपवेद  आयुर्वेद विश्व का प्राचीनतम चिकित्सा शास्त्र है. आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना है और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है. इसमें इलाज से भी ज्यादा महत्व पथ्य-अपथ्य को दिया जाता है. इसके अनुसार पहले रोग उत्पन्न करने वाले कारणों का त्याग करना चाहिए.यह बताता है कि रोग से कैसे बचा जाए और यदि रोग किसी कारण से हो भी जाये तो उसे पूरी तरह से कैसे दूर किया जाये. इस पद्धति व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है जिससे उस पर रोग का आक्रमण ही न हो. अस्वस्थ होने पर रोग के मूल कारण को पहचान कर पहले उस कारण को  दूर किया जाता है, केवल रोग के लक्षणों को दूर करके रोगी को आराम नहीं पहुंचाया जाता. आज जरूरत है कि हम आयुर्वेद से अधिक से अधिक परिचित हों और घर-घर में मिलने वाली इन औषधियों के प्रयोग से स्वयं को सबल बनाएं. 


Wednesday, February 3, 2021

स्व में टिकना सीख गया जो

 हम सबने सुना है ‘पहला सुख निरोगी काया’ अर्थात स्वास्थ्य से बड़ा सुख नहीं. यह भी सही है कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है. यदि शरीर में कोई रोग हो तो मन बार-बार उसी का चिंतन करता है, वह एकाग्र नहीं रहता, ऐसे मन से ध्यान करना सम्भव नहीं और ध्यान के बिना ‘स्व’ में स्थिति नहीं हो सकती. वास्तव में जो ‘स्व’ में  स्थित है वही स्वस्थ है. स्व में स्थित रहने के लिए मन के पार जाना होगा. मन के पार जाने के लिये  मन को शांत रखना होगा अर्थात किसी भी तरह का मानसिक उद्वेग न हो. इसीलिए योग साधना में पहले आसन व प्राणायाम द्वारा तन को सबल बनाया जाता है. नियमित दिनचर्या और उचित आहार-विहार से ही वह सम्भव है. जीवन में जो भी कष्ट आते हैं वे सीख देकर हमें आगे ले जाने लिए होते हैं. सुख और दुःख हमारे कर्मों के फलस्वरूप हमें मिलते हैं, पर सुखी या दुखी होना हम पर निर्भर करता है. सुख को देखकर यदि कृतज्ञता का भाव भीतर जगा और दुःख को देखकर समता को बढ़ाना सीखा तब भी  ‘स्व’ में स्थिति होने लगती है. 


Sunday, January 24, 2021

जहाँ विजय है लोकतंत्र की

कल देश का बहत्तरवाँ गणतंत्र दिवस है, कोरोना के कारण इस बार परेड में कुछ बदलाव हुए हैं, मुख्य अतिथि भी नहीं आ रहे हैं। राजधानी में किसानों के आंदोलन के कारण भी कुछ अनिश्चितता का वातावरण है। किन्तु कुछ भी हो, देश वासियों के दिलों में गणतंत्र दिवस मनाने का जोश उतना ही है। पिछले एक वर्ष में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था, लंबा लॉक डाउन, मजदूरों की घर वापसी, कोरोना के कारण अस्पतालों में मरीजों की बेतहाशा भर्ती, आर्थिक मंदी, स्कूलों का बंद होना और भी कितनी कठिनाइयों को झेलते हुए यह पिछला वर्ष पूरी दुनिया के लिए एक चिंता की वजह छोड़ गया है। इन सबके बावजूद मानव आगे की ओर देख रहा है,  वैक्सीन का निर्माण हो चुका है, कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण हो चुका है। भारत विश्व के कई देशों को इसकी वैक्सीन भेजने में सक्षम है, यह बात भी हमारे लिए कितने गर्व की है। एक बार फिर राजपथ पर सुंदर झाँकियाँ, बच्चों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सैन्य बलों का प्रदर्शन एक बार फिर यह सिद्ध कर देगा कि आपदा चाहे कितनी भी भीषण क्यों न हो मानवता अपना मार्ग ढूंढ ही लेती है। अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो उजाले को रोक नहीं सकता। बांग्ला देश की आजादी की स्वर्णजयंती के अवसर पर वहाँ का एक सैन्य बैंड भी गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेगा।  

 

Thursday, January 21, 2021

सुमन बनेगा जिस क्षण मन यह

 

एक पुष्प का जीवन भी तो पंच तत्वों से ही बना है। धरती ने उसे आधार दिया। जल तथा सूर्य की किरणों ने आहार दिया। पवन के झोंकों ने प्राण दिए तथा प्रेम से सहलाया,  हिलाया-डुलाया। गगन में वह विस्तार पाता है, यदि इनमें से कोई एक भी न हो तो फूल की यात्रा अधूरी ही रह जाएगी। फूल का एक नाम है सुमन अर्थात ऐसा मन जो फूल के समान खिला हो या सुंदर हो ! जो मन धरा से जुड़ा है अर्थात सहनशील व धैर्यवान हो, जल की भांति गतिमान हो, प्रकाश की भांति सदा आगे ही बढ़ने का संकल्प जिसमें हो, गगन की भांति सबको अपने भीतर समेटने की क्षमता रखता हो, पवन की नाईं  उसका परस औरों के लिए सुखदाई हो और जीवन का पोषक हो। किसी मीरा या कबीर का ऐसा सु-मन ही फूल की तरह परम के चरणों में चढ़ाए जाने योग्य है।

Wednesday, January 20, 2021

खाली क्यों है मन की गागर

 मन की गागर को जितना भी भरा जाये, वह खाली ही रहती है. वास्तव में मन की पेंदी ही नहीं है और हम एक असाध्य कार्य में लगे हैं. कोई संगीत से इसे भरना चाहता है तो कोई सुस्वादु भोजन से, कोई विभिन्न स्थानों की सैर करके तो कोई बड़ा सा घर बनाकर, कोई किताबों में उस रिक्तता का हल खोजता है तो कोई दिन रात काम में व्यस्त रहकर भीतर के खालीपन को भुलाना चाहता है. सन्त और शास्त्र कहते हैं मन का स्वभाव ही अपूर्णता है. यदि कोई जीवन की पूर्णता का अनुभव वास्तव में करना चाहता है तो उसे मन के इस स्वभाव को जानना होगा, मन नाम ही उसी का है जो सदा डोलता रहता है, कभी वर्तमान में ठहरता ही नहीं. हमने स्वयं को मन के साथ इस तरह एक कर लिया है कि उसकी अपूर्णता को हम स्वयं की अपूर्णता मान बैठे हैं. ध्यान में ही हमें मन से स्वयं का अलगाव महसूस होता है और विचारों को देखना हम सीखते हैं. ध्यान का अभ्यास बढ़ते-बढ़ते एक अवस्था ऐसी आती है जब विचारों का हम पर कोई प्रभाव नहीं रहता, वे आकाश में आने जाने वाले बादलों की तरह आते और जाते हैं. आगे जाकर हम देखते हैं कि विचारों को हम किस तरह क्षण भर में परिवर्तित कर सकते हैं. चिंता, तनाव आदि शब्द तब बेमानी हो जाते हैं. एक ही विचार को बार-बार मन में लाना ही तो चिंता है, जब हम नकारात्मक विचार आते ही उसे बदल दें तो मन हमारे नियंत्रण में आ गया. अब उसे भरने की फ़िक्र नहीं करनी है क्योंकि हम सदा ही पूर्ण हैं.  


Sunday, January 17, 2021

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

 

जिस सृष्टि का निर्माण हमने ही किया है, हम उसे ही न जानें और उससे ही प्रभावित हो जाएं, यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है ! बाहर की तरह अपने भीतर हर पल हम एक वातावरण का निर्माण करते हैं जो विचारों और भावनाओं से बना है। हम ही उसका संवर्धन भी करते हैं और कुछ समय बाद उसका संहार भी कर देते हैं। हमारी सृष्टि हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को ही तो प्रदर्शित करती है। यदि यह सुखद नहीं है तो भी हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। जिसे भाग्य कहा जाता है वह एक दिन हमारे ही द्वारा किए गए पुरुषार्थ से जन्मा है।

Tuesday, January 12, 2021

जीवन का अधिकार सभी को

 जीवन की कितनी ही परिभाषाएँ दार्शनिकों और साहित्यकारों तथा अनेकों ने दी हैं. कोई इसे यात्रा कहता है तो कोई घटनाओं का एक क्रम। कोई कहता है जीवन सीखने का नाम है, आगे बढ़ने का नाम है. किसी ने यह भी कहा है कि जीवन एक पुस्तक है जिसे पढ़ना सदा ही शेष रहता है. आज तक हमारे जीवन में जो भी घटा है वह अनुभूत हो चुका है किन्तु अगले ही पल क्या होने वाला है, कोई नहीं जानता। जीवन की पुस्तक का अगला पन्ना जब खुलेगा तभी उसे पढ़ सकते हैं. वैज्ञानिक और भविष्यवक्ता अवश्य पूर्वानुमानों के आधार पर अवश्य कुछ सुझाव देते रहते हैं, पर हम उन पर ज्यादा ध्यान नहीं देते. जलवायु परिवर्तन और महामारियों के बारे में भी पहले कितनी ही बार सचेत किया गया है, किन्तु इक्कीसवीं सदी में भी विकसित देश युद्ध और हथियारों में धन लगाना ज्यादा आवश्यक समझते रहे हैं. आवश्यकता है कि सभी देश आपसी विवादों को सुलझाकर पूरी धरती को एक परिवार मानकर हरेक को सम्मान से जीने का अधिकार दें, क्योंकि  आज के हालातों में विश्व का कोई भी देश अपने बलबूते पर किसी समस्या का सामना नहीं कर सकता. 


Tuesday, January 5, 2021

कर्ताभाव का त्याग करे जो

भगवद्गीता में एक जगह अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है, ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है ? और कर्म क्या है ? कृष्ण कहते हैं जो परम है अर्थात सर्वश्रेष्ठ है; जो  अक्षर है अर्थात अविनाशी है; वही ब्रह्म है. हम अपने आसपास वस्तुओं को नित्य बनते-नष्ट होते देखते हैं, लोगों को जन्मते व मरते देखते हैं, क्या ऐसा कुछ है जो कभी नष्ट नहीं होता. वास्तव में वस्तुएं अपना रूप बदल लेती हैं, बीज नष्ट होता है तो वृक्ष बन जाता है, वृक्ष नष्ट हो जाता है तो अंततः खाद बनकर मिट्टी में ही मिल जाता है. विज्ञान में हमने पढ़ा है कि ऊर्जा और पदार्थ न बनाये जा सकते हैं न नष्ट किये जा सकते हैं, केवल उन्हें परिवर्तित किया जा सकता है. ब्रह्म ऐसा पदार्थ या ऊर्जा है जो सदा एक सा है. दूसरे प्रश्न के उत्तर में कृष्ण कहते हैं, स्वभाव ही अध्यात्म है. हर प्राणी का मूल स्वभाव जो शिशु जन्म से अपने साथ लेकर आता है, अध्यात्म है. जब तक बच्चा भाषा नहीं सीख लेता वह स्वभाव से ही संवाद करता है, प्रकृति में सभी जीव उसी मूल स्वभाव से जुड़े हैं, एक बिल्ली अथवा कुत्ते को कैसे ज्ञात हो जाता है कि उसे स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए कौन सा पत्ता खाना है. संत मौन से ही वृक्षों के साथ संवाद कर लेते हैं क्योंकि वह निज स्वभाव में रहते हैं. कर्म की परिभाषा में कृष्ण कहते हैं, भूतों के भाव का त्याग ही कर्म है, अर्थात जब हम अपने मूल स्वभाव से हट हो जाते हैं तो कर्ता भाव में आ जाते हैं. कितने ही साधक कहते हैं साधना काल में मन शांत रहता है पर कर्म करते समय मन विचलित हो जाता है. इसका अर्थ है कि हम अध्यात्म से नीचे उतर गए. इसीलिए कृष्ण निष्काम कर्म करने के लिए कहते हैं जो आत्मा में स्थित रहकर किया जा सकता  है तथा जिसका कोई बन्धन नहीं होता.