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Monday, April 25, 2022

जीवन में जब रंग भरेगा


हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं. 


Sunday, October 10, 2021

उसको अपना माना जिसने


संत कहते हैं, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीवन जीने की कला है. हम  स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से हम सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. तब कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को हमसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है,  विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा सभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !


Friday, August 4, 2017

निज श्रम से ही भाग्य बनेगा

५ अगस्त २०१७ 
योग शब्द का एक अर्थ है जुड़ना अथवा जोड़ना. पहले देह को मन से फिर मन को आत्मा से और अंत में परमात्मा से जोड़ना है. आत्मा बीज रूप में सबके भीतर है पर योग द्वारा ही उस तक पहुंचा जा सकता है. इसके लिए मन की धरती पर उस बीज को बोकर साधना के जल से सींचा जाता है. अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भक्ति से, कोई ज्ञान से तथा कोई निष्काम कर्म से इस पौधे को बड़ा करता है. तीसरे यम ‘अस्तेय’ का पालन सभी के लिए आवश्यक है. ‘अस्तेय’ का शाब्दिक अर्थ है चोरी न करना. चोरी शब्द का यहाँ बहुत व्यापक अर्थ है, किसी की अनुपस्थिति में उसकी वस्तु का उपयोग भी चोरी ही कहा जायेगा. कम श्रम के बदले अधिक धन की लालसा, कर्तव्यों से पीछे हटना, व्यापार में ज्यादा मुनाफा कमाना, दूसरों के विचारों की चोरी भी स्तेय में आएगा. यदि मन में कहीं भी चोरी का संस्कार है, तो वह अन्यों के प्रति संदेह भी जगाता है. साधक को मन की निर्मलता के लिए किसी भी रूप में बिना अर्जित की हुई वस्तु का लोभ नहीं रखना चाहिए. 

Tuesday, February 4, 2014

मन तू ज्योति समान अपना मूल पिछान

जुलाई २००५ 
हमारा जीवन जिन वस्तुओं से महत्वपूर्ण बनता है, उनमें सबसे प्रमुख है प्रेम ! भीतर जब प्रेम भरा रहता है तो बाहर सभी कुछ सरल हो जाता है और प्रेम जब हृदय का वासी बन जाता है तो बाहर एक शांति स्वतः ही प्रकट होती रहती है. हमारा मन तब समाधान पाना सीख लेता है. नम्रता से अहंता को, क्रोध को अक्रोध से, हिंसा को अहिंसा से जीतने की कला सीख लेता है. सार्थक चेष्टा से व्यर्थ अपने आप गिर जाता है, सार्थक चिन्तन से विषाद दूर हो जाता है. जो मन असत्य, परदोष दृष्टि तथा आत्मप्रशंसा को त्याग देता है, उसकी वाणी के दोष भी समाप्त होने लगते हैं. भ्रम दोष, प्रमाद दोष और लिप्सा दोष वाणी के दोष हैं. जिसके बारे में पूर्ण जानकारी न हो, ऐसी वाणी बोलना ही भ्रम दोष है, असजग होकर कहे गये वाक्य भूल से भरे होंगे. लोभ बढ़े तो वाणी का असर नहीं होता. ऐसा मन ही हमें भगवद्प्रेम का अनुभव करा सकता है, आत्मा को प्रकट करने के लिए सहायक हो सकता है. वह अपने मूल को पहचानने लगता है, वह भीतर जाने लगता है. 

Sunday, July 7, 2013

दुनिया रंग रंगीली माधो...

अक्तूबर २००४  
लोभ सूक्ष्म रूप से हम पर आक्रमण करता है, हम सोचते हैं कि निष्काम कर्म कर रहे हैं, अथवा तो सेवा कार्य कर रहे हैं, पर उसके मूल में लोभ ही होता है, सम्मान का लोभ, सुविधा का लोभ, अपनी नजरों में अच्छा बनने का लोभ. साधक को इसके जाल से बचना होगा. लोभ की हल्की सी रेखा मानस को दूषित कर  देती है. अपने मन का चैन गंवा कर यदि कोई कुछ पा भी ले तो व्यर्थ है, यह जगत एक स्वप्न है, इसकी अनुभूति हो जाने के बाद भी वह हमें भरमा लेता है, एक खिलौना दिखाकर जैसे हम बालक को भ्रमित कर देते हैं, उसी तरह. बाहर का सम्मान, लाभ हमारे भीतर के लोभ का ही मूर्त रूप है, वास्तव में बाहर जो भी हमारे साथ साथ घटता है, भीतर का प्रतिफलन ही है. जिस कार्य को किये बिना, जिस वाक्य को सोचे बिना, जिस जिस बात को बोले बिना हमारा काम चलता हो उसे न करना, न सोचना, न बोलना ही अच्छा है. अपने विवेक का आश्रय लेकर हर घटना से कुछ न कुछ सीखते हुए आगे बढ़ना है, ताकि अपना लक्ष्य और निकट आ जाये. वह जो निकट से भी निकटतम है, वही कभी दूर हो जाता है.

Sunday, January 20, 2013

बलिहारी गुरु आपने

फरवरी २००४ 
अंतररूपी गहन तिमिर को हटाने सदगुरु रूप सूर्य जीवन में आता है. इस सूर्य को अंतर के प्रेमाश्रुओं का अर्क चढ़ाना है. भावना का तिलक लगाना है, अपने विचार पुष्पों को उन्हें समर्पित करना है. उनका जीवन जो शुद्ध मणि के समान चमचम चमक रहा है हमें सहज ही उनकी और आकर्षित करता है, उन आँखों की मस्ती हम पर असर डालती है. वह हमें हमारा परिचय कराने आते हैं, मनों पर छाये कल्पनाओं के जाल को तोड़ने आते हैं, वह सत्यस्वरूप हैं, उनमें हम अपने अंतर की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से देख पाते हैं, भय, हिंसा और लोभ को जान पाते हैं. यह जानकारी ही भीतर एक परिवर्तन लाती है. सहज रूप से हमरे स्व का विस्तार होने लगता है और भीतर का आनंद प्रकट होने लगता है.

Friday, January 4, 2013

भक्ति परम धन है


जनवरी २००४ 
भक्त को लगता है, परमात्मा हर पल उसके साथ है. ऑंखें मूंदते ही उसकी छवि प्रकट होती है, कानों में उसका स्वर गुंजित प्रतीत होता है. तन में प्राणों के रूप में वही विचरण करते प्रतीत होते हैं. वही सद्गुरु के रूप में आकर चेताते हैं. उसे लगता है, भीतर शील, सदाचार, प्रेम, क्षमा, दया, शांति का विकास हो रहा है तथा प्रमाद, क्रोध, मोह, लोभ, इर्ष्या आदि का नाश हो रहा है. ऐसा वह चाहते हैं वह जानता है, तभी वह ईश्वर के निकटतर हो जायेगा. ऐसा भक्त क्या हममें से हर कोई न बनना चाहेगा. न चाहते हुए भी जाने कितने अशोभनीय विचार हमारे भीतर उठते हैं, जाने कितने जन्मों के संस्कार दबे हैं भीतर, पर कृष्ण हमें तब भी प्रेम करते हैं, उनका प्रेम अहैतुक है, क्योंकि वह और कुछ कर ही नहीं सकते.