संत व शास्त्र कहते हैं, विद्यामाया विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म ईश्वर की उपाधि ग्रहण करता है और अविद्यामाया विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म जीव की उपाधि ग्रहण करता है। जीव और ईश्वर का एकत्व उनके ब्रह्म होने में है और भेद विद्या और अविद्या के कारण है। ईश्वर माया का अधिपति है और जीव माया का सेवक है। ईश्वर योगमाया का उपयोग करके जगत का कल्याण करता है, जीव महामाया के वशीभूत होकर विकारों से ग्रस्त हो जाता है। ईश्वर सदा अपने चैतन्य स्वरूप को जानता है, जीव स्वयं को जड़ देह और मन आदि मान लेता है। जिस क्षण जीव को अपने ब्रह्म होने का भान हो जाता है, वह ईश्वर से जुड़ जाता है।
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Tuesday, June 27, 2023
Monday, April 25, 2022
जीवन में जब रंग भरेगा
हमारा मूल स्वभाव प्रेम है, लेकिन उस तक हमारी पहुँच ही नहीं है. जिस देह-मन के साथ हमने तादात्म्य कर लिए है, वह इसके विपरीत है. मन बटोरना चाहता है, वह सदा भयग्रस्त रहता है, वह अन्यों से तुलना करता है. मन प्रकृति का अंश है, जो सदा बदलती रहती है, इसलिए मन के स्तर पर बने सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता, वे कभी प्रेम तो कभी क्रोध से भर जाते हैं. मन जिस स्रोत से प्रकटा है, वह आत्मा सदा एक सी है, वह आकाशवत निर्द्वन्द्व एक असीम सत्ता है, वहाँ अनंत आनंद व अनंत प्रेम है. उसका ज्ञान होने पर तथा उसके साथ तादात्म्य करने पर हमारा सारा भय खो जाता है, हम लोभ, क्रोध, मोह आदि विकारों के शिकार नहीं होते. हम मन की माया के पार चले जाते हैं. अपने आप से मुलाकात होती है. प्रह्लाद का जन्म होता है और विकारों की होली जलती है, तब जीवन में रंग ही रंग भर जाते हैं.
Friday, September 28, 2018
शक्ति ही शिव तक ले जाये
२९ सितम्बर २०१८
दिन उगता है और
समाप्त हो जाता है, रात्रि के आँचल में प्रकृति शांत होकर सो जाती है. हम भी दिन
भर के कार्यों के बाद देह और मस्तिष्क को विश्राम देने के लिए सो जाते हैं. नींद
में हम कहाँ होते हैं, किसी को नहीं पता, गहरी निद्रा में न किसी को अपने होने का भान
रहता है, न अपने ज्ञान और ऐश्वर्य का, उस समय राजा और रंक मानो एक हो जाते हैं. नींद
में ही स्वप्न काल भी होता है, कभी अतीत के कभी भविष्य के और कभी अपने वर्तमान
जीवन से जुड़े विचार स्वप्न बनकर हमें दिखाई पड़ते हैं. जागृत अवस्था में जो मन में संकल्प
उठते हुए देखता है, स्वप्न अवस्था में जो दृश्य देखता है, निद्रा में जो सुख का
अनुभव करता है, वह द्रष्टा स्वयं अनदेखा ही रह जाता है. संत कहते हैं, इतने बड़े
मायाजाल का एक ही प्रयोजन है उस मायापति से नाता जोड़ लेना जो इस द्रष्टा को चेतना
प्रदान करता है. नवरात्रि का उत्सव इसी संदेश को लेकर बार-बार आता है, शक्ति की
उपासना करके हम शिव तक पहुँचें.
Tuesday, December 19, 2017
माया के जब पार हो सकें
२० दिसम्बर २०१७
मन ही माया है. सृष्टि जैसी है वैसी ही यह देखने नहीं देता. जैसे
सावन के अंधे को हर जगह हरा ही हरा दिखाई पड़ता है वैसे मन के द्वारा छली गयी आत्मा
को जगत में दोष ही दोष दिखाई पड़ते हैं. मन अपनी मान्यताओं और कल्पनाओं के जाल में
उलझ कर जगत को वैसा ही दिखाता है जैसा वह देखना चाहता है. ध्यान है मन के पार जाने
की कला, स्वयं को अपने मूल रूप में जानने और कुछ पलों के लिए उसमें स्थित होकर
शक्ति पाने की कला. भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, मेरी माया के पार जाना हो तो मेरी
शरण में आना होगा. कृष्ण की शरण में ध्यान में ही जाया जा सकता है. स्तुति, जप
अथवा श्वासों पर मन को टिकाना, किसी भी विधि का उपयोग करके मन को स्थिर किया जा
सकता है और शांत और एकाग्र हुआ मन ही स्वयं में विश्राम कर पाता है. विश्राम के
क्षणों में प्राप्त हुई शांति उसे सुकृत्य के लिए प्रेरित करती है.
Friday, July 7, 2017
नये संस्कार उगें जब मन में
१० जुलाई २०१७
कभी-कभी न चाहते हुए भी हमसे ऐसे कृत्य हो जाते हैं, जिन पर बाद में पश्चाताप
होता है. कभी मुख से ऐसे वचन निकल जाते हैं जिन्हें बोलने के बाद हमें लगता है,
इनकी जरूरत ही नहीं थी. इनका कारण हमारे भीतर के क्रोध आदि विकार हैं, जो जरा सी परिस्थिति
भी अनुकूल पाते ही सिर उठा लेते हैं अथवा तो जब उनके फल देने का वक्त होता है,
परिस्थिति पैदा कर लेते हैं. क्रोध, मान, मोह, माया आदि पूर्व कर्मों के फल हैं. भीतर
जो भी भाव उठते हैं वे संस्कारों के कारण होते हैं, संस्कार पूर्वकर्मों के अनुसार
होते हैं, हमें उनसे प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है. स्वयं का ज्ञान होने पर
ही यह पता चलता है. आत्मा के गुणों के आधार पर जो कर्म हम करते हैं, वे ही नये
संस्कार बनाते हैं, अन्यथा हम बार-बार पुराने ढंग से ही जिए चले जाते हैं. सम्मान कभी भी वर्चस्व से नहीं समानता से प्राप्त किया जाता
है, प्रेम और परोपकार से प्राप्त किया जाता है.
Friday, December 30, 2016
जाना है माया के पार
३१ दिसम्बर २०१६
वेदांत दर्शन के अनुसार जीव, ब्रह्म और माया ये तीन ही तत्व हैं. ब्रह्म माया पर शासन करता है और माया जीव पर. जब जीव भी माया के पार चला जाता है, ब्रह्ममय हो जाता है. अभी हम माया से बंधे हैं, माया का अर्थ है जगत के प्रति आसक्ति और मोह. हम जगत को अपने सुख-दुःख कारण मानते हैं. साधना करते -करते यह ज्ञान होने लगता है कि जगत नहीं हम स्वयं ही अपने सुख-दुःख के कारण हैं. यह ज्ञान होते ही या तो कोई आत्मग्लानि में चला जाता है अथवा तो प्रार्थना उसके जीवन में उतरती है. इसके बाद ही यह ज्ञान होता है कि यदि सुख-दुःख के कारण हम ही हैं तो उनसे मुक्ति भी हमारे हाथ में है, मुक्ति का बोध होते ही माया के पार जाकर ब्रह्म के साथ एकत्व का अनुभव होने लगता है. सतत साधना करते-करते यह अनुभव टिकने लगता है और तब कमलवत रहना सम्भव हो जाता है. नये वर्ष में प्रवेश करने से पूर्व क्यों न हम यह संकल्प लें कि आने वाले वर्ष में हम नियमित साधना करेंगे.
Thursday, April 24, 2014
मन माया के पार है वह
जनवरी २००६
‘जो फैलता है वही जानने
योग्य है’. मन जब फैलता है तो वह माया के पार चला जाता है, वह आत्मा ही हो जाता
है, पर वही मन जब सिकुड़ जाता है तो माया हो जाता है. हमारा मन ही संकल्प-विकल्प
गढ़ता है और स्वयं ही उसके द्वारा सुखी-दुखी होता है, मन से पार जाने पर ही वह
मिलता है जो फैलता है. मन की माया ही संसार से संबंध जोड़ती है, संसार में जाते ही
मन एक से अनेक हो जाता है. जैसे एक पेड़ हमें भिन्न अवसरों पर भिन्न तरह से दिखाई
देता है. मन जब भीतर जाता है तभी वह एक हो पाता है, तभी वह शरण में जाता है. मन से
धीरे-धीरे पीछे पीछे हटना ही भीतर जाना है और तभी हम माया के पार जाते हैं.
Monday, March 31, 2014
रस की खान को लें पहचान
नवम्बर २००५
भगवद
प्राप्ति की प्यास जब जिधर भी जगी, वहीं से माया का लोप होने लगता है. यह प्यास
भीतर से आती है, बुद्धि की पहुंच आत्मा तक नहीं है. आत्मा शाश्वत सुख का स्रोत है.
जैसे शक्कर को मिठास खोजनी नहीं पडती वैसे ही आत्मारामी को सुख की खोज नहीं करनी
है. जब ऐसी मंगलमय घड़ी साधक के जीवन में आती है, वहाँ कोई द्वैत नहीं रहता, कोई
भेदभाव नहीं बचता. सब शुभ होता है. यह जगत निर्दोष दिखाई देने लगता है. किन्तु यह
प्यास भीतर जगे इसके लिए पुरुषार्थ हमें ही करना है. इसे भाग्य के सहारे नहीं छोड़ा
जा सकता. एक बार साधक के भीतर की सुप्त शक्ति जाग्रत हो जाये तो उसकी दिशा
स्वयंमेव बदल जाती है. संसार की सत्यता स्पष्ट हो जाती है और दिव्यता की मांग भीतर
से उठने लगती है.
Wednesday, January 8, 2014
वंशीधर घट घट का वासी
जून २००५
धैर्य खोकर
हम हमारे छोटे से दुःख को भी बड़ा बना लेते हैं और धैर्य रखकर बड़े दुःख को तिलमात्र
का ! हम लोगों के बारे में एकतरफा राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार उनसे व्यवहार
करते हैं, यही माया है, चीजें जैसी हैं वैसी ही दिखने लगें तभी समझना चाहिए कि
माया से मुक्त हुए. हम स्वयं को कुछ ज्यादा ही महत्व देते हैं, यह दुनिया हमारे
बिना भी बेहतर ढंग से चल रही थी और हमारे न होने पर भी चलती रहेगी. जब तक हमें
अपना पता नहीं है तब तक जो कुछ भी हमारे साथ होता है वह हमारे लिए उस परमपिता
परमेश्वर ने ही ही रच है, इस भावना से यदि हम भावित रहें तो कोई द्वंद्व नहीं
होगा. मृत्यु से पहले हमें खुद को जानना है यह लक्ष्य याद रहे तो समय का सदुपयोग
होगा. हमारा जीवन प्रभु की अनमोल देन है उसी
की धरोहर है यह भाव दृढ होते ही वह हमारे, प्राणों में अपनी बांसुरी के स्वर भर
देता है. नयनों में अपना प्रकाश. उससे मिले कई युग बीत गये हों पर वह कभी दूर गया
ही नहीं.
Monday, September 2, 2013
स्वयं के पास हुआ सो मुक्त
फरवरी-२००५
‘उपवास’ का अर्थ है ईश्वर के निकट वास
करने का दिन, अपने आप में रहने का दिन, एकत्व को अनुभव करने का दिन, इसको अनुभव के
स्तर पर जीने का दिन, जहाँ कोई भेद न हो वहाँ शांति होती है, जहाँ दो हुए वहाँ से
दुखों का आरम्भ होता है. शांति से सामर्थ्य का जन्म होता है तब जो कर्म हम करते
हैं वे बांधते नहीं. प्रकृति के गुण गुणों में बरत ही रहे हैं, इन्द्रियां अपने
सहज स्वाभाविक धर्म के अनुसार कार्य कर रही हैं, हम शुद्ध, बुद्ध निर्मल ऊर्जा के पुंज
हैं, यह भाव आज के दिन तो होना चाहिए और यही सत्य है. हम स्वयं ही असत्य के पीछे
दौड़ते हैं,, फिर धोखा खाने पर दुखी होने का नाटक करते हैं, इसलिए इस जगत को माया
जाल कहा गया है. यहाँ मानव स्वयं ही जाल बनाता है, उसमें फंसता है फिर छूटने का
प्रयत्न करते हुए स्वयं को अपनी वीरता पर शाबाशी अथवा तो अपनी निरीहता पर संवेदना
देता है. स्वयं पर दया दिखाता है या कठोर होता है, जबकि सारा खेल उसी का रचा हुआ
है. इसी खेल को खेलते–खेलते कितनी सदियाँ कितने जन्म गुजर जाते हैं.
Tuesday, March 19, 2013
साहेब मेरा एक है
जून २००४
परमात्मा ने मानव को तथा इस सृष्टि
को अपने भीतर के आनंद को प्रकट करने के लिए सिरजा है, लेकिन हम अंधे मनुष्य की
भांति स्वयं ही गड्ढे में गिरते हैं, काँटों से उलझते हैं और फिर कहते हैं दुनिया
दुःख स्वरूप है. दुनिया दुःख रूप तभी तक है जब तक हम अज्ञान में हैं, जब तक हम स्वयं
को अन्यों से पृथक समझते हैं, यही माया है. स्वयं को जाने बिना हम इससे मुक्त नहीं
हो सकते. साधक जब मन को प्रेरणादायक विचारों से भर लेता है तो भीतर और माधुर्य
उभरता है, जैसा बीज हम धरती में बोते हैं, वैसा ही फल हमें प्राप्त होता है. हमें
अंतिम सत्य की तलाश है, ईश्वर का अनुभव हम करना चाहते हैं, समाधिस्थ होना चाहते
हैं, अनवरत शांति के उस स्रोत से जुड़े रहना चाहते हैं, जो हमारे भीतर है, जो
परमसत्य है तो मन को समाहित करना होगा, मन तभी समाहित होगा जब उसमें द्वैत न हो,
जब सम्पूर्ण जगत से हमारा एक्य हो जाये, जब भीतर कोई विरोध न हो, उद्वेग न हो, जब
जो जैसा हो, वैसा का वैसा ही स्वीकार करने का सामर्थ्य हो.
Monday, October 15, 2012
छुप गया कोई रे..
सितम्बर २००३
उपनिषदों के अनुसार पहले ‘एक’ था, ‘एक’ से अनेक हुए. उस ‘एक’ को अकेलापन खला होगा जो
उसने अपने समान अनेकों को रचा. प्रकृति पर दृष्टिपात करके उसमे चेतना का संचार
किया, एक विभु आत्मा से अनेकों अणु आत्माओं की सृष्टि हुई, जो उसके सान्निध्य में प्रसन्न
थीं, फिर उसे एक खेल सूझा, आँख मिचौली का खेल. हमारी आँखों पर माया की पट्टी बांध दी
और स्वयं को खोजने को कहा, सभी भिन्न-भिन्न स्थानों पर सुख, शांति, प्रेम व आनंद
की तलाश करते हैं, क्योंकि यही तो उसकी पहचान है, पर वह बार-बार कहता है, “नहीं,
मैं यहाँ नहीं हूँ”. मानव उसे बाहर खोजता रहता है पर वह छिप गया है उसके भीतर ही कहीं
गहराई में. जो पट्टी खोलकर थोड़ी सी झलक पा लेता है, वह जान जाता है. उनका अनुभव
यदि हमारा भी अनुभव बन जाये तो हम भी जान जायेंगे कि यह जो न मालूम सी प्यास हृदय
में जगी है, यह जो उत्कंठा, व्याकुलता, यह जो कसक, कचोट, यह जो एक फांस सी दिल में
अटकी है, यह उसी की चाहत है, हमारी आशाओं, आकाँक्षाओं का केन्द्र वही तो है,
एकमात्र वही !
Friday, October 12, 2012
वह छुप न सकेगा परमात्मा
सितम्बर २००३
अनंत-अनंत ब्रह्मांडो का रचियता वह परब्रह्म रसमय है. जिसकी सत्ता से सृष्टि अनंत काल
से चली आ रही है, न जाने कितनी बार कितने रूपों में हम इसके अनोखे खेल देखते आये
हैं, हम प्रथम बार कब इस धरा पर आये थे, कौन जानता है ? शायद जब से यह सृष्टि है
तभी से हम भी यहाँ हैं, और शरीर के न रहने पर भी हमारी सत्ता ऊर्जा के रूप में तो
यहाँ रहेगी ही, तो जैसे वह परम सत्य अनादि है, अनंत है, वैसे ही उसने हमें भी बनाया
है. उसका हमारा सम्बन्ध बहुत पुराना है, वह जानता है पर हम भूले रहते हैं. माया का
आवरण डालकर वह जादूगर हमें भुलावे में डाल देता है. पर कभी-कभी किसी जन्म में संत
कृपा से माया का पर्दा हटता है, और हमें अपने वास्तविक स्वरूप की झलक मिलती है, तब
लगता है जिन वस्तुओं को हम इतना महत्व दे रहे हैं, वे तो बिना नींव की हैं, उनका
कोई आधार ही नहीं है, वे हर पल बदल रही हैं. हमारा शरीर भी निरंतर अनित्य की ओर जा
रहा है, ऐसा हो सकता है कि किसी एक दिन यह जगत हमारी आँखों से लुप्त हो जाये, हम
पुनः एक नए शरीर में डाल दिए जाएँ, उससे पूर्व ही इन रहस्यों को जीना होगा. संत
बताते हैं कि जैसे बादल, चाँद, तारे आदि आकाश में स्थित है पर आकाश उनसे अलिप्त
है, वैसे भी वह परमात्मा हमारे भीतर है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से परे है.
Wednesday, August 22, 2012
क्षण क्षण जीना सीखा जिसने
जुलाई २००३
हम अपना कितना समय
व्यर्थ ही गंवा देते हैं, किन्तु जब तक कार्य कारण सिद्धांत के अंतर्गत रहते है,
तो हर कार्य के पीछे एक कारण होता है, उस कारण के पीछे एक और कारण. हमारा इस जगत
में होना भी तो एक कारण छिपाए है, लेकिन यह तो माया का जाल है, जो इस जाल से मुक्त
हो गया हो, उसे अपने कार्यों, विचारों और शब्दों के पीछे अज्ञात कारणों को खोजने
की आवश्यकता नहीं है. वह जो कुछ भी करता है सहज रूप से करता है, उसके पीछे कोई
प्रयोजन नहीं होता, उसके कार्य किसी कारण अथवा परिणाम से बंधे नहीं होते. वह क्षण-क्षण
जीता है. उसका पिछला जीवन एक तरह से समाप्त हो चुका होता है. अगले क्षण क्या होने
वाला है उस ज्ञात नहीं और जो क्षण बीत गया वह उसके लिये रहा नहीं, वह हर क्षण
मुक्त है, वह अपनी मौज में है. वह जीवन की असलियत को जान चुका होता है, यह सारा
माया का खेल उसके सामने स्पष्ट हो चुका होता है, अब उसे इसमें कोई रस नहीं होता.
बस उसका होना ही एक मात्र सत्य बनकर उसे दिखता है. तो क्या वह जड़ वस्तु सम है?
नहीं, वह अनुभव करता है, वह समरस है, वह अपने भीतर की दुनिया में संतुष्ट रहता है.
वह जिस भाव में रहता है उसे व्यक्त करने के लिये शब्दों में सामर्थ्य नहीं है. वह
सभी के भीतर उसी अनंत को देखता है, वह अनंत को पा चुका अब सीमित से कैसे संतुष्ट
हो सकता है पर इससे कोई अभिमान उसे नहीं होता, वह अनंत के आगे स्वयं को अणु ही
मानता है पर ऐसा अणु जो नित्य है ,शाश्वत है, पूर्ण है.
Tuesday, April 24, 2012
तमसो मा ज्योतिर्गमयः
फरवरी २००३
हम प्रकाश के उपासक हैं. प्रकाश ज्ञान
का प्रतीक है. ज्ञान की उपासना करें तो हृदय में कैसी शांति का अनुभव होता है जो
अधरों को सदा खिला रखती है. अंतर में प्रसन्नता का अनुभव तभी हो सकता है जब कोई
उद्वेग न हो, मान की चाह न हो, संक्षेप में कहें तो जब मन माया पर विजय प्राप्त कर
ले. माया अर्थात जो है नहीं पर दिखता है. जो कुछ भी हमें चारों ओर दिख रहा है
प्रतिपल बदल रहा है, नहीं की ओर जा रहा है. जिसका प्रभाव क्षणिक है उसका असर मन पर
लेना मूर्खता ही है. उसे सत्य मान कर उसमें स्वयं को लिप्त कर लेना ही अज्ञान है,
जितनी शीघ्र इस अज्ञान से मुक्ति मिलेगी उतना शीघ्र हमारे भीतर ज्ञान का सूर्य
चमकेगा. यह जो कभी-कभी मन में विक्षिप्तता घर कर लेती है, किसी की कही बात, किसी
का किया व्यवहार हृदय को, एक क्षण के लिये ही सही, बींधता है तो इसका अर्थ यही है
कि अभी भीतर अँधेरा है. यह जगत जैसा हम चाहते हैं वैसा ही रूप धर लेता है. मन में
कोई चाह न हो, तृप्ति हो तभी ज्ञान टिकता है. जहाँ चाह जगी उद्वेग होगा, जबकि वह
क्षणिक ही होती है कुछ समय बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता, उसके बिना भी हम बड़े
मजे से रह सकते थे, मात्र अपने अहं को पोषने के लिये हम चाहते हैं कि हर चाह पूरी
हो. तब निष्कर्ष यही निकला कि अहं ही दोषी है. मिथ्या अहंकार ही हमें अपने को बहुत
कुछ मानने की सलाह देता है, हम यदि कुछ हैं तो उस परम सत्ता के अंश मात्र हैं,
उसने हमें एक पात्र बनाया है, अपने पात्र को सही ढंग से निबाहें, बस यहीं तक हमारा
बस है, उसके आगे वही जाने...वह हमें असीम स्नेह करता है !
Monday, October 24, 2011
विवेक और संयम
जून २००२
माया रूपी रात्रि में संयम रूपी ब्रेक और विवेक रूपी लाइट लगी जीवन की गाड़ी यदि हम चलायें तो दुर्घटना से बचेंगे और ईश्वर के प्रति श्रद्धा अविचल रहेगी. कामनाओं के वेग को जो रोक सके और क्रोध को जो सही सही देख सके वही सुख-दुःख के पार आनंद को उपलब्ध हो सकता है. हमारी चेतना का विस्तार भी तभी होता है... अभी तो हम मन के छोटे से हिस्से में जीते हैं, अचेतन मन में क्या चल रहा है हमें पता ही नहीं होता तभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसे हमने करना नहीं चाहा था. मन की गहराई में जितना-जितना प्रवेश होगा, भीतर प्रकाश बढ़ेगा अर्थात विवेक रूपी टार्च हमें मिल जायेगी.
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