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Tuesday, July 25, 2023

‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’

आदिगुरु शंकराचार्य  उसी तरह कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’. जैसे कोई कहे वस्त्र सत्य है उस पर पड़ी सिलवटें मिथ्या हैं, धागा सत्य है उस पर पड़ी गाँठ मिथ्या है अथवा तो सागर सत्य है, उसमें उठने वाली लहरें, झाग व बूंदें मिथ्या हैं। सिलवटें, गाठें, लहरें और बूंदें पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी, वस्त्र, धागा और सागर पहले भी थे और बाद में भी हैं. इसी तरह हम कह सकते हैं, मन सत्य है उसमें उठने वाले विचार, कल्पनाएँ, स्मृतियाँ मिथ्या हैं, जो पल भर पहले नहीं थीं और पल भर में ही खो जाने वाली हैं. विचार की उम्र कितनी अल्प होती है यह कोई कवि ही जानता है, एक क्षण पहले जो मन में जीवंत था, न लिखो तो ओस की बूंद की तरह ही खो जाता है. आनंदपूर्ण जीवन के लिए हमें सत्य को देखना है, इस बदलते रहने वाले संसार के पीछे छिपे सत्य परमात्मा को अपना अराध्य बनाना है. 


Monday, July 18, 2022

अंतर में जब ध्यान सधे

महाभारत के शांति पर्व में मनु द्वारा बृहस्पति को दिया गया सुंदर उपदेश है जिसमें जीवन को सुखपूर्वक जीने का सुंदर मार्ग बताया गया है। प्रत्येक मानव को शारीरिक या मानसिक कष्टों का सामना जीवन में करना पड़ सकता है। यदि उन्हें  टालने का कोई उपाय दिखायी न दे तो शोक न करके उस दु:ख के निवारण का प्रयत्‍न करना चाहिये।उसे चाहिए कि कष्ट से होने वाले दुःख का चिंतन करना छोड़ दे। चिंतन करने से वह और भी बढ़ता है। शरीर के रोगों को दूर करने के लिए आवश्यक औषधियों का आश्रय लिया जा सकता है। मानसिक दुःख को बुद्धि और विचार द्वारा दूर करे। जगत अनित्य है, यह जानकर इसमें आसक्त नहीं होना है। जो मनुष्‍य सुख और दु:ख दोनों को छोड़ देता है, वह अक्षय ब्रह्म को प्राप्‍त होता है। अत: ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं। विषयों के उपार्जन में दु:ख है। अत: उनका नाश हो जाये तो चिन्‍ता नहीं करनी चाहिये।इसमे संदेह नहीं कि जीवन में सुख की अपेक्षा दु:ख ही अधिक है।परंतु जब साधक सबके आदिकारण निगुर्ण तत्त्व को ध्‍यान के द्वारा अपने अन्‍त:करण में प्राप्‍त कर लेता है, तब कसौटी पर कसे हुए सोने के समान ब्रह्म के यथार्थ स्‍वरूप का ज्ञान होता है।जब  बुद्धि अन्‍तर्मुखी होकर हृदय में स्थित होती है, तब मन विशुद्ध हो जाता है।​​ इस स्थिति में वह जगत में कमलवत रहता है। 


Wednesday, April 27, 2022

कण-कण में जो देखे उसको

हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना। 

Tuesday, March 8, 2022

रिक्त गगन सा मन हो अपना

ब्रह्म का बीज लिए तो सब आते हैं पर बिन बोये ही चले जाते हैं, ऐसे बीज और कंकर में अंतर भी क्या. हर मन की गहराई में ब्रह्म छिपा है पर जैसे बीज को मिटना होता है फूल खिलने के लिए, मन को भी मिटना होता है तभी ब्रह्म का फूल खिलता है. जिस दिन मन जान लेता है कि उसके होने में ही बंधन है तब यह स्वयं को सूक्ष्म करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है. यह ‘मैं’ का पर्दा मखमल से मलमल का करना है, जिस दिन मन पूरा मिट जाता है उस दिन परमात्मा ही बचता है.  जीवन में दो ही विकल्प हैं, या तो ‘मैं’ भाव में जियें या प्रेम भाव में. जगत और परमात्मा दो नहीं है पर वह तभी दिखाई देता है जब संसार माया हो जाता है. अभी मन खाली नहीं है, भीतर कोलाहल है, इसे शांत करके ही मन महीन किया जा सकता है. जो जितना सूक्ष्म होता जायेगा उतना ही शक्तिशाली होता जायेगा. वह चट्टान सा दृढ़ भी होगा और फूल से भी कोमल. वह होकर भी नहीं होगा और उसके सिवा कुछ होगा भी नहीं, सारे द्वंद्व उसमें आकर मिट जयेंगे. वह होने के लिए कुछ करना नहीं है. वह तो है ही, केवल उसे जानना भर है. मन को खाली करना ऐसा तो नहीं है कि कोई बर्तन खाली करना हो. कामना को त्यागते ही या समर्पण करते ही मन ठहर जाता है. ठहरा हुआ मन ही खाली मन है !


Thursday, September 19, 2019

ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या



संत कहते हैं, जैसे सागर, लहरें, फेन, बुदबुदे सभी पानी से बने हैं, पानी ही हैं, वैसे ही प्रकृति, ईश्वर, जीव सभी ब्रह्म से बने हैं, ब्रह्म ही हैं. जीव प्रकृति के तीन गुणों के अधीन रहकर कर्म करता है. यदि वह चाहे तो गुणातीत होकर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है अथवा प्रकृति के साथ एक होकर सुख-दुःख के झूले में डोलता रह सकता है. जीव जब स्वयं को देह मानता है तो वह जरा-मरण के भय से मुक्त नहीं हो सकता, जैसे सागर यदि स्वयं को लहर माने तो वे पल-पल में मिटने वाली है. जीव यदि स्वयं को प्राण मानता है तो बुदबुदों की तरह उसका अस्तित्त्व आज है कल नहीं रहेगा. यदि मन मानता है तो सुख-दुःख से बच नहीं सकता, जैसे सागर यदि स्वयं को फेन माने तो नष्ट होगा ही. जीव यदि स्वयं को ब्रह्म मानता है तो उसका विनाश नहीं हो सकता, वह सदा एकरस, मुक्त, आनंदित रह सकता है, जैसे सागर यदि स्वयं को पानी ही माने तो उसका न कभी कुछ बना न ही बिगड़ा. जो सदा रहता है वह सत्य है, जो आज है कल नहीं रहेगा वह मिथ्या है, ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या का यही तात्पर्य है.

Sunday, June 23, 2019

एकोहं बहुस्याम



वेदों में कहा गया है, ब्रह्म एक था, उसमें इच्छा हुई, एक से अनेक होने की, और इस सृष्टि का निर्माण हुआ. किंतु अनेक होने के बाद भी उसके एकत्व में कोई अंतर नहीं पड़ा. जैसे कोई बीज एक होता है, किंतु समय पाकर एक से अनेक हो जाता है. पहले अंकुर फूटता है, फिर तना, डालियाँ, पत्ते, फूल, फल और अंत में बीज रूप में वह अनेक हो जाता है, किंतु हर बीज उस पूर्व बीज के ही समान है. उसमें भी अनेक होने की पूरी सम्भावनाएं हैं. जैसे अंकुर, तना, या डालियाँ, फूल आदि सभी उस बीज में से ही निकले हैं, पर वे बीज नहीं हैं, इसी प्रकार ब्रह्म से ही जड़ जगत, वृक्ष, पशु, पंछी आदि हुए हैं पर वे ब्रह्म के एकत्व का अनुभव नहीं कर सकते, केवल मानव को ही यह सामर्थ्य है कि वह फूल की तरह खिले, फिर उसमें भक्ति व ज्ञान के फल लगें और उसके भीतर ब्रह्म रूपी बीज का निर्माण हो सके.

Thursday, August 30, 2018

एक ऊर्जा बहती भीतर


३१ अगस्त २०१८ 
संत कहते हैं, ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या...सत्य इतना सरल है कि उस पर दृष्टि ही नहीं जाती, इसलिए ब्रह्म से हम अनजाने ही बने रहते हैं. जगत इतना विषम है कि उलझा लेता है, जो उलझा हुआ है वह भला क्या समझेगा, इसलिए जगत की असलियत से भी हम अनजान ही बने रहते हैं. जगत मिथ्या है, इसका भान ही नहीं कर पाते. जीवन जो एक अवसर के रूप में हमें मिला था, एक दिन चुक जाता है और हम इस जगत से खाली हाथ ही प्रयाण कर जाते हैं, दुबारा उसी जाल में उलझने के लिए. जीवन एक ऊर्जा है, जो पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और मनुष्यों के द्वारा प्रवाहित हो रही है. वनस्पति जगत हो या जीव जगत उन्हें इसका कोई अहंकार नहीं है, पर मनुष्य को लगता है, वह इस ऊर्जा का निर्माता है. वह अपनी इच्छा से जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है, प्रकृति का दोहन करके अपने लिए सुख-सुविधाओं के अम्बार लगा सकता है. मनुष्य यदि यह समझ ले कि वह भी इस विशाल आयोजन का एक पुर्जा ही है, ऊर्जा उसके माध्यम से व्यक्त भर हो रही है, वह उसका निर्माता नहीं है. ऐसा करते ही भीतर एक परिवर्तन आता है, कुछ बनने की, कुछ प्राप्त करने की लालसा एक सहज कर्म प्रवाह में बदल जाती है. जीवन की जिस क्षण जो मांग है उतना भर होता है और शेष समय अंतर एक सहज स्थिति का अनुभव करता है.  

Wednesday, December 27, 2017

अदृश्य पर दृष्टि जिसकी

२७ दिसम्बर २०१७ 
शंकर कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’. जैसे कोई कहे वस्त्र सत्य है उस पर पड़ी सिलवटें मिथ्या हैं, धागा सत्य है उस पर पड़ी गाँठ मिथ्या है अथवा तो सागर सत्य है, उसमें उठने वाली लहरें, झाग व बूंदें मिथ्या. सिलवटें, गाठें, लहरें और बूंदें पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी, वस्त्र, धागा और सागर पहले भी थे और बाद में भी हैं. इसी तरह हमकह सकते हैं, मन सत्य है उसमें उठने वाले विचार, कल्पनाएँ, स्मृतियाँ मिथ्या हैं, जो पल भर पहले नहीं थीं और पल भर में ही खो जाने वाली हैं. विचार की उम्र कितनी अल्प होती है यह कोई कवि ही जानता है, एक क्षण पहले जो मन में जीवंत था, न लिखो तो ओस की बूंद की तरह ही खो जाता है. आनंदपूर्ण जीवन के लिए हमें सत्य को देखना है, इस बदलते रहने वाले संसार के पीछे छिपे सत्य परमात्मा को अपना अराध्य बनाना है. 

Friday, December 30, 2016

जाना है माया के पार

३१ दिसम्बर  २०१६ 
वेदांत दर्शन के अनुसार जीव, ब्रह्म और माया ये तीन ही तत्व हैं.  ब्रह्म माया पर शासन करता है और माया जीव पर. जब जीव भी माया के पार चला जाता है, ब्रह्ममय हो जाता है. अभी हम माया से बंधे हैं, माया का अर्थ है जगत के प्रति आसक्ति और मोह. हम जगत को अपने सुख-दुःख कारण मानते हैं. साधना करते -करते यह ज्ञान होने लगता है कि जगत नहीं हम स्वयं ही अपने सुख-दुःख के कारण हैं. यह ज्ञान होते ही या तो कोई आत्मग्लानि में चला जाता है अथवा तो प्रार्थना उसके जीवन में उतरती है. इसके बाद ही यह ज्ञान होता है कि यदि सुख-दुःख के कारण हम ही हैं तो उनसे मुक्ति भी हमारे हाथ में है, मुक्ति का बोध होते ही माया के पार जाकर ब्रह्म के साथ एकत्व का अनुभव होने लगता है. सतत साधना करते-करते यह अनुभव टिकने लगता है और तब कमलवत रहना सम्भव हो जाता है. नये वर्ष में प्रवेश करने से पूर्व क्यों न हम यह संकल्प लें कि आने वाले वर्ष में हम नियमित साधना करेंगे. 

Thursday, December 8, 2016

पूर्णमदः पूर्णमिदं

९ दिसम्बर २०१६ 
उपनिषद कहते हैं सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण ब्रह्म से उपजी है और उसके उपजने के बाद भी ब्रह्म पूर्ण ही शेष रहता है, सृष्टि ब्रह्म के लिए ही है. इस बात को यदि हम जीवन में देखें तो समझ सकते हैं मन पूर्ण है, पूर्ण आत्मा से उपजा है अर्थात विचार जहाँ  से आते हैं वह स्रोत सदा पूर्ण ही रहता है, मन आत्मा के लिए है. विचार ही कर्म में परिणित होते हैं और कर्म का फल ही आत्मा के सुख-दुःख का कारण है. यदि आत्मा स्वयं में ही पूर्ण है तो उसे कर्मों से क्या लेना-देना, वह उसके लिए क्रीड़ा मात्र है. हम इस सत्य को जानते नहीं इसीलिए मात्र 'होने' से सन्तुष्ट न होकर दिन-रात कुछ न कुछ करने की फ़िक्र में रहते हैं. 

Monday, April 27, 2015

एक स्रोत शांति का भीतर

जनवरी २०१५ 
‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या’ शंकराचार्य ने कहा है मिथ्या का अर्थ है जो दीखता तो है पर है नहीं, माया है, स्वप्न है, लेकिन जिस समय हम स्वप्न देखते हैं सत्य प्रतीत होता है. मिथ्या का एक अर्थ अनुपयोगी है. अनुपयोगी का अर्थ है विवेक से उपयोग करके उससे मुक्त हो जाना. यह जगत विवेक से जीने जैसा है, उपयोग करके उससे पृथक हो जाने जैसा है, इसी अर्थ में यह जगत मिथ्या है, हमारे भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म है, वही अनंत है, निरंतर उसका विस्तार हो रहा है. जगत में दूर से दूर की वस्तुएं तथा निकट से निकट का शरीर, मन बुद्धि, चित्त तथा अहंकार भी आ जाते हैं. श्वास यानि प्राण भी हमारे उपयोग में लाने जैसा है, जिसे देखते–देखते हम मन तक पहुंचते हैं, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार को जानते-जानते स्वयं तक पहुंचते हैं. चैतन्य की अनुभूति होते ही हमें अपनी शाश्वतता का प्रमाण भी मिल जाता है, मृत्यु का भय नहीं रहता, सारे द्वन्द्वों से पार उस निर्भय, निर्वैर अवस्था का अनुभव होता है, जहाँ एक अखंड शांति का सोता बह रहा है, जहाँ कोई चाह नहीं, पूर्णता है, जहाँ कोई अभाव नहीं, उस अखंड आनंद की अवस्था में भी एक विस्तार है, रहस्य है. विस्मय की वह अनोखी अवस्था ही समाधि तक पहुंचती है. जिससे प्रज्ञा का जन्म होता है, वही जानने योग्य है !   

Tuesday, March 3, 2015

अमन हुए को वह मिलता

फरवरी २००८ 
जो स्वरूप को प्रकट करे वह कला है, और जो ब्रह्म को जान ले वही कलाकार है. ऐसा कोई बिरला ही होता है, और कोई जान भी ले तो दूसरों को जना नहीं सकता, वह तो और भी बिरला है. सभी ब्रह्म होने का बीज लिए आते हैं पर बीज लिए ही चले जाते हैं, ऐसे बीज और कंकर में अंतर ही क्या ? बीज जब अंकुरित हो और फूल खिलाये तभी परमात्मा के दरबार में जा सकता है. जैसे बीज को मिटना होता है वैसे ही मन को भी मिटना होता है, तभी ब्रह्म का फूल खिलाना सम्भव होता है. ब्रह्म की झलक मिल भी जाती भी है पर उसे टिकाये रखना कठिन है. ‘मैं’ भाव छोड़ने को जो तैयार हो जाये वही मन से अमन में चला जाता है. जिन्होंने त्यागा उन्होंने भोगा. ऋषियों ने इस सत्य को जाना और पाया कि परमात्मा के सिवा और कुछ यहाँ है ही नहीं !  



Thursday, January 8, 2015

कारण में ही कार्य छुपा है


ज्ञान तो मिल जाता है सद्गुरु से, पर उसमें टिकने के लिए आसक्ति का त्याग करना पड़ता है. हमारा भौतिक शरीर और मन ही हमें गुलाम बना देता है. हम जो आत्मा का आनंद लेना चाहते हैं, इन तामसिक सुखों की आसक्ति का त्याग नहीं कर सकते. परमात्मा का ज्ञान जीव को ब्रह्म पद प्रदान करता है और परमात्मा का प्रेम ब्रह्म को जीव बना देता है. धीरे-धीरे जब ज्ञान और प्रेम बढ़ते जाते हैं तब जीव और ब्रह्म में एकता होने लगती है. शब्द में जैसे अर्थ बताने की शक्ति है वैसे ही कार्य में, कारण में जाने की शक्ति है. आनंद दायिनी चेतना की सत्ता ही कण-कण में व्याप्त है. हरेक में वही छुपा है. जो दूसरों के भीतर परमात्मा के दर्शन कर सकता है वही कण-कण में व्याप्त सत्ता, चेतनता और आनंद अनुभव कर सकता है. 


Tuesday, December 2, 2014

सच्चा मोती एक वही है

जून २००७ 
राम ब्रह्म हैं, वह मानव रूप लेकर धरती पर आते हैं. हर मानव ब्रह्म की शक्तियों को लेकर ही आता है, पर वे उसके भीतर निष्क्रिय पड़ी रह जाती हैं. हम सूक्ष्म की ओर चलें तो ये शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं. जीवन में वरदान घटते हैं, प्रेम पहला वरदान है जो तब घटता है जब हमारा स्वयं से परिचय होता है, जो परिचय सद्गुरु कराते हैं. जब तक हम मन के किनारे पर बैठे रहते हैं तब तक स्वयं से परिचय नहीं होता, एक बार जब गहरी डुबकी लग जाती है तो आत्मा का मोती हाथ लगता है, जिससे ज्ञान, प्रेम औए आनंद का प्रकाश फूटता है. संस्कारों से मुक्ति मिलती है, मन पावन बनता है.


Monday, December 16, 2013

जुड़ा रहे मन उस अपने से

मई २००५ 
जिसका कार्य और रूचि एक हो, जिसका हृदय और मस्तिष्क एक हो उसमें सख्य भाव होता है. राम और लक्ष्मण में भी ऐसा सख्य भाव है. लक्ष्मण सदा से ही राम के संग हैं. जगे हुए ब्रह्म में जब सृष्टि की इच्छा होती है तो यह शेष उन्हें अपने शीश पर धारण करता है. दोनों में अद्वैत है. इसी तरह का सख्य भाव भक्त और भगवान में होता है, गुरु और शिष्य में होता है. मानसिक रूप से वे साथ रहते हैं, भौतिक दूरी उनके लिए कोई दूरी नहीं होती. जो ईश्वरीय तत्व को जानता है, वह हर क्षण जुड़ा रहता है, दोनों के बीच प्रेम की धारा अविरल बहती रहती है. समाधि का अनुभव दोनों को होता है. आधि, व्याधि, उपाधि से मुक्त होकर भक्त, भगवान के प्रेम का पात्र बन जाता है. अपनी ऊँचाई पर स्थित होते हुए भी वह उसके मन से जुड़ जाते हैं, वे सर्व समर्थ हैं.

Friday, December 6, 2013

निज गरिमा में रहना सीखें

अप्रैल २००५ 
हम दुखकार हैं, जैसे चित्रकार चित्र बनाता है, कुम्भकार घट बनाता है, उसी प्रकार हम जीवन में नित नये दुखों का निर्माण करते हैं. फिर स्वयं ही सहानुभूति के पात्र बनते हैं, अपनी भी और दूसरों की भी. परमात्मा के सम्मुख जाकर दुखों से छुड़ाने के लिए प्रार्थना करते हैं, वह भी सोचता होगा, मैंने तो मानव को समर्थ बनाया है, वह अपनी शक्ति भुलाकर क्यों दुखी होता है. ईश्वर प्रेम व शांति की मूरत है, जब वह अपनी गरिमा में रह सकता है तो फिर मानव क्यों नहीं रह सकता. देह, मन, बुद्धि जो हमारे लिए साधन रूप थे, हमारी सेवा के लिए मिले थे, हमसे सेवा मांगते हैं. शुद्र, वैश्य आदि कोई जन्म से नहीं होता, जो देह को ही आत्मा मानता है, वह शुद्र है, जो मन, बुद्धि तथा अहंकार को आत्मा मानते हैं वे क्षत्रिय या वैश्य हो सकते हैं, आत्मा को ही आत्मा जानने वाला ब्राह्मण है, ब्रह्म को जानने का अधिकारी है, तथा उसके आनन्द को पा सकता है. ऐसा आनन्द जो कभी घटता-बढ़ता नहीं, जो सापेक्ष नहीं है, जो अनंत मात्रा का है, जो अनंत काल के लिए है, जिसे पाने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता, जो हमें सहज ही प्राप्त है.   


Wednesday, May 22, 2013

जिस मरने से जग डरे


सितम्बर २००४ 
मृत्यु को जीतने का अर्थ है, मृत्यु के भय पर विजय पाना, अपने भीतर अमृत तत्व को पाने का अर्थ भी यही है, आत्मा ही व अमृत है जिसे हमें अपने मन रूपी सागर से मंथन करके निकालना है. हमारे शरीर में जो चेतन तत्व है वह हर काल व हर देश में एक सा है, उसे जान लेने पर शरीर का उतना महत्व नहीं रह जाता, ठीक है वह शरीर के माध्यम से कार्य कर रहा है, मन, बुद्धि आदि उसके सहायक हैं, पर वह कार्य कर ही क्यों रहा है ? वह स्वयं को जानने के लिए ही कार्य कर रहा है, आत्मा से ही आत्मा को जाना जा सकता है. वह मन, बुद्धि से परे है , पर इनके न रहने पर, शरीर के न रहने पर वह स्वयं को जान भी नहीं सकता. यह एक पहेली जैसा लगता है पर यही तो माया है. जीव ही ब्रह्म है यह जानने के लिए उसे माया का आवरण पार करना ही है. एक खेल है जो युगों-युगों से खेला जा रहा है, इस खेल में रोमांच भी है, आनन्द भी है, साहस भी है. जीव, माया को ही लक्ष्य मानकर भटकता रहता है, फिर सद्गुरु का उपदेश पाकर वह स्वयं को बदलता है और ब्रह्म को जानने का प्रयास करता है.

Friday, October 12, 2012

वह छुप न सकेगा परमात्मा


सितम्बर २००३ 
अनंत-अनंत ब्रह्मांडो का रचियता वह परब्रह्म रसमय है. जिसकी सत्ता से सृष्टि अनंत काल से चली आ रही है, न जाने कितनी बार कितने रूपों में हम इसके अनोखे खेल देखते आये हैं, हम प्रथम बार कब इस धरा पर आये थे, कौन जानता है ? शायद जब से यह सृष्टि है तभी से हम भी यहाँ हैं, और शरीर के न रहने पर भी हमारी सत्ता ऊर्जा के रूप में तो यहाँ रहेगी ही, तो जैसे वह परम सत्य अनादि है, अनंत है, वैसे ही उसने हमें भी बनाया है. उसका हमारा सम्बन्ध बहुत पुराना है, वह जानता है पर हम भूले रहते हैं. माया का आवरण डालकर वह जादूगर हमें भुलावे में डाल देता है. पर कभी-कभी किसी जन्म में संत कृपा से माया का पर्दा हटता है, और हमें अपने वास्तविक स्वरूप की झलक मिलती है, तब लगता है जिन वस्तुओं को हम इतना महत्व दे रहे हैं, वे तो बिना नींव की हैं, उनका कोई आधार ही नहीं है, वे हर पल बदल रही हैं. हमारा शरीर भी निरंतर अनित्य की ओर जा रहा है, ऐसा हो सकता है कि किसी एक दिन यह जगत हमारी आँखों से लुप्त हो जाये, हम पुनः एक नए शरीर में डाल दिए जाएँ, उससे पूर्व ही इन रहस्यों को जीना होगा. संत बताते हैं कि जैसे बादल, चाँद, तारे आदि आकाश में स्थित है पर आकाश उनसे अलिप्त है, वैसे भी वह परमात्मा हमारे भीतर है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से परे है. 

Thursday, September 6, 2012

एक देश ऐसा भी है


अगस्त २००३ 
‘’हम उस देश के वासी हैं, जहाँ शोक नहीं, जहाँ आह नहीं’’, जहाँ हम जमीन से ऊपर उठ जाते हैं. जहाँ हमारा मन, मन नहीं रहता, वह शुद्ध चेतना से संयुक्त हो जाता है. जहाँ कोई रूप नहीं, आकार नहीं, जिसका कोई नाम नहीं, जहाँ समय का बोध नहीं रहता, जहाँ स्थान का भी कोई बोध नहीं रहता. जब मन बिना किसी कारण के पूर्ण आनंदित रहता है, सभी के भीतर उस ब्रह्म के दर्शन होते हैं, सभी के साथ आत्मीय सम्बन्ध प्रतीत होता है,एक अद्भुत शांति का आभास होता है तब उसी लोक की झलक मन को मिली होती है. शास्त्रों की बातें तभी समझ में आती हैं, वरना शास्त्र अपना मूल अर्थ छिपाए ही रखते थे. उन्हें पढ़कर बुद्धि से जानना और है, जीवन में उतारना और है. हम ईश्वर की ओर एक कदम बढाते हैं तो वे हजार कदम हमारी ओर बढाते हैं. वह अनंत है सो उसका हर काम अनंत है.