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Monday, August 1, 2022

पल-पल जीना सीखा जिसने


पानी पर खिंची लकीर की तरह मन में कोई भाव जगे और विलीन हो जाए तो उसके संस्कार नहीं पड़ते। बच्चों का हृदय ऐसा ही होता है, उन्हें रोते-रोते हँसते देर नहीं लगती, उनका अहंकार अभी मज़बूत नहीं हुआ है, बातों को पकड़कर रखने की अभी उन्हें जानकारी नहीं है। अहंकारी मन घटनाओं को पकड़ लेता है और वे उस पर गहरे प्रभाव डालती हैं। जीवनमुक्त पल पल में जीता है। हर क्षण उसके लिए नया अनुभव ला रहा है। प्रकृति भी नित नूतन है इसलिए  उसमें सौंदर्य है। कोई भी बात जब भावनाओं को प्रभावित न कर सके तब मानना चाहिए कि अपने स्वरूप में स्थिति दृढ़ हो गयी है।  


Thursday, May 26, 2022

नित्य-अनित्य का भेद जो जाने

यह जगत जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं. मन भी जगत का ही एक भाग है, निकट जाकर देखने पर यह विलीन हो जाता है. इसे देखने वाला चैतन्य ही सत्य है, शास्त्रों की यह उक्ति तभी सत्य सिद्ध होती है। सागर में हज़ार लहरें उठती हैं, छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची लहरें, पर उनका अस्तित्त्व ज़्यादा देर नहीं टिकता। सागर जिस पानी से बना है वह पानी कभी नहीं मिटता। यदि पानी चेतन होता और स्वयं को लहर मानता तो वह भी स्वयं को मिटता हुआ मान सकता था। हम स्वयं को जानकर ही उस शाश्वत पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं, जो व्यर्थ ही वस्तुओं और संबंधों में ढूँढते हैं। जाति, संप्रदाय, धर्म आदि ऊपर-ऊपर के भेदों  को छोड़कर भीतर आत्मा के स्तर पर ही शुद्ध प्रेम का अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा निरंजन व असंग है, वह पूर्ण है, मुक्त है, चैतन्य है,  जब-जब वह राम, कृष्ण या किसी सद्गुरू के रूप में धरती पर आता है, उसी ने जल में कमलवत रहने का ढंग सिखाया है। बुद्ध ने कहा था जिस क्षण मुझे ज्ञान हुआ, मैंने हर प्राणी के भीतर बुद्धत्व को देखा। सबके साथ आत्मीयता और एक्य का अनुभव आत्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता। 


Sunday, July 12, 2020

निज स्वरूप को जाना जिसने

अविद्या का आवरण हमारे स्वरूप को हमें देखने नहीं देता. देह, मन, बुद्धि को ‘मैं’ मानना ही अविद्या है. हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही अपना स्वरूप हमें प्रतीत होगा. यदि हम देह को ही मैं मानते हैं तो सदा ही भयभीत रहेंगे, क्योंकि देह निरन्तर बदल रही है और एक दिन मिट जाएगी. यदि मन को अपना स्वरूप मानते हैं तो सदा ही कम्पित होते रहेंगे क्योंकि मन भी इस निरंतर बदलते हुए संसार से ही बना है, जैसा वातावरण, जैसे शिक्षा उसे मिलती है वह उसी को सत्य मानकर उसी के अनुसार चलता है. जब हम बुद्धि को ही अपना स्वरूप मानेंगे तो सदा ही मान-अपमान के द्वंद्व में फंसे रहेंगे क्योंकि अपनी बुद्धि से उपजे विचार, धारणा आदि को ही हम सत्य मानेंगे और दूसरों के विचारों से मतभेद पग-पग पर होता ही रहेगा. इसके साथ-साथ ही देह, मन और बुद्धि से किये गए कार्यों का हमें अभिमान भी बना रहेगा. 

Monday, August 26, 2019

काहे री नलिनी तू कुम्हलानी



संत कबीर कहते हैं, 'काहे री नलिनी तू कुम्हलानी'. हमारा मन रूपी कमल भी अक्सर कुम्हला जाता है, हम अपने आपसे यह सवाल पूछें तो उत्तर मिल सकता है. दिक्कत यह है कि हमने स्वयं को मन ही समझ लिया है, इसलिए मन के उदास होते ही हम भी परेशान हो जाते हैं और सवाल पूछना तो दूर सामान्य व्यवहार भी भुला बैठते हैं. दुखी व्यक्ति न बोलने योग्य बोल देता है, न सोचने योग्य सोच लेता है और विषाद के कारण हुए तनाव से तन को भी रोगी बना लेता है. हम अन्यों को सलाह देने में कितने दक्ष हैं, किसी की भी, कैसी भी समस्या हो, हमारे पास उसका निदान सदा ही रहता है. कितना अच्छा हो यदि एक क्षण के लिए भी मन पर बादल छाये तो हम उससे पूछें और एक समझदार मित्र की तरह उसे इस दुःख से बाहर निकलने की सलाह दे सकें. ऐसा करने के लिए मन के साथ हुआ तादात्म्य तोड़ना होगा. नीले आकाश की तरह विस्तृत हमारा स्वरूप है और उस पर उड़ते हुए बादलों की तरह विचार हैं, दोनों में कोई तादात्म्य नहीं, दोनों पृथक हैं. विचारों के पार जाते ही मन के सुख-दुःख के हम साक्षी मात्र रहते हैं, वे हम पर अपना असर नहीं डाल सकते.  

Monday, July 16, 2018

सुख सपना दुःख बुलबुला


१७ जुलाई २०१८
सुख की तलाश जब तक बाहर है, दुःख मिलने ही वाला है. सुख-दुःख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के साथ दूसरा मुफ्त में मिलता है. सुख जब अपने होने में ही मिलने लगता है, तब उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं होता, क्योंकि अपने होने में तो किसी को आज तक संदेह नहीं हुआ. हमारी तकलीफ यह है कि हम कभी भीतर जाकर अपने सही स्वरूप को खोजते नहीं. जगत के साथ हमारा जो संबंध है, उसी के नाते हम स्वयं को दी गयी उपाधियों से ही जानते हैं. कोई हमसे हमारी पहचान पूछे तो झट हमारा उत्तर होगा, अपना नाम, जबकि वह तो बदला जा सकता है, राष्ट्रीयता अथवा धर्म भी बदला जा सकता है, व्यवसाय भी बदल सकता है, रिश्ते भी जो आज हैं कल बदल  सकते हैं. स्वयं को हम जब तक शुद्ध रूप में पहचान नहीं लेते अपने होने का स्वाद हमें नहीं मिल सकता. तब तक सुख की तलाश बाहर ही जारी रहेगी और पीछे-पीछे दुःख भी मिलता रहेगा.

Thursday, May 10, 2018

भीतर के पट खोल


११ मई २०१८ 
संत कहते हैं, मानव जन्म दुर्लभ है, हमें इसका भरोसा नहीं होता और छोटी-छोटी बातों में स्वयं को डुबा कर हम इस बहुमूल्य जीवन को किसी न किसी तरह व्यतीत करते रहते हैं. आधि, व्याधि और उपाधि के चक्र से कभी बाहर ही निकल पाते. एक समस्या से दूसरी समस्या में जाने का नाम ही हमने जीवन समझ लिया है. सुख का स्वाद अभी मुख से गया भी नहीं होता कि दुःख की रोटी थाली में पड़ी दिखाई देती है. हम रुककर यह भी नहीं पूछते, कि आखिर इस दुःख का कारण क्या है ? मानव जीवन में ही हम इस सत्य से परिचित हो सकते हैं. स्वयं के सच्चे स्वरूप का अज्ञान हमें मन और बुद्धि में ही उलझाये रखता है. संस्कारों के कारण पूर्व के किये गये कृत्य पुनः-पुनः करके हम बार-बार उसी दुविधा में पड़ते हैं. कितना अच्छा हो यदि हम संत वाणी पर पूर्ण विश्वास करके अपने भीतर जायें और मानव जीवन की दिव्यता का स्वयं अनुभव करें.

Monday, February 12, 2018

हे शिव शम्भोः औघड़दानी


१३ फरवरी २०१८ 
शिव कल्याणकारी हैं. शिव अनादि व अनंत हैं. शिव और शक्ति दो नहीं हैं. दिन-रात और सुख-दुःख की तरह शिव और शक्ति सदा साथ हैं. शक्ति जब विश्राम में होती है तो शिव होती है और शिव जब गतिमान होते हैं तो शक्ति होते हैं. शिव का विश्राम भी उतना ही प्रभावशाली है जितना उनका गतिमान होना. शिव चैतन्यता की पराकाष्ठा हैं. जब साधक अपने स्वरूप में स्थिर हो जाता है, शिव में ही होता है. उसके अशुभ संस्कार नाश को प्राप्त होते हैं और वह नई शक्ति भरकर जगत में कार्य करने में सक्षम होता है. शिव संहारक हैं, वे क्रोध आदि विकारों का नाश करते हैं तथा शांत, सृजनात्मक ऊर्जा का पोषण करते हैं. महाशिवरात्रि के पर्व पर हम सभी को आसुरी शक्तियों का विनाश करके अपने भीतर के देवत्व को जगाना है.  

Tuesday, June 13, 2017

भगवद् गीता किञ्चिदधीता

13 jun 2017 
भगवद गीता पूजा की पोथी नहीं है, ग्रंथालय की शोभा नहीं है. भगवान का गीत है, ब्रह्म और जीव का अद्भुत संवाद है. ज्ञान रूपी अनंत अलौकिक खजाना है. निज स्वरूप में अवस्थित होकर जीवन जीने की कला है. चैतन्य का बहता हुआ झरना है यह, शब्दों के जंजाल से मुक्त होकर यदि कोई इस प्रवाह का अनुभव कर सके तो वह चैतन्य के साथ एकत्व का अनुभव कर सकता है. हजारों वर्ष पूर्व यह ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था पर यह नित नवीन है. सदियाँ बीत जाती हैं पर ज्ञान नहीं बदलता. यह मोक्ष शास्त्र है.

Tuesday, March 21, 2017

होना भर ही जब आ जाये

२२ मार्च २०१७ 
हम स्वयं को उस क्षण सीमित कर  लेते हैं जब केवल उपाधियों को ही अपना होना मान लेते हैं.  आज हर कोई अपनी पहचान बनाने में लगा है, वह जगत के सामने स्वयं को कुछ साबित कर के अपनी पहचान बनाना चाहता है, मानव यह भूल जाता है यह पहचान उसे अपने वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर ले जाती है. कोई अध्यापक तभी तक अध्यापक है जब तक वह कक्षा में पढ़ा रहा है, कोई वकील तभी तक वकील है, जब वह मुकदमा लड़ रहा है, किन्तु उसके अतिरिक्त समय में वह कौन है, हम कितनी भी उपाधियाँ एकत्र कर लें, भीतर एक खालीपन रह ही जाता है . बाहर की उपाधियाँ चाहे हमें  बौद्धिक व भावनात्मक सुरक्षा भी दे दें, किन्तु उसके बाद भी हमारी तलाश खत्म नहीं होती जब तक हमें अपनी अस्तित्त्वगत पहचान नहीं होती. जब हम स्वयं को मात्र होने में ही स्वीकार कर लेते हैं, उस क्षण भीतर एक सहजता का जन्म होता है, अब सारा जगत अपना घर लगने लगता है.

Tuesday, March 3, 2015

अमन हुए को वह मिलता

फरवरी २००८ 
जो स्वरूप को प्रकट करे वह कला है, और जो ब्रह्म को जान ले वही कलाकार है. ऐसा कोई बिरला ही होता है, और कोई जान भी ले तो दूसरों को जना नहीं सकता, वह तो और भी बिरला है. सभी ब्रह्म होने का बीज लिए आते हैं पर बीज लिए ही चले जाते हैं, ऐसे बीज और कंकर में अंतर ही क्या ? बीज जब अंकुरित हो और फूल खिलाये तभी परमात्मा के दरबार में जा सकता है. जैसे बीज को मिटना होता है वैसे ही मन को भी मिटना होता है, तभी ब्रह्म का फूल खिलाना सम्भव होता है. ब्रह्म की झलक मिल भी जाती भी है पर उसे टिकाये रखना कठिन है. ‘मैं’ भाव छोड़ने को जो तैयार हो जाये वही मन से अमन में चला जाता है. जिन्होंने त्यागा उन्होंने भोगा. ऋषियों ने इस सत्य को जाना और पाया कि परमात्मा के सिवा और कुछ यहाँ है ही नहीं !  



Tuesday, June 10, 2014

चलती रहे साधना प्रतिपल

अप्रैल २००६ 
साधना के बाद मन पहले के जैसा नहीं रहता, जो हर वक्त बीच में अपनी टांग अड़ाता था, अब कहना मानता है. आखिर मन है क्या, कुछ आशा कुछ निराशा, पर जब हम अपने सही स्वरूप में होते हैं तो कुछ पाने की आशा नहीं, कुछ खोने की निराशा नहीं, पीड़ा भी तब सात्विक हो जाती है, वह यह कि साधक को सेवा के पर्याप्त अवसर नहीं मिले. ईश्वर से निकटता का अनुभव होने लगता है, उसका प्रेम ही स्वयं को समर्पित करने को प्रेरित करता है. वह जीवन को पूरी गहराई से जीना चाहते हैं, सच्चाई से भी. हमारे वचनों, कर्मों और विचारों में एकता आने लगती है. हम अपने प्रति सच्चे होने लगते हैं. सत्य की ही जय होती है, साधक हर कीमत पर सत्य का ही आश्रय लेना चाहता है, अपने जीवन के हर मोड़ पर.


Tuesday, April 9, 2013

सूक्ष्म ही पा सकता सूक्ष्म को


जुलाई २००४ 
हमसे सुबह से शाम तक न जाने कितने अपराध होते रहते हैं, वाणी का अपराध उनमें सबसे ज्यादा होता है, हम स्वभाव वश कटु भाषा का प्रयोग करते हैं, अप्रिय बात भी बोल देते हैं, असत्य तथा बढा-चढ़ा कर भी बोलते हैं. जो जैसा है वैसा का वैसा प्रकट नहीं करते. व्यर्थ ही हम जोर से बोलते हैं, बिना आवश्यकता के बोलते हैं, और अपनी बहुमूल्य ऊर्जा का अपव्यय होने देते हैं. यह सभी तब होता है जब हम खुद की याद भुला देते हैं, हमें यह बोध नहीं रहता कि वास्तव में हम पावन ऊर्जा हैं, जिसकी एक-एक बूंद अनमोल है, अपने शुद्ध स्वरूप में होने पर कोई कभी भी असत्य का आश्रय नहीं ले सकता. मन के स्तर पर होने से हम उसी के धर्म का शिकार हो जाते हैं. मन चंचल है, वह हमें भी अस्थिर कर देता है, संसार को जिस रूप में दिखाता है, बाध्य होकर हम उसी रूप में देखते हैं. साधना में हम इसी मन को यहाँ-वहाँ से, इधर-उधर से, पचासों जगहों से जहाँ-जहाँ यह अटका है, वहाँ-वहाँ से लाकर अपने भीतर लाना सिखाते हैं, जहाँ परमात्मा का वास है, ऐसा मन सौम्यता धारण करता है, ईश्वरीय प्रसाद पाने लगता है. सूक्ष्म को पाकर वह स्थूल से मोह नहीं कर  सकता. सूक्ष्म को पाने की क्षमता यदि एक बार मन विकसित कर ले तो वह एकाकी नहीं रह जाता, वह तत्व सदा उसके साथ रहता है. मन आत्मारामी हो जाता है. मन की धारा संसार से उलट कर  राधा हो जाती है, कृष्ण का आश्रय जिसे सदा ही प्राप्त है.

Wednesday, July 13, 2011

संत मन

नवम्बर २००० 
चलो सखि, यह मन संत बनाएँ ! यदि यह मन ( जो सारे क्रिया कलापों का केन्द्र बिंदु है) संत बन  जाये तो हम अपने सहज स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं. ऐसा मन जो आलोचना नहीं करता, नुक्ताचीनी से परे है, कुछ चाहता नहीं है, अपेक्षा नहीं रखता, लोभी नहीं है,  जो मुक्त है परम्पराओं से, पूर्वाग्रहों से, जड़ मान्यताओं से. मन जो कहीं अटका नहीं है, गतिमान है, संत की तरह, जल की धार की तरह बहता जाता है तट को भिगोता हुआ पर तट से बंधता नहीं. जिस पर कोई लकीर नहीं पड़ती जो प्रेम से ओत-प्रोत है, जीव मात्र के प्रति प्रेम से, जो अमानी है.