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Monday, August 8, 2022

उसकी चाह जगे जब मन में

 हमने इस जगत में अपने चारों ओर कुछ लोगों को वस्तुओं का गुलाम बनकर दुखी होते हुए तथा कुछ सजग व्यक्तियों को अकिंचन होकर भी प्रसन्न रहते हुए देखा है. वास्तविकता को भूले हुए कुछ लोग अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा करते रहते हैं, फिर उसकी साज-संभार में अपनी ऊर्जा को व्यर्थ गंवाते हैं. हमारी ऊर्जा का उपयोग स्वयं को तथा स्वयं के इर्दगिर्द का वातावरण संवारने में होता रहे, तभी उसकी सार्थकता है. इसके लिए हमें समझना होगा कि आवश्यकता तथा इच्छा में अंतर है, इच्छाओं का कोई अंत नहीं पर आवश्कताएं सीमित हैं. आवश्यकता की पूर्ति होती है, उसकी निवृत्ति विचार द्वारा नहीं हो सकती पर इच्छा की निवृत्ति हो सकती है.अपनी इच्छाओं को पूरा करने के प्रयास में हम अपनी सहज आवश्यकता को भी भुला बैठते हैं.परमात्मा प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने वाली इच्छा है, पर संसार प्राप्ति की इच्छा कभी पूर्ण नहीं हो सकती. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा वास्तव में हमारी आवश्यकता है, हर जीव आनंद चाहता है, क्योंकि वह ईश्वर का अंश है, उसमें अपने अंशी से मिलने की जो स्वाभाविक चाह है, वह उसकी नितांत आवश्यकता है. जैसे भूख, प्यास आदि आवश्यकताओं की पूर्ति भोजन, जल आदि से हम करते हैं, वैसे ही हमारी आनन्द प्राप्ति की आवश्यकता की पूर्ति ईश्वर प्राप्ति के बाद ही होती है. 

Monday, April 18, 2022

प्राण ऊर्जा बहे अबाध जब


आयुर्वेद के अनुसार शरीर के सभी अंगों में प्राण-ऊर्जा का प्रवाह वैसे तो चौबीस घण्टे होता है,पर हर समय एक सा प्रवाह नहीं होता. प्रायः जिस समय जो अंग सर्वाधिक सक्रिय हो उस समय उससे सम्बन्धित कार्य करने से हम उसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं. प्रातः तीन बजे से पांच बजे तक फेफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक रहता है, इसी कारण ब्रह्म मुहूर्त में उठकर खुली हवा में घूमने अथवा  प्राणायाम आदि करने से शरीर स्वस्थ बनेगा. सुबह पांच बजे से सात बजे तक ऊर्जा बड़ी आंत में जाती है, जो व्यक्ति इस समय सोये रहते हैं व शौच क्रिया नहीं करते उन्हें कोई न कोई पेट का रोग हो सकता है. इस समय योगासन व व्यायाम करना चाहिए. सात से नौ बजे तक सर्वाधिक ऊर्जा आमाशय में रहती है इसलिए सुबह का नाश्ता जल्दी कर लेना चाहिए. नौ से ग्यारह बजे तक तिल्ली और पैंक्रियाज की सक्रियता का समय है, यदि दोपहर का भोजन ग्यारह बजे या उसके कुछ बाद कर लें तो पाचन अच्छा हो सकता है. दिन में ग्यारह से एक बजे तक हृदय में विशेष ऊर्जा का प्रवाह होता है. हृदय हमारी संवेदनाओं, दया, करुणा तथा प्रेम का प्रतीक है, इस समय लेखन या रूचि का कोई काम अच्छा हो सकता है. दोपहर में एक बजे से तीन बजे तक छोटी आंत में पोषण का कार्य होता है, इसलिए दोपहर का भोजन देर से नहीं करना चाहिए. शाम को पांच से सात बजे तक किडनी में ऊर्जा का प्रवाह होता है. शाम का भोजन सात बजे तक कर लेना चाहिए. सात से नौ बजे तक ऊर्जा मस्तिष्क में जाती है, यह समय अध्ययन के लिए उत्तम है. नौ से ग्यारह बजे तक रीढ़ की हड्डी में सर्वाधिक ऊर्जा होती है, यह समय सोने के लिए उत्तम है. रात्रि ग्यारह से एक बजे तक पित्ताशय में ऊर्जा प्रवाहित होने से मानसिक गति विधियों पर नियंत्रण होता है, इस समय जगे रहने से पित्त तथा नेत्र के रोग हो सकते हैं. रात्रि एक से तीन बजे तक लिवर में ऊर्जा का परवाह सर्वाधिक होता है, इस समय गहरी नींद आवश्यक है. लिवर से पुनः ऊर्जा फेफड़ों में चली जाती है और एक नए दिन का आरम्भ होता है. 

(गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण में प्रकाशित एक लेख से साभार )

Friday, March 11, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

 सन्त कहते हैं, प्रेम ही वह सूत्र है जिसे पकड़कर हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं.  तभी हम जान पाते हैं कि सभी प्राणी अस्तित्त्व का ही अंश हैं, इससे किसी का कोई विरोध नहीं है. जब कोई  प्रेमपूर्ण हो जाता है तो ध्यान पूर्ण भी हो जाता है. जब वह आँख भर कर अपने को देखता  है तो पाता है कि वह ऊर्जा के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं. अपने को मिटाने पर अपने में ही यह पता चलता है कि वह नहीं है और वैसे ही पता चलता है कि केवल परमात्मा है. वह भौतिक देह है यह सोचना ही आँखों पर पड़ा पर्दा है. ध्यान में वही मिटता है जो है ही नहीं. जो है वह कभी मिटता ही नहीं. जब तक मन अशांति से ऊबे नहीं तब तक झूठ-मूठ ही खुद को बनाये रखना चाहता है, अहंकार की यात्रा जब तक तृप्त नहीं होती तब तक सीमित ‘मैं’ नहीं मिटता !

Thursday, January 20, 2022

रस भीतर का जिसे मिला है

देह ऊर्जा का एक केंद्र है. ऊर्जा का चक्र यदि पूर्णता को प्राप्त न हो तो जीवन में एक अधूरापन रहता है. प्रार्थना में भक्त भगवान से जुड़ जाता है और चक्र पूर्ण होता है, तभी पूर्णता का अहसास होता है. हर व्यक्ति अपने आप में अधूरा है जब तक वह किसी के प्रति समर्पित नहीं हुआ. यही पूर्णता की चाह अनगिनत कामनाओं को जन्म देती है. व्यर्थ ही इधर-उधर भटक के अंत में एक न एक दिन व्यक्ति ईश्वर के द्वार पर दस्तक देता है. इस मिलन में कभी आत्मा परमात्मा हो जाता है और कभी परमात्मा आत्मा. मन जहाँ जहाँ अटका है, उसे वहाँ-वहाँ से खोलकर लाना है. इस जगत में या तो किसी के प्रति कोई जवाबदेही न रहे अथवा तो सबके प्रति रहे. एक साधक का इसके सिवा क्या कर्त्तव्य है कि भीतर एकरसता  बनी रहे, आत्मभाव में मन टिका रहे. जीवन जगत के लिए उपयोगी बने, किसी के काम आए. अहम का विसर्जन हो. परमात्मा ही हमारा आदर्श है जो सब कुछ करता हुआ कुछ भी न करने का भ्रम बनाये रखता है. चुपचाप प्रकृति इतना कुछ करती है पर कभी उसका श्रेय नहीं लेती. फूल खिलने से पहले कितनी परिस्थितियों से दोचार नहीं होता है, बादल बरसने से पहले क्या-क्या नहीं झेलता. हम हर काम करने के बाद औरों के अनुमोदन की प्रतीक्षा करते हैं. हम भी छोटे-मोटे परमात्मा तो हैं ही, मस्ती, ख़ुशी तो हमारे घर की शै है, इन्हें कहीं मांगने थोड़े ही जाना है.


Saturday, July 3, 2021

कर्म यदि निष्काम हो सकें

 जब हम अपने भीतर शक्ति के स्रोत से जुड़ जाते हैं तब हमसे सहज ही ऐसे कर्म होते हैं जिनमें कर्ता भाव नहीं होता. निष्काम कर्म अथवा सेवा कर्म ऐसे ही कर्मों को कहते हैं. जगत को सुंदर बनाने के लिए अथवा किसी की सहायता के लिए किये गए ऐसे कर्मों से कोई कर्म बन्धन नहीं होता. आत्मा की शक्ति अनायास ही हमें ऐसे कर्मों को करने के लिए प्रेरित करती है. श्रम की महत्ता को समझकर हम कामगारों व मजदूरों के प्रति सम्मान की भावना भी जगाते हैं. ध्यान के द्वारा स्वयं के वास्तविक स्वरूप का परिचय पाना साधना की पहली सीढ़ी है. इसके बाद जगत कल्याण के लिए उस ऊर्जा का उपयोग अगला पड़ाव है. इससे हम प्रारब्ध से मिलने वाले सुख के प्रभाव से अछूते रह जाते हैं और अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं. सृष्टि के आयोजन में परमात्मा के साथ मिलकर हम भी अपना योगदान दे रहे हैं ऐसी भावना हमें सदा प्रसन्नचित्त रखती है. 


Monday, November 2, 2020

सदा ऊर्जित होगा मन जो

 

जगत में विकास करना हो तो ऊर्जा के नए-नए स्रोत चाहिए. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैज्ञानिक नयी खोजें कर रहे हैं। भीतर विकास करना हो उसके लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता है। हम भोजन, जल, निद्रा और श्वास से ऊर्जा को ग्रहण करते हैं। ध्यान भी एक सहज और सशक्त साधन है जिससे हम मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं। हमारे चारों ओर तरंगों का एक विशाल समुद्र है, जिसमें सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा की तरंगें भी हैं। मन भी एक ऊर्जा है, यदि कुछ क्षणों के लिए ही इसे केंद्रित करके सकारात्मक विचारों से भर लें फिर स्वीकार भाव में मात् बैठे ही रहें तो ‘समान समान को आकर्षित करता है’ के नियम से दिव्य ऊर्जा स्वयं ही हमारे मन को छूने लगेगी, और यदि वह पहले से ही विचारों से भरा हुआ नहीं है तो उस रिक्त स्थान को भर देगी। मन यदि स्वीकार भाव में हो तो उसकी गहराई में स्थित आत्मा की झलक भी मिलने लगती है। इससे आत्मिक बल भी बढ़ता है और जीवन में भय और असुरक्षा का नाम भी नहीं रहता। प्राण ऊर्जा का संवर्धन प्राणायाम के द्वारा भी किया जा सकता है, किन्तु ध्यान रखना होगा कि मन श्रद्धा से भरा हो। जीवन के अंतिम क्षण तक यदि कोई अपने कार्य स्वयं करने में समर्थ रहना चाहता है तो उसे प्राण ऊर्जा का संवर्धन निरंतर करते रहना होगा।

Tuesday, October 13, 2020

ऊर्जावान बने जग सारा

 ऋतुओं के सन्धिकाल में नवरात्रि का उत्सव हर वर्ष आता है और वातावरण के प्रति हमारी सजगता को बढ़ाता है. वर्षा ऋतु का अंत हो रहा है और पतझर या शरद का आगमन है. हमारी महान संस्कृति में सामान्य जन को इस संक्रमण काल में सुरक्षित रखने के लिए ही वर्ष में दो नव-रात्रियों का विधान किया गया है. हमारा जीवन तभी सुचारूरूप से चल सकता है जब देह में प्राण शक्ति सबल हो. वर्षा ऋतु में जब सब तरफ सीलन और नमी भर जाती है, उसका असर शरीर व मन पर भी पड़ता है. हमारी शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक ऊर्जा को सन्तुलित करने के लिए ही नौ दिनों के व्रत का विधान शास्त्रों में किया गया है. ग्रहों की स्थिति भी इन दिनों ऐसी होती है कि इन दिनों में किया गया ध्यान और साधन शीघ्र फलित होता है. देवी का हर रूप शक्ति का प्रतीक है, ऐसी शक्ति जो हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. सात्विक भोजन, नियमित जीवन शैली, स्वाध्याय और ध्यान का अभ्यास हमें न केवल आने वाली सर्दी की ऋतु के लिए ऊर्जा वान बना देगा बल्कि कोरोना जैसी महामारी से सुरक्षित रहने का सरल उपाय भी देगा. इन नौ दिनों में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रात: काल से ही हम शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्मांडा, स्कंद माता, कात्यायनी, काल रात्रि, महागौरी, सिद्धिरात्रि आदि नौ रूपों में देवी के एक- एक रूप का प्रतिदिन आह्वान करें और अपने भीतर उसकी उपस्थिति को ध्यान द्वारा अनुभव कर सकें तो नवरात्रि का उत्सव सही अर्थों में हम मनाएंगे. 


Tuesday, June 23, 2020

बहे ऊर्जा पल-पल उसकी

जीवन अपार संभावनाएं लिए हमारे सम्मुख खड़ा है. हम ही उससे आँखें चुराए अपने आपको एक बंधे-बंधाये क्रम में ढाल कर अपनी ऊर्जा को व्यक्त होने से रोकते हैं. परमात्मा की ऊर्जा भिन्न-भिन्न आकारों से पल-पल व्यक्त हो रही है. कोई कलाकार एक अनगढ़ पत्थर को सुंदर शिल्प में बदल देता है, कोई सात सुरों से ऐसी मोहक धुन निकालता है कि जड़-चेतन सभी उसे सुनकर ठिठक जाते हैं. कहीं वह परमात्मा वीरों के रूप में प्रकट हो रहा है तो कहीं संतों के रूप में. अनेकानेक फूलों, पंछियों और तितलियों के रूप में भी तो वही ऊर्जा व्यक्त हो रही है. इस ऊर्जा का स्वभाव है प्रेम और आनंद ! ध्यान की गहराई में इसका अनुभव होता है और सेवा के रूप में जगत में यह प्रकट होती है. उन कर्मों से यह प्रकट होती है जो जगत के प्रति प्रेम से प्रकटे हों या आनंद के अतिरेक में सहज ही होते हों. मन जब इतर कामनाओं से खाली हो, तब इस ऊर्जा का अनुभव कण-कण में उसे होता है. शास्त्र इसे ही भक्ति कहते हैं. भक्त का अंतर जब इस भक्ति का स्वाद ले लेता है तो जगत के अन्य स्वाद उसे नहीं भाते. जीवन में उसे कुछ पाने का नहीं सहज होकर जीने का मार्ग भाता है. भविष्य की कल्पनाएं और अतीत की उपाधियों से परे वह केवल वर्तमान में ही रहने लगता है. 

Sunday, April 5, 2020

आओ मिलकर दीप जलाएं


दीप जलाकर हम पूजा करते हैं, अतिथियों का स्वागत करते हैं, दीपावली मनाते हैं पर आज रात्रि जो दीपक हम जलाने जा रहे हैं उसके पीछे कितने ही कारण छुपे हैं. सबसे पहला कारण है भारत के नागरिकों की एकता और अखंडता की शक्ति का जागरण. संगठन में कितनी शक्ति है यह सर्वविदित है, जब हम सभी एक ही संकल्प लेकर दीपदान करेंगे तो उस संकल्प की शक्ति कितने गुणा बढ़ जाएगी, इसका अंदाजा अभी हम नहीं लगा सकते. मन एक ऊर्जा है, इसे सकारात्मक भी बनाया जा सकता है और नकारात्मक भी, जैसे एक ही विद्युत शक्ति से हम हीटर भी चलाते हैं कूलर भी, इसी तरह हमारे मन की शक्ति का उपयोग दोनों प्रकार से किया जा सकता है. सकारात्मकता और उत्साह आज हम सबकी सबसे बड़ी आवश्यकता है. जिस आपदा का सामना हम कर रहे हैं, उसे देख नहीं सकते, कब तक और कैसे उस पर विजय मिलेगी यह किसी को भी ज्ञात नहीं, ऐसे अनिश्चय के वातावरण में यदि हमारे मन सकारात्मक विचारों और शुभ भावनाओं से संयुक्त रहेंगे तभी हम अपना और अपने परिवार, समाज और राष्ट्र का तथा अंततः इस विश्व का कुछ भला कर सकते हैं. हर नकारात्मक विचार हमारी ऊर्जा को व्यर्थ ही नहीं करता उसे काटता भी है. अतः आज रात्रि नौ बजे हम सभी एक शुभ संकल्प हृदय में लेकर परमात्मा से प्रार्थना करेंगे और स्वयं की शक्ति को जगायेंगे. इसका सुखद परिणाम हमें निकट भविष्य में शीघ्र ही देखने को मिलेगा. 

Monday, June 10, 2019

एक साधना ऐसी भी हो



हम जीवन को सुख मानकर चलते हैं पर कदम-कदम पर हमारा सुख बाधित होता है. हमने मान लिया है कि धन में सुख है, यश में सुख है, इन्द्रियों की मांग पूरी करने में सुख है. किंतु जरा गहराई से देखें तो पता चलता है, यह सुख कितना क्षणिक है, इन सबकी प्राप्ति से पूर्व दुःख है, इनके खो जाने के भय में दुःख है. यदि हम यह मानकर चलें कि जिस जीवन से हम परिचित हैं, उसमें सुख नहीं है, तो दुःख मिलने पर हमें कोई धक्का तो नहीं लगेगा. दुःख को हम सहज रूप से स्वीकार कर लेंगे और हमारी ऊर्जा व्यर्थ ही उसका प्रतिरोध करने में नहीं लगेगी. एक बात और होगी, जिस जीवन में सचमुच सुख है क्या कोई ऐसा भी जीवन है, इसकी तलाश भी भी हमारे भीतर जगेगी. उसी तलाश का नाम साधना है, योग है. जिस सुख की प्राप्ति के पहले भी कोई दुःख न हो, जिसके खो जाने का भय भी न हो और जो शाश्वत हो ऐसा सुख केवल ध्यान के द्वारा ही मिल सकता है.

Friday, March 1, 2019

शिव अनंत है


२ मार्च २०१९ 
सभी धर्म यह मानते हैं कि परमात्मा एक है. उस तक पहुंचने के मार्ग पृथक-पृथक हो सकते हैं. इसमें भी किसी को संदेह नहीं कि परमात्मा सर्वज्ञ है, सर्व शक्तिमान है और सब जगह है. वह प्रेम और आनंद का सागर है. मानव के भीतर अनंत की कल्पना का बीज जिस क्षण पड़ा, परमात्मा जैसे पूर्णतया स्पष्ट हो गया. हमारे चारों और का संसार पदार्थ और ऊर्जा से बना है, बनने और मिटने वाला है, किन्तु विज्ञान कहता है पदार्थ को न तो बनाया जा सकता है न ही नष्ट किया जा सकता है, केवल उसका रूप बदला जा सकता है. इसी प्रकार ऊर्जा का भी केवल रूप बदला जा सकता है, उसे सृजित या नष्ट नहीं किया जा सकता. पदार्थ और ऊर्जा दोनों के पीछे जो एक और तत्व है, जो दोनों का मूल है, जो कभी नहीं बदलता, वही शिव तत्व है. ऐसा कभी नहीं था कि वह नहीं था, ऐसा कभी नहीं होगा कि वह नहीं होगा, और ऐसा नहीं है कि वह अभी नहीं है. उस एक में टिककर ही पूर्ण विश्राम का अनुभव संतजन करते हैं.

Thursday, October 25, 2018

जीवन जब उत्सव बन जाए


२५ अक्तूबर २०१८ 
जीवन हर पल हमें बुलाता है, यहाँ अवसरों की कमी नहीं है. छोटे से छोटे सा पल भी अपने भीतर एक अनंत को धारण किये है, जैसे छोटा सा परमाणु असीम ऊर्जा को अपने भीतर छिपाए है. संत कहते हैं, वास्तव में जीवन एक दर्पण है जिसमें हम वही देख लेते हैं जो देखना चाहते हैं. हमारा अंतर्मन ही हमारे व्यवहार में झलकता है और हमारी प्रतिक्रियाओं में भी, यदि भीतर भय है तो अँधेरे में हर वस्तु हमें भयभीत करने वाली नजर आयेगी. यदि भीतर क्रोध है तो छोटी-छोटी बातों पर झुंझलाहट के रूप में वह व्यक्त होगा. यदि भीतर अहंकार है तो हर कोई अपना प्रतिद्वन्दी दिखाई देगा. जीवन का हर अनुभव हमें स्वयं को परखने का जानने का एक अवसर देने के लिए है. जिस दिन भीतर कुछ नहीं रहेगा, जगत जैसा है वैसा अपने शुद्ध रूप में पहली बार दिखाई देगा. क्या सारे उत्सव इसी अंतर परिवर्तन की ओर इशारा करते प्रतीत नहीं होते हैं ? हर उत्सव में पूजा को जोड़ दिया गया है, इसका अर्थ है कि परमात्मा की आराधना करके भीतर की शक्ति को जगाना है ताकि प्रमाद, क्रोध, अहंकार अदि दानवों का नाश हो और हम अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव कर सकें.


Wednesday, October 3, 2018

माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:


४ अक्तूबर २०१८ 

भारत के प्रधानमन्त्री माननीय मोदी जी को चैम्पियन ऑफ़ द अर्थ पुरस्कार मिला है, हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊंचा हुआ है. ‘यथा राजा तथा प्रजा’ के सूत्र के अनुसार हम सभी इस धरती का रक्षक बनने की क्षमता रखते हैं. हम यदि अपने समय और ऊर्जा का अल्प भाग भी अपने वातावरण के प्रति सजग होकर लगायें तो देखते ही देखते भारत भी विकसित देशों की तरह अपनी स्वच्छता पर गर्व कर सकता है. अवश्य ही बाधाएँ आएँगी किन्तु उन्हें दूर करने की हिम्मत भी साथ ही आएगी. समस्या-समाधान भी रात-दिन की तरह जोड़े में ही रहते हैं. इससे आने वाली पीढ़ी भी बचपन से ही इस भाव से संस्कारित होगी. यदि हम छोटा सा ही सही एक बगीचा लगायें, या गमलों में ही कुछ पौधे उगायें. हफ्ते में एक बार अपनी गली और मोहल्ले की सफाई में भाग लें. आस-पड़ोस के बच्चों को इकठ्ठा करके उन्हें स्वच्छ रहने के लाभ बताएं और इस विषय पर चित्र आदि बनवाएं, कितने ही उपाय हैं जिनके द्वारा हम लघु अंश में ही सही धरती माँ का ऋण उतार सकते हैं.  

Thursday, August 30, 2018

एक ऊर्जा बहती भीतर


३१ अगस्त २०१८ 
संत कहते हैं, ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या...सत्य इतना सरल है कि उस पर दृष्टि ही नहीं जाती, इसलिए ब्रह्म से हम अनजाने ही बने रहते हैं. जगत इतना विषम है कि उलझा लेता है, जो उलझा हुआ है वह भला क्या समझेगा, इसलिए जगत की असलियत से भी हम अनजान ही बने रहते हैं. जगत मिथ्या है, इसका भान ही नहीं कर पाते. जीवन जो एक अवसर के रूप में हमें मिला था, एक दिन चुक जाता है और हम इस जगत से खाली हाथ ही प्रयाण कर जाते हैं, दुबारा उसी जाल में उलझने के लिए. जीवन एक ऊर्जा है, जो पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और मनुष्यों के द्वारा प्रवाहित हो रही है. वनस्पति जगत हो या जीव जगत उन्हें इसका कोई अहंकार नहीं है, पर मनुष्य को लगता है, वह इस ऊर्जा का निर्माता है. वह अपनी इच्छा से जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है, प्रकृति का दोहन करके अपने लिए सुख-सुविधाओं के अम्बार लगा सकता है. मनुष्य यदि यह समझ ले कि वह भी इस विशाल आयोजन का एक पुर्जा ही है, ऊर्जा उसके माध्यम से व्यक्त भर हो रही है, वह उसका निर्माता नहीं है. ऐसा करते ही भीतर एक परिवर्तन आता है, कुछ बनने की, कुछ प्राप्त करने की लालसा एक सहज कर्म प्रवाह में बदल जाती है. जीवन की जिस क्षण जो मांग है उतना भर होता है और शेष समय अंतर एक सहज स्थिति का अनुभव करता है.  

Monday, August 6, 2018

छाया को छाया भर जानें


७ अगस्त २०१८ 
एक तरफ पदार्थ है और दूसरी तरफ ऊर्जा यानि चेतना, दोनों के संयोग से एक तीसरा तत्व उत्पन्न हुआ मन, जो ऐसे ही था जैसे प्रकाश के सामने कोई वस्तु आ जाये तो उसकी छाया बन जाती हो. छाया जो प्रकाश के अनुसार बदलती रहती है, जो कभी होती है कभी नहीं होती, इसीलिए मन को चन्द्रमा के समान माना गया है, जो घटता बढ़ता रहता है और कभी-कभी समाप्त ही हो जाता है. यदि चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश न पड़े और वह धरती की परिक्रमा न करे तो उसके अस्तित्त्व का सामान्य मानव को पता भी न चले. भौतिकी नियम के अनुसार पदार्थ और ऊर्जा दोनों को न ही उत्पन्न किया जा सकता है, न ही नष्ट किया जा सकता है. हम स्वयं को यदि शुद्ध पदार्थ मानते हैं, यानि अपना केवल भौतिक अस्तित्त्व मानते हैं, तो भी हमारा विनाश सम्भव नहीं है, केवल परिवर्तन होता है. पंच तत्वों से बना बच्चे का तन एक दिन वृद्ध हो जाता है और पुनः सारे तत्व अपने-अपने स्रोत में मिल जाते हैं. यदि हम स्वयं को शुद्ध चेतना मानते हैं तब भी हमारा विनाश सम्भव नहीं है. स्वयं को मन मानने से ही सारी उलझन का आरम्भ होता है. पहली बात तो यह है, मन छाया मात्र है, अर्थात उसका कोई अस्तित्त्व नहीं है, वह प्रतीत भर होता है. पदार्थ परिवर्तन शील है, उसकी छाया होने के कारण मन भी प्रतिपल बदल रहा है, इसीलिए कोई भी अपने आप में टिका हुआ नहीं लगता, केन्द्रित नहीं है. मन माया के पार जाकर ही कोई स्वयं में स्थित हो सकता है.

Monday, July 9, 2018

सृजनशील जब मन हो जाये


९ जुलाई २०१८ 
जीवन ऊर्जा हर क्षण बंट रही है. कहीं नक्षत्रों का निर्माण हो रहा है तो कहीं पुष्पों का सृजन. इस धरती पर हर क्षण कितना कुछ नया बन रह है और पुराना विनष्ट हो रहा है. मानव मन में भी असंख्य विचारों का सृजन होता है, विशाल पुस्तकालय उन विचारों की ही देन हैं. जाने-अनजाने हम सभी सृष्टिकर्ता के इस कार्य में उसके सहायक बन जाते हैं. उसने मानव को ही नित नूतन सृजन की क्षमता दी है. मन की गहराई में न जाने कहाँ से किसी कवि और लेखक के भीतर भावनाओं और विचारों का जखीरा चला आता है, जिसे वह रचना के रूप में बाहर उलीच देता है. भाषा और व्याकरण का सीमित ज्ञान ही इसका कारण है ऐसा नहीं लगता, अवश्य ही उसका मन किसी अनंत स्रोत से जुड़ा है, जो ताजे कूप की तरह सदा भरा रहता है. कभी ऐसा भी देखा गया है जिस भाषा का इस जन्म में अध्ययन ही नहीं किया, किन्हीं पलों में उसके शब्द भी भीतर से फूटने लगते हैं. तब विश्वास हो जाता है, यह यात्रा सिर्फ इसी जन्म की तो नहीं है.

Friday, June 22, 2018

करें योग रहें निरोग


२२ जून २०१८ 
कोई भी तनावग्रस्त व्यक्ति स्वयं के अस्तित्त्व को ही नहीं अपने चारों ओर के वातावरण को भी दूषित करता है, इसी तरह यदि कोई व्यक्ति शांत होता है तो शांति की लहरें उस तक ही सीमित नहीं रहतीं आस-पास के वातावरण को भी प्रभावित करती हैं. बिखरते हुए समाज को जोड़ने का काम योग से ही हो सकता है. भारत के संतों तथा प्रधानमन्त्री के कारण योग दिवस के रूप में विश्व को वर्ष में एक दिन ऐसा मिला है जिसको हर व्यक्ति मना सकता है. बच्चे, युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर सभी किसी न किसी रूप में इस दिन अपने तन, मन और आत्मा के पोषण के लिए कुछ समय निकाल सकते हैं. आज जब कि संसार के सभी देश किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हैं, योगदिवस पर लाखों लोगों ने आसन, प्राणायाम किये, ध्यान किया, जिसके परिणाम स्वरूप समाज, देश और दुनिया में सकारात्मक ऊर्जा की लहर फैली है.

Wednesday, January 31, 2018

सहज बंटे है नेमत उसकी

१ फरवरी २०१८ 
जीवन एक प्रसाद है. एक अनोखा उपहार. जीवन कितना भव्य है और कितना गरिमापूर्ण भी. जीवन का होना मात्र ही अपनेआप में इतना सुख से भरा है कि जीवन से कुछ मांगने की बात ही बेमानी है. संत सदा से कहते आये हैं, मानव जन्म अनमोल है, इसका अहसास उसी को होता है जो जीवन के मर्म को समझ लेता है. देह तो मात्र बाहरी आवरण है, इसको चलाने वाली ऊर्जा जो चेतन भी है और रसपूर्ण भी है, उसका अनुभव किये बिना जीवन का मोल नहीं लगाया जा सकता. मीरा ने जिस राम रतन को पाया और बुद्ध ने जिस शून्य को अपने भीतर पाया वह परम सत्य हर मानव पा सकता है. एक बार उसके लिए भीतर आकांक्षा जगे और परम के प्रति अटूट श्रद्धा हो तो जीवन का हर पल आनंद से भर जाता है.   

Wednesday, January 24, 2018

रहे ऊर्जित हर पल अपना

२४ जनवरी २०१८ 
जीवन एक ऊर्जा है, जो हजार-हजार रूपों में स्वयं को व्यक्त कर रही है. मानव इस उर्जा को पहचान कर उसे दिशा दे सकता है. जब तक हम स्वयं को नहीं जानते नियति के द्वारा संसार सागर में इधर-उधर बहाए जाते हैं. हमारे कर्म पूर्वाग्रहों से संचालित होते हैं, जो पूर्व संस्कारों के कारण बनते हैं. न चाहते हुए भी हम मनसा, वाचा, कर्मणा स्वयं दुःख पाते हैं और अन्यों को दुःख देने के साधन बन जाते हैं. एक बार अपने भीतर इस ऊर्जा को अनुभव करने के बाद भीतर स्वराज्य का जन्म होता है. यही असली मुक्ति है. विकारों, संस्कारों, मान्यताओं और विश्वासों से मुक्त होते ही ऊर्जा खिलने लगती है और जीवन के एक नये आयाम से परिचय होता है.

Thursday, December 28, 2017

हीरा जनम अमोल है

२९ दिसम्बर २०१७ 
जीवन का हर पल अनंत सम्भावनाएं छिपाए है. अगले पल क्या घटने वाला है, कोई नहीं जानता. हर घड़ी एक नया अवसर लेकर हमारे सम्मुख आती है. हम क्या चुनते हैं, यह हम पर निर्भर है. समय की धारा तो बही जा रही है. उसमें कुछ सूखे हुए पुष्प हैं तो कुछ नव कुसुमित कमल भी, कुछ बासी मालाएं हैं तो कुछ सूर्य की नव रश्मियाँ भी, हमारी दृष्टि किस पर है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है. कोई यूँही सोये-सोये भोर गंवा देता है तो कोई निकल पड़ता है, सुबह की लालिमा और हवा की स्नेह भरी छुअन को समेटने, परमात्मा को धन्यवाद देने अथवा तो ध्यान, सुमिरन में डूबने, जिससे ऊर्जा के उस महत स्रोत से वह जुड़ जाये और अपने भीतर ही तृप्ति का महासागर उसे मिल जाये. जीवन अनमोल है इसका मर्म जाने बिना इसका कीमत का अंदाजा नहीं होता. आने वाले वर्ष में अन्य लक्ष्यों के साथ इस एक खोज को भी जोड़ लें तो नया वर्ष कभी बीतेगा ही नहीं.