पुराणों में कथा आती है, जब-जब पृथ्वी पर असुरों का भार बढ़ गया तो उनके विनाश के उपाय करने पड़े. असुरों के सींग नहीं होते, वे भी मानव ही होते हैं. उनमें दैवीय अथवा मानवीय गुणों की अपेक्षा आसुरी प्रवृत्तियां अधिक प्रकट होती हैं. सात्विक भावों से भरे मानव देवता होते हैं. सात्विक व राजसिक दोनों गुणों से युक्त मानव तथा राजसिक व तामसिक गुणों से भरे हुए लोग असुर कहलाते हैं. जब जीवन में सत्व की कमी हो जाती है, लोग ईमानदारी को अपवाद तथा बेईमानी को जीवन व व्यापार का सहज अंग मानने लगते हैं, मिलावट, कालाबाजारी बढ़ जाती है. रिश्वत लेकर या देकर काम निकालना बुरा नहीं समझा जाता. जब विद्यालयों में अध्ययन के साथ साथ व्यसनाधीन होने की सुविधा भी मिलती है, तब आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगने लगती है. अहंकार, धन या बल का प्रदर्शन आसुरी गुण हैं. मानव को सन्मार्ग पर लाने के लिए अस्तित्त्व द्वारा समय-समय पर उपाय किये जाते हैं. सम्भवतः आज हम उसी दौर से गुजर रहे हैं, यदि मानव अब भी नहीं संभला तो भविष्य में और भी कठिन समय से गुजरना पड़ सकता है.
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Monday, May 17, 2021
Monday, October 5, 2020
गगन सदृश हुआ मन जिस क्षण
जीवन जिन तत्वों से मिलकर बना है, वे हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश. तीन तत्व स्थूल हैं और दो सूक्ष्म. पृथ्वी, वायु व जल से देह बनी है, अग्नि यानि ऊर्जा है मन अथवा विचार शक्ति, और आकाश में ये दोनों स्थित हैं. शास्त्रों में परमात्मा को आकाश स्वरूप कहा गया है, जो सबका आधार है . परमात्मा के निकट रहने का अर्थ हुआ हम आकाश की भांति हो जाएँ. आकाश किसी का विरोध नहीं करता, उसे कुछ स्पर्श नहीं करता, वह अनन्त है. मन यदि इतना विशाल हो जाये कि उसमें कोई दीवार न रहे, जल में कमल की भांति वह संसार की छोटी-छोटी बातों से प्रभावित न हो, सबका सहयोगी बने तो ही परमात्मा की निकटता का अनुभव उसे हो सकता है. मन की सहजावस्था का प्रभाव देह पर भी पड़ेगा. स्व में स्थित होने पर ही वह भी स्वस्थ रह सकेगी. मन में कोई विरोध न होने से सहज ही सन्तुष्टि का अनुभव होगा.
Tuesday, June 4, 2019
स्वच्छ रहे परिवेश हमारा
पर्यावरण संरक्षण से तात्पर्य है
जो आवरण हमें हमारे चारों ओर से घेरे हुए है, उसका बचाव. कोई सोचता है कि हवा,
पानी और जल जो हमसे बाहर हैं उनका बचाव. किंतु इस आवरण का आरंभ हमारी देह की सीमा आरंभ
होते ही हो जाता है, यानि भीतर से ही. हमारा शरीर साठ प्रतिशत जल तत्व से बना है,
अशुद्ध जल भीतर जाते ही भीतर का जलीय वातावरण बिगड़ जाता है. देह के कण-कण में वायु
तत्व है, जो श्वास हम ग्रहण करते हैं यदि वह अशुद्ध है तो भीतर स्वच्छता की कामना
रखना व्यर्थ है. इसी तरह पृथ्वी यानि भोजन का जो अंश हम रोज ग्रहण करते हैं यदि रासानियक
रूप से प्रदूषित है तो देह के अंग स्वस्थ नहीं रह सकते. मन बनता है भोजन के
सूक्ष्म अंश से, प्राण बनता है वायु के सूक्ष्म अंश से, यदि मन व प्राण ही साफ-सुथरे
नहीं हैं तो रोग को हम स्वयं ही आमन्त्रण दे रहे हैं. इसका अर्थ हुआ पेड़ लगाना,
नदियों को स्वच्छ रखना, रसायन मुक्त खेती करना, आज यह विश्व के लिए या देश के लिए
जरूरी नहीं है बल्कि हमारे खुद के अस्तित्त्व की रक्षा के लिए आवश्यक हो गया है. जीवन
का सम्मान यदि हमें करना है तो अपने परिवेश की स्वच्छता के प्रति सजग होना हमारी
पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
Wednesday, March 27, 2019
तेरी है जमीं तेरा आसमां
यह पृथ्वी हमारा घर
है, इसका नीला समुन्दर और विशाल गगन मंडल हमारी कल्पनाओं को बहने और उड़ने के लिए एक
सहज और सुंदर आधार देता है. हरे-भरे जंगल और सुंदर पशु-पक्षी इसको कितना आकर्षक
बनाते हैं. यह सुंदर पृथ्वी विभिन्न अन्नों व फलों-शाकों से हमें पोषित करती है. चन्द्र
और सूर्य रात और दिन के प्रहरी की तरह जीवन को विकसित होने के लिए ऊष्मा देते हैं.
मानव की गरिमा इस बात में है कि वह इस सारे आयोजन का साक्षी है, वह चाहे इसमें
अपना अल्प योगदान ही दे सकता हो किन्तु यदि उसकी चेतना विकसित होकर इसका आनंद भी
लेना सीख जाती है, तो परमात्मा का तात्पर्य सिद्ध हो गया जानना चाहिए. मानव जब
स्वार्थ में या संकीर्णता के कारण इस सृष्टि को आँख भर कर निहारे भी नहीं और इसे
नष्ट करने के उपाय खोजे तो दिव्यता का अपमान होता है. जो सत्य, शिव और सुंदर है
उसे देखने के लिए पहले भीतर उसके प्रति सम्मान और प्रेम तो जगाना ही होगा.
Wednesday, October 3, 2018
माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:
४ अक्तूबर २०१८
भारत के प्रधानमन्त्री माननीय मोदी जी को चैम्पियन ऑफ़ द अर्थ
पुरस्कार मिला है, हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊंचा हुआ है. ‘यथा राजा तथा प्रजा’
के सूत्र के अनुसार हम सभी इस धरती का रक्षक बनने की क्षमता रखते हैं. हम यदि अपने
समय और ऊर्जा का अल्प भाग भी अपने वातावरण के प्रति सजग होकर लगायें तो देखते ही
देखते भारत भी विकसित देशों की तरह अपनी स्वच्छता पर गर्व कर सकता है. अवश्य ही
बाधाएँ आएँगी किन्तु उन्हें दूर करने की हिम्मत भी साथ ही आएगी. समस्या-समाधान भी रात-दिन
की तरह जोड़े में ही रहते हैं. इससे आने वाली पीढ़ी भी बचपन से ही इस भाव से संस्कारित
होगी. यदि हम छोटा सा ही सही एक बगीचा लगायें, या गमलों में ही कुछ पौधे उगायें.
हफ्ते में एक बार अपनी गली और मोहल्ले की सफाई में भाग लें. आस-पड़ोस के बच्चों को
इकठ्ठा करके उन्हें स्वच्छ रहने के लाभ बताएं और इस विषय पर चित्र आदि बनवाएं,
कितने ही उपाय हैं जिनके द्वारा हम लघु अंश में ही सही धरती माँ का ऋण उतार सकते
हैं.
Sunday, June 4, 2017
पर्यावरण बचाएं हम
५ जून २०१७
पृथ्वी को हम माँ कहते हैं. उसी से हम जन्मे हैं और एक दिन उसी में हमारे भौतिक
अवशेष लीन हो जाने वाले हैं. पृथ्वी के उपकारों को याद करना आरम्भ करें तो उनका
अंत ही नहीं आएगा. हमारे वस्त्र, मकान, भोजन सभी कुछ तो उसी से मिला है. जल को भी वही
धारण करती है और अग्नि को भी अपने उदर में वही धारण किये हुए है. हजारों तरह के जीव-जन्तु,
पेड़-पौधे, हीरे-जवाहरात और खनिज लवण क्या नहीं है उसके आश्रय में. मानव ने पृथ्वी
के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार किया है, यह किसी से छिपा नहीं है. जंगल नष्ट किये जा
रहे हैं, हवा को प्रदूषित किया जा रहा है, जल को भी पीने योग्य नहीं छोड़ा है. मानव
का अज्ञान उसे किस ओर ले जा रहा है वह अपनी बेहोशी में यह भी नहीं देख पा रहा है. विश्व
पर्यावरण दिवस हमें जागने के लिए मजबूर करता है, यदि हम अब नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी
को जन्म से ही रोगों का सामना करना पड़ेगा. आज भी प्रदूषण के कारण रोगों की संख्या
बढती जा रही है. योग युक्त जीवन शैली अपना कर हम पुनः इस धरा को हरा-भरा बना सकते
हैं.
Wednesday, November 30, 2016
मन ही माया
हर सुबह एक नए अंदाज में प्रकटती है, सूर्य भी नए रूप में दिखाई देता है. आकाश वही है पर बादलों के बदलते रूप उसे नित नया कलेवर पहना देते हैं. इसी तरह आत्मा सदा एक सी रहने पर भी मन पल-पल बदलता है, तीन गुणों के मेल से कभी हँसता कभी उदास होता है. शास्त्रों के अनुसार आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी का निर्माण हुआ है. उसी तरह आत्मा से प्राण, प्राण से ऊर्जा, ऊर्जा से मन तथा मन से देह का निर्माण होता है. साधना के द्वारा जितना-जितना सतोगुण बढ़ता जाता है, मन आत्मा के निकट पहुँच जाता है.
Sunday, June 21, 2015
हरी हरी वसुंधरा
फरवरी २०१०
वसुधा,
वसुंधरा, धरा, धरित्री, पृथ्वी, मही, भू, भूमि, मेदिनी, श्री, विष्णु पत्नी इतने
सारे नाम हैं धरती माँ के, हर एक का अलग अर्थ है. भू का अर्थ है होना. पृथ्वी जड़
नहीं, स्थिर नहीं किसी आकर्षण में बंधी घूम रही है. भूमि का अर्थ होने की
प्रक्रिया को आधार देने वाली अर्थात जिन्हें वह आधार देती है उन्हें भी एक दूसरे
के लिए क्रियाशील देखना चाहती है. धरा, धरित्री का अर्थ धारण करने वाली अर्थात
सहनशीलता, क्षमा, शक्ति, क्षमता. धरित्री माँ को भी कहते हैं. वह माँ की तरह उदार
है. वसुधा कहते हैं क्योंकि कितनी सम्पदा इसके पास है. वसु धन भी है और वसु रहने
का साधन भी है, वह देवता भी है, वसुधा का अर्थ इसलिए घर मात्र नहीं है, घर की
आत्मीयता भी है. पृथ्वी का अर्थ विस्तारवाली है. विष्णु ने मधु-कैटभ का वध किया
उसके मेद से बना स्थूल पिंड, तभी वह मेदिनी कहलायी. श्री भूदेवी है, आश्रय देने
वाली. इन सब अर्थों को लेकर पृथ्वी की आराधना करें तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ
समझ में आता है, शेष इस पर रहने वाले लोगों की आत्मीयता से बनता है.
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