पुराणों में कथा आती है, जब-जब पृथ्वी पर असुरों का भार बढ़ गया तो उनके विनाश के उपाय करने पड़े. असुरों के सींग नहीं होते, वे भी मानव ही होते हैं. उनमें दैवीय अथवा मानवीय गुणों की अपेक्षा आसुरी प्रवृत्तियां अधिक प्रकट होती हैं. सात्विक भावों से भरे मानव देवता होते हैं. सात्विक व राजसिक दोनों गुणों से युक्त मानव तथा राजसिक व तामसिक गुणों से भरे हुए लोग असुर कहलाते हैं. जब जीवन में सत्व की कमी हो जाती है, लोग ईमानदारी को अपवाद तथा बेईमानी को जीवन व व्यापार का सहज अंग मानने लगते हैं, मिलावट, कालाबाजारी बढ़ जाती है. रिश्वत लेकर या देकर काम निकालना बुरा नहीं समझा जाता. जब विद्यालयों में अध्ययन के साथ साथ व्यसनाधीन होने की सुविधा भी मिलती है, तब आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगने लगती है. अहंकार, धन या बल का प्रदर्शन आसुरी गुण हैं. मानव को सन्मार्ग पर लाने के लिए अस्तित्त्व द्वारा समय-समय पर उपाय किये जाते हैं. सम्भवतः आज हम उसी दौर से गुजर रहे हैं, यदि मानव अब भी नहीं संभला तो भविष्य में और भी कठिन समय से गुजरना पड़ सकता है.
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Monday, May 17, 2021
Friday, January 12, 2018
देवों का आशीष सदा है
१२ जनवरी २०१८
संत कहते हैं, जैसे कोई सिंह शावक बाल्यावस्था में भेड़ों के
मध्य चला गया हो और स्वयं को भेड़ ही मानता रहे, वैसे ही मानव देव होने की क्षमता
रखते हुए भी असुरों के मध्य चला जाता है और स्वयं को असुर मानने लगता है. देव होने
का अर्थ है स्वयं को परमशक्ति के प्रति समर्पित मानना, सदा देने की भावदशा में
रहना, आनंद और शांति के साथ सबके सुख की कामना करते हुए जीना. असुर स्वयं को
असुरक्षित मानता है, फिर भी समर्पण नहीं करता. उसे अपने लिए ही कम पड़ता है, देने
का ख्याल कहाँ से आएगा और स्वार्थपूर्ति के लिए वह अन्यों को दुःख भी पहुँचा सकता
है. मानव यदि देवत्व को जगाने की कामना करता है तो सारी देव शक्तियाँ उसकी सहायता
के लिए आ खड़ी होती हैं. आसुरी भाव में जीने वाला व्यक्ति आसुरी शक्तियों के प्रभाव
में और भी दुर्बल हो जाता है.
Wednesday, August 6, 2014
शुभता ही प्रकटे जीवन से
जनवरी २००७
हमारा
तन वेदिका है. प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं. प्राणाग्नि बनी रहे, देह
दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक और अल्प आहार ही लेना है. इंद्र हाथ का देव
है, सो कर्म भी ऐसे हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी
शुभ हो. अतियों का निवारण ही योग है. योग से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम
प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. सन्त हमें जगाते हैं और हम जग कर पुनः सो जाते
हैं. हमें संकल्प करना है कि अशुभ से बचे, क्यों कि अशुभ विष है और हमें जीना है. व्यवहार
क्षेत्र में पहले भाव फिर क्रिया होती है पर अध्यात्म क्षेत्र में पहले क्रिया
पवित्र हो तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण
के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है.
Tuesday, December 25, 2012
मानव होना सीखें हम
दिसंबर २००३
मानव एक पुल है, जिसके एक ओर
पशुता है और दूसरी ओर देवत्व, चुनाव उसके हाथ में है, क्रोध, हिंसा उसे पशु के
समान बनाते हैं, प्रेम, उदारता देवों के समान. ऊर्जा भीतर एक ही है, दिशा भिन्न
है, हर पल उसे दोनों में से चुनाव करने का अवसर मिलता है, यही तनाव उसे व्यथित
किये रहता है, पशुता में उसका आकर्षण है क्योंकि वहाँ कोई जिम्मेदारी नहीं, देवत्व
उसे चाहिए पर कीमत चुकाए बगैर, इसी कशमकश में मानव कहीं भी नहीं पहुंच पाता. नशा करके
वह इस चुनाव से मुख मोड़ लेता है, यह नशा मादक द्रव्य का भी हो सकता है, धन, पद या
यश का भी. वह अपनी एक मनमोहक छवि बना लेता है, और स्वयं ही धोखे में आ जाता है. इस
पुल से निजात पाने का एक उपाय है, एक नई दिशा की तलाश, केवल मानव होने की
आकांक्षा, जहां है वहीं रहकर स्वयं में टिक जाने का प्रयास, अपने भीतर जाने का
प्रयत्न, तब चुनाव से परे होकर जीना होगा, जब जो मिले उसे सहज ही स्वीकारना, अमृत
हो या विष दोनों को समता की भावना से ग्रहण करना. न कुछ पाने की चाह हो न कुछ
त्यागने की, ऐसा मन ही परमात्मा की निकटता को अनुभव कर सकता है.
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