इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति के रूप में काली, लक्ष्मी और सरस्वती हमारे भीतर विद्यमान हैं। ये तीनों ही तमोगुण, रजो गुण तथा सतो गुण का भी प्रतीक हैं। तीनों गुणों के ऊपर एक ही ब्रह्म तत्व है। अलग-अलग नाम-रूप में वही एक तत्त्व समाया है। तीनों गुणों से पार जा कर ही मानव अपने सहज धर्म या स्वभाव का अनुभव करता है। सहज धर्म में स्थित रहना मानव को इन शक्तियों के शुद्ध रूप से जोड़कर रखता है। सहज धर्म से विचलन ही अहंकार है। आत्मा जब तीनों गुणों की साक्षी हो जाती है तो ब्रह्म तत्त्व में स्थित हो जाती है। उसे जानना ही आत्मसाक्षात्कार है।
Tuesday, September 21, 2021
Sunday, February 14, 2021
मन की ताकत जो पहचाने
हमने न जाने कितनी बार
यह पढ़ा है और सुना है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। हमारा भाग्य पल-पल
हमारी सोच के द्वारा ही लिखा जाता है। अपने विचारों में यदि उच्चता, दृढ़ता और
एकाग्रता हो तो हमारा जीवन स्वयं के लिए व औरों के लिए भी सहज, सरल और सुंदर होगा।
किन्तु अक्सर हम पाते हैं विचार बिखरे हुए हैं, एक-दूसरे के विरोधी हैं और दृढ़ नहीं
रह पाते। इसलिए जीवन भी उलझा हुआ, अस्पष्ट तथा दुरूह प्रतीत होने लगता है। इसका कारण
है कि हमने मन की शक्तियों को कभी समझा ही नहीं, शास्त्र कहते हैं मन परमात्मा की तीन
शक्तियों से सम्पन्न है, वे हैं इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति। जैसी इच्छा
हमने जगायी, उसी के अनुरूप क्रिया जाने-अनजाने होने लगती है। उदाहरण के लिए यदि किसी
के भीतर चोरी की इच्छा जगी तो उसके लिए वैसी ही परिस्थतियों का निर्माण हो जाएगा। बाद
में वह कहता है कि उसने ऐसा नहीं किया, न जाने कैसे उससे हो गया, क्योंकि उस क्षण वह
मन की उस कामना से बाहर था। मन जितना सकारात्मक होगा, जीवन में वैसी ही परिस्थितियाँ
प्रकट होंगी, यदि नकार की तरफ झुका होगा तो उन्हीं घटनाओं व व्यक्तियों को जीवन में
आकर्षित कर लेगा जो नकारात्मक हैं। वास्तव में हम मन नहीं हैं, आत्मा हैं, किन्तु जब
तक यह अनुभव के रूप में नहीं आता, जब तक हम मन के घाट पर ही जीते हैं, पल-पल सचेत रहना
होगा। जाने-अनजाने जो विचार भीतर चलते हैं वे ही वस्तु, व्यक्ति और घटना बनकर हमारे
सम्मुख आते रहेंगे।
Monday, November 23, 2020
ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है
संत कहते हैं, ‘इच्छा, क्रिया और ज्ञान’ आत्मा में ये तीनों शक्तियां हैं. इन तीनों से योग का घनिष्ठ संबंध है. सफलता तब मिलती है जब ये तीनों एक साथ प्रकट होती हैं. कुछ करने की भावना या मात्र इच्छा होना ही पर्याप्त नहीं है, इसे क्रिया के क्षेत्र में उजागर करने की आवश्यकता है. जब हम चाहते हैं कि हमारी इच्छा पूरी हो, ज्ञान और क्रिया शक्ति की भी आवश्यकता है. हर एक में क्रिया शक्ति मौजूद है, हमें इसे समुचित रूप से प्रवाहित करने की जरूरत है अन्यथा यह मन और देह में बेचैनी बढ़ाती है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है, कुछ लोग मेज थपकते हैं, कुछ पैर हिलाते हैं, जो उनके भीतर की बेचैनी को ही दिखाता है. जब हम योग साधना और ध्यान करते हैं तभी कर्म और सेवा के क्षेत्र में सफल होते हैं. क्रिया जब ज्ञान से संयुक्त होती है तब प्रसन्नता सहज ही मिलती है। योग से प्राप्त सजगता और सतर्कता का उपयोग किसी और का दोष ढूंढने में इस्तेमाल न करना कर्म की शक्ति को बढ़ाता है। यदि हम इस का निरीक्षण नहीं करते हैं, जीवन में आलस्य और जड़ता छा जाती है. जब कर्म का आदर नहीं होता, जीवन में प्रमाद छा जाता है, इच्छाएं पूरी नहीं होती हैं. सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है। जब हम ध्यान की स्थिति में विचारों से परे जाते हैं, इच्छा से ज्ञान की ओर, फिर कार्य करना सरल हो जाता है. जो इच्छा, ज्ञान में परिवर्तित हो जाती है, और क्रिया में फलित होती है, उसी से विकास होता है.