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Sunday, January 13, 2013

हर पथ उसकी ओर जा रहा


जनवरी २००४ 
क्रिया के कारण भीतर के आनंद का हमें पता चलता है. क्रिया और ज्ञान दोनों का समन्वय हो तभी हम अध्यात्म के पथ पर चल सकते हैं. धर्म व्यवहारिक हो तभी चेतना का विकास हो सकता है, चेतना का रूपान्तरण ध्यान के द्वारा किया जा सकता है. ध्यान हमारी सुप्त चेतना को जागृत करता है. सत्य हमारे भीतर है उसे खोजकर यदि हम जगत में व्यवहार करें तो ही हम सही रूप से उसका उपयोग कर सकते हैं. हम प्रतिक्षण अपने आप से प्रश्न करें कि क्या मेरा यह क्षण बंधन का कारण बनने वाला है या मुक्त करने वाला है. सर्वप्रथम शत्रु अहंकार है जिससे हमें सजग रहना है, बहुत सूक्ष्म होता है यह अहंकार और यह भी हिंसा का कारण बन जाता है, हम स्वयं में इतने न खो जाएँ की अन्य हमें बाधा स्वरूप लगें, हम इतने न बंध जाएँ कि छूटने में भी दर्द हो. हम अपनी कोहनी भर जगह तो अपने चारों और रखें ही ताकि सरलता से चल सकें और किसी को चोट भी न लगे. हमारा कोई व्यवहार किसी को चोट पहुंचाता हो तो उसकी भनक स्वयं को पहले लग जाती है. वह  परमेश्वर परब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप हमारे साथ जो है, वह सदा सचेत करता रहता है. उससे प्रीति होना इतना सरल व सहज भी नहीं है, तलवार की धार पर चलने जैसा है पर एक बार यदि चलना आ जाये तो भीतर की सच्चाईयाँ प्रकट होकर स्वयं राह बताती हैं तब वह सुह्रद स्वयं हमारा हाथ पकड़ कर सही पथ पर ले जाता है, तब गिरने का भी नहीं रहता. शरण में जाने के बाद उत्तरदायित्व उसका हो जाता है, कितनी भी बाधाएं आयें कोई भय नहीं क्योंकि उस निर्भय का साथ जो है.    

Wednesday, June 6, 2012

लगन लगायी जिसने उससे


अप्रैल २००३ 
हमारे जीवन में प्रेम नित नवीन होता रहे, निरंतर उसमें वृद्धि हो, उसकी बन्दगी भी हम बढाते रहें, समर्पण को द्विगुणित करते चलें तो जीवन में अन्य कोई रह ही नहीं सकता सिवाय उस एक राम के जो रोम-रोम में बसता है. उस कृष्ण के जो हर क्षण हमें अपनी ओर आकर्षित करता है, उस जगन्माता के जो हमारा पोषण करती है, उस शिव के जो सदा हमारा कल्याण करता है, उस गणपति के जो हमारे जीवन से विघ्न-बाधाओं को हटाता है, और जब हमारा हृदय उस परमब्रह्म का घर हो जाता है तो हृदय से सारे चोर निकलते लगते हैं, मुक्ति का आनंद ही हमें भक्ति करने को प्रेरित करता  है. हम कृतज्ञता प्रकट करते हैं और अपनी आत्मा की झलक पाकर विस्मित भी हो जाते हैं, परम की सुंदरता अपरिमेय है, हमारा अंतर्मन भगवद्शक्ति का आश्रय लेकर सहज प्राप्त कर्त्तव्य निभाता है, कर्मों के बंधन नहीं बाँधते, पुराने संस्कार नष्ट हुए लगते है. शांति का एक आवरण हमारे चारों ओर छाने लगता है, जिसको भेद कर संसार का कोई दुःख हमें छू नहीं सकता उस परम प्रिय का प्रेम एक कवच बन कर हमारे साथ रहता है.