हमारे पास हर पल एक पथ होता है, जिस पर चलकर हम उस परम से एक हो सकते हैं। वह सदा सर्वदा उपलब्ध है। हम स्वभाव वश, संस्कार वश या अपने प्रारब्ध के अनुसार कहीं और चल देते हैं। वह हमसे कभी बिछुड़ा नहीं, उसे अपने से जुदा मान लेते है, फिर व्यर्थ ही अन्धेरों में ठोकर खाते हैं। ध्यान की वह ज्योति नित्य निरंतर भीतर है। कर्मशील मन हो तो उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है।जीवन में कैसी भी परिस्थति हो, ईश्वर का वरदान है। जैसे कुम्हार मिट्टी के पात्र को आकार देते समय कभी सहलाता है कभी आहत करता है; ईश्वर भी ‘स्वयं’ को गढ़ने के लिए हर उपाय अपनाता है। वह ‘स्वयं’ को अपने सुंदरतम रूप में देखना चाहता है। कोई उसके साथ सहयोग करता है तो उसे फूलों के पथ से ले जाता है और जो विरोध करता है उसे काँटों के पथ से ! मंज़िल पर दोनों मिल जाते हैं, क्योंकि लक्ष्य सभी का एक ही है। एक न एक दिन सभी को वह लक्ष्य पाना है।
Showing posts with label पथ. Show all posts
Showing posts with label पथ. Show all posts
Friday, January 12, 2024
Tuesday, July 30, 2013
एक बार लग गयी लगन तो
करां सजदा ते सिर न उठावां, के दिल विच रब वसदा
किवें
सूरत तो नजरां उठावां, के दिल विच रब दिसदा
जब
भी यह सुंदर भजन सुनते हैं तो मन प्राण आलोड़ित हो जाते हैं. ईश्वर हमारे भीतर है,
फिर भी हम संदेह का शिकार होते हैं, हमारे पुण्य कर्म जब क्षीण होते हैं, तब मन
शंकाओं से घिर जाता है. सत्संग हमें पुनः-पुनः अपनी स्मृति कराता है. प्रमाद नीचे
ले जाता है, अज्ञान की निद्रा मोह में डाल देती है, पर कृपा हमें उबार लेती है
क्योंकि मन में होने वाली कचोट हमें शांत नहीं बैठने देती. एक बार जो उस रास्ते चल
पड़े वह उससे विमुख कब तक रह सकता है. परमात्मा हमारे कोटि-कोटि अपराधों को क्षमा
कर देते हैं और पुनः अपनी शरण में ले लेते हैं. अपना भूला हुआ पथ हम फिर से पा
लेते हैं.
Friday, February 8, 2013
अगम प्रेम का पथ है यह
‘स्व’ से ‘पर’ की ओर जाने का नाम ही
संसार है और ‘पर’ से ‘स्व’ की ओर जाने का नाम ही अध्यात्म है. यह संसार पाया नहीं
जा सकता और परमात्मा को खोया नहीं जा सकता. जिसको पाने का कोई उपाय नहीं उसे हम
पाया हुआ समझते हैं और जिसे खोने का कोई उपाय नहीं उसे जीवन भर पाने का प्रयास
करते है. संसारी कुछ बनना चाहता है, पर संत, भक्त मिटना चाहता है. प्रेम का पथ अगम
है, इसमें प्रियतम तो याद रहता है पर खुद की याद नहीं रहती.
Sunday, January 13, 2013
हर पथ उसकी ओर जा रहा
जनवरी २००४
क्रिया के कारण भीतर के आनंद का हमें पता चलता है. क्रिया और ज्ञान दोनों का समन्वय
हो तभी हम अध्यात्म के पथ पर चल सकते हैं. धर्म व्यवहारिक हो तभी चेतना का विकास
हो सकता है, चेतना का रूपान्तरण ध्यान के द्वारा किया जा सकता है. ध्यान हमारी
सुप्त चेतना को जागृत करता है. सत्य हमारे भीतर है उसे खोजकर यदि हम जगत में
व्यवहार करें तो ही हम सही रूप से उसका उपयोग कर सकते हैं. हम प्रतिक्षण अपने आप
से प्रश्न करें कि क्या मेरा यह क्षण बंधन का कारण बनने वाला है या मुक्त करने
वाला है. सर्वप्रथम शत्रु अहंकार है जिससे हमें सजग रहना है, बहुत सूक्ष्म होता है
यह अहंकार और यह भी हिंसा का कारण बन जाता है, हम स्वयं में इतने न खो जाएँ की अन्य
हमें बाधा स्वरूप लगें, हम इतने न बंध जाएँ कि छूटने में भी दर्द हो. हम अपनी
कोहनी भर जगह तो अपने चारों और रखें ही ताकि सरलता से चल सकें और किसी को चोट भी न
लगे. हमारा कोई व्यवहार किसी को चोट पहुंचाता हो तो उसकी भनक स्वयं को पहले लग
जाती है. वह परमेश्वर परब्रह्म सच्चिदानंद
स्वरूप हमारे साथ जो है, वह सदा सचेत करता रहता है. उससे प्रीति होना इतना सरल व
सहज भी नहीं है, तलवार की धार पर चलने जैसा है पर एक बार यदि चलना आ जाये तो भीतर
की सच्चाईयाँ प्रकट होकर स्वयं राह बताती हैं तब वह सुह्रद स्वयं हमारा हाथ पकड़ कर
सही पथ पर ले जाता है, तब गिरने का भी नहीं रहता. शरण में जाने के बाद
उत्तरदायित्व उसका हो जाता है, कितनी भी बाधाएं आयें कोई भय नहीं क्योंकि उस
निर्भय का साथ जो है.
Monday, January 7, 2013
कुछ नहीं या सब कुछ हैं हम
जनवरी २००४
किसी कवि ने कहा है - पथ सोचे आमि देव, रथ सोचे आमि देव, मूर्ति सोचे आमि देव, ऊपर
हँसे अन्तर्यामी..हमारा कर्ता भाव क्या कुछ ऐसा ही नहीं है, शरीर सोचता है बड़ा श्रम
किया, मन सोचता है बहुत चिंतन किया बुद्धि स्वयं को क्या नहीं माने बैठी है...पर
भीतर बैठा वह आत्मदेव यदि न हो तो..जैसे सूर्य कुछ नहीं करता पर सृष्टि मात्र उसके
होने से ही तो है. करने वाले सब प्रकृति का अंश हैं, जिसके कारण सब होता है वह
परमात्मा है, तो हम क्या हैं ? कुछ हमारा भी हिस्सा है कि नहीं...जब मुनि मौन में
यह पूछता है तो पाता है प्रकृति के साथ उसका मेल नहीं बैठता...जो खुद पल-पल बदल
रही है वह उसे कैसे धारण करेगी, परमात्मा की ओर निहारता है तो पाता है कि वह बचा ही नहीं ..यही तो रहस्य है जिसे भगवान कृष्ण
अर्जुन से कहते हैं.
Thursday, November 22, 2012
अर्थ वही जीवन को देता
अक्टूबर २००३
ज्ञान हमें मुक्त करने के लिए है न कि बांधने के लिए, कहीं यह हमारे अहंकार को
बढ़ाने का साधन न बन जाये. इसके लिए हमें सतत् सजग रहना होगा. निरंतर आत्मा का विकास
करते जाने के लिए आवश्यक है कि हम स्वाध्याय कभी न छोड़ें. अभी पथ पर चलना शुरू ही
किया है, फिसलने का भी डर तो बना ही है. संत कहते हैं कि हम अपने दुखों से भी
आसक्ति कर लेते हैं, पुराने किसी दुःख को हम बार-बार याद करते हैं और उसके संस्कार
को दृढ करते जाते हैं. सुखों को हम अन्यों से छिपाते हैं कि हमारा सुख घट न जाये,
हम कितने कृपण हैं. सहन शक्ति भी कम है, हमें कितने छोटे-छोटे सुख-दुख हिला जाते
हैं, हमारी नसें तन जाती हैं, जैसे ही कोई अप्रिय घटना घटे या हमारे मन के विपरीत
कुछ हो तो हमारी वाणी में रुक्षता छलक ही जाती है. हम जो ईश्वर के भक्त होने का दम
भरते हैं, उसके बनाये जगत से ही प्रेम नहीं कर पाते. इसके कण-कण में भी तो उसकी ही
चेतना है. वह परब्रह्म ही सबमें समाया है, वह हमारा जितना है उतना ही सभी का है,
वह अनंत है उसका प्रेम सभी के लिए अनंत है. जो कोई भी उसे प्रेम से पुकारता है, वह
उसकी सुनता है, वह सर्व मंगलकारी है. वह हमारे जीवन को एक अर्थ देता है, वह हमें
एक लक्ष्य प्रदान करता है, स्वयं तक पहुंचने का लक्ष्य.
Thursday, August 30, 2012
आत्मा केन्द्र है
जुलाई २००३
सदगुरु हमें अपने सच्चे स्वरूप का परिचय देते हैं और वहाँ तक जाने का रास्ता भी
बताते हैं. और एक बार जब उस पथ के यात्री हम बन जाते हैं तो लगता है वास्तविक जीवन
अब शुरू हुआ है. तब यह जगत एक खेल प्रतीत होता है. यहाँ सब कुछ बदल रहा है यह
स्पष्ट होने लगता है. हमारा अंतः करण ही तब एक मात्र स्थिर प्रतीत होता है, सदा एक
सा, हम केन्द्र में स्थित हो जाते हैं. तब संसार के झूले के झकोरे हमें नहीं
झुलाते. हम द्रष्टा भाव में आ जाते हैं. यह जगत दृश्यमान है हम उससे पृथक हैं.
जैसे जल में नाव जल से पृथक है. कीचड़ में कमल की तरह हम निर्लिप्त हो जाते हैं.
सारे कार्य पूर्ववत होते हैं, पर जैसे प्रकृति अपना खेल देख रही होती है. तीनों
गुणों के आधीन होकर हम जगत का व्यवहार तो करते हैं पर स्वयं को इससे पृथक देखते
हैं, शरीर, इंद्रिय, मन और बुद्धि अपना-अपना कार्य करते हैं, ऐसा स्पष्ट आभास होने
लगता है.
Wednesday, July 25, 2012
चलती रहे यात्रा अविरत
जून २००३
हमारी यात्रा निर्विघ्न चलती रहे, इसका सतत् प्रयास करना है. सदगुरु की दी हुई औषधि
का पान नियत समय पर करें, तभी यह जन्म जन्मान्तर का रोग दूर हो सकता है. यह भव रोग
बहुत बलशाली है पर गुरुज्ञान उससे भी अधिक सबल है यदि उसे उपयोग में लायें. सब
घटों में वह ईश्वर है, लेकिन गुरु के घट में वह प्रकट हुआ है. लकड़ी में जैसे अग्नि
छुपी है, दूध में जैसे मक्खन है, वैसे ही सबके अंतर में निर्विकार परमात्म आनंद
है. इस जगत की चाल ऐसी है कि ईश्वर सदा सर्वदा विद्यमान होते हुए भी सभी इसे समझ
नहीं पाते. वही इस पथ का अधिकारी है जो संसार की असारता को जानकर उसके पीछे छिपे
रहस्यों को जानना चाहता है, जो इस भाग-दौड़, आपाधापी से ऊब कर कुछ ऐसा पाना चाहता
है, जो सदा एक सा है, जो परम है.
Tuesday, May 15, 2012
जिन खोजा तीन पाइयाँ
मन के इस नगर में कहीं तो वह छुपा हुआ है, उसे खोजना है. बार-बार हमें उस पथ पर जानेके लिये उठना है, हम एक बार गिरे तो कहीं गिरते ही न चले जाएँ, यात्रा आसान नहीं है, मन जब उज्ज्वल होता है तभी रंग चढ़ता है. जहाँ-जहाँ वह अटके उसे लौटा लाना है, वह कहीं दूर नहीं है बस पर्दा उठाने भर की देर है. तब बुद्धि स्वतः उस शुद्ध स्वभाव में ठहरने लगती है. एक विचार उठा दूसरा अभी आने को है बीच का संधि काल उसी परमात्मा का शुद्ध ज्ञान है, उसी में टिकना है. श्वास को आते-जाते देखते समय भी मन ठहर जाये तो हृदय में ऋत उत्पन्न होता है.
Thursday, April 19, 2012
इच्छा तेरे रूप अनेक
फरवरी २००३
अक्सर आवश्यकता एवं इच्छा में हमें भेद नहीं मालूम पड़ता, जो वस्तु हमारी आवश्यकता की पूर्ति करे वह कभी दुःख का कारण नहीं बन सकती. इच्छा हमें मानसिक उद्वेग देती है, एक दौड़ में हम शामिल हो जाते हैं. इच्छा उठते ही मन में संकल्प-विकल्प उठते हैं, उसे पूरी करने की धुन हमें बेचैन कर देती है. निर्दोष लगने वाली इच्छा भी मन को अटकाती है, पथ पर चलना संभव नहीं हो पाता. पानी सा मन बहता रहे यही साधना की पहली शर्त है. जैसे आकाश पर बादल आते हैं और चले जाते हैं. मन, बुद्धि आदि आत्मा के चिदाकाश पर आने-जाने वाले बादलों के समान अनित्य हैं, ज्ञान का सूर्य जब निकलता है तो आकाश की स्वच्छ नीलिमा झलकती है.
Thursday, November 3, 2011
उसका पथ
जून २००२
आध्यात्मिक मार्ग पर चलना ही हमारी नियति है. हम सभी किसी न किसी रूप में इसी मार्ग के राही हैं. कोई अन्जाना है और कोई सचेत होकर चल रहा है. नित नए अनुभव होते हैं इस मार्ग पर, जैसे पहले से ही तय हों. कभी कभी ऐसा लगता है कि कोई आश्वासन दे रहा है कि सब कुछ सही समय पर होगा, ठीक होगा. किसी इच्छा का पूरा होना या न होना दोनों में कोई फर्क नहीं रह जाता. संसार का कोई भी सुख उतना आकर्षित नहीं करता जितना कि ईश्वर का विचार और उससे मिलने की ललक. वही जैसे हमारा मार्ग निर्देशित कर रहे होते हैं, तभी तो समय भी है, शास्त्र भी हैं, सदगुरु भी हैं सभी कुछ हमारे अनुकूल कर दिया है. जिसकी स्मृति ही मन को इतनी सौम्यता से भर देती है उसका साक्षात्कार कितना अभूतपूर्व होगा, यह बात ही पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.
Monday, June 13, 2011
समता
मई २०००
जो टिकता नहीं वह जगत है और जो मिटता नहीं वह परम सत्य है. बस इतनी सी बात समझ में आ जाये तो ईश्वर के मार्ग पर चलना सहज हो जाता है. यह जगत हमें कई पाठ पढ़ाता है, ठोक-पीट कर इस काबिल बनाता है कि हम उस परम को जान सकें. जब कभी कृतज्ञता के भाव के कारण हृदय भर आता है, अथवा साधना के कारण सुख का अनुभव होता है तब भी यह स्मरण रखना होगा कि यह भी एक अवस्था है जो टिकने वाली नहीं है, सुखद अथवा दुखद दोनों ही अवस्थाओं से जो परे नहीं गया वह परम को नहीं पा सकता. अनुकूल या प्रतिकूल दोनों में जो सम रहना सीख गया वही उस पथ का यात्री है. हमारे भीतर अमृत भी है और विष भी, पर सत्य दोनों के पार है.
Subscribe to:
Posts (Atom)