हम सबने सुना है ‘पहला सुख निरोगी काया’ अर्थात स्वास्थ्य से बड़ा सुख नहीं. यह भी सही है कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है. यदि शरीर में कोई रोग हो तो मन बार-बार उसी का चिंतन करता है, वह एकाग्र नहीं रहता, ऐसे मन से ध्यान करना सम्भव नहीं और ध्यान के बिना ‘स्व’ में स्थिति नहीं हो सकती. वास्तव में जो ‘स्व’ में स्थित है वही स्वस्थ है. स्व में स्थित रहने के लिए मन के पार जाना होगा. मन के पार जाने के लिये मन को शांत रखना होगा अर्थात किसी भी तरह का मानसिक उद्वेग न हो. इसीलिए योग साधना में पहले आसन व प्राणायाम द्वारा तन को सबल बनाया जाता है. नियमित दिनचर्या और उचित आहार-विहार से ही वह सम्भव है. जीवन में जो भी कष्ट आते हैं वे सीख देकर हमें आगे ले जाने लिए होते हैं. सुख और दुःख हमारे कर्मों के फलस्वरूप हमें मिलते हैं, पर सुखी या दुखी होना हम पर निर्भर करता है. सुख को देखकर यदि कृतज्ञता का भाव भीतर जगा और दुःख को देखकर समता को बढ़ाना सीखा तब भी ‘स्व’ में स्थिति होने लगती है.
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Wednesday, February 3, 2021
Wednesday, May 24, 2017
जुड़ा रहे मन सदा सत्य से
२४ मई २०१७
स्व को एक क्षण के लिए
भी भुलाना साधक के लिए उचित नहीं है. स्व का अर्थ है अस्तित्त्व के साथ एक होकर
रहना, सहज होकर रहना और सजग होकर निरंतर कर्म में रहना. शरीर की हर कोशिका चेतना
से ढकी है, यदि मन में नकारात्मक भावनाएं रहेंगी तो चेतना धूमिल हो जाएगी, चेतना
जल की तरह है वह जिस पात्र में रखी जाती है उसका ही आकार ले लेती है. मन में हल्का
सा भी तनाव हो तो चेतना पर आवरण छा जाता है और देह पर उसका असर होने लगता है. स्व
की साधना में लगा हुआ साधक अपने जीवन को सजग होकर देखता है, इस देखने में ही मन
शुद्ध होने लगता है, स्व मुखर हो जाता है.
Monday, May 8, 2017
मन जो लौट गया निज घर में
८ मई २०१७
मन जब भीतर जाकर अपने आप में ठहर जाता है तो विचारों के स्रोत से परिचय होता है. ऐसा अनुभव अतुलनीय है, भीतर से कुछ उमड़ कर बाहर उलीचने का मन होता है. पहली बार एक तृप्ति का अहसास होता है जो किसी भी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है. सभी इन्द्रियां बाहर ही देखती हैं, मन ही ऐसा अनुपम साधन है जो बाहर और भीतर दोनों ओर जा सकता है. जिस क्षण जगत से सुख लेने की चाह न रहे मन स्वयं में लौट ही आयेगा. मन तब स्वनिर्भर होना सीखेगा, जितना-जितना स्व की महिमा का उसे भान होगा उतना-उतना वह भीतर से पूर्ण होता जायेगा. फकीर भी स्वयं को बादशाह मानते हैं क्योंकि उन्हें अपने सुख के लिए जगत से कुछ नहीं चाहिए.
Friday, February 8, 2013
अगम प्रेम का पथ है यह
‘स्व’ से ‘पर’ की ओर जाने का नाम ही
संसार है और ‘पर’ से ‘स्व’ की ओर जाने का नाम ही अध्यात्म है. यह संसार पाया नहीं
जा सकता और परमात्मा को खोया नहीं जा सकता. जिसको पाने का कोई उपाय नहीं उसे हम
पाया हुआ समझते हैं और जिसे खोने का कोई उपाय नहीं उसे जीवन भर पाने का प्रयास
करते है. संसारी कुछ बनना चाहता है, पर संत, भक्त मिटना चाहता है. प्रेम का पथ अगम
है, इसमें प्रियतम तो याद रहता है पर खुद की याद नहीं रहती.
Friday, October 19, 2012
दूर से दूर और निकट से निकट
सितम्बर २००३
उपवास का दिन साधना का विशेष दिन है, यूँ तो साधक के लिए हर घड़ी, हर क्षण साधना का
क्षण है, उसे अनुभव होता है कि अपने कर्त्तव्यों में, भौतिक कार्यों में थोड़ी
असावधानी बरती तो तुरंत मन स्वयं को फटकारने लगता है. वह कौन है जो भीतर से सचेत
करता रहता है, सुबह जगाता है, जो एक प्यास जगाए रखता है भीतर, हम गलत रास्ते पर जा
रहे हों तो सजग रखता है. वह परमात्मा जिसे
अपना सुह्रद, हितैषी माना है, जो अकारण दयालु है, जो हमसे प्रेम करता है, हम उ सके
प्रेम के पात्र हैं अथवा नहीं वह इसकी रंच मात्र भी प्रवाह नहीं करता, वह जो प्रेम
से परिपूर्ण है, वही हमें सजग करता है. साधना का पथ जितना सरल है उतना ही दुर्गम
भी. यहाँ तो सर कटाने के लिए हर क्षण तैयार रहना पड़ता है, स्वयं को मिटा देना होता
है, पर जब हम स्वयं को सर्वोपरि मानने लगें सिर्फ इसलिए कि हम साधक हैं तो हम उससे
दूर ही रह जाते हैं. वह जितना निकट है उतना ही दूर है ! उसमें सारे द्वंद्व समाते
हैं, वह द्वन्द्वातीत है. वह दुर्लभ है पर अलभ्य नहीं. उसकी ओ र यदि हम एक कदम
बढाते हैं तो वह हजार कदमों से हमारी ओर आता है. वह अपने स्वभाव का परित्याग कभी
नहीं करता पर हम सुविधानुसार अपना स्व भूलते व याद करते हैं, हम जिस क्षण भी अपने ‘स्व’
को भूलते हैं वह क्षण हमारे लिए दुखद बनता है. साधना का लक्ष्य तो सदा के लिए समस्त
दुखों से मुक्ति है, ऐसे दुःख जो अज्ञानवश उत्पन्न हुए हैं, दूसरों के दुःख में
दुखी होना करुणा है. हमारे स्व का विस्तार तभी होता है, जब हम सभी में उसी का
दर्शन करते हैं.
Tuesday, May 22, 2012
तत्व ज्ञान की ओर
मार्च २००३
तत्व में टिके बिना स्वस्थ नहीं रहा जा सकता. मन यदि वर्तमान में नहीं रहता और
बुद्धि उसके पीछे जाती है, ‘स्व’ बुद्धि के पीछे जाता है तो स्व स्थ नहीं रहा
अर्थात स्वस्थ नहीं रहा. जो स्वतः सिद्ध है उसमें टिके रहना ज्ञान से ही संभव है.
अपनी कमियों की ओर नहीं बल्कि हमारे भीतर जो सहज प्राप्त परम तत्व है उसकी ओर अपनी
दृष्टि रखें तो उसे ही प्राप्त होंगें. जीवन अनंत है, वर्तमान अटल है. जब तक यह तन
है तब तक इसका सदुपयोग करके वर्तमान में ही टिके रहना है अर्थात स्व में स्थित
रहना है. ताकि बारम्बार मरना न पड़े.
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