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Wednesday, January 10, 2018

जग जायेगी जब जिज्ञासा

१० जनवरी २०१८ 
देह प्रतिक्षण बदल रही है, मन कहीं ठहरता ही नहीं, इन्हें देखने वाला द्रष्टा मात्र साक्षी है. बचपन की देह अब नहीं रही, युवावस्था भी बीत गयी और प्रौढ़ावस्था भी अधिक देर तक नहीं रहेगी. एक दिन देह भी गिर जाएगी, उस क्षण भी एक तत्व अखंड बना रहेगा. उस एक तत्व को जो जान लेता है और उसमें टिकना सीख जाता है, वह सुख-दुःख के पार चला जाता है. जगत में रहकर कार्य करते हुए, गाढ़ निद्रा में अथवा स्वप्न देखते समय वह एक तत्व निरंतर देखता रहता है. हम संसार को देखते हैं पर उस देखने वाले को नहीं देखते. नींद से जगकर जब हम कहते हैं, रात अच्छी नींद आयी तो यह जवाब वहीं से आता है. हर साधना का लक्ष्य बुद्धि में उस एक तत्व को जानने की लालसा जगाना ही है.

Friday, September 1, 2017

भाव युक्त हो अंतर अपना

१ सितम्बर २०१७ 
जीवन में होने वाले अनुभवों में अधिकतर भीतर का भाव ही लौट-लौट कर आता है. जब किसी हृदय में परम के प्रति प्रेम का जागरण होता है तो वह प्रेम अपनी सुवास स्वयं ही बहा देता है,  इसके लिए शब्द जुटाने नहीं पड़ते. पका फल जैसे अपनी मिठास से भर कर खुदबखुद टपक जाता है,  भाव भरा अंतर भी इसी तरह व्यक्त हो जाता है. जिसने उसे अनुभव किया है उसने ही गीत गाए हैं. वह खुद भी नहीं जानता कितना बड़ा रहस्य अपने भीतर छुपाये है. जीवन स्वयं में एक रहस्य है, इसका रचियता भी और उसके प्रति समर्पित अंतर भी. जीवन धारा अविरल गति से बही जा रही है, किन्तु इसका आधार भी तो है. समयचक्र घूम रहा है, इसका केंद्र भी तो है. जगत गतिशील है, किन्तु गति का अनुभव कराने वाला अचल तत्व भी तो है. जिसने उसे अपने मन का मीत बना लिया वही दिव्य प्रेम को अनुभव सकता है.  

Wednesday, September 14, 2016

कुदरत के संग जीना है

१४ सितम्बर २०१६  
सद्गुरू कहते हैं एक ही तत्व से यह सारा अस्तित्त्व बना है ! सारा खेल ऊर्जा का ही है ! मन भी ऊर्जा है और तन भी ! सब चेतना ही है, जो ऊर्जा बहती रहे वही सफल है. भोजन, जल, सूर्य, नींद तथा श्वास सभी तो ऊर्जा के स्रोत हैं, हम जिनसे लेते ही लेते हैं, लेकिन जब तक देना शुरू नहीं कर देते तब तक ऊर्जा भीतर दोष पैदा करना शुरू कर देती है. रचनात्मकता तभी तो हमें स्वस्थ बनाये रखती है. यदि हम एक माध्यम बन जाएँ जिसमें से प्रकृति प्रवाहित हो और अपना काम करती जाये, हम उसके मार्ग में कोई बाधा खड़ी न करें, तो हम जीवन के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं.

Thursday, April 30, 2015

भक्ति का जब फूल खिले

जनवरी २००९ 
संत बालवत होते हैं, वे जैसे कभी बड़े हुए ही नहीं, और हम हैं कि छोटा होना ही नहीं जानते ! अध्यात्म मार्ग पर अहंकार को मिटाना ही परम लक्ष्य है. परम के प्रति प्रेम हो तो यह सहज ही हो जाता है. शरणागति में गये बिना यह कठिन है. कर्म तथा ज्ञान इसे पुष्ट करते हैं, भक्ति इसे पिघला देती है. भक्ति स्वयं में साधन है और साध्य भी वही है. इस अमृत स्वरूपा भक्ति को अपने भीतर पाना ही है, परम सत्य के प्रति प्रेम ही भक्ति है, तत्व के प्रति श्रद्धा ही भक्ति है. वह अस्तित्त्व अकारण करुणामय है, वह सुहृद है, वह हमें हर क्षण प्रेम से निहारता है. वह प्रेम का ऐसा स्रोत है जो कभी नहीं चुकता !

Tuesday, January 6, 2015

एक प्रकाश छिपा है भीतर

अगस्त २००७ 
सद्गुरु तो एक पल में झोली भर देता है, हमारे भीतर जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए ! जब गुरुकृपा से भीतर परमात्मा प्रकट हो जाता है तो हर पल, हर घड़ी साधक प्रकाशमान हो जाते हैं, रहते हैं. हर घटना तब शुभ ही होती है, तब बाहरी वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जिधर भी देखें परमात्मा ही नजर आता है, मन जैसे खो जाता है, अहम विगलित हो जाता है, भीतर कुछ द्रवित होता है, सारा ठोसपना खत्म हो जाता है. प्रेम का अनुभव होता है तो सारा जगत एक उसी का रूप दिखाई देता है. भीतर-बाहर एक ही सत्ता का दर्शन होता है, वह दर्शन चौबीस घंटे होता है. अब न कोई दिन है न रात है. आज हुई न कल है, न स्थान न समय के सापेक्ष है वह दर्शन. वह तो गुरू का प्रसाद है, एक जगी हुई आत्मा ही दूसरी आत्मा को जगा सकती है. एक जला हुआ दीपक ही दूसरी ज्योति जल सकता है. जब मन शुद्ध होता है तो परमात्मा उस मन का हरण कर लेता है, उसे परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं भाता और उसे खोजने निकल पड़ता है. सद्गुरु ऐसे में परमात्मा के दूत बनकर आते हैं और भीतर ही उस तत्व का दर्शन करा देते हैं ! सद्गुरु के रूप में परमात्मा ही आते हैं. एक ही चेतना है, वही तो सबके भीतर भी है. !



Tuesday, October 28, 2014

बुरा जो देखन मैं चला

अप्रैल २००७
संत कहते हैं यह जग कितना सुंदर है ! हमें यदि यह सुंदर नहीं लगता तो हमारी नजर में ही दोष है. हम अन्यों में दोष देखना जब तक बंद नहीं करते, जगत हमें असुन्दर ही लगेगा. ज्ञानी सभी को शुद्ध आत्मा ही देखते हैं, तो कमियां अपने आप छिटक जाती हैं. हम जब कमियां देखते हैं तो हमारे मन में भी उस कमी का भाव दृढ हो जाता है. हम न चाहते हुए भी उनके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं. यह जगत जैसा है, वैसा है हमें चाहिए कि हो सके तो किसी की सहायता कर दें, न हो सके तो अपने हृदय को खाली रखें, उनमें संसार की कमियां तो न ही भरें. इस नाशवान स्वप्नवत् संसार के पीछे छिपे तत्व को पहचानें और उसी पर अपनी नजर रखें. 

Monday, July 1, 2013

करते हो तुम कन्हैया ...

अक्तूबर २००४ 
एक साधक को अपने मन में उठने वाली वृत्तियों का भी परिष्कार करना है, क्योंकि मन में वृत्तियाँ तो निरंतर समुद्र की लहरों की तरह उठती रहती हैं, वे अशुभ न हों, शुभ हों, धीरे-धीरे उन शुभ वृत्तियों को भी कम करते जाना होगा, तब मन शुद्ध तत्व में स्थित रहेगा, वर्तमान में रहेगा. भूत की स्मृतियाँ और भावी की कल्पनाएँ हमें ‘अपने’ होने से दूर रखती हैं, स्वयं में कोई वृत्ति नहीं है, यदि है भी तो वह हमारे द्वारा लायी नहीं गयी है, यदि आ भी गयी है तो हम साक्षी मात्र हैं. अनायास ही हम उसके कर्ता नहीं हो गये हैं, कर्ता बनने पर भोक्ता तो बनना ही पड़ेगा. हम अपने आत्मभाव में स्थित रहकर ही प्रज्ञा, बुद्धि व क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सकते हैं, सामान्य बुद्धि से यदि हम जगत का निर्णय करेंगे तो दुविधा हमें घेर लेगी. जगत से व्यवहार करते समय यदि हम यह याद रखें कि वास्तव में ‘हम कौन हैं’? तो हम किसी भी परिस्थिति से अछूते निकल जायेंगे.


Monday, May 6, 2013

बिखरा है चहुँ ओर वही तो


सितम्बर २००४ 
हमारा तन पांच तत्वों का बना हुआ है और हमारा मन प्रेम का, मन को हम देख नहीं सकते महसूस करते हैं, वैसे ही प्रेम को भी. जैसे विकारी मन दुःख देता है, शांत मन सुखकारी है, प्रेम भी यदि विकृत हो जाये अर्थात उसमे ईर्ष्या, क्रोध आदि के भाव समा जाएँ तो वह दुःख देता है. इन विकारों से रहित शुद्ध प्रेम हमें अपने भीतर ही खोजना होगा, तब वह सृष्टि के कण-कण में दिखाई देगा. वर्तमान के क्षणों में ही ऐसे प्रेम का अनुभव हो सकता है, क्योंकि वह बालवत निर्दोष होता है, उसे कुछ चाहिए नहीं, वह देना चाहता है. मृत्यु के क्षणों में भी प्रेम के कारण ही प्रेमी अनंत में समा  जाता है, फिर एक नया शरीर धारण करता है तो जगत से प्रेम के कारण ही.

Tuesday, April 2, 2013

पूर्णमदः पूर्णमिदं



पांच तत्वों से मिलकर हमारा तन बना है और तीन तत्वों से मन, वे हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश. जब हम सृजनशील होते हैं, पोषण करते हैं अथवा परिवर्तन करते हैं तो ये तीनों तत्व क्रियाशील होते हैं. सभी के भीतर किसी न किसी अंश में ये तीनों होते हैं, लेकिन जब हमारे कर्म स्वार्थ की पूर्ति के लिए न होकर सहज हों अथवा तो आनंद के फलस्वरूप हों तो वे तीनों से पार चले जाते हैं, यही तीनों सत्व, रज, तम गुण के भी परिचायक हैं, हमें गुणातीत होना है. आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहना तभी सम्भव है. बाहर का सुख मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं, भीतर का सुख निरपेक्ष है, अनंत है, अपरिमेय है, इसका आश्रय लेकर जब हम जगत में व्यवहार करते हैं तो वह पूर्ण होता है, प्रामाणिक होता है. पूर्ण की उपासना ही हमें पूर्ण बनाती है.



Wednesday, November 14, 2012

आखिर कहाँ हमें जाना है


अक्टूबर २००३ 
जिस क्षण कोई अपने सामने पहली दफा खड़ा हो जाता है, आमने-सामने..उसी क्षण वह सत्य को जान जाता है. उस क्षण उसके भीतर संसार से उठने, जगने और कामनाओं से मुक्त होने की क्षमता पूर्ण विकसित हो चुकी होती है. संतों की वाणी सुनकर हमारे भीतर अपनी वास्तविक स्थिति का बोध जगता है. धर्म के मूल में तीन बाते हैं, हम कहाँ से आये हैं, हम कहाँ हैं और कहाँ जाने वाले हैं? इनकी खोज ही हमें धर्म की ओर ले जाती है. हम उसी एक तत्व से आये हैं, उसी में हैं और उसी में लौट जाने वाले हैं. लेकिन लौटने से पूर्व हमें देखना है कि भीतर सुई की नोक के बराबर भी अहम् न बचे, उसका मार्ग बहुत संकरा है, अहम् मिटते ही सारा अस्तित्व हमारी सहायता को आ जाता है, आया ही हुआ है. भीतर से प्रेरणा मिलने लगती है और हम उसकी ओर बढते चले जाते हैं..जहां वह है वहाँ सभी ऐश्वर्य हैं, जगत कृपण है ईश्वर दाता है, वह जानता है हमारे लिए क्या उचित है और क्या नहीं, वह हितैषी है, अकारण दयालु है, वह ही तो है जिसने यह खेल रचा है.

Tuesday, September 4, 2012

एक ही माला के सब मोती


अगस्त २००३ 
जीवन के रंग विचित्र हैं. हम सभी एक विशाल अथवा कहें अनंत सृष्टि के भाग हैं, आपस में सभी जुड़े हैं, उस परमात्म तत्व के द्वारा. वह तत्व भीतर-बाहर हर जगह है, एक सूक्ष्म तन्तु के रूप में उसने सभी को बांध रखा है. कृष्ण ने गीता में कहा ही है कि यह सारा जगत मुझ धागे में मोतियों की भांति पिरोया हुआ है. यहाँ कोई भी एक से जुदा नहीं. एक ही आत्मा सभी के भीतर है, सभी को सुख-दुःख समान रूप से व्यापते हैं. पर जो इस संसार से परे हो जाता है, वह इस जगत को परमात्मा की नाईं द्रष्टा भाव से देखता है. जो कुछ भी इस जगत में जहाँ कहीं भी, जिस किसी के साथ भी हो चुका है, हो रहा है गहराई से सोचें तो खेल ही लगता है, नाटक की तरह हम अपने पात्र निभाएं तो खेल मजेदार है और यदि उसे सच्चा मानने लगें तो बुद्धि चकरा जायेगी, पर इसका पार न पा सकेंगे. यहाँ एक को खुश करो तो दूसरे को नाराज करना ही पड़ता है. सभी को साथ लेकर चलना हो तो अंतर में शुद्ध प्रेम होना चाहिये, ऐसा विशाल हृदय जो कोई भेद नहीं मानता, मानवेतर सृष्टि से भी उतना ही प्रेम रखता है. जो वस्तुओं का गुलाम नहीं, जो जीवनमुक्त है. 

Tuesday, May 22, 2012

तत्व ज्ञान की ओर


मार्च २००३  
तत्व में टिके बिना स्वस्थ नहीं रहा जा सकता. मन यदि वर्तमान में नहीं रहता और बुद्धि उसके पीछे जाती है, ‘स्व’ बुद्धि के पीछे जाता है तो स्व स्थ नहीं रहा अर्थात स्वस्थ नहीं रहा. जो स्वतः सिद्ध है उसमें टिके रहना ज्ञान से ही संभव है. अपनी कमियों की ओर नहीं बल्कि हमारे भीतर जो सहज प्राप्त परम तत्व है उसकी ओर अपनी दृष्टि रखें तो उसे ही प्राप्त होंगें. जीवन अनंत है, वर्तमान अटल है. जब तक यह तन है तब तक इसका सदुपयोग करके वर्तमान में ही टिके रहना है अर्थात स्व में स्थित रहना है. ताकि बारम्बार मरना न पड़े.