जलवायु परिवर्तन के कारण आज विश्व का तापमान बढ़ रहा है। जंगल जल रहे हैं , साथ ही जल रहे हैं हज़ारों निरीह जीव। प्रकृति आज विक्षुब्ध प्रतीत होती है। मानव की बढ़ती हुई लिप्सा के कारण क्रुद्ध भी। आज मानव ने सुविधाओं के अम्बार लगा दिए हैं पर किस क़ीमत पर ? सूर्य की ऊर्जा ग्रीन गैसों की बढ़ती हुई मात्रा के कारण बाहर नहीं जा पाती, इसलिए मौसम में असमय बदलाव हो रहे हैं। ईश्वर को नकारने का भाव मानव को स्वयं से भी दूर ले जा रहा है। सत्य की राह पर चलने के लिए उसे मानना तो पड़ेगा। अपने ज़मीर को भुलाकर युद्ध की आग में भी कुछ देश जल रहे हैं। अपने ही नागरिकों को भीषण दुःख में झोंकते हुए शासकगण एक बार भी नहीं सोचते। हथियारों की दौड़ में न जाने कितने देश ग़लत नीतियों को अपना रहे हैं। जैविक और रासायनिक हथियारों पर शोध चल रही है यह जानते हुए भी कि इसके दुष्परिणाम इसी धरती के वसियों को भुगतने पड़ेंगे। प्रकृति के सामान्य नियमों को तोड़ते हुए मानव आज परिवार को भी जोड़ पाने में सक्षम नहीं रह गए हैं। किसी नीति, धर्म या परंपरा को न मानने का प्रण लेते हुए मानव को क्या दानव की वृत्ति अपनाने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। तभी शायद जंगलों में आग लगी है, युद्ध ख़त्म होने को नहीं आ रहा, कोरोना नियंत्रित होने का नाम नहीं ले रहा। विश्व जैसा आज दिशाहीन हो गया है। किंतु अस्तित्त्व आज भी अपने गौरव में मुस्का रहा है। यदि अब भी हम सजग हो जाएँ; अपने भीतर उस एक्य को महसूस करें जिससे यह कण-कण बना है; उस तत्व को नमन करें तो कुछ अवश्य बचाया जा सकता है। एक बार फिर सादा जीवन और उच्च विचार की जीवन शैली को अपनाकर हम अपनी धरती को विनाश से बचा सकते हैं।
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Friday, July 22, 2022
Wednesday, June 21, 2017
योगी बनें उपयोगी बनें
२१ जून २०१७
हमारे अस्तित्त्व के कई स्तर हैं, कोई भी व्यक्ति अंतिम स्तर तक भी जा सकता है और
केवल पहले पर ही रह कर पूरा जीवन बिता सकता है. देह के स्तर पर अन्य जीवों और
मानवों में ज्यादा भेद नहीं है, मन के स्तर पर मानव मनन चिंतन कर सकता है जो अन्य
प्राणी नहीं कर सकते. आत्मा के स्तर पर मनुष्य अपने भीतर आनंद और शांति के स्रोत
से जुड़ सकता है. उसे पूर्ण स्वाधीनता और प्रसन्नता का अनुभव इसी स्तर पर होता है.
योग ही इसका एकमात्र उपाय है. योग का अर्थ है जुड़ना, व्यष्टि का समष्टि से जुड़ना अथवा
तो मन का आत्मा से जुड़ना. इसका आरम्भ देह से होता है, फिर श्वास की सहायता से मन की
गहराई में जाकर व्यक्ति को जगत के साथ एकत्व का अनुभव होता है. योग को केवल कुछ आसनों
तक ही सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे शिक्षा का उपयोग मात्र जीविकापार्जन के लिए
करना.
Tuesday, June 17, 2014
लघुता में है छिपा महान
अप्रैल २००६
अस्तित्व
सूक्ष्म है, उससे परिचय हो जाये तो हम सूक्ष्मतर आत्मा के स्वरूप में रहने लगते
हैं, तब हम लघुत्तम पद में आने लगते हैं. क्रिया से अहंकार होता है, पर यह ज्ञान
क्रिया से नहीं मिलता, ज्ञान से ही मिलता है. कर्म हमें पहचान देता है, पर वह
पहचान अहंकार जनित होने के कारण सुख-दुःख से प्रभावित होती रहती है. ज्ञान से मिली
स्वयं की पहचान स्वभाव जनित है अतः कभी बदलती नहीं, यह हमें जगत से तोडती नहीं,
विशिष्ट नहीं बनाती वरन सारी दुनिया तब अपनी हो जाती है. कोई विरोध नहीं रहता. छोटा
‘मैं’ एक विशाल ‘मैं’ में बदल जाता है जो पूर्ण है.
Monday, February 25, 2013
मन का सरवर हिलता जाता
अप्रैल २००४
जो दुःख हर ले, वही अध्यात्म
है, परिस्थितियां कैसी भी हों, हम उनके द्वारा प्रभावित न हों, प्रभावित तभी होते
हैं, जब स्वयं को अस्तित्व से पृथक मानते हैं. अस्तित्व को कोई सुख-दुःख नहीं
व्यापता, वह पूर्ण मुक्त है और साक्षी है. जब हम भी मन को साक्षी भाव से देखने
लगते हैं, तो वह भी अपना स्वभाव छोड़ने लगता है, शांत होने लगता है. मन को देखना आ
जाये तो उसका निग्रह करना आसान है. इन्द्रियां प्रत्यक्ष रूप से विषयों के सम्पर्क
में आती जरूर हैं, पर उन्हें कहता तो मन ही है. आँख यदि कुछ असुंदर देखती है तो
उसका दुख मन ही अनुभव करता है, और यदि मन भी सो जाये तो हमें उसका पता ही नहीं
चलता. हमें इसी अमनी भाव में आना है. अहंकार की जड़ भी यह मन है, और दुःख तथा
अहंकार का कारण भी यह मन है, जो अस्थिर होकर ज्ञान को टिकने से रोकता है. यदि दूध
में जामन डाल दें और निरंतर उसे हिलाते रहें तो दही नहीं जमेगा. मन स्थिर होगा तभी
अस्तित्व उसके दर्पण में झलकेगा.
Wednesday, November 14, 2012
आखिर कहाँ हमें जाना है
अक्टूबर २००३
जिस क्षण कोई अपने
सामने पहली दफा खड़ा हो जाता है, आमने-सामने..उसी क्षण वह सत्य को जान जाता है. उस
क्षण उसके भीतर संसार से उठने, जगने और कामनाओं से मुक्त होने की क्षमता पूर्ण
विकसित हो चुकी होती है. संतों की वाणी सुनकर हमारे भीतर अपनी वास्तविक स्थिति का
बोध जगता है. धर्म के मूल में तीन बाते हैं, हम कहाँ से आये हैं, हम कहाँ हैं और
कहाँ जाने वाले हैं? इनकी खोज ही हमें धर्म की ओर ले जाती है. हम उसी एक तत्व से
आये हैं, उसी में हैं और उसी में लौट जाने वाले हैं. लेकिन लौटने से पूर्व हमें
देखना है कि भीतर सुई की नोक के बराबर भी अहम् न बचे, उसका मार्ग बहुत संकरा है,
अहम् मिटते ही सारा अस्तित्व हमारी सहायता को आ जाता है, आया ही हुआ है. भीतर से
प्रेरणा मिलने लगती है और हम उसकी ओर बढते चले जाते हैं..जहां वह है वहाँ सभी
ऐश्वर्य हैं, जगत कृपण है ईश्वर दाता है, वह जानता है हमारे लिए क्या उचित है और
क्या नहीं, वह हितैषी है, अकारण दयालु है, वह ही तो है जिसने यह खेल रचा है.
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