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Wednesday, May 6, 2015

जीवन वन बने जब उपवन

जनवरी २००९ 
हम सबके जीवन का यह सत्य है कि यदि हम स्वयं समर्पण करने जायेंगे तो हमारा ‘मैं’ साथ चलेगा. यदि समर्पण टालते हैं तो मूढ़ता पुनः-पुनः घेर लेती है. जिससे दुःख मिलता है और हम स्वयं ही परमात्मा को पुकारने निकल पड़ते हैं, संग में अहम् चला आता है, सद्गुरु के द्वारा जब यह घटना घटेगी तो हम निरहंकारी रह सकते हैं. सद्गुरु विवेक प्रदान करता है. यह जीवन एक वन की नाई है, विवेक सम्राट है, वैराग्य सचिव है, शांति रानी है, जो सुंदर है, सद्बुद्धि युक्त तथा प्रिय है. सत्य, ज्ञान, आनंद, सुख, शक्ति, पवित्रता तथा प्रेम ये साथ हमारी मौलिक मांगें हैं. शक्ति शैलजा है वह भीतर की स्थिरता से प्राप्त होती है. व्याधि, जरा और मृत्यु से हम बच नहीं सकते किन्तु ज्ञान के बाद ये दुःख का कारण नहीं रहते, मुक्ति का साधन बन जाते हैं.  


Saturday, May 4, 2013

सबका भला मेरे राम जी करें


संतजन कहते हैं कि मानव पांच इन्द्रियों के राज्य के वासी हैं, खाना, देखना, सूंघना, सुनना और स्पर्श करना इन्हीं कृत्यों को करते हुए वे मूलाधार चक्र में ही रहते हैं. अहम् का जब विकास होता है तो परिवार आदि का पोषण करते हैं स्वाधिष्ठान चक्र में, स्वयं को मन का राजा मानकर मणिपुर में रहते हैं, अनहत तक आते-आते अहंकार कुछ बढ़ जाता है. विशुद्धि में देहाभिमान कुछ कम होता है, आज्ञा चक्र में वह पूरी तरह चला जाता है, सभी के साथ एकात्मकता का अनुभव साधक तब करता है. तब जीवन में ऐसे प्रेम का उदय होता है जो सर्वहित चाहता है. इससे पूर्व यदि परमात्मा का प्रेम हम अनुभव नहीं कर पाते तो केवल इसलिए कि हम उससे प्रेम नहीं सुविधाएँ चाहते हैं. मानवी प्रेम की तरह हम कुछ शर्तों के साथ उससे प्रेम करते हैं.  

Friday, May 3, 2013

एक चुप सौ सुख


अगस्त २००४ 
जगत में इस तरह रहें हम कि किसी को दुःख न पहुंचाएं, अज्ञान के कारण हम कभी-कभी अन्यों की भलाई की कामना रखते हुए भी उनको पीड़ा पहुँचा रहे होते हैं, हमारा अहम् हमें सच्चाई से दूर रखता है अथवा तो हममें इतनी योग्यता होती नहीं कि हम किसी पर अपना प्रेमपूर्ण अधिकार ही जतला सकें, तो सबसे अच्छा यही है कि हम मौन का आश्रय लें, कहने से अच्छा करना है, हमारे शब्दों से ज्यादा असर हमारे व्यवहार का अन्यों पर पड़ता है, प्रेम यदि हृदय में है तो उसे कहकर जताने की जरूरत नहीं, वह मौन से ज्यादा अच्छी तरह से व्यक्त होता है. हम सभी को प्रेम, आनंद व शांति की आवश्यकता है, क्योंकि वही हमारा मूल स्वरूप है, एक बार उसका अनुभव हो जाने के बाद जीवन एक क्रीड़ा स्थली हो जाता है. जिस तरह अतीत का अब हमारे लिए कोई महत्व नहीं वैसे ही एक दिन वर्तमान भी हो जाने वाला है, हम उसे खो दें, इसके पूर्व हमें भरपूर जीना है.

Monday, March 11, 2013

रस का कोई स्रोत बह रहा


मई २००४ 
मन जितना-जितना समता में स्थिर होता जाता है, अस्तित्त्व के हम उतने ही निकट जाते हैं. जीवन में सन्यास घटित होता है, सत्य का संकल्प ही सन्यास है. यह एक छलांग है, जिसे लगाने पर भीतर एक मोद का अहसास होता है, ईश्वर को निकट पा जाने की कला आ जाती है, वह रसमय है, माधुर्यपूर्ण है, जिसे शब्दों में कहना आसान नहीं है, उसमें स्वयं को मिटाने की कला ही सन्यास है. हम कुछ भी नहीं हैं, यह भाव सिद्ध हो, अहं को नष्ट करना आ जाये तो हम उसके रस को पीने की कला सीख जाते हैं, वह रस हमारे भीतर से ही प्रकट होने लगता है, हम हैं क्या ? वही तो है, एक वही तो अनेक रूपों में दिखाई दे रहा है. वही स्वयं ही हमारे भीतर प्रकट होता है, और स्वयं ही अपने आनंद को पाता है. ‘स्व’ में स्थित होकर ‘स्वकीय’ में विश्रांति पानी है, ‘स्व’ ‘स्वकीय’ का अंश है, प्रकृति से जुड़कर ‘स्व’ अहम बन जाता है. मन, ‘स्व’ के सागर पर उठने वाली लहरें हैं, जब मन शांत हो जाता है तब ‘स्व’ में समाहित हो जाता है, मन का होना अहम् के कारण है. समता की साधना करने पर साधक को अपने भीतर बहुत कुछ घटता हुआ दीखता है, कुछ मधुर जिसे नाम नहीं दे सकते, जो अनिर्वचनीय है.

Wednesday, November 14, 2012

आखिर कहाँ हमें जाना है


अक्टूबर २००३ 
जिस क्षण कोई अपने सामने पहली दफा खड़ा हो जाता है, आमने-सामने..उसी क्षण वह सत्य को जान जाता है. उस क्षण उसके भीतर संसार से उठने, जगने और कामनाओं से मुक्त होने की क्षमता पूर्ण विकसित हो चुकी होती है. संतों की वाणी सुनकर हमारे भीतर अपनी वास्तविक स्थिति का बोध जगता है. धर्म के मूल में तीन बाते हैं, हम कहाँ से आये हैं, हम कहाँ हैं और कहाँ जाने वाले हैं? इनकी खोज ही हमें धर्म की ओर ले जाती है. हम उसी एक तत्व से आये हैं, उसी में हैं और उसी में लौट जाने वाले हैं. लेकिन लौटने से पूर्व हमें देखना है कि भीतर सुई की नोक के बराबर भी अहम् न बचे, उसका मार्ग बहुत संकरा है, अहम् मिटते ही सारा अस्तित्व हमारी सहायता को आ जाता है, आया ही हुआ है. भीतर से प्रेरणा मिलने लगती है और हम उसकी ओर बढते चले जाते हैं..जहां वह है वहाँ सभी ऐश्वर्य हैं, जगत कृपण है ईश्वर दाता है, वह जानता है हमारे लिए क्या उचित है और क्या नहीं, वह हितैषी है, अकारण दयालु है, वह ही तो है जिसने यह खेल रचा है.