इस परिवर्तनशील जगत में यदि कोई जन सुखपूर्वक जी सकते हैं तो उन्होंने जीने की कला सीख ली है। कुछ आवश्यक सूत्र हृदयंगम कर लिए हैं। अस्तित्त्व को प्रेम किए बिना हम जगत के साथ सामंजस्य नहीं बना सकते। परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना जिस तत्व से की है वह प्रेम है। उसे हर परमाणु में प्रकट करना और महसूस करना ही योग है।कण-कण में वही समाया है, का अर्थ है कि परमात्मा की उस करुणामयी शक्ति ने ही स्वयं को जगत रूप से प्रकट किया है। हमें पहले अपने हृदय में उस तत्व को खोजना है और फिर उसे विराट के साथ जोड़ना है। सृष्टि और सृष्टि कर्ता तब दो नहीं रह जाते और संत उसी में आनंदपूर्वक निवास करते हैं। कृष्ण की मुस्कान जीवन की कोई परिस्थिति छीन नहीं सकती। अपार कष्टों में भी राम यह भीतर जानते हैं कि लीला है, और उनके चेहरे का भाव राज्य पाने और राज्य त्यागने में स्थिर रहता है। इस समता को पाने की साधना ही योग है।
Friday, December 23, 2022
Monday, March 1, 2021
समता यदि साध ले कोई
जीवन फूल की तरह नाजुक है तो चट्टान की तरह कठोर भी। पथरीले रस्तों के किनारे कोमल पुष्प खिले होते हैं और कोमल पौधों पर तीक्ष्ण कांटे उग आते हैं। यहाँ विपरीत साथ-साथ रहता है। शिव के परिवार में बैल और सिंह दोनों हैं, सर्प और मोर में सामीप्य है। जो विपरीत में समता बनाए रखना जानता है वह जीवन के मर्म को छू लेता है। हम ज्यादातर एक की तरफ झुक जाते हैं, जो संवेदनशील है वह छोटी-छोटी बातों को दिल से लगा लेता है और इसके विपरीत जो किसी बात की परवाह ही नहीं करता वह अहंकारी हो जाता है । यदि मध्य में रहना हो तो हमें एक साथ संवेदनशील और बेपरवाह होना सीखना होगा, दोनों जिस बिन्दु पर मिलते हैं उस मध्य में ठहरना सीखना होगा। उस मध्य के बिन्दु पर हम दोनों में से कुछ भी नहीं होते, लेकिन जिस क्षण जैसी आवश्यकता हो हम तत्क्षण वैसा व्यवहार करने में सक्षम होते हैं। इसके विपरीत यदि कोई एक सीमा पर है तो उसे दूसरी तरफ जाने में कितना समय लगेगा नहीं कहा जा सकता। इसी तरह कुछ लोग बहुत ज्यादा बोलते रहते हैं, उन्हें अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रह जाता और कुछ को थोड़ा सा बोलना भी नागवार गुजरता है, वे दूसरी अति पर हैं। मध्य में स्थित हुआ जरूरत पड़ने पर घंटों बोल सकता है और जरूरत न होने पर मौन भी रह सकता है। समता का यह गुण ही योग साधना की सिद्धि है।