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Friday, December 23, 2022

समता की जो करे साधना

इस परिवर्तनशील जगत में यदि कोई जन सुखपूर्वक जी सकते हैं तो उन्होंने जीने की कला सीख ली है। कुछ आवश्यक सूत्र हृदयंगम कर लिए हैं। अस्तित्त्व को प्रेम किए बिना हम जगत के साथ सामंजस्य नहीं बना सकते। परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना जिस तत्व से की है वह प्रेम है। उसे हर परमाणु में प्रकट करना और महसूस करना ही योग है।कण-कण में वही समाया है, का अर्थ है कि परमात्मा की उस करुणामयी शक्ति ने ही स्वयं को जगत रूप से प्रकट किया है। हमें पहले अपने हृदय में उस तत्व को खोजना है और फिर उसे विराट के साथ जोड़ना है। सृष्टि और सृष्टि कर्ता तब दो नहीं रह जाते और संत उसी में आनंदपूर्वक निवास करते हैं। कृष्ण की मुस्कान जीवन की कोई परिस्थिति छीन नहीं सकती। अपार कष्टों में भी राम यह भीतर जानते हैं कि लीला है, और उनके चेहरे का भाव राज्य पाने और राज्य त्यागने में स्थिर रहता है। इस समता को पाने की साधना ही योग है।   


Monday, March 1, 2021

समता यदि साध ले कोई

जीवन फूल की तरह नाजुक है तो चट्टान की तरह कठोर भी। पथरीले रस्तों के किनारे कोमल पुष्प खिले होते हैं और कोमल पौधों पर तीक्ष्ण कांटे उग आते हैं। यहाँ विपरीत साथ-साथ रहता है। शिव के परिवार में बैल और सिंह दोनों हैं, सर्प और मोर में सामीप्य है। जो विपरीत में समता बनाए रखना जानता है वह जीवन के मर्म को छू लेता है। हम ज्यादातर एक की तरफ झुक जाते हैं, जो संवेदनशील है वह छोटी-छोटी बातों को दिल से लगा लेता है और इसके विपरीत जो किसी बात की परवाह ही नहीं करता वह अहंकारी हो जाता है । यदि मध्य में रहना हो तो हमें एक साथ संवेदनशील और बेपरवाह होना सीखना होगा, दोनों जिस बिन्दु पर मिलते हैं उस मध्य में ठहरना सीखना होगा। उस मध्य के बिन्दु पर हम दोनों में से कुछ भी नहीं होते, लेकिन जिस क्षण जैसी आवश्यकता हो हम तत्क्षण वैसा व्यवहार करने में सक्षम होते हैं। इसके विपरीत यदि कोई एक सीमा पर है तो उसे दूसरी तरफ जाने में कितना समय लगेगा नहीं कहा जा सकता। इसी तरह कुछ लोग  बहुत ज्यादा बोलते रहते हैं, उन्हें अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रह जाता और कुछ को थोड़ा सा बोलना भी नागवार गुजरता है, वे दूसरी अति पर हैं। मध्य में स्थित हुआ जरूरत पड़ने पर घंटों बोल सकता है और जरूरत न होने पर मौन भी रह सकता है। समता का यह गुण ही योग साधना की सिद्धि है। 

 

Thursday, July 16, 2020

मन को तारे मन्त्र वही है

निशब्द परमात्मा तक पहुंचने के लिए शब्दों की एक नाव बनानी पडती है, पर अंततः शब्द भी छूट जाते हैं क्योंकि वह शब्दातीत है. मंत्र इसी नाव का नाम है. हमारे मन में असीम सामर्थ्य है जो हम चाहें उसे वह अनुभूत करा सकता है. मन की वृत्ति या विचार में यदि ईश्वर का नाम हो,  तो वही प्रगट होगा. यह जप सतत बना रहे तो इष्ट हमारे मन का स्वामी बन जाता है, उसी का अधिकार हृदय पर हो जाता है और इसके बाद समता स्वयं ही प्राप्त हो जाती है. यदि बाहर कोई भी विपरीत परिस्थिति आती है और मन विचलित होता है तो मन्त्र का स्मरण तुरन्त सहज अवस्था में पहुँचा देता है.  मन में जो नकारात्मक विचार आयें उन्हें ठहरने न देना और जो सकारात्मक विचार आयें उन पर ही ध्यान केंद्रित करना साधक के लिये सहज हो जाता है. 

Monday, May 11, 2020

समता में जो मन टिक जाये

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय इन पांच कोशों के भीतर हमारा वास है. जब चेतना अन्नमय कोष से जुड़ी होती है उसे जरा-मरण का भय लगता है, प्राणमय कोष में रहकर भूख-प्यास का अनुभव होता है. मनोमय कोष के कारण हम शोक-मोह का अनुभव करते हैं, विज्ञानमय कोष ही हमारे सुख-दुःख के अनुभव का कारण है. आनंदमय कोष आत्मा का निकटस्थ है, इसमें ब्रह्म का आनन्द है किन्तु यह सदा उपलब्ध नहीं होता. जब साधक साधना के द्वारा अन्य चार कोशों के पार चला जाता है तब इसका अनुभव करता है. यहाँ असीमता का अनुभव होता है तथा विषाद और भय का लोप हो जाता है. ध्यान और समाधि के द्वारा इसमें टिकने का सामर्थ्य बढ़ता है, तब सुख-दुःख में समता प्राप्त होती है, जिसे कृष्ण योग में स्थित होना कहते हैं. मानव जीवन में ही इस समता को प्राप्त करना सम्भव है. 

Thursday, September 19, 2019

खिला रहे जब मन का फूल



सृष्टि में हर शै एक-दूसरे से जुड़ी है. कोई यहाँ अकेला नहीं है. यदि कोई वास्तव में अपने भीतर एकांत का अनुभव कर लेता है तो उसी क्षण वह सारी सृष्टि से जुड़ जाता है. हम जो अकेलापन अनुभव करते हैं, वह खुद की बनाई हुई सीमाएं हैं जो हमें अपने वातावरण से तोडती हैं, एक सिकुड़े हुए मन को ही अकेलेपन का भय होता है एक खिला हुआ मन सहज ही सबसे अपनेपन का अनुभव करता है. दुःख मन को सीमित करता है और ख़ुशी उसे फैलाती है. पूजा में हम फूल चढ़ाते हैं इसका तात्पर्य है मन भी फूल की तरह खिला रहे. जीवन में प्रतिपल कुछ न कुछ ऐसा घटता है जो हमारे अन्य्कूल नहीं है, किंतु जो मन उसे भी ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार कर लेता है, वह उस भीतरी एकांत से जुड़ने की कला सीख लेता है. ऐसा मन समता को प्राप्त होता है.

Friday, June 14, 2019

समता एक साधना ही है



किसी भी व्यक्ति, घटना अथवा वस्तु को गलत कहते ही हम अपने भीतर द्वेष भाव उत्पन्न कर लेते हैं. जिसका फल दुःख के रूप में हमें ही प्राप्त होता है. कोई भी व्यक्ति जैसा है वैसा होने के लिए उसे न जाने कितने कर्मों का प्रवाह ले आया है. इसमें वह स्वाधीन नहीं है. हम स्वाधीन हैं अपने अंतर की समता बनाये रखने में, क्योंकि वही आत्मा में रहना है. हम तभी भूल जाते हैं जब अहंकार वश स्वयं को कर्त्ता मानते हैं. अतीत का भय हमें तभी सताता है जब भविष्य में हम कुछ पाना चाहते हैं. वर्तमान का क्षण निर्दोष है जिसमें न कोई भय है न पश्चाताप, क्योंकि अतीत में जो हुआ वह उन क्षणों की उपज था, भविष्य में जो होगा वह वर्तमान के कार्यों का परिणाम होगा. वर्तमान में हम नये कर्म नहीं बाँध रहे क्योंकि समता में रहना आ गया है, तो भविष्य सुधरने ही वाला है.

Thursday, January 25, 2018

दिल है छोटा सा

२५ जनवरी २०१८ 
कितना छोटा सा है मानव का हृदय और उसमें वह अनंत समा जाता है जैसे कितना छोटा सा है मोबाइल फोन और उसमें सारा जहाँ समा गया है. सूक्ष्म में स्थूल समाया है या स्थूल में सूक्ष्म, यह पहेली हल नहीं होती. देह स्थूल है, मन सूक्ष्म, बुद्धि मन से भी सूक्ष्म और आत्मा बुद्धि से, परमात्मा आत्मा से भी परे है, यानि उससे भी सूक्ष्म. वह अति सूक्ष्म सत्ता हर जड़-चेतन का आधार है. उसमें सतत् वास करने से ही आत्मा समता को प्राप्त होती है, वरना मन तो पीपल के पते की तरह डोलता ही रहता है. मन चाह जगाता है, फिर उसे पूर्ण करने के लिए प्रयत्न करता है, सफल या असफल होने पर सुख-दुःख का अनुभव करता है, यश अथवा अपयश का भागी भी बनता है. एक चक्र पूरा होने पर दूसरी चाह...मन कभी थकता नहीं. आत्मा सदा तृप्त है. उसे विश्राम मिल गया है. वह उस पुष्प की तरह सुगंध फैलाती है जिसे न खिलने की चाह है न मुरझाने का भय, जिसका स्वभाव ही है खिलना. 

Monday, September 11, 2017

लौट सकेगा जब मन भीतर

१३ सितम्बर २०१७ 
भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, जैसे कछुआ संकट आने पर अपने अंगों को भीतर सिकोड़ लेता है और उसके कठोर तन पर किसी चोट का असर नहीं होता, वह अपने को बचा लेता है. इसी तरह मन भी यदि किसी संकट के आने पर स्वयं को सिकोड़ना सीख ले, अपने भीतर एक ऐसा स्थान बना ले जहाँ जाकर बाहरी घटनाओं के असर से बचा जा सकता है तो मन भी स्वयं की रक्षा आसानी से कर लेता है. मन पर संकट आने का अर्थ है, उसका विकार ग्रस्त हो जाना, उसका चिंताग्रस्त हो जाना अथवा दुर्बल हो जाना. मन की रक्षा का अर्थ है समता में रहने की उसकी कला का विकास. यदि छोटी-छोटी बातों से मन कुम्हला जाता है तो देह भी स्वस्थ नहीं रह सकती. मन के आकुल-व्याकुल होते ही अंतस्रावी ग्रन्थियों से ऐसे स्राव निकलते हैं जो देह को रोगग्रस्त कर सकते हैं. मन की गहराई में स्थित एक स्थान जहाँ जाकर पूर्ण विश्राम मिलता है, वही उसका आश्रय स्थल है. नियमित ध्यान करने से इस स्थल पर जाने का मार्ग सहज हो जाता है.  

Sunday, December 4, 2016

योग साधना होगा सबको


संसार का अर्थ है जो पल-पल बदलता है, अगले पल क्या होने वाला है कोई नहीं जानता. कोई कितना भी प्रयास करले  उसके जीवन की परिस्थितियां सदा उसके अनुकूल नहीं रहतीं। हर सुख अपने पीछे दुःख छिपाये है, तो आखिर मानव के पास कोई विकल्प है या नहीं, इसका उत्तर योग के द्वारा ही मिल सकता है. योग ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा हर मानव अपने भीतर एक ऐसी अवस्था को प्राप्त कर सकता है जिसे बाहर की कोई परिस्थिति छू भी नहीं पाती। योगी ही सदा समता में रहना सीख पाता है.  

Sunday, May 3, 2015

जो मैं हूँ सो तू है

जनवरी २००९ 
हम स्वयं को दूसरे के समान नहीं समझ पाते. हम अपने शिखर को अपना सार समझते हैं तथा दूसरे की खाई को उसका. उसका भी शिखर है और हमारी भी खाई है. जो स्वयं के समान सबको समझेगा, वह कभी दूसरों का निर्णायक नहीं होगा, वह जान लेता है कि सबके भीतर जो बैठा है वह सम है. सभी के भीतर वह हीरा छिपा है. यह समता तभी प्राप्त होती है जब हम निंदा में रस लेना त्याग देते हैं. अहंकार कभी यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई अन्य उससे बढ़कर भी हो सकता है. अहंकार सदा इस आशा में रहता है कि कब कोई उसे कहे कि तुम सबसे महान हो ! हमारे दुःख का कारण यही है कि हम दूसरों का अपमान करने को राजी हो जाते हैं. हम निकटतम के साथ भी दूरी रखते हैं. उससे स्वयं को ऊपर रखते हैं. जब भी हम दूसरों के बारे में कुछ सोचें अपने को सामने रखकर ही सोचें. क्योंकि जैसा हम महसूस करेंगे वैसा ही दूसरे भी महसूस करते हैं 

Tuesday, March 10, 2015

भीतर का प्रकाश जगे जब

अप्रैल २००८ 
अनेकांत हमें कहीं उलझने नहीं देता. जीवन के बारे में सच्चाई हो तो दुःख का कोई कारण नहीं. जीवन की परिस्थितियाँ बदल रही हैं, हमारे हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह बहा ले जा सकता है. दृष्टिकोण यदि सही हो तो मन एक समता में टिका रह सकता है. जब-जब हम प्रमाद में जाते हैं, तो संवेग नियन्त्रण की शक्ति कमजोर हो जाती है. हमारे किसी भी व्यवहार से यदि किसी को थोड़ा सा भी दुःख पहुँचे तो हमने कर्म बाँध ही लिया. हम अध्यात्म में टिके रहते हैं तो दूसरों के दोष देखना अपने आप छूट जाता है. यदि अब भी दोष दीखते हैं तो आत्मा में स्थिति दृढ़ नहीं है. परमात्मा हर जीव के भीतर है, वह सभी ओर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है. सभी को उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है, मेरे भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. हम इस जगत में प्रेम बांटने ही आये हैं अथवा तो सेवा करने. शरीर द्वारा सेवा व मन द्वारा प्रेम देना ही हमारा लक्ष्य है ! 



Sunday, March 1, 2015

समता भाव साधना है

फरवरी २००८ 
प्रतिकूल संयोग हमारे लिए विटामिन है और अनुकूल संयोग हमारे लिए भोजन है. हम अपने जीवन में जो कुछ भी अच्छा-बुरा पाते हैं, हमारे कर्मों का फल है यदि ऐसी हमारी दृढ़ मान्यता है तो दुखों के आने पर हमें प्रसन्न होना चाहिए कि एक बुरा कर्म कट रहा है. भीतर समता बनाये हुए जब हम परिस्थिति को झेल जाते हैं तो भविष्य के लिए कोई कर्म बंध नहीं बांधते. इसी प्रकार सुख के मिलने पर किसी पुण्य कर्म का उदय हुआ है यह मानकर समता भाव बनाये रखना है, अन्यथा वह सुख भी बंधन बन जायेगा. 

Thursday, February 26, 2015

समता में रहना ही ध्यान

जनवरी २००८ 
ध्यान क्या है ? जैसे कोई यह नहीं कह सकता कि प्रेम क्या है, वैसे ही ध्यान को परिभाषित करना कठिन है. मन जब विशाल हो जाता है, मन में कोई दुराव नहीं होता, छल नहीं होता, आग्रह नहीं होता, उहापोह नहीं होती, मन बस खाली होता है तभी ध्यान घटता है. इच्छा मन को दूषित करती है, पैदा होते ही मन में तरंगें उठने लगती हैं, पूरा करने का प्रयास शुरू हो जाता है. यदि पूरी होती नहीं दिखे तो कैसी अशांति का अनुभव होता है. कितनी भी निर्दोष इच्छा क्यों न हो मन की समता भंग कर जाती है. लेकिन जो मन ध्यान का अभ्यासी है वह तुरंत समता में आ जाता है. उसे समता के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए. इच्छा पूरी हो या न हो वह अपनी समता खोना नहीं चाहता. वह जानता है आज एक बात तो कल दूसरी बात कारण बनेगी और जब इच्छा पूर्ण हो भी जायेगी तब लगेगा यह न भी होती तो क्या फर्क पड़ने वाला था. बाहर कुछ भी बदले वह व्यर्थ ही है, भीतर का बदलना ही वास्तविक है और भीतर का बदलाव बाहर पर निर्भर नहीं करता, वह ज्ञान, प्रेम और ध्यान पर निर्भर करता है.    

Thursday, December 11, 2014

भीतर जिसको मिला ठिकाना

जुलाई २००७ 
रहो भीतर, जीओ बाहर’ यह ध्यान का सूत्र है. आत्मज्ञान होने पर साधक भीतर रहना सीख जाता है. ‘भीतर’ हमें सारे दुखों से मुक्त करके आश्रय देता है. जब तक भीतर कोई केंद्र नहीं है, कोई वहाँ टिके भी तो कैसे. हम वास्तव में परमात्मा का अंश हैं इसे भुलाकर मन, बुद्धि तथा देह को ही सत्य मानकर उनके सुख-दुःख में लिप्त होते रहते हैं. वे हमें साधन रूप में मिले हैं, पर हम इन्हें ही साध्य मान लेते हैं, उनको संतुष्ट करना ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं. जबकि आत्मा ही साध्य है. इस संसार में जो कुछ भी हमें मिला है, कर्मों के अनुसार ही मिला है, उनमें राग-द्वेष करने से हम नये कर्म बांधेंगे, यदि समता में रहेंगे तो शांति से उन कर्मों को करेंगे जो हमारे प्रारब्ध में हैं तथा नये कर्म करने पर कर्ता भाव से मुक्त रहेंगे. 

Thursday, September 18, 2014

नित्य निरंतर जो बढ़ता है

मार्च २००७ 
दो तरह का प्रेम होता है एक साधक का, एक सिद्ध का. पहला हमें करना है दूसरा अपने आप होता है. हमारी साधना लौकिक है और यह दूसरा प्रेम दिव्य है, इसे पाने के लिए कीर्तन, स्मरण तथा श्रवण साधनों से भक्ति के द्वारा अंत करण की शुद्धि करनी होगी. तब अहंकार नही रहता, संसार की वस्तुओं की कामना नहीं भी रहती तथा हृदय की समता बनी रहती है, फिर वह दिव्य प्रेम स्वतः ही प्रकट होता है. ऐसा प्रेम जो कभी घटता नहीं, नित्य बढ़ता ही रहता है, ऐसा प्रेम जो दोष नहीं देखता, जो सदा एक के प्रति होते हुए भी सारी सृष्टि के लिए होता है.


Thursday, June 26, 2014

वही नूर झलके सबमें

दिसम्बर २००६ 
जीवन में यदि योग हो, ईश्वर की लगन हो, सद्गुरु का अनुग्रह हो और मन में समता हो तो परमात्मा को प्रकट होने में देर नहीं लगती, वह तत्क्ष्ण प्रकट हो जाता है. प्रभु का स्मरण यदि स्वतः ही होता हो, मन उसके बिना स्वयं को असहाय अनुभव करता हो, वैराग्य सहज हो जाये तो हमारी पात्रता के अनुसार ईश्वर प्रकट हो जाता है. जो विराट है इतने बड़े ब्रम्हाण्ड का मालिक है, वह एक साधक के छोटे से उर में प्रकट हो जाता है. भक्ति विराट को लघु, असीम को ससीम बनाने में सक्षम है और लघु को विराट व ससीम को असीम बनाने में भी. ऐसी भक्ति ही साधक का ध्येय है, साध्य है. देह और बुद्धि की सार्थकता इसी में है कि इसमें चैतन्य प्रकटे. सजगता साधना की पहली और अंतिम सीढ़ी है, बिना सजग रहे हम कहीं नहीं पहुंच सकते.


Friday, June 13, 2014

जिसकी डोरी उसके हाथ


यदि कोई साधना के पथ पर चलना चाहे तो ईश्वर उसके लिए सुविधा कर देते हैं. परमात्मा और सद्गुरु हर पल साधक को अपनी नजर में रखते हैं. एक पल के लिए भी वह उनसे जुदा नहीं है. उसके भीतर के अज्ञान को मिटाने के लिए भी वह तरह-तरह की परिस्थितयां जीवन में भेजते रहते हैं. हृदय में जब तक कोई भी कामना शेष रहे तब तक हम सत्य का अनुभव नहीं कर सकते, तो वह उसकी शुभकामना की पूर्ति करने में भी बाधा खड़ी कर देते हैं. साधक को अपने अंतर को पूर्णतया खाली करना है, सारे राग मिटाने हैं, जगत के माध्यम से जीवन में ऐसे कितने ही पल आते हैं जब उसे यह जांचने का मौका मिलता है कि भीतर समता बनी है या नहीं. ईश्वर के रूप में ही वह सुखद या दुखद परिस्थिति को स्वीकारता है. अपने जीवन की पूरी बागडोर प्रभु के हाथों में सौंप देना ही समपर्ण है. जहाँ भेद है वहाँ समपर्ण है ही नहीं. ध्यान में जो एकता अनुभूत हो ती है वही एकता यदि हर समय अनुभव करें तो बाह्य परिस्थिति हमें विचलित नहीं कर सकती. 

Monday, June 2, 2014

तेरा साहिब घट के भीतर

अप्रैल २००६ 
प्रेम से प्रभु प्रकटता है, प्रेम विश्वास से, विश्वास ज्ञान से, ज्ञान श्रद्धा से, श्रद्धा समता से और समता सत्य से और सत्य प्रभु ही है. हमारा हृदय जब समता से भर जाता है तब ही मानना चाहिए परम में हमारी स्थिति है, वह हम सभी के भीतर अनंत सुख के रूप में विद्यमान है. जब तक उसका ज्ञान नहीं होता तभी तक सारी बेचैनी है, उसके बाद तो मन मस्ती में डूब जाता है. हमारे भीतर जो मोती भरे छिपे हैं, जो अमृत भरा है उसे ध्यान की डुबकी लगा कर हम पा सकते हैं. भीतर उसका प्रकाश है, संगीत है, ऊर्जा है, आनंद है उस सारी सम्पत्ति को हम सहज ही पा सकते हैं. जगत के अभाव नित्य हैं, परमात्मा का भाव नित्य है. हमें भाव चाहिए, अभाव नहीं. 

Tuesday, March 25, 2014

सागर में उठती लहरें जब

अक्तूबर २००५ 
हम इस जगत में सुख-दुःख के झूले में झूलने नहीं आये हैं बल्कि अखंड आनंद से मिलने वाली शांति प्राप्त करने आए हैं, ऐसी शांति जो जगत की हलचल से समाप्त होने वाली नहीं होती है. यह शांति उस ज्ञान से प्राप्त होती है जो हमें भक्ति करने के लिए प्रेरित करता है, ज्ञान का अंत भक्ति में ही है. भक्ति का अर्थ है अपने आप में रहना, कोई कामना नहीं, कोई उद्वेग नहीं, कोई विक्षेप नहीं, मन की वह अवस्था ही ईश्वर की निकटता की अवस्था है. वह निर्लेप, निसंग अवस्था ही अखंड शांति की अवस्था है, यही हमारी सच्ची अवस्था है, वही हमारा स्वरूप है. उसी में स्थित होकर भक्त कवियों ने ईश्वर की आराधना की है. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तो आत्मा रूपी सागर में उठने वाली लहरे हैं, जब यह लहरें न रहें तो शांत सागर अपने स्वरूप में स्थित रहता है. एक बार उस अवस्था का अनुभव हो जाने के बाद यदि लहरें उठती-गिरती रहें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, फर्क तभी पड़ता है जब हम उनके साथ संबंध बना लेते हैं. जब तक हमारा संबंध दृश्य के साथ नहीं है, हम द्रष्टा भी नहीं हैं, साक्षी भाव में आ जाते हैं. आत्मा में स्थित हुआ जीव सुख-दुःख का भागी नहीं होता, वह तो सम अवस्था में ही रहता है. 

Thursday, December 26, 2013

जामे दो न समाए

मई २००५ 
‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाए’ जीवन में यदि द्वंद्व है तो दुःख रहेगा ही. द्वैत के शिकार होते ही मन द्वेष करता है, थोड़ी सी भी निषेधात्मकता अथवा आग्रह उसे समता की स्थिति से डिगा देता है. यह तलवार की धार पर चलने जैसा है. भीतर जब एक धारा बहेगी, समरसता की धारा तब शांति तथा आनन्द फूल की खुशबू की तरह अस्तित्व को समो लेंगे. आकाश से बहती जलधार जब धरा को सराबोर करती है तो उसका कण-कण भीग जाता है, इसी तरह भीतर जब समता का अमृत स्रोत खुल जाता है तो प्रेम व आनन्द की धारा बहती है. मन का ठहराव ही आत्मा की जागृति है. आत्मा में स्थित होकर जीने का ढंग यदि सध जाये तो कुछ अप्राप्य नहीं है.