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Wednesday, January 5, 2022

ध्यान का जो अभ्यास करे

देह में रहते हुए देहातीत अवस्था का अनुभव ही ध्यान है। स्थूल इंद्रियों से स्थूल जगत का अनुभव होता है, सूक्ष्म इंद्रियों से स्वप्न अवस्था का अनुभव होता है। गहन निद्रा में स्थूल व सूक्ष्म दोनों का भान नहीं रहता। ध्यान उससे भी आगे का अनुभव है, जब निद्रा भी नहीं रहती, चेतना केवल अपने प्रति सजग रहती है। ध्यान के आरम्भिक काल में इस अवस्था का अनुभव नहीं होता है, पर दीर्घकाल के अभ्यास द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। एक बार इसका अनुभव होने के बाद भीतर स्मृति बनी रहती है। इसे ही भक्त कवि सुरति कहते हैं। इस अवस्था में गहन शांति का अनुभव होता है, मन में यदि कोई विचार आता है तो चेतना उसकी साक्षी मात्र होती है। देह में होने वाले स्पंदन और क्रियाएँ भी अनुभव में आती हैं, किंतु साक्षी भाव बना रहता है। जब विचार भी लुप्त हो जाएँ और देह का भान ही न रहे इसी अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि के अनुभव से सामान्य बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है। मन में स्पष्टता और आनंद का अनुभव होता है। 


Monday, May 11, 2020

समता में जो मन टिक जाये

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय इन पांच कोशों के भीतर हमारा वास है. जब चेतना अन्नमय कोष से जुड़ी होती है उसे जरा-मरण का भय लगता है, प्राणमय कोष में रहकर भूख-प्यास का अनुभव होता है. मनोमय कोष के कारण हम शोक-मोह का अनुभव करते हैं, विज्ञानमय कोष ही हमारे सुख-दुःख के अनुभव का कारण है. आनंदमय कोष आत्मा का निकटस्थ है, इसमें ब्रह्म का आनन्द है किन्तु यह सदा उपलब्ध नहीं होता. जब साधक साधना के द्वारा अन्य चार कोशों के पार चला जाता है तब इसका अनुभव करता है. यहाँ असीमता का अनुभव होता है तथा विषाद और भय का लोप हो जाता है. ध्यान और समाधि के द्वारा इसमें टिकने का सामर्थ्य बढ़ता है, तब सुख-दुःख में समता प्राप्त होती है, जिसे कृष्ण योग में स्थित होना कहते हैं. मानव जीवन में ही इस समता को प्राप्त करना सम्भव है. 

Sunday, September 29, 2019

अमन हुआ जो मुक्त वही है



जब तक मन संकुचित है वह डोलेगा ही, ऐसा मन अशांति का ही दूसरा नाम है. जो मन दिखावा करता है, तुलना करता है, वह उद्ग्विन हुए बिना नहीं रहेगा. स्वार्थ से भरा हुआ मन भी अकुलाहट से भर जाता है. विशाल मन का अर्थ है अमनी भाव में आ जाना. संत कहते हैं अमन हुए बिना समाधान नहीं मिलता. क्योंकि मन होने का अर्थ ही है अहंता का होना, जो है वह अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए अन्य का विरोध करेगा ही, इसीलिए सिर काटने और घर जलाने की बात कबीर कह गये हैं. मन के मिटे बिना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं किया जा सकता. चेतना जब पूर्ण विश्राम में होती है, अर्थात समाधि में होती है, तब मन खो जाता है. जब हम विचारधारा में बह जाते हैं मन के प्रभाव में होते हैं, जब हम विचार के साक्षी होते हैं, अप्रभावित बने रह सकते हैं. किंतु समाधि का अनुभव शून्यता में ही किया जा सकता है.

Friday, June 28, 2019

बने सार्थक जीवन अपना



चेतना अपने आप में पूर्ण है. जब उसमें जगत का ज्ञान होता है, वह दो में बंट जाती है. जहाँ दो होते हैं, इच्छा का जन्म होता है, और फिर उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए कर्म होते हैं. कर्म का संस्कार पड़ता है, और कर्मफल मिलता है. जिससे पुनः-पुनः कर्म होते हैं. कर्मों की एक श्रंखला बनती जाती है. 'ध्यान' में हम पहले सब कर्म त्याग देते हैं. फिर सब इच्छाओं का विसर्जन कर देते हैं. भीतर केवल स्वयं ही बचता है, जब वह भी विलीन हो जाये, अर्थात अपने होने का बोध भी खो जाये तब शुद्ध चैतन्य प्रकट होता है. लेकिन उसको देखने वाला वहाँ कोई नहीं है, इसीलिए कहते हैं, भगवान को कोई देख नहीं सकता. समाधि से बाहर आने के बाद संतों ने अनुमान से ही उसका वर्णन किया है. साधक के लिए पहले स्वयं को जानना ही पर्याप्त है. इससे इच्छाओं पर उसका नियन्त्रण हो जाता है. व्यर्थ के कर्म अपने आप छूट जाते हैं. सार्थक जीवन में घटने लगता है. निष्काम कर्म बंधन पैदा नहीं करते और न ही उनका कोई फल ही साधक को मिलता है.

Sunday, June 2, 2019

योग की महिमा कौन बखाने



जून का महीना आते ही 'योग दिवस' की याद आ जाती है. 'इक्कीस जून' को ही 'योग दिवस' के रूप में क्यों चुना गया होगा, सम्भवतः इसलिए कि इस दिन भोर जल्दी होती है और शाम देर से होती है, वर्ष का सबसे दीर्घ दिन है इक्कीस जून. योग भी हमारे जीवन को कई तरह से दीर्घ बनाता है. योग एक जीवन पद्धति है जो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक, और आध्यात्मिक रूप से मानव जीवन को समृद्ध करती है. योग का एक अर्थ है जोड़ना, इसका साधक पहले खुद से जुड़ता है, फिर समष्टि से. आसन करने से देह व श्वास जुड़ते हैं, प्राणायाम करने से देह, श्वास व मन जुड़ते हैं, ध्यान से देह, श्वास, मन, बुद्धि तथा चेतना जुड़ते हैं. योग का एक अर्थ समाधि भी है, जिसमें टिकने से साधक पूरे अस्तित्त्व से जुड़ जाता है, उसके लिए कोई पराया नहीं रहता. यदि कोई समाधि तक न भी पहुँचे तब भी स्वयं से जुड़ना एक असीम आनंद की उपलब्धि कराता है. निय्मिओत और सही ढंग से योग करने वाला व्यक्ति सहज ही प्रसन्न रहना सीख जाता है, उसके जीवन में अनुशासन आ जाता है. एक साथ योग करने से समूह भावना का जागरण होता है. शरीर बिना दवाओं के स्वस्थ रहता है. मन बिना मनोरंजन के शांत रहता है. बुद्धि तीव्र होती है और स्वतः ही उसकी दिनचर्या सात्विक होने लगती है. आज की भौतिकतावादी जीवन शैली के कितने दुष्प्रभाव हमें देखने को मिल रहे हैं, इस सबसे यदि आने वाली पीढ़ी को दूर रखना है तो उन्हें बचपन से ही योग सिखाना होगा.

Sunday, April 7, 2019

तीनों गुणों के पार हुआ जो


चित्त सत्व, रज व तम से बना है, जड़ है. चित्त में ज्ञान, क्रिया और स्थिरता तीनों हैं. सत्व से ज्ञान होता है, रज से प्रवृत्ति होती है तथा तम से स्थिति होती है. चित्त कार्य द्रव्य है, यह उत्पन्न हुआ है, नष्ट भी होगा. यह कार्य जगत भी इन्हीं तीनों गुणों से बना है. भीतर जो संघर्ष चल रहा है वह जड़ और चेतन में होता है. हर क्षण हम जो जान रहे हैं, वह चित्त के सत्व गुण के कारण है. जब इसमें रजो या तमो गुण बढ़ा हुआ होता है, हम प्रामाणिक ज्ञान से दूर हो जाते हैं. समाधि का लक्ष्य है सत्व गुण को बढ़ाना. चित्त की एकाग्र व निरुद्ध अवस्था में समाधि घटती है. पतंजलि योग सूत्रों के आधार पर मुख्यतः समाधि दो प्रकार की है सम्प्रज्ञात व असम्प्रज्ञात. वितर्क, विचार, आनन्द व अस्मिता अनुगत ये चार समाधियाँ सम्प्रज्ञात के अंतर्गत आती हैं. वितर्क में स्थूल विषयों पर एकाग्रता रहती है. विचारानुगत में सूक्ष्म का ज्ञान होता है. आनंद व अस्मिता में क्रमशः आनंद व स्वयं के होने का भान होता है. जब सभी वृत्तियाँ रुक जाती हैं उसे असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं.

Wednesday, November 14, 2018

समाधान दिलाये योग


१४ नवम्बर 2018
भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, जो न किसी से उद्ग्विन होता है न किसी को उद्ग्विन करता है, वह मुझे प्रिय है. इसका अर्थ हुआ हम जगत में इस तरह रहना सीख लें कि किसी को हमसे कोई परेशानी न हो, और न जगत ही हमारे लिए कोई समस्या बने. प्रगाढ़ नींद में ऐसा ही होता है, जगत होते हुए भी नहीं रहता और हम जगत के लिए अदृश्य हो जाते हैं. समाधि में भी ऐसा होता है, जगत का भान नहीं रहता और देह भान भी नहीं रहता, देह से ही जगत आरम्भ होता है. इसका अर्थ हुआ कि जगते हुए भी समाधि में बने रहने की कला आ जाये तभी यह सम्भव है. समाधि के लिए योग साधना में बताये यम, नियम का पालन पहला कदम है, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार दूसरा तथा धारणा व ध्यान के तीसरे कदम के बाद समाधि तक पहुंचा जा सकता है. इसीलिए कृष्ण बार-बार अर्जुन को योगी बनने के लिए कहते हैं.

Wednesday, June 17, 2015

मस्त हुआ जो वही पा गया

जनवरी २०१० 
अभ्यास और वैराग्य ये दो पंख हैं, जिनके सहारे साधक अध्यात्म के आकाश में उड़ता है. अभ्यास समय सापेक्ष है पर वैराग्य समय सापेक्ष नहीं है. परम को प्रेम करें तो संसार से वैराग्य हो जाता है. मन ही तो संसार है, जब मन स्थिर हो जाता है तो वह ज्योति स्तम्भ बन जाता है, तब शरीर हल्का हो जाता है. मस्ती में परम वैराग्य है. वैराग्य से समाधि का अनुभव होता है, समाधि से प्रज्ञा पुष्ट होती है. पूर्णता का अनुभव होता है.    

Thursday, April 23, 2015

जिस पल घटे समाधि भीतर

जनवरी २००९ 
निर्वाण, वैकुण्ठ, सत्य, प्रेम, मोक्ष, मुक्ति, ईश्वर, आत्मा तथा परमात्मा सारे शब्द एक की ओर इशारा करते हैं ! उस एक को जो पाले वह जीवन का परम सौभाग्य प्राप्त कर लेता है. उसके सारे बंधन जल जाते हैं, चाह मिट जाती है. पूर्ण तृप्त हुआ वह जगत में आनंद बांटता फिरता है ! जो मिल जाये उसी में संतुष्ट हुआ वह सहज प्राप्त कर्मों को करता हुआ नित आत्मानंद में डूबा रहता है ! यह आत्मानंद सभी को सहज प्राप्त हो सकता है, बस आवश्यकता है अपने भीतर देखने की, जागकर अपने बाहर देखने की, अपने कर्मों पर नजर डालने की ! हमारे कर्म ही हमारी सोच को गढ़ते हैं, सद्कर्म सद्विचारों की ओर ले जायेंगे. सद्विचार पुनः हमें अच्छे कर्मों में लगायेंगे. हमारा आचरण यदि हमारे मन की गवाही देगा तो जीवन में सौम्यता व रस बरसेगा. किन्तु जब हमारे सोचने व करने में अंतर होगा तब भीतर का द्वंद्व किसी न किसी रूप में बाहर प्रकट होकर ही रहेगा. कोई भी भाव या विचार अपना असर छोड़े बिना नहीं जाता. जब भाव, विचार तथा कर्म तीनों शुद्ध हों तभी उसकी झलक मिलती है. वह तो चारों ओर बिखरा हुआ है, भीतर भी वही है. उसी का विस्तार है यह सृष्टि, जब भीतर मौन छा जाता है, तब उसका आभास होता है. मौन में ही पूर्ण सत्य का अनुभव किया जा सकता है. वह समाधि का क्षण है. शांति का उद्गम स्रोत भी वही है. वही निर्वाण है. जब मात्र शून्य शेष रहता है. शांति को अनुभव करने वाला भी नहीं रहता. एकाध क्षण को ऐसा अनुभव सभी को होता है, पर हम इसे पहचान नहीं पाते ! 

Sunday, November 30, 2014

लहरों सा मन गिरता उठता

जून २०१४ 
‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं हूँ’ तथा ‘मैं हूँ’ से ‘है’ तक की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है. जब ‘है’ की अनुभूति होती है तो कोई भेद नहीं रहता. समाधि की अवस्था तभी मिलती है. मन जब अपने मूल स्वरूप में टिक जाये तत्क्षण समाधि घटती है. आत्मा शुद्ध चिन्मात्र सत्ता है, वह आकाशवत है. मन उसमें उठने वाला एक आभास ही तो है. मन को जब हम अलग सत्ता दे देते हैं तभी बंधते हैं. जहाँ द्वैत है वहाँ दुःख है. विचार भी उसी आत्मा की लहरें हैं जो आनन्दमयी है. भीतर उठने वाले सारे संशय, डर तथा भ्रम उसी आत्मा से ही तो उपजे हैं, वे दूसरे नहीं हैं, उनसे कैसा डर. विचार तो शून्य से उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाने वाला है. सागर क्या अपनी लहरों से डरेगा चाहे लहर कितनी भी बलशाली  क्यों न हो, आकाश क्या बादलों की गर्जन से डरेगा ?  आत्मा सागर की तरह गहरी और आकाश की तरह अनंत है, वह निर्मल है, वह जहाँ है वहाँ न कोई गुण है न दुर्गुण, वहाँ कुछ भी नहीं है, निर्दोष, अनछुई वह शुद्ध प्रकाश है. प्रकाश का कोई आकार नहीं, वह उससे भी सूक्ष्म है. 

Saturday, July 26, 2014

जिन्दगी एक नाटक है

नवम्बर २००६ 
सजगता यह सिखाती है कि हम कितने नाटक करते हैं, यह जीवन एक नाटक ही तो है, हम सहज होते ही कब हैं. सहज होकर जीना जिसको आ गया वह तर गया. सहज समाधि उसकी लग गयी. पर हमें कई बार विवश होकर नाटक करना पड़ता है, पर जो यह जानता ही नहीं कि वह नाटक कर रहा है, वह किस अँधेरे में जी रहा है. जो जानता है वह मुक्त है. इस मुक्ति का आनंद अपरिमित है, कभी-कभी हम नाटक को असलियत समझ बैठते हैं तब फंस जाते हैं, पर द्रष्टा भाव में आते ही सब नष्ट हो जाता है. कभी जब कोई कुछ न कर रहा हो, बस चुपचाप बैठा हो, भीतर चल रही हलचल को देखता रहे तो धीरे-धीरे सब शांत हो जाता है, अडोल, ध्यानस्थ और तब मन में सजगता जगती है. 

Tuesday, January 28, 2014

सृष्टि चक्र है जाने कब से

जुलाई २००५ 
प्रत्यक्ष ज्ञान ही प्रज्ञा है और ऐसी समाधि जो प्रज्ञा की ओर ले जाये वही सम्यक समाधि है. कभी-कभी ध्यान में हमें ऐसे अनुभव होते हैं, जिनका वर्तमान जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं  होता, सम्भवतः वे हमारे पूर्व जीवन से सम्बन्धित होते हैं, तब ज्ञान होता है कि इस शरीर से कैसा मोह, न जाने कितने शरीर हम धारण कर चुके हैं, हर बार वही कहानी दोहराई जाती रही है, बस अब और नहीं, अब और इस झूले में नहीं बैठना जिसका एक सिरा ऊपर जन्म फिर नीचे मृत्यु की ओर ले जाता है. अब स्वयं को जानकर उसमें स्थित होना है, संतजन कहते हैं, पलक झपकने में देर लग सकती है पर अपने स्वरूप में स्थित होने में उतनी भी देर नहीं लगती. साधना के द्वारा हम अपने स्वरूप की झलक तो पा ही लेते हैं, पर यह स्थिति सदा बनी नहीं रहती, क्योंकि जब तक अहंकार शेष है पर्दा बना ही रहेगा. 

Wednesday, November 6, 2013

भीतर जगती प्रेम समाधि

अप्रैल २००५ 
‘समाधि सुखः लोकानन्दः’ समाधि से प्राप्त सुख लोक के सुख का कारण भी बनता है, तथा लोक में हमें जो भी आनन्द मिलता है वह समाधि से ही प्राप्त है. उगते हुए सूर्य को देखकर जो हम चकित से रह जाते हैं, अनजाने में समाधि ही लग जाती है, मन लुप्त हो जाता है, हम उस चेतना से जुड़ जाते हैं. जब हम ध्यान में बैठते हैं तो शांति की किरणें फूल की सुगंध की तरह हमारे चारों ओर फूटती रहती हैं. दुनिया के सारे सुख इस ध्यान सुख में समाये हैं, जैसे हाथी के पैर में सारे पैर समा जाते हैं. जिसे एक बार इस समाधि का अनुभव होता है, वह  द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है. प्रेम, आनन्द, शांति उसके नित्य सहचर बन जाते हैं. गांठे खुलने लगती है और बीजरूप में पड़ा भक्ति का वृक्ष खिल उठता है, यह एक चमत्कार ही होता है, इससे बढ़कर कोई चमत्कार नहीं ! 



Saturday, August 10, 2013

क्षुद्र हटे समाधि घटे

 दिसम्बर २००४ 
“लोकोआनंदः समाधिसुखं” जगत का सारा सुख समाधि के सुख का ही अंश है, जहाँ कहीं भी हमें सुख मिलता है, वह उसी समाधि के सुख की झलक मात्र है, हमारा मन पल भर को भी जहाँ ठहर जाता है, अनंत का सुख बरसने लगता है, समाधि सुख कहीं बाहर से लाना नहीं है, वह तो भीतर ही है, बस उसे जगने का अवसर देना है. समाधि में बैठा व्यक्ति वातावरण को भी सुख से भर रहा होता है. वह जो स्वयं तृप्त है वही दूसरों की प्यास बुझा सकता है. सद्गुरु की कृपा यदि किसी के जीवन में घटित हो जाये तो एक क्रांति उसके जीवन में होनी निश्चित है. वह तब सीमाओं से परे चले जाता है, वर्तमान को प्राप्त होता है, क्षुद्रता को त्याग देने से अनंत की शक्तियाँ उसकी सहयोगी बन जाती हैं, वह परम में विहार करने लगता है.


Tuesday, June 4, 2013

मायापति की माया है यह


विकारों से मुक्त हुए बिना हम अपने मन को मुक्त नहीं कर सकते. मन को बंधन में डालने वाली माया है माया यानि दृश्य में आकर्षण, दृश्य जो द्रष्टा से ही उत्पन्न हुआ है. शक्ति को शक्तिमान से अलग नहीं कर सकते, जैसे अग्नि से उसकी दाहिका शक्ति को. धीरे धीरे साधना के द्वारा दृश्य से पृथक हुआ मन द्रष्टा में स्थित होता है, इन्द्रियों के माध्यम से सुख पाने की इच्छा जब घटती जाती है द्रष्टा स्वयं में ही पूर्णता का अनुभव करता है तब एक घड़ी ऐसे आती है जब दृश्य के साथ-साथ द्रष्टा का भी विलोप हो जाता है. सम्भवतः वही समाधि है. 

Monday, April 22, 2013

समाधि ही देती समाधान


 जुलाई २०१३ 
 चित्त के समाधान के लिए पहला कदम है विनम्रता, उद्दन्डता से चित्त समाधि में प्रविष्ट नहीं हो सकता. अपना ही दृष्टिकोण सही है, यह दुराग्रह रखने वाला समर्पित नहीं हो सकता. चित्त यदि व्याकुल है तो अवश्य अपने मार्ग से भटका है. सुख मिलने पर सुखी और दुःख मिलने पर दुखी तो पशु भी हो लेते हैं, साधक दोनों से परे होने की कला सीखता है., आत्मारामी होता है. आत्मा अव्यय है, अविनाशी है, अप्रमेय है, प्रकृति इसके विपरीत है. समपर्ण के द्वारा ही प्रकृति के पार जाया जा सकता है. एकनिष्ठ चित्त ही समाहित होता है. समाहित चित्त ही समाधि तक पहुंचता है. 

Tuesday, March 19, 2013

साहेब मेरा एक है


जून २००४ 
परमात्मा ने मानव को तथा इस सृष्टि को अपने भीतर के आनंद को प्रकट करने के लिए सिरजा है, लेकिन हम अंधे मनुष्य की भांति स्वयं ही गड्ढे में गिरते हैं, काँटों से उलझते हैं और फिर कहते हैं दुनिया दुःख स्वरूप है. दुनिया दुःख रूप तभी तक है जब तक हम अज्ञान में हैं, जब तक हम स्वयं को अन्यों से पृथक समझते हैं, यही माया है. स्वयं को जाने बिना हम इससे मुक्त नहीं हो सकते. साधक जब मन को प्रेरणादायक विचारों से भर लेता है तो भीतर और माधुर्य उभरता है, जैसा बीज हम धरती में बोते हैं, वैसा ही फल हमें प्राप्त होता है. हमें अंतिम सत्य की तलाश है, ईश्वर का अनुभव हम करना चाहते हैं, समाधिस्थ होना चाहते हैं, अनवरत शांति के उस स्रोत से जुड़े रहना चाहते हैं, जो हमारे भीतर है, जो परमसत्य है तो मन को समाहित करना होगा, मन तभी समाहित होगा जब उसमें द्वैत न हो, जब सम्पूर्ण जगत से हमारा एक्य हो जाये, जब भीतर कोई विरोध न हो, उद्वेग न हो, जब जो जैसा हो, वैसा का वैसा ही स्वीकार करने का सामर्थ्य हो.

Monday, November 19, 2012

सजग रहे जो दुःख से छूटे


अक्टूबर २००३ 
हर तरह की वेदना से मुक्ति के उपाय की खोज, बोधि तथा समाधि की प्राप्ति साधक का लक्ष्य है. उपाय की खोज ही बोधि है. चित्त की निर्मलता ही समाधि है. अपनी भूलों पर वेदना होती है तो हमारी सजगता बढ़ती है. दुःख हमें सिखाता है, क्रोध, मोह, प्रमाद, आलस्य हमारे ताप को बढ़ाते हैं. सजगता ही जिसकी एकमात्र औषधि  है. थोड़ी सी भी असावधानी हमें वेदना देती है वही वेदना फिर सजग करती है. वाणी का संयम नहीं सधता तो मुख से कठोर शब्द निकल जाते हैं. जिह्वा का संयम नहीं सधता तो हम अखाद्य भी खा लेते हैं. मन का संयम नहीं रहा तो व्यर्थ का चिंतन चलता रहता है. मन जब खाली हो तो सुमिरन स्वतः होता है जबकि चिंतन बलपूर्वक करना होता है. हमारा हृदय इतना शुद्ध हो कि वहाँ नित्य सुमिरन चलता रहे, यही समाधि है.

Tuesday, October 30, 2012

मिले समाधि से समाधान


हम सभी एक विशाल समष्टि के अंग हैं, इस नाते सभी एक-दूसरे से बंधे हैं पर हमारी अलग-अलग पहचान है, जब यह पहचान भी नहीं रहती तब मन सारी सीमाओं को तोड़कर असीम में मिल जाता है. हममें से हरेक की चेतना अनंत है पर हम छोटे-छोटे दायरों में बंधे होने के कारण उस विशालता का अनुभव नहीं कर पाते हैं. समाधि की अवस्था में सम्भवतः ऐसा ही अनुभव होता है, सारा का सारा ब्रह्मांड एक तत्व से बना है यह स्पष्ट होता है, फिर कोई भेद नहीं, अद्वैत का अनुभव होने के बाद अंतर में राग-द्वेष नहीं रह सकते.

Wednesday, October 17, 2012

घड़ी घड़ी में बरसे अमृत


सितंबर २००३ 
मन यदि समता में रहे, एकाग्र हो, शांत हो, निरपेक्ष हो तो जाग्रत अवस्था भी समाधि बन जाती है. ध्यान तब करना नहीं पड़ता, अपने आप ही होता रहता है. जगत को जैसा यह है वैसा ही देखने की समझ आ जाती है. रस्सी को तब सांप नहीं देखते. अपने आस-पास के वातावरण के प्रति सजग रहकर हम स्वार्थहीन जीवन जीते हैं. हमारा चित्त इतना विशाल हो जाता है कि सभी के स्वार्थ हमारे स्वार्थ में बदल जाते हैं. बल्कि सभी कुछ सहज ही होने लगता है. भेद दृष्टि नहीं रहती, सभी व्यक्तियों, वस्तुओं, परिस्थितियों के पीछे एक ही तत्व के दर्शन होते हैं, वही एक हम हैं, वही एक वह है, तब कैसी स्थिरता का अनुभव होता है. मृत्यु, जन्म, बुढ़ापा, रोग भी तब अपना अर्थ बदल लेते हैं. हम शोक-रोग, राग-द्वेष के भोक्ता न रहें तो यह हम पर असर नहीं डाल सकते. मन यदि संयमित हो तभी सुखों-दुखों के जाल से बच सकता है, वरना तो हर कदम पर ठोकर खानी पड़ेगी. श्रेय और प्रेय से चुनाव का मौका प्रकृति हमें हर पल देती है, हम अधिकतर प्रेय को चुनते हैं, तात्कालिक सुख के लिए दीर्घकालिक सुख को भुला देते हैं, बाद में वही तात्कालिक सुख, दुःख में बदल जाता है. सारा जीवन इसी तरह बीत जाता है. सजग होकर देखें तो हर क्षण आनंद का अनुभव के लिए है, हर श्वास उसी का नाम लेने के लिए है.