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Monday, June 12, 2023

सत्व बढ़ेगा जब जीवन में

सृष्टि का आधार सच्चिदानंद है, अर्थात् जो सदा है, ज्ञान स्वरूप है और आनंद से परिपूर्ण है। जड़-चेतन जो भी पदार्थ हमें दृष्टिगोचर  होते हैं, वे रूप बदलते रहते हैं; किंतु उनका कभी नाश नहीं होता। यहाँ पदार्थ ऊर्जा में और ऊर्जा पदार्थ में निरन्तर बदल रही है।हम जो भोजन करते हैं उसका सूक्ष्म अंश ही मन बन जाता है, इसलिए सात्विक भोजन का इतना महत्व है। राजसिक भोजन मन को चंचल बनाता है और तामसिक भोजन प्रमाद से भर देता है। शरीर में आलस्य, भारीपन  तथा बेवजह की थकान भी गरिष्ठ भोजन से होती है। इतना ही नहीं पाँचों इंद्रियों से हम जो भी ग्रहण करते हैं, मन पर उसका प्रभाव पड़ता है। यदि हम चाहते हैं कि मन सदा उत्साह से भरा हो, सहज हो तो इसे सत्व को धारण करना होगा और अंततः उसके भी पार जाकर अनंत में विलीन होना होगा। मन जब स्वयं को समर्पित कर देता है तो भीतर शुद्ध अहंकार का जन्म होता है, जो सदा ही पावन है। 


Friday, July 17, 2020

तीन गुणों का जो साक्षी


भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है, गुण ही गुणों में वर्तते हैं. हम अपनी सात्विक, राजसिक, तामसिक प्रकृति के अनुसार कर्मों को करते हैं. यही गुण हमारे कर्मों का कारण बनते हैं और हम स्वयं को कर्ता मानकर उनके द्वारा प्राप्त सुख-दुःख का भोग करते रहते हैं. यह क्रम जाने कब से चलता आ रहा है. अंतर्मुखी होकर जब साधक इस सत्य को देखता है तो गुणातीत होने की तरफ उसके कदम बढ़ते हैं. जब साक्षी भाव बढ़ने लगता है तो वह गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता. यदि तमस के कारण भीतर प्रमाद है तो वह उसके वश में नहीं होता, मन यदि चंचल है तो यह जानकर कि रजोगुण बढ़ा हुआ है वह ध्यान का प्रयोग करता है. सत्व में स्थित होने पर शांति का भी भोक्ता नहीं बनता बल्कि स्वयं को सदा ही अलिप्त देखता है. 

Sunday, April 7, 2019

तीनों गुणों के पार हुआ जो


चित्त सत्व, रज व तम से बना है, जड़ है. चित्त में ज्ञान, क्रिया और स्थिरता तीनों हैं. सत्व से ज्ञान होता है, रज से प्रवृत्ति होती है तथा तम से स्थिति होती है. चित्त कार्य द्रव्य है, यह उत्पन्न हुआ है, नष्ट भी होगा. यह कार्य जगत भी इन्हीं तीनों गुणों से बना है. भीतर जो संघर्ष चल रहा है वह जड़ और चेतन में होता है. हर क्षण हम जो जान रहे हैं, वह चित्त के सत्व गुण के कारण है. जब इसमें रजो या तमो गुण बढ़ा हुआ होता है, हम प्रामाणिक ज्ञान से दूर हो जाते हैं. समाधि का लक्ष्य है सत्व गुण को बढ़ाना. चित्त की एकाग्र व निरुद्ध अवस्था में समाधि घटती है. पतंजलि योग सूत्रों के आधार पर मुख्यतः समाधि दो प्रकार की है सम्प्रज्ञात व असम्प्रज्ञात. वितर्क, विचार, आनन्द व अस्मिता अनुगत ये चार समाधियाँ सम्प्रज्ञात के अंतर्गत आती हैं. वितर्क में स्थूल विषयों पर एकाग्रता रहती है. विचारानुगत में सूक्ष्म का ज्ञान होता है. आनंद व अस्मिता में क्रमशः आनंद व स्वयं के होने का भान होता है. जब सभी वृत्तियाँ रुक जाती हैं उसे असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं.

Monday, February 6, 2017

जीवन बने सात्विक सबका

७ फरवरी २०१७ 
सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से सारी प्रकृति आच्छादित है. सत्व गुण प्रकाश, सुख  और ज्ञान को बढ़ाता है. रज हमें क्रियाशील बनाता है और तम निद्रा और जड़ता का कारण है. हमारा जीवन तभी सुंदर होगा जब रज और तम ये दोनों गुण संतुलित मात्रा में हों. आज समाज में जो दुःख और विषाद छाया है, उसका कारण तमस की अधिकता है. बच्चे और युवा रजस की अधिकता से पीड़ित हैं, वे शांत बैठना नहीं चाहते, नींद का समय खिसकते-खिसकते आधी रात तक चला गया है. आधुनिक गैजेट्स उनके मस्तिष्क को उत्तेजित किये रहते हैं. सत्व की अधिकता होने पर व्यक्ति मुक्ति की ओर सहज ही कदम बढ़ाता है और सत्व की कमी होने पर रोगों का शिकार हो जाता है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्व को कैसे बढ़ाएं, सात्विक भोजन, सात्विक दिनचर्या अर्थात योग साधना से दिन का आरम्भ, नियमित स्वाध्याय, जीवन में अनुशासन, ध्यान का अभ्यास आदि सत्व गुण को पोषित करते हैं. देह स्वस्थ हो, मन शांत हो और बुद्धि तीक्ष्ण हो यह कौन नहीं चाहता, इसके लिए आवश्यक है कि रज और तम को धीरे-धीरे कम करते जाएँ.

Friday, August 1, 2014

स्वयं में जो रमण करे

जनवरी २००७ 
अहंकार से मुक्त होकर जब मन कामना रहित होता है, उसी क्षण आत्मा में टिक जाता है. अहंकार छोड़े बिना हम दीन नहीं होते और दीन हुए बिना दीनानाथ की कृपा नहीं मिलती. आत्मा में जिसकी सदा ही स्थिति हो ऐसा मन शरणागत में जा सकता है. उसमें कोई उद्वेग नहीं है, वह राग-द्वेष से परे है. उसमें एक मौन का जन्म  होता है, इस मौन में सत्व का जन्म होता है, जिसकी तरंगे न केवल भीतर बल्कि बाहर का वातावरण भी पावन कर देती हैं. उसमें जिसने एक बार विश्रांति पायी है वह इस जगत से अलिप्त हो जाता है अर्थात इससे सुख पाने की इच्छा उसकी नष्ट हो जाती है. वह आत्मा में रमण करने वाला परम आनन्द को प्राप्त करता है.