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Monday, February 6, 2017

जीवन बने सात्विक सबका

७ फरवरी २०१७ 
सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से सारी प्रकृति आच्छादित है. सत्व गुण प्रकाश, सुख  और ज्ञान को बढ़ाता है. रज हमें क्रियाशील बनाता है और तम निद्रा और जड़ता का कारण है. हमारा जीवन तभी सुंदर होगा जब रज और तम ये दोनों गुण संतुलित मात्रा में हों. आज समाज में जो दुःख और विषाद छाया है, उसका कारण तमस की अधिकता है. बच्चे और युवा रजस की अधिकता से पीड़ित हैं, वे शांत बैठना नहीं चाहते, नींद का समय खिसकते-खिसकते आधी रात तक चला गया है. आधुनिक गैजेट्स उनके मस्तिष्क को उत्तेजित किये रहते हैं. सत्व की अधिकता होने पर व्यक्ति मुक्ति की ओर सहज ही कदम बढ़ाता है और सत्व की कमी होने पर रोगों का शिकार हो जाता है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्व को कैसे बढ़ाएं, सात्विक भोजन, सात्विक दिनचर्या अर्थात योग साधना से दिन का आरम्भ, नियमित स्वाध्याय, जीवन में अनुशासन, ध्यान का अभ्यास आदि सत्व गुण को पोषित करते हैं. देह स्वस्थ हो, मन शांत हो और बुद्धि तीक्ष्ण हो यह कौन नहीं चाहता, इसके लिए आवश्यक है कि रज और तम को धीरे-धीरे कम करते जाएँ.

Friday, March 1, 2013

मन अनंत अनंत ही चाहे


मई २००४ 
हम यदि विकारों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते तो कहीं न कहीं सीमाकरण तो करना ही होगा, धीरे-धीरे इस सीमा को बढ़ाते जाना है. हम सुख-दुःख से परे उस परम आनंद को यदि अपना आश्रय स्थल बनाना चाहते हैं तो संयम और अनुशासन पहला कदम है. उन्मुक्त जीवन में मन भी उडा-उड़ा सा ही रहेगा. ऐसे मन में बुद्धि स्थिर नहीं रहेगी, स्थिर बुद्धि में ही आत्मा प्रतिबिंबित होती है. ईश्वर स्वयं हमें अपना आनंद प्रदान करना चाहते हैं, उसकी शक्ति ही हमें जीवित रखे हुए है, पर इस बात को हम नहीं मानते, उसके प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे भीतर नहीं उमड़ते. इतने पर भी वह हमें प्रेम करता है, हमारी सोयी हुई शक्तियों को जगाना चाहता है, हमारे माध्यम से प्रकट होना चाहता है, हमारे धैर्य समाप्त होने की अनंत काल से प्रतीक्षा कर रहा है, कि कितने वर्षों तक हम उससे दूर रह सकते हैं, हम कितने निस्वार्थी हैं कि ईश्वर का सान्निध्य भी नहीं चाहते, लेकिन जगत जो सीमित है वह असीम मन को आनन्दित कैसे कर सकता है.

Wednesday, September 19, 2012

रोम रोम जब उसे पुकारे


अगस्त २००३ 
साधक के जीवन में अनुशासन की अत्यधिक आवश्यकता है, समय की पाबंदी रहे, उसका सदुपयोग हो, उसके महत्व को जानते हुए हम कर्म करें. प्रातः उठकर यदि सभी के लिए मंगल कामना हो तो दिन भर उसकी सुगन्धि मिलती है. भाव और विचार ही वाणी व कर्म को जन्म देते हैं. वह पुण्यों की खेती करे ऐसे ही बीज बोये जिसके फल सुखकारी हों. हर अशुभ कर्म, वाणी अथवा सोच दुःख का वह  बीज होता है जो हम स्वयं ही बोते हैं और भविष्य में उसका फल हमें ही काटना होता है. आज हमारे जीवन में जो भी दुखद घटता है वह हमारे ही कर्मों का प्रतिफलन है. ऐसा मन जिसे सत्य की आकांक्षा हो उसमें कोई विकार आए भी क्यों, परम सत्य शुद्धता चाहता है, खोट, कपट, मिलावट, दम्भ, छल अथवा झूठ उसे नहीं भाते, वह हमारे मन को निर्मल देखता है तभी अपने कदम वहाँ रखता है. हमारे हृदय में उसके लिए पुकार, प्यास, चाह कितनी गहरी है, इसका पता उसे चल जाता है, जिस क्षण हम विकारग्रस्त होते हैं अथवा तो निर्मल होते हैं तत्क्षण हमें अनुभव होता है. उसकी कृपा तभी होती है जब हमारे रोम-रोम से उसकी चाह उठती है. तभी वह जिस भी परिस्थिति में रखे, उसे स्वीकारते हुए समता की भावना बनाये हुए और अंतर में उसके प्रेम को अनुभव करते हुए साधक इस जगत में व्यवहार करता है.

Tuesday, July 24, 2012

अनुशासन जीवन में सौंदर्य भरता है


जून २००३ 
जीवन जीना एक कला है और जीवन में अनुशासन रखना भी. प्रकृति के सारे कार्य अपने निर्धारित समय पर सम्पन्न होते हैं, एक पल के लिये भी वह नहीं चूकती, लेकिन मानव सदा आपने प्रमाद भरे मन के कारण चूक जाता है. ज्ञान ही उसका एक मात्र आधार है जिस पर उसे अपने जीवन की इमारत को खड़ा करना है, जनक को ज्ञान हुआ तो वे विदेही कहलाये, यह ज्ञान कि वह मरणधर्मा शरीर नहीं है, अमर ऊर्जा हैं, कि यह तन जो हर क्षण क्षय की ओर बढ़ रहा है, सारी शक्ति और समय का हरण कर लेता है, इसे स्वस्थ रखने, सजाने, संवारने, खिलाने-पिलाने में ही सारा समय नष्ट न करके आत्मा को पुष्ट बनाएँ. आत्मा की पुष्टता हमारे मन पर निर्भर करती है, मन जो खाली हो, जगत के हित की बात सोचता हो, प्रेम से परिपूर्ण हो. ऐसा मन हमें व्यर्थ के कार्यों से बचाता है, शक्ति का अपव्यय नहीं होता. उस समय व शक्ति का उपयोग ही हम ध्यान में, सत्शास्त्रों के अध्ययन में लगा सकते हैं. सुमिरन में लगा सकते हैं.

Thursday, August 18, 2011

अनुशासन


अक्तूबर २००१ 

जीवन में कुछ नियमों के पालन से मार्ग प्रशस्त हो जाता है और हम मुक्ति की ओर स्वतः ही चल पड़ते हैं. अनुशासन और नियंत्रण हमारे जीवन को बंधन मुक्त ही करते हैं बंधन में डालते नहीं हैं. परमात्मा का लक्ष्य रहने से वही हमारी जिम्मेदारी ले लेते हैं, जीवन तब जिस किसी रूप में हमारे सम्मुख आता है मुक्त हृदय से उसका स्वागत करना हम सीखते हैं.