जैसे मानव देह में
मस्तिष्क का मुख्य स्थान है, वैसे ही एक देश में संसद का. मस्तिष्क यानि बुद्धि,
जिस प्रकार का ज्ञान बुद्धि में होगा, वैसा ही निर्देश कर्मेन्द्रियों व
ज्ञानेन्द्रियों को मिलेगा. यदि बुद्धि सात्विक होगी तो आहार-विहार भी सात्विक
होगा, कर्म भी शुद्ध होंगे और शरीर स्वस्थ रहेगा. स्वस्थ का अर्थ है देह का मालिक
यानि आत्मा अपने आप में स्थित रहेगा, जिससे अनवरत ऊर्जा का प्रवाह देह, मन
इन्द्रियों को मिलता रहे. यदि देह अस्वस्थ होती है तो चेतना रुग्ण अंग में ही सिमट
जाती है और ऊर्जा का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है. इसी प्रकार यदि संसद में देश और
धर्म के प्रति समर्पित सांसद होंगे तो वैसा ही निर्देश अधिकारियों और जनता को
मिलेगा. यदि सांसद निष्ठावान होंगे तो विकास भी सही दिशा में और शीघ्र होगा. देश
समर्थ बनेगा, समर्थ का अर्थ है अपनी रक्षा करने में सक्षम और जनता के हर वर्ग को
एक सुंदर व स्वस्थ वातावरण प्रदान करने में सक्षम. यदि ऐसे व्यक्ति चुनकर आते हैं
जो दीर्घसूत्री हैं, उच्च आदर्शों के प्रति जिनके मन में सम्मान नहीं है, जो निज
हितों को देश से ऊपर रखते हैं तो विकास की गति अवेरुद्ध हो जाएगी. देश कमजोर
बनेगा. निर्णय हमें करना है कि हम चरित्रवान और कर्मठ लोगों को चुनें.
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Wednesday, April 17, 2019
Monday, May 15, 2017
भाव भरा जब अंतर होगा
१५ मई २०१७
ऋषि कहते आये हैं भाव
यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं
वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज
की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ
ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से
ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी
होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे
एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी.
Monday, February 6, 2017
जीवन बने सात्विक सबका
७ फरवरी २०१७
सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से सारी प्रकृति आच्छादित है. सत्व गुण प्रकाश, सुख और ज्ञान को बढ़ाता है. रज हमें क्रियाशील बनाता है और तम निद्रा और जड़ता का कारण है. हमारा जीवन तभी सुंदर होगा जब रज और तम ये दोनों गुण संतुलित मात्रा में हों. आज समाज में जो दुःख और विषाद छाया है, उसका कारण तमस की अधिकता है. बच्चे और युवा रजस की अधिकता से पीड़ित हैं, वे शांत बैठना नहीं चाहते, नींद का समय खिसकते-खिसकते आधी रात तक चला गया है. आधुनिक गैजेट्स उनके मस्तिष्क को उत्तेजित किये रहते हैं. सत्व की अधिकता होने पर व्यक्ति मुक्ति की ओर सहज ही कदम बढ़ाता है और सत्व की कमी होने पर रोगों का शिकार हो जाता है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्व को कैसे बढ़ाएं, सात्विक भोजन, सात्विक दिनचर्या अर्थात योग साधना से दिन का आरम्भ, नियमित स्वाध्याय, जीवन में अनुशासन, ध्यान का अभ्यास आदि सत्व गुण को पोषित करते हैं. देह स्वस्थ हो, मन शांत हो और बुद्धि तीक्ष्ण हो यह कौन नहीं चाहता, इसके लिए आवश्यक है कि रज और तम को धीरे-धीरे कम करते जाएँ.
Tuesday, April 28, 2015
दर्पण सा जब मन हो जाये
जनवरी २००९
भगवद्गीता में
श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’ अदृश्य के प्रति विश्वास ही श्रद्धा
है, जो हम जानते हैं वह बहुत थोड़ा है उससे जो हम नहीं जानते. उस अव्यक्त का हमारे
जीवन पर असीम प्रभाव पड़ता है. श्रद्धा का अर्थ है पूर्ण समर्पण, जो कुछ भी हमारे
साथ हो चुका है, हो रहा है, अथवा भविष्य में घटने वाला है, सभी को पूर्ण स्वीकार
करते हुए साक्षी भाव में, समता में टिके रहने का नाम ही पूर्ण समर्पण है. असंतुष्ट
व्यक्ति श्रद्धा नहीं रख सकता. वह परम विश्रांति को भी उपलब्ध नहीं हो सकता. जीवन
में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं, साक्षी को प्राप्त हुए चित्त पर उनकी
कोई छाप नहीं पडती ! वह दर्पण की भांति सभी कुछ अपने ऊपर से गुजर जाने देता है. वह
कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं ठहरने देता, सदा वर्तमान में ही रहता है. वास्तव में वह
होता ही नहीं, जैसे एक वृक्ष है, वह होकर भी नहीं है. वैसे ही हम भी प्रकृति के
साथ एक होकर जी सकते हैं. निर्भार, निर्द्वंद्व और पूर्ण आनंद में. श्रद्धा हृदय
की वस्तु है, तर्क मस्तिष्क की उपज है. तर्क तनाव से भर देता है, श्रद्धा प्रेम से भर देती है, जीवन
को ऊंचा उठाती है !
Monday, December 22, 2014
इतनी शक्ति हमें देना दाता
हमारे मस्तिष्क
का आधा हिस्सा भी हम इस्तेमाल नहीं कर पाते, कोई कहता है कि हम दस प्रतिशत से भी
कम उस क्षमता का प्रयोग करते हैं जो प्रकृति ने हमें दी है. उस दस प्रतिशत में से
भी कितनी तो व्यर्थ ही नष्ट हो जाती है जैसे, व्यर्थ बोलना, नकारात्मक चिन्तन,
नकारात्मक दृष्टिकोण आदि. शक्ति का पूर्ण उपयोग हो सके इसका पहला साधन है पवित्रता
! शुद्ध बुद्धि में शक्ति टिकती है. उस शक्ति का जब हम प्रयोग करते हैं तो और
प्रकटती है. यह सृष्टि न जाने कितनी बार बनी और नष्ट हुई और कितनी बात मानव
ऊंचाइयों पर पहुँचा है और कितनी बार गिरा है. हम आगे बढ़ें यही हमारी नियति है.
Friday, June 29, 2012
अनंत की ओर
मई २००३
ज्ञान वही है जो वक्त पर काम आये, नहीं तो मस्तिष्क पर बोझ डालने जैसा ही है. जो
वस्तु, व्यक्ति व परिस्थिति को को नहीं स्वीकारते, वही दुखी होते हैं, जो मुसीबत
आने पर मुस्कान से किनारा कर लेते हैं, वे कहाँ तत्व को जान पाए. जब ज्ञान के अवसर
का उपयोग आये तब हम अक्सर चूक जाते हैं. अध्यात्म की दुनिया अनंत है, उसमें कोई
सीमा हो ही नहीं सकती. वह मुक्त करती है. आत्मा की शक्ति का परिचय हमें इसी दुनिया
में मिलता है. वह दुनिया इसी दुनिया में है, बल्कि यह दुनिया, यह छोटा सा जगत उस
अनंत दुनिया में समाया है. हमें तो बंधन पसंद है सो उस अनंत दुनिया से हम वास्ता
नहीं रखते. पर जब बंधन बोझ लगने लगे, कोई पूर्व पुण्य उदय हो जाये, कृपा हो जाये
तो उस अनंत दुनिया के द्वार हमारे लिये खुलने लगते हैं.
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