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Tuesday, January 16, 2024

श्रद्धावान लभते ज्ञानम

संत कहते हैं, मन में श्रद्धा स्थायी हो जाये तो आनंद स्वभाव में बस जाता है.  मीरा के पैरों में ही घुंघरू नहीं बंधे थे, उसके दिल के भीतर भी बजे थे। सागर की गहराई में एक ऐसी दुनिया है जहाँ सौंदर्य बिखरा हुआ है, हमें उस पर यक़ीन नहीं होता। आश्चर्य की बात है कि इतने संतों और सद्गुरुओं रूपी गोताखोरों को देखकर भी नहीं होती. कोई-कोई ही उसकी तलाश में भीतर जाता है, जबकि भीतर जाना अपने हाथ में है, अपने ही को तो देखना है, अपने को ही तो बेधना है परत दर परत जो हमने ओढ़ी है उसे उतार कर फेंक देना है. हम नितांत जैसे हैं वैसे ही रह सकें तो सदा सहजता ही है। हम सोचते हैं कि बाहर कोई कारण होगा तभी भीतर ख़ुशी फूटी पड़ रही है पर सन्त कहते हैं भीतर ख़ुशी है तभी तो बाहर उसकी झलक मिल रही है हमें भीतर जाने का मार्ग मिल सकता है पर उसके लिए उस मार्ग को छोड़ना होगा जो बाहर जाता है एक साथ दो मार्गों पर हम चल नहीं सकते. बाहर का मार्ग है अहंकार का मार्ग, कुछ कर दिखाने का मार्ग भीतर का मार्ग है, समर्पण का मार्ग, स्वयं हो जाने का मार्ग !  


Friday, June 17, 2022

निजता का जब फूल खिलेगा

हमें अपनी निजता को खोजना है, यह अहंकार नहीं है, अस्मिता है, अपने भीतर एक केंद्र को खोजना है जो बाहरी किसी भी प्रभाव से अछूता रहता है। यह एक चट्टान की तरह कठोर है। जिस पर धूप, पानी, अग्नि और हवाएं भी अपना प्रभाव नहीं डालतीं और उस फूल की तरह कोमल भी जो अपनी सुगंध और रूप से सभी का मन मोह लेता है. यह अपना होनापन किसी के विरुद्ध नहीं है, यह मानव होने की पहचान है. यह विवेक की उस अग्नि में तपकर मिलती है जो नित्य और अनित्य का भेद करके व्यर्थ को जला  देती है और ऐसा कुछ शेष रह जाता है जो कभी जल ही नहीं सकता, यह उस भरोसे से पैदा होता है जिसके सामने सारा ब्रह्मांड भी खड़ा हो जाए तो वह टूटता नहीं। जो श्रद्धा छोटी-छोटी बात पर खंडित होती हो वह निजता तक नहीं ले जा सकती। जब इस जगत में कुछ भी पाया जाने जैसा न लगे और साथ ही हर वस्तु अनमोल भी प्रतीत हो क्योंकि वह उसी एक  स्रोत से उपजी है, तब जानना चाहिए कि भीतर निजता का फूल खिला है। अब जगत एक क्रीड़ास्थली बन जाता है जहाँ अन्य लोग मात्र खिलाड़ी हैं और खेल में तो हार-जीत होती ही रहती है।सुख की चाह तब बाँधती नहीं क्योंकि सुख हमारा स्वभाव है यह ज्ञान हो जाता है।  


Monday, March 28, 2022

इतनी शक्ति हमें दी है दाता

आत्मा में अनेक शक्तियाँ होते हुए भी मानव स्वयं को दुर्बल मानता है, वह जड़ को तो बहुत महत्व देता है पर स्वयं की महिमा से अनभिज्ञ रहता है। जहाँ भी जीवन है वहाँ आत्मा विद्यमान है। परमात्मा की तरह जीव अनादि और अनंत है। चेतना उसका लक्षण है, चेतना को नष्ट नहीं किया जा सकता केवल विस्मृति के पर्दे से उसे आवृत किया जा सकता है। स्वयं में निहित दर्शन शक्ति व ज्ञान शक्ति के द्वारा जीव संसार का ज्ञान प्राप्त करता है । उसके भीतर स्मरण की भी एक शक्ति है जिससे वह जगत के अनेक पदार्थों को उनके उपयोग सहित स्मरण रखता है। आत्मा में सुख को अनुभव करने की भी एक शक्ति है, हमें लगता है सुख बाहर के पदार्थ देते हैं पर कभी तन अस्वस्थ हो तो बाहर के अमूल्य पदार्थ भी सुख नहीं देते। इस आत्मीय सुख का कारण है परमात्मा में असीम श्रद्धा और मन की निर्मलता। जब मन में मोह होता है तो श्रद्धा अचल नहीं रह पाती और सुख तब दुःख में बदल जाता है। आत्मा में शौर्य की भी एक शक्ति है जो जगत में हर परिस्थिति का सामना करने की प्रेरणा देती है। इस शौर्य शक्ति के कारण ही अटल श्रद्धा भी टिकी रहती है। 


Wednesday, June 2, 2021

जाकी रही भावना जैसी

 श्रद्धा की पूर्णता तभी है जब हम स्वयं के प्रति पूर्ण आश्वस्त हो जाएँ, हम अपनी क्षमताओं के प्रति, अपने इरादों के प्रति तिल मात्र भी संदेह नहीं रखें। हमारा मन पूर्ण श्रद्धा से भरा है तो जगत का व्यवहार स्वयं ही बदल जाता है। यह सारा जगत एक ही तत्व  से बना है, यहाँ एक के प्रति किया गया संदेह पूर्ण के प्रति ही सिद्ध होता है। इसका आरम्भ स्वयं से ही होता है। अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते हुए जब हम जीते हैं तो संदेह कैसा ?स्वयं के प्रति किया अविश्वास ही जगत के प्रति हमारे संदेह का कारण है, और वही औरों के द्वारा हमारे प्रति किए गये व्यवहार में प्रतिफलित होता है। दूसरे हमारे साथ जो भी व्यवहार करते हैं, वह हमारे खुद के प्रति व्यवहार को ही दर्शाता है।


Monday, November 2, 2020

सदा ऊर्जित होगा मन जो

 

जगत में विकास करना हो तो ऊर्जा के नए-नए स्रोत चाहिए. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैज्ञानिक नयी खोजें कर रहे हैं। भीतर विकास करना हो उसके लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता है। हम भोजन, जल, निद्रा और श्वास से ऊर्जा को ग्रहण करते हैं। ध्यान भी एक सहज और सशक्त साधन है जिससे हम मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं। हमारे चारों ओर तरंगों का एक विशाल समुद्र है, जिसमें सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा की तरंगें भी हैं। मन भी एक ऊर्जा है, यदि कुछ क्षणों के लिए ही इसे केंद्रित करके सकारात्मक विचारों से भर लें फिर स्वीकार भाव में मात् बैठे ही रहें तो ‘समान समान को आकर्षित करता है’ के नियम से दिव्य ऊर्जा स्वयं ही हमारे मन को छूने लगेगी, और यदि वह पहले से ही विचारों से भरा हुआ नहीं है तो उस रिक्त स्थान को भर देगी। मन यदि स्वीकार भाव में हो तो उसकी गहराई में स्थित आत्मा की झलक भी मिलने लगती है। इससे आत्मिक बल भी बढ़ता है और जीवन में भय और असुरक्षा का नाम भी नहीं रहता। प्राण ऊर्जा का संवर्धन प्राणायाम के द्वारा भी किया जा सकता है, किन्तु ध्यान रखना होगा कि मन श्रद्धा से भरा हो। जीवन के अंतिम क्षण तक यदि कोई अपने कार्य स्वयं करने में समर्थ रहना चाहता है तो उसे प्राण ऊर्जा का संवर्धन निरंतर करते रहना होगा।

Tuesday, July 14, 2020

जीवन का जो पाठ पढ़ेगा

जीवन एक पाठशाला ही तो है, यहाँ हर दिन, हर किसी को, कोई न कोई परीक्षा देनी होती है. जब कोई देख न रहा हो तब भी कोई देखता है कि जब करुणा दिखाने का वक्त था तो हम कितने उदार थे. अचानक कोई विपदा आ पड़ी तो हमने कितनी शीघ्रता से उसका समाधान ढूंढ लिया. सामने वाला हमसे सहमत न हो रहा हो तो झट उसके दृष्टिकोण से हम वस्तुओं को भांप सकते हैं या नहीं इसकी भी परख होती है. जब देह को कोई रोग सताये तो हम कितनी जल्दी साक्षी भाव में आकर स्वयं को दर्द से बचा ले जाते हैं. जीवन में आ रहे परिवर्तन को कितनी आसानी से हम स्वीकार कर लेते हैं और दृढ़ता से उसका सामना करते हैं. कुछ भी हो जाये हमारी आशा की डोर टूटी तो नहीं, इसकी भी परीक्षा होती है. परमात्मा के प्रति आस्था और श्रद्धा में रंच मात्र भी कमी तो नहीं आती, कृतज्ञता की भावना ने हमारे अंतर को आप्लावित तो कर दिया है न. असीम धैर्य और आत्मविश्वास की पूंजी घट तो नहीं रही. जैसा जीवन  हम चाहते हैं उसी के अनुरूप हमारे कर्म भी हो रहे हैं या नहीं. ये सभी छोटी-छोटी बातें यदि जीवन में हैं तो अवश्य ही हम जीवन की पाठशाला से सफल होकर जाने वाले हैं. 

Sunday, July 5, 2020

गुरुर्ब्रह्मा: गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः


गुरु पूर्णिमा प्रत्येक साधक के लिए एक विशेष दिन है. अतीत में जितने भी गुरू हुए, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन ! माता शिशु की पहली गुरू होती है. जीविका अर्जन हेतु शिक्षा प्राप्त करने तक शिक्षक गण उसके गुरु होते हैं, लेकिन जगत में किस प्रकार दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है, जीवन को उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, इन प्रश्नों का हल गुरुजन ही दे सकते हैं. इस निरंतर बदलते हुए संसार में किसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने भीतर स्थिरता का अनुभव कर सकता है ? जगत का आधार क्या है ? इस जगत में मानव की भूमिका क्या है ? उसे शोक और मोह से कैसे बचना है ? इन सब सवालों का जवाब भी गुरू का सत्संग ही देता है. जिनके जीवन में गुरू का ज्ञान फलीभूत हुआ है वे जिस संतोष और सुख का अनुभव सहज ही करते हैं वैसा संतोष जगत की किसी परिस्थिति या वस्तु से प्राप्त नहीं किया जा सकता. गुरू के प्रति श्रद्धा ही वह पात्रता प्रदान करती है कि साधक उनके ज्ञान के अधिकारी बनें.

Friday, June 5, 2020

श्रद्धा जिसकी सदा अटल है

आज गुरूजी ने बताया भक्ति मन में जगे इसके लिए शरणागति एक साधन है. यदि कोई भूल हमसे होती है और उसे हम स्वीकार लेते हैं, तो उससे बाहर आ जाते हैं. जो झुकना नहीं जानता वह आनंद के सागर में डुबकी नहीं लगा सकता. असहाय के लिए ही भगवान सहायक बन कर   आते हैं, दीन के लिए ही दीनानाथ है, जो स्वयं को सदा सही मानता है, अपनी भूल स्वीकार करने में जिसका अहंकार आड़े आता है, वह अपने भीतर विश्राम नहीं कर सकता. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता और ईश्वर की कृपा के बिना गुरु का सान्निध्य नहीं मिलता. गुरु के सान्निध्य का अर्थ है उनके ज्ञान को स्वीकारना, अपनी बुद्धि को किनारे रखकर श्रद्धा भाव से स्वयं के जीवन में परिवर्तन के लिए सदा तैयार रहना. मन को मारकर बैठना ही गुरु की संगति में बैठना है. जो भी हम अपने प्रयत्न से प्राप्त करते हैं वह हमसे छोटा ही होता है, पर जो गुरु अथवा ईश्वर की कृपा से मिलता है वह असीम है. उस असीम को भीतर समाने के लिए हमारा छोटा सा मन पर्याप्त नहीं है. एक लोटे में भला सागर समा सकता है क्या ?  साधक को गुरु के रक्षा कवच में रहना है. अपने हर आग्रह को छोड़ना है. जीवन में कितने ही कठोर अनुभव करवा के परमात्मा हमारी श्रद्धा को हिलाते हैं, पर जो हर संशय को पार करके भी अटल रहती है ऐसी दृढ श्रद्धा ही वास्तविक है. ऐसी श्रद्धा जगते ही हृदय द्रवीभूत हो जाता है, अहंकार पिघल जाता है और हमारे व्यक्त्तिव में एक लोचपन आता है जो किसी भी परिस्थिति में हमें स्थिर बनाये रखता है.  

Thursday, May 28, 2020

भेद प्रार्थना का जो जाने


हमारी प्रार्थनाएं हमारे मन की गहराई में छिपी आकांक्षाओं को प्रकट करने में अति सहायक होती हैं. हर धर्म में प्रार्थना का बहुत महत्व बताया गया है, जब हम परम श्रद्धा के साथ किसी इष्ट अथवा परमात्मा के सामने बैठकर प्रार्थना करते हैं तो हमें ज्ञात भी नहीं होता कि अगले क्षण भीतर से जो शब्द या वाक्य हम बोलने वाले हैं वह क्या होने वाला है. प्रार्थना सोच-सोच कर नहीं की जाती, न ही किसी रटे रटाये भजन या श्लोक को बोलकर की जाती है. यह तो स्वतः स्फूर्त होती है और हृदय की गहराइयों से निकलती है. हो सकता है वर्षों तक फिर दोबारा वे शब्द हमारे मुख से प्रकट  भी न हों, पर कभी न कभी जब वह पूर्ण होती है तब हमें याद आता है, या नहीं भी आ सकता. किन्तु इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. प्रतिदिन हमें कुछ समय प्रार्थना को देना चाहिए, यदि हम कह नहीं सकते तो एक नोटबुक में उसे लिख दें जो भी हमारी दिली इच्छा है, और शेष सब अस्तित्त्व पर छोड़ दें. शुभता की चाह मन में जगे हर प्रार्थना का यही लक्ष्य है.

Wednesday, May 13, 2020

जो गुरुवाणी पर करे मनन


भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं संशय आत्मा विनश्यति, अर्थात जिस व्यक्ति में संशय करना  उसका स्वभाव ही बन गया है वह कभी सुख को उपलब्ध नहीं हो सकता. संसार विश्वास पर चलता है, उसके बिना जीवन में एक ठहराव आ जाता है. संशय बुद्धि करती है और श्रद्धा भावना का क्षेत्र है. अपने-अपने स्थान पर जीवन में दोनों की आवश्यकता है. यदि भीतर श्रद्धा और संशय ऊपर-ऊपर है तो व्यक्ति किसी दिन ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है. श्रद्धा के बिना केवल संशय करना अपने जीवन को आगे बढ़ने से रोकना ही है. श्रद्धावान को ही ज्ञान मिलता है, ऐसा ज्ञान जिसके आने से भीतर शांति का अनुभव होता है.  ठहरी हुई झील में भी कुछ तरंगें होती हैं पर ज्ञान की उपलब्धि से ऐसी चिर शांति भीतर उत्पन्न  हो जाती है जो कभी नष्ट नहीं होती.

Tuesday, July 16, 2019

गुरू मेरी पूजा गुरू भगवंता



आज गुरू पूर्णिमा है, अतीत में जितने भी गुरू हुए, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन. शिशु का जब जन्म होता है, माता उसकी पहली गुरू होती है. उसके बाद पिता उसे आचार्य के पास ले जाता है, शिक्षा प्राप्त करने तक सभी शिक्षक गण उसके गुरु होते हैं. जीविका अर्जन करने के लिए यह शिक्षा आवश्यक है लेकिन जगत में किस प्रकार दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है, जीवन को उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, इन प्रश्नों का हल कोई सद्गुरू ही दे सकता है. इस निरंतर बदलते हुए संसार में किसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने भीतर स्थिरता का अनुभव कर सकता है, इसका ज्ञान भी गुरू ही देता है. जगत का आधार क्या है ? इस जगत में मानव की भूमिका क्या है ? उसे शोक और मोह से कैसे बचना है ? इन सब सवालों का जवाब भी यदि कहीं मिल सकता है तो वह गुरू का सत्संग ही है. जिनके जीवन में गुरू का ज्ञान फलीभूत हुआ है वे जिस संतोष और सुख का अनुभव सहज ही करते हैं वैसा संतोष जगत की किसी परिस्थिति या वस्तु से प्राप्त नहीं किया जा सकता. गुरू के प्रति श्रद्धा ही हमें वह पात्रता प्रदान करती है कि हम उसके ज्ञान के अधिकारी बनें.

Thursday, March 7, 2019

महिला दिवस पर शुभकामनायें



नारी तुम केवल श्रद्धा हो..अथवा अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी..आजतक स्त्री को या तो देवी कहकर पूजा जाता रहा है अथवा उसको कमजोर समझ कर दया की जाती रही है. मध्यकाल में तो नायिका बनाकर उसके नख-शिख का वर्णन करके उसे भोग की वस्तु ही बना दिया गया. किन्तु अब समय बदल रहा है, स्त्री ने स्वयं को पहचान कर अपनी परिभाषा स्वयं लिखनी आरम्भ कर दी है. वह एक मानवी की भांति जीवन के हर रंग, उत्सव और रस का अनुभव स्वयं करना चाहती है. वह सागर की गहराइयों को भी नाप सकती है और अन्तरिक्ष की ऊंचाइयों को भी. आज कोई भी कर्मक्षेत्र ऐसा नहीं रह गया है जहाँ महिला के कदम न पड़े हों. उसकी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक क्षमता पर अब किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है. महिला दिवस उसकी उपलब्धियों पर गर्व करने का क्षण है और साथ ही उन लाखों महिलाओं की आवाज में आवाज मिलाने का वक्त भी जिन्हें अभी इंसाफ नहीं मिला है, जो आज भी किसी न किसी कारण वश अपनी प्रतिभा को विकसित नहीं कर पा रही हैं.

Friday, February 22, 2019

दृष्टिकोण बदल जाये जब



कर्म किये बिना कोई एक क्षण भी नहीं रह सकता. हमारे कर्म ही हमारा परिचय देते हैं. किसान खेती का कर्म करता है और कवि लिखने का, दोनों ही अपने कर्म को अहंकार को पोषने के लिए भी कर सकते है और पूजा स्वरूप भी. सभी के जीवन में कोई न कोई महत्वपूर्ण वस्तु, व्यक्ति या स्थिति होती है, जिसको वे चाहते हैं. हमारा श्रद्धा पात्र जब सारा अस्तित्त्व बन जाता है तब उपासना घटित होती है. एक शिशु भी जानना चाहता है और एक वृद्ध भी अपने आस-पास के परिवेश के बारे में सजग रहना चाहता है, यदि ज्ञान का बिंदु अपने भीतर केन्द्रित हो जाये तो स्वयं का ज्ञान अपने आप घटित होने लगता है. कर्म, उपासना और ज्ञान स्वयं को जानने के तीन साधन हैं. साधक के कर्म उपासना बन जाते हैं और वही भक्ति एक दिन ज्ञान में बदल जाती है. जब भीतर ज्ञान मात्र रह जाता है, उसी क्षण आत्म अनुभव घटित होता है.

Wednesday, January 30, 2019

उसके कदमों में झुकना है


३१ जनवरी २०१९ 
जीवन में कोई आदर्श न हो, कोई ऐसा न हो जिसके सामने सिर झुकाया जा सके तो जीवन का मर्म कभी नहीं खुल सकता. जिसके भीतर प्रेम और आदर को स्थान नहीं मिला उसके मन में भक्ति और श्रद्धा कैसे खिल सकती है. हमें अपने बड़ों का आदर करना है ताकि हमारा उद्धार हो, छात्रों को शिक्षकों का सम्मान करना है तभी वे उनके दिए ज्ञान को ग्रहण कर सकेंगे. पुत्र को पिता के पैर छूने हैं ताकि एक दिन उसका सिर भीतर परमात्मा के सम्मुख भी झुक सके. बहू को सासूजी का कहा मानना है ताकि एक दिन उसके भीतर देवी का जागरण हो सके. आधुनिकता के नाम पर आज हम सारी सम्भावनाओं को ही खत्म दिए जा रहे हैं. छोटे-छोटे बच्चे माँ-पिता के सामने जवाब देने लगे हैं, जो मन माता-पिता के सम्मुख नहीं झुकता वह कभी परमात्मा के सामने झुकेगा इसकी कल्पना व्यर्थ है. ऐसा मन यदि भविष्य में तनाव का शिकार होता है तो कोई आश्चर्य नहीं. झुकना हमारे लिए सार्थक है, जिसके सम्मुख हम झुकते हैं उसके लिए नहीं.

Monday, May 21, 2018

मनसा, वाचा, कर्मणा भजे एक को जो


२२ मई २०१८ 
महात्मा गाँधी के प्रसिद्ध वचन हैं, ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, तीनों में सामंजस्य हो. मन और वाणी एक दूसरे के विपरीत न हों, हमारे वचन और कर्म भी एक दूसरे की गवाही बनें. किन्तु अक्सर ऐसा होता है कि भाव शुद्ध होते हुए भी वाणी कठोर हो जाती है, अथवा वाणी अत्यंत मधुर है, मानो शहद में डूबी हो, पर कर्म स्वार्थ से भरे होते हैं. जब तक ऐसा है, ख़ुशी टिकने वाली नहीं है. साधक को तो अति सजग रहना होगा, उसका आचरण परमार्थ के लिए हो, वाणी में कोई दोष न हो, और भाव पवित्र हों. परमात्मा के पथ का जो राही है, उसे यदि स्वयं के कुशल-क्षेम की चिंता स्वयं ही करनी है तो उसकी श्रद्धा सच्ची नहीं. उसे भी यदि सम्मान पाने की आकांक्षा है तो उसने परमात्मा को सर्वोत्तम माना ही नहीं. कबीर दास ने कहा है, जो शीश कटाने को तैयार हो वही इस पथ पर चल सकता है. स्वयं को बचाते हुए बल्कि और भी  सजाते हुए इस पथ पर नहीं चला जा सकता. निष्कामता और निस्वार्थता साधे बिना अनंत के द्वार तक नहीं पहुंचा जा सकता.    

Thursday, September 7, 2017

प्रेम गली अति सांकरी


साधना का पथ अत्यंत दुष्कर है और उतना ही सरल भी. जिनका हृदय सरल है, जहाँ प्रेम है, ऐसे हृदय के लिए साधना का पथ फूलों से भरा है, पर राग-द्वेष जहाँ हों, अभाव खटकता हो, उसके लिए साधना का पथ कठोर हो जाता है. कृपा का अनुभव भी उसे नहीं हो पाता, क्योंकि कृपा का बीज तो श्रद्धा की भूमि में ही पनपता है, अनुर्वरक भूमि में नहीं. जहाँ हृदय में ईश्वर प्राप्ति की प्यास ही नहीं जगी वहाँ उसके प्रेम रूपी जल की बरसात हो या नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता, जब मन में एक मात्र चाह उसी की हो तभी भीतर प्रकाश जगता है. उस चाह की पूर्ति के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता गौण है, वहाँ मन ही प्रमुख है, मन को ही प्रेम जल में नहला कर, भावनाओं के पुष्प अर्पित कर, श्रद्धा का दीपक जला, आस्था का तिलक लगा कर शांति का मौन जप करना होता है. यह आंतरिक पूजा हमें उसकी निकटता का अनुभव कराती है, साधक तब धीरे-धीरे आगे बढता हुआ एक दिन पूर्ण समर्पण कर पाता है.

Thursday, June 22, 2017

सहज मिले अविनाशी

२३ जून २०१७ 
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.

Wednesday, June 24, 2015

मन हो अपना सहज सुराजी

अप्रैल २०१० 
जहाँ राजा विवेकवान है, सचिव सत्यवान है, रानी श्रद्धा से भरी नारी है, सेनापति वैराग्ययुक्त है , वहीं सुराज होता है. हमारे मन का राज्य भी तभी सुराज होगा जब इस पर विवेक का शासन होगा, श्रद्धा हमारी प्रिया होगी, सत्य सलाहकार होगा और वैराग्य रक्षक होगा.   

Tuesday, April 28, 2015

दर्पण सा जब मन हो जाये

जनवरी २००९ 
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’ अदृश्य के प्रति विश्वास ही श्रद्धा है, जो हम जानते हैं वह बहुत थोड़ा है उससे जो हम नहीं जानते. उस अव्यक्त का हमारे जीवन पर असीम प्रभाव पड़ता है. श्रद्धा का अर्थ है पूर्ण समर्पण, जो कुछ भी हमारे साथ हो चुका है, हो रहा है, अथवा भविष्य में घटने वाला है, सभी को पूर्ण स्वीकार करते हुए साक्षी भाव में, समता में टिके रहने का नाम ही पूर्ण समर्पण है. असंतुष्ट व्यक्ति श्रद्धा नहीं रख सकता. वह परम विश्रांति को भी उपलब्ध नहीं हो सकता. जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं, साक्षी को प्राप्त हुए चित्त पर उनकी कोई छाप नहीं पडती ! वह दर्पण की भांति सभी कुछ अपने ऊपर से गुजर जाने देता है. वह कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं ठहरने देता, सदा वर्तमान में ही रहता है. वास्तव में वह होता ही नहीं, जैसे एक वृक्ष है, वह होकर भी नहीं है. वैसे ही हम भी प्रकृति के साथ एक होकर जी सकते हैं. निर्भार, निर्द्वंद्व और पूर्ण आनंद में. श्रद्धा हृदय की वस्तु है, तर्क मस्तिष्क की उपज है. तर्क तनाव से  भर देता है, श्रद्धा प्रेम से भर देती है, जीवन को ऊंचा उठाती है ! 

Monday, August 4, 2014

उठत बैठत वही उठाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने

जनवरी २००७ 
श्रद्धा, विश्वास, प्रेम और आस्था यदि जीवन में न हों तो जीवन अधूरा है बल्कि जीवन है ही नहीं, उसका भ्रम है. प्रेम तो इस जगत का कारण ही है, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु भी प्रेम से भरे हैं. ईश्वर जो कण-कण में व्याप्त है वह भी प्रेम से प्रकट हो जाता है. ऐसा प्रेम जीवन में तब आता है जब मन में करुणा का भाव जगे, जीवन में मंत्र मिले, जो व्यथा का नाश करता है दिव्य आभा जगाता है. ऐसा मंत्र ज्ञान भी हो सकता है और भक्ति भी. ज्ञान का अर्थ है नित्य-अनित्य, सत्य-असत्य का बोध और श्रेय-प्रेय का भेद, इनमें से एक का त्याग करना है एक को प्रेम. भक्ति का अर्थ है यह सारी सृष्टि जिसने बनायी है वह यदि हमारे प्रेम का पात्र है तो जगत भी उसी का बनाया होने के कारण हमारे प्रेम का पात्र हुआ. साधक का अंतर गुरु के बताये पथ पर सारे ही फूल समेटने में लगा रहता है, जिसमें ज्ञान भी है, योग-प्राणायाम भी, कीर्तन और सेवा भी. जो भी सहज प्राप्त कार्य सम्मुख आता है उसे करने के अलावा शेष समय उसी की याद में गुजरता है जो छिपा रहता है फिर भी नजर आता है.