जीवन में जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, कोई अभाव नहीं खटक रहा होता. शरीर स्वस्थ होता है और कोई आर्थिक समस्या भी नहीं होती तब मानव ईश्वर को याद नहीं करता. वह यदि नित्य की पूजा में बैठता भी है तो उसकी प्रार्थनाओं में गहराई नहीं होती. वह फूल भी अर्पित करता है और उसके मन्दिर में घन्टा भी बजा देता है पर उसके मन में कोई कोई आतुरता नहीं होती. दुःख में की गयी प्रार्थना हृदय की गहराई से निकलती है. दुःख व्यक्ति को अपने करीब ले आता है, वह ईश्वर से जुड़ना चाहता है. वह उसकी कृपा का भागी होना चाहता है; किंतु उसका संबंध क्योंकि आत्मीय नहीं बना है, उसे आश्वासन मिलता हुआ प्रतीत नहीं होता। सन्त कहते हैं, सुख या दुःख दोनों के पार है परम सत्य, उसे अपने जीवन का आधार मानते हुए हर पल उसके प्रति कृतज्ञता की भावना रखनी चाहिए. उसकी उपस्थिति से ही हमारे प्राण जीवित हैं, रक्त प्रवाहित हो रहा है. हमें वाणी मिली है. हमारा होना ही उससे है. जीवन में आने वाले सुख-दुःख हमारे स्वयं के कर्मों के परिणाम हैं. वह साक्षी मात्र है. जब हमारे जीवन का केंद्र उसके प्रति कृतज्ञता के निकट स्थित होगा तब मन के सजगता पूर्ण होने के कारण कर्म सहज होंगे और उनका परिणाम भी दुखदायी नहीं होगा. सुख-दुःख तब समान हो जाएंगे और जीवन एक खेल की भांति प्रतीत होगा.
Showing posts with label कृपा. Show all posts
Showing posts with label कृपा. Show all posts
Thursday, September 15, 2022
Monday, September 10, 2018
कबीर मन निर्मल भया
११ सितम्बर २०१८
जीवन में प्रतिपल प्रसाद बंट रहा है, प्रसाद का एक अर्थ है प्रसन्नता.
निर्मलता और कृपा भी इस उल्लास में शामिल हैं, यह प्रसाद बिना किसी पात्रता के
बंटता है, सब पर समान रूप से, बशर्ते कोई इसके लिए उत्सुक हो. जब जीवन में सत्य को
जानने की प्यास जगे, किसी जागे हुए संत के प्रति श्रद्धा का भाव जगे और स्वयं को
सदा सर्वदा आनंदित देखने की चाह जगे तो समझना चाहिए कि इसी प्रसाद की तलाश है.
सुबह से शाम तक हम कितने ही कार्य देह के लिए करते हैं, मन के रंजन के लिए भी हर
कोई कुछ न कुछ समय निकाल ही लेता है, पर उसके लिए जो इस देह और मन को चलाता है,
जिसके कारण ये दोनों हैं, जो देह के द्वारा जगत में कार्य करता है और मन के द्वारा
चिंतन-मनन करता है, उसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता. उसी को इस प्रसाद की आवश्यकता
है. नियमित योग साधना और ध्यान से हम उससे परिचित होने लगते हैं और एक दिन उस कृपा
को अनुभव भी करते हैं जो प्रतिपल बरस रही है.
Friday, January 19, 2018
स्वयं में होगा मिलन परम से
२० जनवरी २०१८
परमात्मा की कृपा को अनुभव करेगा कौन ? देह जड़ है, मन स्मृति और
कल्पना से पूर्ण है. बुद्धि सदा हानि-लाभ की उधेड़बुन में लगी रहती है. चित्त न
जाने कितने जन्मों के संस्कारों से भरा हुआ है. अहं चाहता है जैसे संसार मिला है वैसे
ही परमात्मा भी मिल जाये. उसे यह ज्ञात ही नहीं जिस शक्ति से वह बना है, जो उसके
भीतर ओत-प्रोत है, उसके शांत होते ही स्वयं को देख सकती है. संत कहते हैं, एक ही
तत्व से यह सारा जगत बना है. देह, मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार की गहराई में भी
वही छिपा है. उसे जानने के लिए कहीं दूर नहीं जाना है. ध्यानपूर्वक मन आदि को
ठहराना है, आत्मा स्वयं ही प्रकट हो जाएगी और परमात्मा का अनुभव उसे ही होगा. बाद
में देह, मन आदि पर उसका प्रभाव अवश्य ही देखा जा सकेगा.
Thursday, September 7, 2017
प्रेम गली अति सांकरी
साधना का पथ अत्यंत दुष्कर है
और उतना ही सरल भी. जिनका हृदय सरल है, जहाँ प्रेम है, ऐसे हृदय के लिए साधना का
पथ फूलों से भरा है, पर राग-द्वेष जहाँ हों, अभाव खटकता हो, उसके लिए साधना का पथ
कठोर हो जाता है. कृपा का अनुभव भी उसे नहीं हो पाता, क्योंकि कृपा का बीज तो
श्रद्धा की भूमि में ही पनपता है, अनुर्वरक भूमि में नहीं. जहाँ हृदय में ईश्वर
प्राप्ति की प्यास ही नहीं जगी वहाँ उसके प्रेम रूपी जल की बरसात हो या नहीं कोई
फर्क नहीं पड़ता, जब मन में एक मात्र चाह उसी की हो तभी भीतर प्रकाश जगता है. उस
चाह की पूर्ति के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता गौण है, वहाँ मन ही प्रमुख है, मन को
ही प्रेम जल में नहला कर, भावनाओं के पुष्प अर्पित कर, श्रद्धा का दीपक जला, आस्था का तिलक लगा
कर शांति का मौन जप करना होता है. यह आंतरिक पूजा हमें उसकी निकटता का अनुभव कराती
है, साधक तब धीरे-धीरे आगे बढता हुआ एक दिन पूर्ण समर्पण कर पाता है.
Monday, August 28, 2017
कली खिलेगी जिस पल मन की
२९ अगस्त २०१७
बसंत और बहार की ऋतु
में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है, इसका कारण है कि पेड़-पौधे व वृक्ष अपनी
मंजिल पर पहुँच जाते हैं, अर्थात खिल जाते हैं. हमारा मन भी जिस दिन अपनी मंजिल को
छू भर लेगा, उसका मौसम भी बदल जायेगा. अभी मन को तलाश है, वह कुछ पाना चाहता है,
तभी दिन-रात किसी न किसी उधेड़-बुन में लगा रहता है. मन की कली अभी बंद है, भीतर ही
भीतर सुगबुगा रही है, कोई स्पर्श उसे जगा सकता है. कोई पुकार उसे खिला सकती है.
कोई कृपा उसे मुक्त कर सकती है. यह सब हो सकता है यदि मन यह मान ले कि वह अभी खिला
नहीं है, कि अभी उसे बहार मिली नहीं है, और मन जिस राह पर अब तक चलता आया है उस
मार्ग पर तो वह खिल नहीं सकता. मन को खिलने के लिए कोई श्रम नहीं करना है, बस अपने
आप में ठहरना है, आखिर कली क्या करती है फूल बनने के लिए, बस स्वयं को धूप और हवा
के आश्रय में छोड़ देती है.
Wednesday, June 7, 2017
बन सुवास जब मन बिखरे
७ जून २०१७
बादल बरस रहे हैं
जैसे, कृपा बरसती प्रभु की वैसे
भीगा जैसे घर का
आँगन, भीगे वैसे अंतर उपवन !
परमात्मा की कृपा का
अनुभव साधक को हर घड़ी होता है, पर उस कृपा को सुवास बनाकर बाहर बिखेरना भी तो आना
चाहिए. जैसे धरती जल लेकर सुवास देती है, वैसे ही कृपा के जल से भीगा हुआ मन प्रेम
के गीत रचे. सुनहले शब्दों की चादर बुने, मोती से वचन कहे, जिसे हंस चुगें. धरा
देती है, गगन देता है, प्रकृति देती है और मानव भरे जाते हैं भीतर. पाना ही उनका
लक्ष्य है, पाकर वे उसे व्यर्थ कर देते हैं.
Monday, November 28, 2016
मिलकर भी जो मिले कभी न
परमात्मा उनकी नजरों से छुपा रहता है जो उसे ढूंढते ही नहीं, जो उसकी याद में अश्रु बहाते हैं उन्हें तो वह मिला ही हुआ है. रात-दिन वह उन्हें राह दिखाता है जिनके भीतर उसके प्रेम का दीपक जलता रहता है. जिन्होंने उस अनदेखे परमात्मा से रिश्ता बना लिया है, जिनके भीतर प्रीत की अग्नि निरंतर जलती रहती है. जो उसके दर पर आकर झुक जाते हैं उन्हें वह तत्क्षण मिल जाता है और जो तनकर खड़े रहते हैं उनके लिए वह बेगाना ही बना रहता है. यूँ तो सभी उसकी कृपा के अधिकारी हैं पर वह किसी पर अपना अधिकार नहीं जताता, पूर्ण स्वतन्त्रता देता है. आश्चर्य तो तब होता है जब जिन्हें वह मिल जाता है उन्हें भी न मिलने का भरम बना ही रहता है और एक मधुर सी तलाश सदा ही चलती रहती है.
Thursday, July 7, 2016
भक्ति करे कोई सूरमा
७ जुलाई २०१६
तेरी बज्म
तक तो आऊँ, जो यह आना रास आए
यह सुना है जो भी लौटे, वे उदास आए !
गुरु की दृष्टि, उसकी वाणी, उसका स्पर्श और उसका
चिन्तन भी साधक के भीतर जागृति ले आता है. तब एक भिन्न तरह की उदासी उसे घेर लेती
है, जो अब इस दुनिया में उसे चैन नहीं लेने देती. वह भी प्रेम के पंख लगाकर अनंत
गगन में उड़ान भरना चाहता है. भक्ति मार्ग सहज भी है और कठिन भी. ‘प्यार सभी का काम
नहीं, आंसू सबका आम नहीं’ ! सद्गुरु की उदारता ही परमात्मा की कृपा करवाती है,
साधक की पात्रता नहीं.
Thursday, June 11, 2015
एक वही तो दे सकता है
सितम्बर २००९
ऐसा संत
जिसे न कुछ
पाने को शेष रह गया हो न कुछ करना ही, वही अहैतुकी कृपा या सेवा कर सकता है. हम जो
कुछ करते हैं वह आनंद के लिए, जिसे वह मिल गया हो अब उसके लिए कुछ पाना बाकी नहीं
रहता ! प्रतिपल हमारा मन आनंद की खोज में लगा रहता है, ऐसा आनंद जो अनंत राशि का
हो तथा जो कभी छिने न, जिन्हें वह मिल गया, उन्हें कुछ करने को शेष रहता नहीं,
लेकिन फिर भी वे करते हैं, क्योंकि वे अन्यों को आनंद देना चाहते हैं. वे केवल
कृपा करते हैं, अकारण हितैषी होते हैं, सुहृद होते हैं !
Wednesday, January 28, 2015
मोह मिटे तो चैन मिले
जनवरी २००८
मोह के कारण दुनिया में
सारे दुःख हैं. मोह तभी टूटता है जब स्वयं का ज्ञान होता है. परमात्मा की कृपा से
ही यह सम्भव होता है, उसकी कृपा का कोई विकल्प नहीं. लेकिन कोई यदि इस बात का
भरोसा न करे तो उसे धीरे-धीरे ही समझाना होगा. अध्यात्म का मार्ग धैर्य का मार्ग
है. सभी के भीतर वही एक ही सत्ता है, सभी उस कृपा के पात्र हैं. कृपा के अधिकारी
होना भी कृपा है, अधिकारी बनने के लिए जो पुरुषार्थ करते हैं वह भी कृपा से ही
सम्भव है. हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं, यह भी मोह के ही कारण है. हमारा आचरण
देखकर यदि कोई बदलने का प्रयत्न करे तो ही हम किसी के जीवन में परिवर्तन ला सकने
में समर्थ हैं, अन्यथा नहीं. हमें जीवन में जिस किसी भी स्थिति का सामना करना पड़ता
है वह हमने स्वयं ही उत्पन्न की है, केवल हम ही उसके लिए जिम्मेदार हैं. ज्ञान को
हमने केवल ओढ़ा हुआ है यदि हर किसी को हम उसे ओढ़ाते चलेंगे. सभी के भीतर वह आत्मा है
तथा सही वक्त की प्रतीक्षा कर रही है. जागने का सही वक्त सभी के जीवन में आता ही
है, आयेगा ही, तब तक उसे हर दौर से गुजरना होगा. हमारी जागृति का पूरा लाभ हम
स्वयं उठा लें, सजग रहें, स्वस्थ रहें, भोजन के प्रति सावधान रहें, वाणी के दोषों
से बचें, स्वाध्याय करें, मनन करें, भीतर रहें, कृतज्ञता अनुभव करें, प्रशंसा
करें, स्वाध्याय करें, सकारात्मक सोचें, कहें, करें, ज्ञान में तभी हम दृढ़ रहेंगे.
Tuesday, September 16, 2014
जाग सके तो जाग
मार्च २००७
ईश्वर कृपा रूप है, उसकी कृपा हर पल, हर स्थान पर बरस रही है. हम
कृपा के सागर में ही रह रहे हैं पर हम इसे महसूस नहीं कर पाते. ज्ञान, कर्म और
उपासना के द्वारा हम इसे महसूस करने के योग्य बन सकते हैं. ज्ञान का अर्थ है स्वयं
के वास्तविक रूप का ज्ञान अर्थात आत्मा का ज्ञान, कर्म का अर्थ है निष्काम कर्म
अर्थात जो सहज रूप से होते हैं न कि किसी कामना वश, उपासना का अर्थ है भक्ति, जो
हमें ईश्वर के निकटतर लेती जाये. मात्र शाब्दिक ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जायेगा
वरण अनुभव करना होगा. अभी तो हम असजग हैं, स्वप्न में हैं, केवल रात्रि को ही
स्वप्न नहीं देखते, दिन में भी भीतर जो अंतर धारा चल रही है वह भी तो स्वप्न ही है. बीच में कभी क्षण भर के लिए स्वप्न टूटता
है. काश ! यह हमारे जीवन की रात्रि का अंतिम स्वप्न हो. सन्त हमें जगाने आते हैं,
वह जो स्वयं जगा है वही तो दूसरों को जगा सकता है.
Monday, May 19, 2014
एक लक्ष्य को सदा समर्पित
मार्च २००६
अपने
मन के अनुकूल कुछ घटे तो मानना चाहिए हरिकृपा हो रही है और यदि प्रतिकूल हो तो विशेष
कृपा मानकर सहर्ष ही उसे स्वीकार लेना चाहिए ! अनूकूलता हमें सुला सकती है, प्रतिकूलता
में हम सजग होते हैं. संतजन तभी तो कहते हैं यह संसार दुखों का घर है, ताकि हम
सुखों में खो न जाएँ. हो सकता है यह संसार कभी किसी के लिए सुखों का अम्बार लगा दे
पर तब भी यदि वह सजग नहीं रहे तो छोटी सी भूल भी उसमें से दुःख पैदा कर सकती है.
दैविक, भौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की व्याधियों में से कोई न कोई मानव के
साथ लगी ही रहती है, सजग होकर जब हम इनका सामना करते हैं तो ये हमें भीतर जाने का ज्ञान
देती हैं . सत्य को जानने की उत्कंठा, सब दुखों से मुक्त होने की इच्छा भीतर जगती
है. जब कोई लक्ष्य हमारे सम्मुख रहता है तो संसार की छोटी-छोटी बातें हमारा ध्यान
नहीं खींच पातीं, हम उनसे ऊपर उठ जाते हैं. तब अनुकूलता-प्रतिकूलता में कोई भेद ही
नहीं रहता.
Friday, April 4, 2014
एक बूंद तेरी कृपा की जो बरसे
दिसम्बर २००५
परमात्मा
की कृपा की एक झलक भी यदि मिल जाये तो भीतर एक उत्सव छाने लगता है. तब लगता है इस
जगत में जिस क्षण भी जो भी हो रहा है, वही होना था. वही ठीक है, ऐसा ही लगता है,
कोई शिकायत नहीं, जब कोई कामना ही नहीं तो शिकायत का प्रश्न ही पैदा नहीं होता.
भीतर एक रस की धारा प्रकट होती है जिसने सब कुछ ढक लिया है, वही अब प्रमुख है.
ईश्वर की अनुभूति की रस धार, वह निकट है, वही सुगंध बनकर समाया है, वही संगीत बनकर
समाया है, वही प्रकाश बनकर और वही तरंग रूप में भीतर समाया है, वही अमृत बनकर भीतर
रिस रहा है अनवरत...
Tuesday, February 25, 2014
श्रद्धा रूपी बेलि फूले जब
अगस्त २००५
साधना
के द्वारा पहले मन से हमें हृदय की ओर जाना है, भाव जगत में जाना है, अंततः भाव से
भी परे शून्य में जाना है. एक बार इस शून्यता का अनुभव हो जाने के बाद मन सदा ही
उससे जुड़ा रहता है. जगत में उतना ही व्यवहार करता है जितना आवश्यक हो. श्रद्धा तथा
विश्वास के सहारे–सहारे वह ऊपर चढ़ता है. यह विश्वास कि वह सदा हमारे साथ है, हमें
अनेक संकटों से उबार लेता है. शास्त्र हमें प्रेरणा देते है, संतजन प्रेम देते हैं
और हमारे मन में श्रद्धा जितनी दृढ होती है, कृपा का अनुभव उतना ही अधिक होता है.
Tuesday, February 18, 2014
एक हुआ जब मन वह प्रकटे
अगस्त २००५
ईश्वर
की कृपा तो हर काल में हर किसी पर अनवरत बरस रही है, उसका लाभ लेने वाले को ही
साधक कहते हैं. जब जीव स्वयं पर कृपा करता है तभी ईश्वर की कृपा फलीभूत होती है.
मन को ही अहंकार का दुर्ग समझना चाहिए जो उस कृपा का अनुभव नहीं होने देता. मन ही
वह दर्पण है जिसमें चेतना प्रतिबिम्बित होती है. मन यदि मलिन होगा तो चेतना भी
मलिन ही प्रकट होगी, मन यदि बंटा हुआ होगा तो चेतना भी टुकड़ों में दिखेगी. मन का
समाहित होना ही अपने-आप से जुड़ना है. मन को जब यह ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में
वह कुछ भी नहीं है, आत्मा की शक्ति ही उसके द्वारा प्रकट हो रही है, तो वह शांत होकर
बैठ जाता है, जैसे चन्दमा के पास अपना प्रकाश नहीं है, वह सूर्य के प्रकाश से ही
प्रकाशित होता है, वैसे ही मन भी आत्मा रूपी सूर्य पर आश्रित है और धरती रूपी शरीर
के चक्कर काट रहा है.
Friday, February 7, 2014
रामकथा सम अमृत नाहीं
जुलाई २००५
कितना
अद्भुत है वह परमात्मा जो हमारे भीतर छिपा है और प्रेम का ऐसा जाल बिछाता है कि
कोमल हृदय उसमें बंध जाता है. ईश्वर का प्रेम अमूल्य है, अनुपम है, अद्भुत है, उसी
के कारण तुलसी अमर काव्य की रचना करते हैं, सन्त कथावाचक बनते हैं और श्रोता
सुनते-सुनते भाव की गंगा में डूबते उतरते हैं. ईश्वर की कृपा से ही उसका प्रेम
मिलता है, सद्गुरु की कृपा से ही ईश्वर की कृपा मिलती है. राम ही आत्मा है, और लक्ष्मण विवेक, सीता प्रज्ञा है और हनुमान ज्ञान. हमारी आत्मा के चारों ओर अभी विवेक की जगह अविवेक है, प्रज्ञा की जगह अविद्या और ज्ञान की जगह अज्ञान, तभी राम भी दूर लगते हैं.
Sunday, November 10, 2013
अप्प दीपो भव
अप्रैल २००५
परमात्मा
की कृपा भरा हाथ सदा हमारे सिर पर है, वह जीवन के हर मोड़ पर हमें मार्ग दिखाने के लिए हमारे
साथ हैं. सत्संग से हमें इसका ज्ञान होने लगता है. सत्य का आश्रय मिल जाये तो जीवन
का पथ कितना सहज तथा सुरक्षित हो जाता है. हम अपने दीप स्वयं बन जाते हैं. हमारे
लिए इस जगत का महत्व तभी तक रहता है जब तक हमारी पहचान इस देह के माध्यम से बनी
है, स्थूल देह के साथ हमारा सम्बन्ध टूटते ही जगत का इस अर्थ में लोप हो जाता है कि
वह हमें प्रभावित नहीं करता. यह देह हमसे अलग है, हम इसे जानने वाले हैं, जहाँ
जानना तथा होना दो हों वहाँ द्वैत है, जब जानना तथा होना एक हो जाता है, वहाँ दो
नहीं होते एक ही सत्ता होती है, वही वास्तव में हम हैं. शरीर, मन, बुद्धि सब अपने-अपने
धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, पर आत्मा जिसकी सत्ता से ये सभी हैं. अपनी गरिमा
में रहता है. वह है, वह जानता है कि वह है, वह जानता है, वह आनन्द पूर्ण है. यह
जानना ही वास्तव में जानना है.
Saturday, August 10, 2013
क्षुद्र हटे समाधि घटे
“लोकोआनंदः समाधिसुखं” जगत का सारा सुख समाधि
के सुख का ही अंश है, जहाँ कहीं भी हमें सुख मिलता है, वह उसी समाधि के सुख की झलक
मात्र है, हमारा मन पल भर को भी जहाँ ठहर जाता है, अनंत का सुख बरसने लगता है,
समाधि सुख कहीं बाहर से लाना नहीं है, वह तो भीतर ही है, बस उसे जगने का अवसर देना
है. समाधि में बैठा व्यक्ति वातावरण को भी सुख से भर रहा होता है. वह जो स्वयं
तृप्त है वही दूसरों की प्यास बुझा सकता है. सद्गुरु की कृपा यदि किसी के जीवन में
घटित हो जाये तो एक क्रांति उसके जीवन में होनी निश्चित है. वह तब सीमाओं से परे
चले जाता है, वर्तमान को प्राप्त होता है, क्षुद्रता को त्याग देने से अनंत की
शक्तियाँ उसकी सहयोगी बन जाती हैं, वह परम में विहार करने लगता है.
Thursday, July 25, 2013
भीतर जाकर ही वह मिलता
पदार्थ से अपदार्थ की ओर तथा पर से परम की
ओर हमें जाना है . परम ही ब्रह्म है, वही शिव है. सबसे बड़ी बाधा भीतर की होती है,
हमारे पूर्वाग्रह, मान्यताएं, रुचियाँ तथा अपेक्षाएं, नकारात्मक भावनाएं और हमारा
स्वार्थ. हम कुछ भी नहीं हैं जिस क्षण यह भाव दृढ हो जाता है, कृपा का अनुभव तत्क्षण
होने लगता है. जब कुछ हैं ही नहीं तो कुछ चाहिए भी नहीं, कोई आग्रह भी नहीं. हम इस
विशाल सृष्टि के नियंता का अंश हैं, बूंद सागर से अलग तो नहीं, जब हम कुछ नहीं हैं
तो इसका अर्थ हुआ हम वही हैं, जब वही हैं तो सब कुछ हमारा पहले से ही है. केवल हम
ही नहीं सारे प्राणियों की यही सच्चाई है, तो हममें भेद कहाँ रहा, भेद गया तो सारे
द्वंद्व भी मिट गये और सारा का सारा विषाद छू मंतर हो गया. फिर एकमात्र जो शेष रहा
वह वही है, अनंत सुख का स्रोत, ज्ञान का स्रोत. दृश्य से हमें द्रष्टा में लौट आना
है, द्रष्टा को देखने वाले बनते ही सहजता का अनुभव होता है. हमारा जीवन जब सहज
होता है सारा जगत अपना घर लगता है, सारे प्राणी अपने लगते हैं, मन तब सारे
द्वन्द्वों से परे होता है. अपने भीतर जिसे जाना आ गया वह बाहर कहीं भी जा सकता
है, वह निर्भय हो जाता है.
Wednesday, July 3, 2013
गोपी मनहर सुंदर हरिओम
अक्तूबर २००४
गोपियों से हमें बहुत कुछ सीखना है, वे विशाल हृदय को रखने वाली
हैं, उनके विरह की अग्नि में भीतर के विकार जल सकते हैं. उल्लास से गहन शांति की
ओर उनकी प्रेम यात्रा बढ़ती ही जाती है. जब कोई प्रेम में होता है तो भीतर पूर्णता
का अहसास रहता है, तब कोई अभाव नहीं सताता. अभाव तभी खलते हैं जब हम भीतर खाली हो
जाते है प्रेम व ज्ञान से. जब लोभ, दम्भ, असत्य हमारी आँखों पर पर्दा डाल देते
हैं, और यह भी ईश्वर की कृपा ही है, हमें चेताने के लिए वे कोई न कोई व्यवस्था कर
देते हैं कि हम उसे पुकार उठते हैं, हमारे पास एकमात्र पूंजी है आत्मा की शक्ति,
उसे अनुभव करने के लिए मन को सुपात्र बनाना होगा.
Subscribe to:
Posts (Atom)