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Monday, March 17, 2025

आभारी हो मन यह प्रतिपल

जीवन में धन का अभाव हो या किसी भी और बात का, फिर भी उतनी हानि नहीं उठानी पड़ती जितनी हानि तब होती है जब मन में कृतज्ञता का अभाव हो। कृतघ्न व्यक्ति से ख़ुशी ऐसे ही दूर भागती है जैसे सिपाही को देखकर चोर। मानव रूप में जन्म मिला है, तो ईश्वर के प्रति इतनी कृतज्ञता हमारे मन में होनी चाहिए मानो कोई अनमोल ख़ज़ाना मिल गया हो। न जाने कितनी योनियों से गुजर कर हम आये हैं, चट्टान से वनस्पति, कीट, पक्षी, पशु होते हुए मानव का मस्तिष्क मिला है। इसके बाद माता-पिता के प्रति कृतज्ञता का पौधा मन में उगाना चाहिए जो कभी न सूखे, इसके लिए उसमें सदा ही स्नेह व आदर  का जल डालते रहना होगा। यदि जीवन में उत्साह और उमंग का आगमन निर्विरोध चाहिए तो अपने परिवार के प्रति, पति-पत्नी और बच्चों के प्रति कृतज्ञता जताने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहिये। अपने शिक्षकों, गुरुजनों, लेखकों, और शासकों के प्रति भी हमें कृतज्ञ होना है। किसानों और व्यापारियों के लिए और समाज के हर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना है, जिसने हमारे जीवन को सरल और सुंदर बनाने में कोई न कोई योगदान दिया है। 


Saturday, April 22, 2023

कृतज्ञता का भाव जगे जब

भोर से रात तक  धन्यवाद देने, कृतज्ञ होने के अनेक अवसर हमें प्राप्त होते हैं। उठते ही सबसे पहले एक और नये दिन में आँखें खोलने का अवसर देने के लिए अस्तित्त्व का आभार ! परिवार साथ है,  सिर पर छत है, देश में शांति है, इसके लिए भी ईश्वर का आभार !  आहार के लिए किसानों व दुकानदारों का, आजीविका  देने के लिए  सरकार या उद्योग पतियों का कृतज्ञ होना भी ज़रूरी है। वर्तमान काल में सोशल मीडिया का, जिस पर अपनी बात रखी जा सकती है, औरों की सुनी जा सकती है। न्याय पालिका,  शासन व्यवस्था, सेना, लेखकों, पत्रकारों आदि उन सभी का धन्यवाद किया जा सकता है, जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।  रिश्तेदारों, मित्रों, जान-पहचान के लोगों और बच्चों के प्रति जब मन में कृतज्ञता का भाव बना रहे तो मन फूल सा हल्का रहता है। जहां धन्यवाद नहीं वहाँ शिकायत घेर लेती है । नकारात्मक भाव आते ही मन एक चक्र में फँस जाता है। तब यह भी याद नहीं रहता कि शिकायत किसके प्रति है। कृतज्ञता का भाव मन की गहराई से आता है, जो अनंत से जुड़ी है। शिकायत मन की ऊपरी सतह से आती है, जो हमें अस्त-व्यस्त कर देती है। 


Thursday, September 15, 2022

दुःख में सुमिरन सब करें

जीवन में जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, कोई अभाव नहीं खटक रहा होता. शरीर स्वस्थ होता है और कोई आर्थिक समस्या भी नहीं होती तब मानव ईश्वर को याद नहीं करता. वह यदि नित्य की पूजा में बैठता भी है तो उसकी प्रार्थनाओं में गहराई नहीं होती. वह फूल भी अर्पित करता है और उसके मन्दिर में घन्टा भी बजा देता है पर उसके मन में कोई कोई आतुरता नहीं होती. दुःख में की गयी प्रार्थना हृदय की गहराई से निकलती है. दुःख व्यक्ति को अपने करीब ले आता है, वह ईश्वर से जुड़ना चाहता है. वह उसकी कृपा का भागी होना चाहता है; किंतु उसका संबंध क्योंकि आत्मीय नहीं बना है, उसे आश्वासन मिलता हुआ प्रतीत नहीं होता। सन्त कहते हैं, सुख या दुःख दोनों के पार है परम सत्य, उसे अपने जीवन का आधार मानते हुए हर पल उसके प्रति कृतज्ञता की भावना रखनी चाहिए. उसकी उपस्थिति से ही हमारे प्राण जीवित हैं, रक्त प्रवाहित हो रहा है. हमें वाणी मिली है. हमारा होना ही उससे है. जीवन में आने वाले सुख-दुःख हमारे स्वयं के कर्मों के परिणाम हैं. वह साक्षी मात्र है. जब हमारे जीवन का केंद्र उसके प्रति कृतज्ञता के निकट स्थित होगा तब मन के सजगता पूर्ण होने के कारण कर्म सहज होंगे और उनका परिणाम भी दुखदायी नहीं होगा. सुख-दुःख तब समान हो जाएंगे और जीवन एक खेल की भांति प्रतीत होगा. 


Wednesday, April 27, 2022

कण-कण में जो देखे उसको

हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना। 

Sunday, July 5, 2020

गुरुर्ब्रह्मा: गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः


गुरु पूर्णिमा प्रत्येक साधक के लिए एक विशेष दिन है. अतीत में जितने भी गुरू हुए, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन ! माता शिशु की पहली गुरू होती है. जीविका अर्जन हेतु शिक्षा प्राप्त करने तक शिक्षक गण उसके गुरु होते हैं, लेकिन जगत में किस प्रकार दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है, जीवन को उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, इन प्रश्नों का हल गुरुजन ही दे सकते हैं. इस निरंतर बदलते हुए संसार में किसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने भीतर स्थिरता का अनुभव कर सकता है ? जगत का आधार क्या है ? इस जगत में मानव की भूमिका क्या है ? उसे शोक और मोह से कैसे बचना है ? इन सब सवालों का जवाब भी गुरू का सत्संग ही देता है. जिनके जीवन में गुरू का ज्ञान फलीभूत हुआ है वे जिस संतोष और सुख का अनुभव सहज ही करते हैं वैसा संतोष जगत की किसी परिस्थिति या वस्तु से प्राप्त नहीं किया जा सकता. गुरू के प्रति श्रद्धा ही वह पात्रता प्रदान करती है कि साधक उनके ज्ञान के अधिकारी बनें.

Thursday, April 9, 2020

सदा रहेगा यदि कृतज्ञ मन


जीवन में कृतज्ञता का भाव जगे, इससे बढ़कर कुछ भी नहीं, दुःख से बचने का यह एक सरलतम उपाय है. जिन माता-पिता ने हमें जन्म दिया उनके प्रति तथा अपने पूर्वजों के प्रति जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव रहता है वह उनके आशीष बिन मांगे ही पाता है. हमारे भीतर उनका अंश है, हमारी जड़ें उनमें ही हैं, जितना -जितना हम भावनात्मक रूप से उनसे जुड़े रहेंगे उतना -उतना हम दूरदर्शी भी होंगे. इसके बाद अपने शिक्षकों व गुरुजनों के प्रति हृदय से आभारी होना है. जीवन के पथ पर चलने के लिए पग-पग पर हमें किसी न किसी की सहायता चाहिए, जिससे भी जितना भी सीखा है, उस हर आत्मा के प्रति कृतज्ञ होना है. कभी मित्रों ने हमने राह दिखाई, कभी पुस्तकों ने, कभी किसी घटना ने अथवा  किसी अनजान व्यक्ति ने ही अपने कृत्य या शब्दों से कुछ सिखाया, कभी-कभी उन सभी का आदर पूर्वक स्मरण करके आभार व्यक्त करना है. प्रकृति से भी हम कितना कुछ पाते हैं, सीखते हैं. इस जगत में सुबह से शाम तक हम अपने जीवन के लिए जिन-जिन पर आश्रित रहते हैं उन सभी के हम ऋणी हैं. जो व्यापारी हमें पदार्थ उपलब्ध कराते हैं तथा जो कृषक वे अन्न व वस्त्र उपजाते हैं, दोनों ही धन्यवाद के पात्र हैं. जो सफाई कर्मचारी सड़कें तथा हमारे घर साफ करते हैं, जो चिकित्सक हमारा इलाज करते हैं, जो सैनिक व सिपाही हमारी रक्षा करते हैं, जो अधिकारी व राजनीतिज्ञ देश की नीतियों का निर्धारण करते हैं, जो हमें  जीवनयापन के लिए नौकरी देते हैं, वे सभी हमारी कृतज्ञता के अधिकारी हैं. अपनी प्रार्थना में हर रोज उनमें से कुछ को शामिल करके हम अपने जीवन को सहज ही दुःख से मुक्त कर सकते हैं. 

Sunday, July 28, 2019

गुरू की महिमा कौन बखाने


शब्द अधूरे हैं, अल्प सामर्थ्य है शब्दों में. भाव गहरे हैं, अनंत ऊर्जा है भावों में, किंतु गुरू के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी हो तो भाव भी कम पड़ जाते हैं. वहाँ तो मौन ही शेष रहता है. जब उसके हृदय से साधक का हृदय जुड़ जाता है तो मौन में ही संवाद घटता है. गुरू के शब्द और कर्म प्रेम से ही उपजे हैं. वह नित जागृत है, करुणा, प्रेम और जीवन के प्रति उत्साह के भाव उसके हृदय में लबालब भरे हैं. उसका ज्ञान एक पवित्र जल धारा की तरह साधकों के मनों को तरोताजा कर देता है. उसके हृदय का वृक्ष शांति, सुख और आनंद के फलों से लदा है, जो वह बेशर्त प्रदान करता है. उसकी आँखों में प्रेम की मस्ती है, आत्मा में बेशकीमती खजाना है, जो वह लुटा रहा है. वह साधकों के अंतर में साधना का बीज बोता है, जो भी व्यर्थ है उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित करता है, जो भी अच्छा है, उसे बाड़ लगाकर सहेजने के लिए कहता है. उसके भीतर से जो स्वर्गिक संगीत निकलता है, उसे सुनकर साधक जीवन के सुन्दरतम रूप को देखते हैं. उसकी आत्मा के प्रकाश में भीग कर उनमें भी भीतर जाने की ललक जगती है, पावों में पंख लग जाते हैं, मन जीवन के प्रति तीव्र चाह से भर उठता है.

Monday, July 15, 2019

अंतर्मन के द्वार खोल दें



इस वक्त जो कुछ भी हमारे पास है, वह जरूरत से ज्यादा है, यदि यह ख्याल मन में आता है तो भीतर संतोष जगता है. क्या यह सही नहीं है कि कभी जिन बातों की हमने कामना की थी, उनमें से ज्यादातर पूरी हो गयी हैं. मन में कृतज्ञता की भावना लाते ही जैसे कुछ पिघलने लगता है और सारा भारीपन यदि कोई रहा हो तो गल जाता है. जब हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाते हैं तो जल धाराओं को बहाता हुआ विशाल आसमान जैसे यह संदेश देता नजर आता है कि भीतर कुछ भी बचाकर न रखें, सब यहीं से मिला है और सब यहीं छोड़कर जाना है, तो क्यों न सहज ही अंतर का वह द्वार खोल दें जिसके पीछे परम का अथाह खजाना छिपा है. हरीतिमा युक्त धरती भी अपने भीतर से जैसे सब कुछ उलीच देना चाहती है. जीवन प्रतिपल दे रहा है और हमें उसे अपने द्वारा बहने का मार्ग देना है.

Friday, April 20, 2018

भीतर जगे प्रार्थना ऐसी


२० अप्रैल २०१८ 
कृतज्ञता और धन्यवाद के ताने-बने से बुनी प्रार्थना अंतर को शीतलता प्रदान करती है. संत कहते हैं, मानव जन्म दुर्लभ है, उस पर भी देव भूमि भारत में जन्म लेना दुर्लभ है. शास्त्र व संतों के प्रति श्रद्धा भाव जगना और भी दुर्लभ है. जिसके जीवन में ये तीनों घट रहे हों वह धन्यवाद के भाव से न भरे तो क्या करेगा. जिस दुनिया में ऐसे मत भी हों जो अपने सिवाय किसी को कुछ न समझते हों, भारत पूरे विश्व में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का परचम लहरा रहा है. वेदों का अनुपम ज्ञान जिसकी थाती हो, प्रकृति के हर रूप को जहाँ पूज्य माना जाता हो, लोक कथाओं के माध्यम से उच्च से उच्च विचार भी जहाँ जन-जन में फैलाया जा सका हो, ऋषियों की उस प्रयोगधर्मा भूमि में जन्म लेने वाला हर मानव का हृदय कृतज्ञता के भाव से भर ही जाना चाहिए.

Thursday, August 31, 2017

जब स्वयं ही आधार बनेगा

३१ अगस्त २०१७ 
जीवन आज कितना कठिन होता जा रहा है. कहीं अत्यधिक वर्षा, कहीं तूफान, कहीं सूखा..प्रकृति के बदलते हुए रूप भी आज भयभीत कर रहे हैं. समाज में मूल्यों का इतना अधिक ह्रास हो गया है कि मंदिरों और आश्रमों में भी श्रद्धा और आस्था के नाम पर शोषण किया जा रहा है. ऐसे ही समय में जब बाहर कुछ भी भरोसे करने लायक न बचा हो, भीतर जाकर ही उस आधार को तलाशना होगा जो कभी नहीं बदलता. जो भीतर जाकर देख लेता है कि जिसका अपने मन पर ही कोई वश नहीं है, जिसे यही नहीं पता कि अगले पल मन में क्या विचार आने वाला है तो वह बाहर पर नियन्त्रण कैसे कर सकता है. वह नियन्त्रण करने की अपनी प्रवृत्ति का ही त्याग कर देता है. वह कुछ प्राप्त कर लेने की दौड़ से ही बाहर हो जाता है. वह समझ लेता है कि सुख को पाया नहीं जा सकता पर उसके प्रति समर्पित हुआ जा सकता है. अंतर में कृतज्ञता उपजती है. जीवन तब एक उपहार लगता है संघर्ष नहीं लगता. 


Tuesday, June 27, 2017

भीतर एक विराट छिपा है

२७ जून २०१७ 
हमारा छोटा मन कभी भी संतुष्ट नहीं होता, उसे जितना मिले उस पर वह अपना अधिकार ही मानता है. कृतज्ञता की भावना उसमें नहीं होती. उसे प्रेम भी मिलता है तो वह उसे अपनी योग्यता मानता है अथवा तो उसके प्रति उदासीनता दिखाता है. जीवन में जितने भी दुःख अथवा कष्टों का अनुभव हमें होता है वह इसी छोटे मन के कारण. हमारे ही भीतर एक विराट मन भी है, जहाँ कोई अपूर्णता नहीं, जो सदा तृप्त है, जो सृष्टि की हर वस्तु के प्रति हर क्षण कृतज्ञ है. जिसे देह, मन, बुद्धि आदि भी ईश्वर का एक उपहार लगता है, जिसके माध्यम से वह जगत को देख, सुन सकता है. साधना के द्वारा हम छोटे मन से ऊपर उठकर विराट से जुड़ते हैं. हम देने के भाव से भर जाते हैं. उत्साह, सृजनात्मक शक्ति, उदारता, प्रेम, कृतज्ञता, अभय, सजगता और आनंद हमारे स्वभाव में झलकने लगते हैं.

Tuesday, May 16, 2017

श्वास श्वास है नेमत उसकी

१६ मई २०१७ 
वेदों में ऋषियों ने कितनी सुंदर प्रार्थनाएं गायी हैं. मन जब प्रार्थना से भर जाता है तो शुद्ध होने लगता है. सबके सुख की कामना, सम्पन्नता की कामना जब भीतर सहज ही उठने लगती है तो हृदय मधुरता का अनुभव करता है. जीवन के उपहार को पाकर जो मन अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता के भाव से नहीं भरा वह परमात्मा के आनन्द से वंचित ही रह जाता है. जीवन में प्रेम को अनुभव करने के कोमल पल भी साधक के लिए उसे ही याद करने का निमित्त बन जाते हैं. प्रकृति के सुहाने मंजर हों या किसी के कंठ की मधुर आवाज, वर्षा की सोंधी सुगंध हो या उषा का आकाश, हर शै उसे याद दिलाने का सबब बन जाती है. धन्यता और कृतज्ञता का भाव जिसके हृदय में जग जाता है वह अंतर पल-पल प्रार्थना में लीन रहता है. 

Tuesday, July 15, 2014

अहोभाव जब छा जाता है

सितम्बर २००६ 
साधक के जीवन में सद्भाव का प्रमाण है निर्भयता, वीरभाव का प्रमाण है धैर्य, समभाव का प्रमाण है निश्चिंतता, करुणा भाव का प्रमाण है अहिंसक होना, त्यागभाव का प्रमाण है वैराग्य, इससे अनावश्यक अपने आप छूट जाता है, लुट जाना, लुटाते रहना ही तब स्वभाव बन जाता है. प्रेम भाव में कामनाओं का नाश होता है. अहोभाव आने पर केवल आनन्द ही शेष रहता है. अहोभाव में आने के लिए आवश्यक है कि हम क्षण-प्रतिक्षण कृतज्ञता का अनुभव करें. हमें जीवन का इतना सुंदर उपहार मिला है, अस्तित्त्व ने इस पल हमें चुना है, वह हमारे माध्यम से प्रकट हो रहा है. हम हैं, क्योंकि वह है, उसकी कृपा की छाया में हम पलते आये हैं, इस बात का अनुभव होने पर ही अहोभाव घटता है.  

Wednesday, June 18, 2014

भक्ति का जब दीप जलेगा

जुलाई २००६
ब्रह्म साकार भी है निराकार भी, वह परमात्मा के रूप में हमारे हृदयों में रहता है. हमारे मन का आधार भी वही है. मन जब कृष्ण समाहित होता है तो वह भीतर-बाहर उसे ही देखता है. मन के पार दोनों एक ही हैं. पर साधक यहीं आकर ठहर नहीं जाता, इसके बाद भक्ति के फूल खिलाता है. भक्ति के बाद ही जीवन में रस मिलता है, आनन्द प्रकट होता है, उल्लास प्रकटता है. उसकी व्यापकता का, भव्यता का ज्ञान होने के बाद ही भीतर कृतज्ञता का भाव उमड़ता है. धन्यभागी होने का भाव जगता है और तब जीवन में पूर्णता आती है. इस अनंत ब्रह्मांड को जो संकल्प रूप से रचते हैं वह परमात्मा हमारे आराध्य हैं यह भाव जगते ही मन प्रेम से झुक जाता है.                                                                                                       

Monday, December 24, 2012

घूँघट के पट खोल रे



संतजन कहते हैं कि हमने मन को कई परतों में लपेट रखा है, जैसे बिजली की तार पर पहले प्लास्टिक की परत, फिर कपड़े की परत लगी होने पर, छूने पर भी कुछ महसूस नहीं होता, इसी तरह हमारे मन पर भीं जाने कितनी परतें चढ़ी हैं, तभी तो ईश्वर का नाम लेते रहने पर भी कुछ नहीं होता. उसके प्रति कृतज्ञता के भाव अंतर में नहीं उपजते न ही उसकी अनंत कृपाओं का स्मरण होता है. प्रमाद और व्यर्थ की कामनाओं की परत उसे हमसे दूर ही रखती है. अतीत का विषाद और भविष्य के स्वप्न हमें ऊपर उठने से रोकते हैं, जैसे कोई पैर बड़ा होने पर भी छोटे आकार के जूते पहने ही रहे तो पैर छोटे ही रह जायेंगे. हम जैसे उसे दूर-दूर से ही याद करते हैं, उसके निकट आने से डरते हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए हमें अपने को खोलना होगा. हम उसी से शांति चाहते हैं और अशांति का साधन जुटाए रहते हैं. यह संसार जो प्रतिपल बदल रहा है, हमें स्थिर होने ही नहीं देता, दे ही नहीं सकता, स्थिरता परम का धर्म है, उससे जुड़ते ही एक आधार मिल जाता है, सहजता, सरलता और सरसता तब अनायास ही प्राप्त हो जाती है.

Thursday, May 31, 2012

अद्भुत खेल रचाया किसने


अप्रैल २००३  

विस्मय अथवा कृतज्ञता ही हमें ध्यान में ले जाते हैं. हमारी मुस्कान को स्थिर रखते हैं. तब ही एक मुक्ति का आभास हमें होता है जब भीतर एक स्थिरता छा जाती है. इस मुक्ति से ही भीतर प्रेम का भी जागरण होता है. प्रेम से मन शक्तिशाली अनुभव करता है, शक्ति से ही समाधान मिलता है यानि द्वंद्व से पार हुआ जा सकता है. तो प्रथम हुई कृतज्ञता की भावना और उस सृष्टि कर्ता की लीला को देखकर विस्मित होना. द्वंद्व से पार हुआ मन ही स्वयं के पार जाकर उसकी गहराई में जाना चाहता है, जहाँ उसे आनंद का अनुभव होता है. एक ऐसा भाव हमारे भीतर उतरता है कि देह का कण-कण एक धागे में पिरोया हुआ है, वह धागा प्राण ऊर्जा ही है. ध्यान का ही परिणाम है कि हम अपने भीतर स्थित देव तत्व से जुड़ जाते हैं. जीवन में जो पात्र निभाना है वह आनंद पूर्वक निभाते हैं फिर लौट आते हैं अपने आप में, वैसे के वैसे, कबीर ने ऐसे ही भाव में आकर लिखा होगा “ज्यों की त्यों रख दीनी चदरिया” !

Friday, March 16, 2012

हर जगह बस वही तो है


जनवरी २००३ 
भक्त परमात्मा की उपस्थिति को अपने भीतर-बाहर हर जगह महसूस करता है. जब हम भीतर बाहर एक से होते हैं तभी उसे अनुभव कर पाते हैं. जब हम तृष्णा से बंधे नहीं होते, सब कुछ हो रहा है, ऐसा जानते हैं, तभी उसको जान सकते हैं. उसको जानने के लिये उसके जैसा तो होना ही पड़ेगा. परमात्मा ही गुरु बनकर हमें ज्ञान देता है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव बने, सबमें उसे देखना आ जाये तो अहंकार व आसक्ति से हम बच जाते हैं. मन के संशय भी मिट जाते हैं. जन्म-मरण की पटरियां ही तो हमने पार करनी हैं फिर मन में इतना ताना-बाना बुनने की क्या आवश्यकता है, एक उसी का आश्रय पर्याप्त है. नाव पानी में रहे तब तो ठीक है पानी नाव में आ जाये तो वह डूब जाती है. 

Sunday, February 5, 2012

अनुभव की महिमा


नवम्बर २००२ 
ईश्वर है यह मानना ही तो पर्याप्त नहीं, हमें उसका अनुभव करना है, पहले हमें स्वयं को जानना होगा तभी हम परमात्मा को जान सकते हैं. ‘मैं कौन हूँ’ की यात्रा ही हमें ईश्वर तक ले जाती है. वैराग्य और विवेक का उदय भी तभी होता है. जब हम अपने सच्चे स्वरूप को जान लेते हैं तभी हृदय में कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है. और यही कृतज्ञता प्रेम में बदल जाती है. भक्ति ज्ञान के बिना नहीं टिक सकती और ज्ञान भक्ति के बिना अधूरा है. पूर्ण समर्पण तभी संभव है जब हृदय में पूर्ण ज्ञान हो. तब ईश्वर से प्रेम सहज हो जाता है, क्योंकि एक वही है जो प्रेम करने के योग्य है उसकी बनायी सृष्टि भी पूर्ण है, आनन्दमय है, उसकी लीला स्थली है. तब सहज ही सभी के प्रति प्रेम रहेगा, कोई उपेक्षा या अपेक्षा नहीं रहेगी. जीवन एक उपहार बन कर हर दिन सम्मुख आयेगा. सुख को पुकार पुकार हमें उसकी गुहार नहीं लगानी होगी. वह हमारा स्वभाव बन जायेगा, अखंड आनंद ! जो पीड़ा को भी खेल बना देगा. ईश्वर का सामीप्य हममें कितनी शक्ति भर देता है. उसके नाम का स्मरण ही हृदय में असीम शांति की लहर उठा देता है. वह सभी आत्माओं का आत्मा है.