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Tuesday, July 15, 2014

अहोभाव जब छा जाता है

सितम्बर २००६ 
साधक के जीवन में सद्भाव का प्रमाण है निर्भयता, वीरभाव का प्रमाण है धैर्य, समभाव का प्रमाण है निश्चिंतता, करुणा भाव का प्रमाण है अहिंसक होना, त्यागभाव का प्रमाण है वैराग्य, इससे अनावश्यक अपने आप छूट जाता है, लुट जाना, लुटाते रहना ही तब स्वभाव बन जाता है. प्रेम भाव में कामनाओं का नाश होता है. अहोभाव आने पर केवल आनन्द ही शेष रहता है. अहोभाव में आने के लिए आवश्यक है कि हम क्षण-प्रतिक्षण कृतज्ञता का अनुभव करें. हमें जीवन का इतना सुंदर उपहार मिला है, अस्तित्त्व ने इस पल हमें चुना है, वह हमारे माध्यम से प्रकट हो रहा है. हम हैं, क्योंकि वह है, उसकी कृपा की छाया में हम पलते आये हैं, इस बात का अनुभव होने पर ही अहोभाव घटता है.