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Tuesday, July 15, 2014

अहोभाव जब छा जाता है

सितम्बर २००६ 
साधक के जीवन में सद्भाव का प्रमाण है निर्भयता, वीरभाव का प्रमाण है धैर्य, समभाव का प्रमाण है निश्चिंतता, करुणा भाव का प्रमाण है अहिंसक होना, त्यागभाव का प्रमाण है वैराग्य, इससे अनावश्यक अपने आप छूट जाता है, लुट जाना, लुटाते रहना ही तब स्वभाव बन जाता है. प्रेम भाव में कामनाओं का नाश होता है. अहोभाव आने पर केवल आनन्द ही शेष रहता है. अहोभाव में आने के लिए आवश्यक है कि हम क्षण-प्रतिक्षण कृतज्ञता का अनुभव करें. हमें जीवन का इतना सुंदर उपहार मिला है, अस्तित्त्व ने इस पल हमें चुना है, वह हमारे माध्यम से प्रकट हो रहा है. हम हैं, क्योंकि वह है, उसकी कृपा की छाया में हम पलते आये हैं, इस बात का अनुभव होने पर ही अहोभाव घटता है.  

Friday, February 14, 2014

भीतर भरा उजाला जगमग

अगस्त २००५ 
हमारे ही भीतर इतनी सामर्थ्य भरी है कि सितारे यदि गर्दिश में भी हुए तो कुछ न बिगाड़ सकें. हम व्यर्थ ही अपनी शक्ति को कम आंकते हैं अथवा तो व्यर्थ गंवाते हैं. मानव जीवन दुर्लभ है, हम संतों की वाणी में यह पढ़ते हैं. उन्होंने अपने जीवन में भीतर की शक्तियों को उजागर किया और आनंद पाया व लुटाया. संतों, सदगुरुओं का जीवन चरित्र पढ़ें तो पता चलता है उनकी हर श्वास एक आनन्द की धारा से भीतर को स्वच्छ करती है. उनका मन अहोभाव से ओत-प्रोत रहता है. ईश्वर का प्रेम उनके शरीर के हर कण में स्पन्दित होता है. उनका मन ऐसी अलौकिक  शांति से भर जाता है जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. हम भी यह सब प्राप्त कर सकते हैं, बस आत्मशक्ति को जगाने भर की देर है.