जीवन विरोधाभासी है.
यहाँ रात है तो दिन भी है, सुख के साथ दुःख भी है, इसी तरह प्रेम है तो घृणा भी
है. पक्ष है तो विपक्ष भी है. हम सुख का वरण करना चाहते हैं, और दुःख से बचना
चाहते हैं, लेकिन जीवन का यह नियम है कि एक के साथ दूसरा स्वतः ही मिलता है. यदि
दुःख से बचना है तो सुख का भी त्याग करना होगा, घृणा से बचना है तो प्रेम का भी
मोह छोड़ना होगा. जगत को साक्षी भाव से देखकर स्वयं को द्वन्द्वों से ऊपर उठाना ही
साधना है. रात और दिन दोनों से ऊपर संध्या काल है, जिसका बहुत महत्व शास्त्रों में
गाया गया है. सुख-दुःख दोनों से ऊपर आनंद है, जो आत्मा का स्वभाव है. प्रेम व घृणा
दोनों से ऊपर करुणा है, जिसकी आज जगत को बहुत आवश्यकता है. इसी तरह हर द्वंद्व के
पार जाकर ही समाधान मिल सकता है.
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Sunday, April 14, 2019
Friday, February 27, 2015
हो निर्भार परम तक पहुंचें
जनवरी २००८
इन्द्रियगत ज्ञान
सीमित है वह हमें विस्मय से नहीं भरता, स्वरूपगत ज्ञान अनंत है, वह विस्मय से भर
देता है. आनंद की झलक दिखाता है. अज्ञान को स्वीकारने से ऐसा ज्ञान मिलता है. इस
विशाल सृष्टि में हम कितने नगण्य हैं, कितना कम जानते हैं, बहुत कुछ है जो जान
नहीं सकते यह अहसास हमें झूठे अभिमान से मुक्त कर देता है, हम हल्के हो जाते हैं.
उतने ही हम सत्य के निकटतर होते जाते हैं. जानने का बोझ उठाये हम थकते ही हैं, उस
जानने से न हमारा कोई लाभ होता है न किसी अन्य का, क्योंकि सभी को यह भ्रम है कि
वही जानता है. ज्ञेय सदा ज्ञान से छोटा है, हम ज्ञेय में ही उलझे रहते हैं. दृश्य
से हटकर दृष्टा में आना ही योग का प्रथम चरण है. विस्मय से परे वह तत्व है जहाँ
स्तब्धता है, मौन है, आनंद है और वैराग्य है. तृष्णा का वहाँ कोई स्थान नहीं. परम शांति
है, प्रेम है !
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मन. दृश्य,
शांति
Friday, July 4, 2014
होना हमको हम जैसा ही
सितम्बर २००६
हम अपने शुद्ध स्वरूप में
टिके रहें अर्थात सहज, सरल, प्रेम पूर्ण स्वभाव में, शांति और आनन्द में तो सहज ही
हमसे भले कार्य होते हैं. यदि हम कुछ करने जाते हैं तो बात बिगड़ जाती है. हमें कुछ
बनना नहीं है, होना है, जो हम हैं वही होना है. कुछ विशेष नहीं होना है. हमारे लिए
कुछ करने जैसा है ही नहीं, न कुछ जानने जैसा है, न पाने जैसा है. जिसको जानकर,
पाकर संतजन कृत कृत्य हो गये वह आत्मा तो हमें पहले से ही प्राप्त है. उसका अनुभव
तो हमें हर पल होता है, हमें उसी में रहना है. यही अध्यात्म है.
Monday, May 12, 2014
मिल कर भी जो कभी न मिलता
संतजन
कहते हैं, शिव तत्व सृष्टि के कण-कण में है, वह हमारे भीतर भी है, उसे जगाना ही
वास्तविक पूजा है. जब मन में कामनाओं, वासनाओं तथा महत्वाकांक्षाओं का जाल न फैला
हो, मन खाली हो तब वह शिव तत्व जो पहले से ही वहाँ है, प्रकट हो जाता है. हमारी
शुद्ध चेतना उसी से बनी है. वह प्रेम है, सौन्दर्य है, कल्याणकारी है, अखंड है,
निर्दोष है, शाश्वत है, निर्द्वन्द्व है, ज्ञान स्वरूप है. उस शिव तत्व को एक बार
जान लेने के बाद उसका विस्मरण नहीं होता, उसके रहस्य धीरे-धीरे करके खुलते हैं लेकिन
कभी पूरे नहीं होते. वह जान कर भी जाना नहीं जाता, वह अनुभव की वस्तु नहीं, शब्दों
में नहीं आता, पर एक बार जिसे उसकी झलक भी मिल गयी वह स्वयं को तृप्त अनुभव करता
है. पर यह तृप्ति उसकी प्यास को बढ़ाती है, जगत की प्यास को मिटा देती है.
Friday, February 14, 2014
भीतर भरा उजाला जगमग
अगस्त २००५
हमारे
ही भीतर इतनी सामर्थ्य भरी है कि सितारे यदि गर्दिश में भी हुए तो कुछ न बिगाड़
सकें. हम व्यर्थ ही अपनी शक्ति को कम आंकते हैं अथवा तो व्यर्थ गंवाते हैं. मानव
जीवन दुर्लभ है, हम संतों की वाणी में यह पढ़ते हैं. उन्होंने अपने जीवन में भीतर
की शक्तियों को उजागर किया और आनंद पाया व लुटाया. संतों, सदगुरुओं का जीवन चरित्र
पढ़ें तो पता चलता है उनकी हर श्वास एक आनन्द की धारा से भीतर को स्वच्छ करती है.
उनका मन अहोभाव से ओत-प्रोत रहता है. ईश्वर का प्रेम उनके शरीर के हर कण में
स्पन्दित होता है. उनका मन ऐसी अलौकिक शांति से भर जाता है जिसे कोई नाम नहीं दिया जा
सकता. हम भी यह सब प्राप्त कर सकते हैं, बस आत्मशक्ति को जगाने भर की देर है.
Thursday, October 20, 2011
ईश्वर अंश जीव अविनाशी
मई २००२
ईश्वर के अंश होने के कारण हम परम आनंद को पाने के अधिकारी हैं, चेतना के उस दिव्य स्तर तक पहुंचने के अधिकारी हैं जहाँ विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है. सम्पूर्ण प्रकृति भी तब हमारे लिये सुखदायी हो जाती है. इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है यह स्थूल नहीं है अति सूक्ष्म है और व्यापक भी. शरद काल के चन्द्रमा की चाँदनी कि तरह. तब यह लगता है कि ईश्वर के सिवा इस जग में जानने योग्य कुछ भी स्थायी और शाश्वत है क्या... और उसे जानने की ललक ही एक अनिवर्चनीय संतोष को जन्म देती है.
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