नया महीना यानि नए वायदे करने का वक्त, नए संकल्प करने, नयी चुनौतियाँ लेने, नई ख़ुशियाँ पाने और लुटाने का वक्त है।सितम्बर का पहला सप्ताह पोषण को समर्पित है और पहला पखवाड़ा हिंदी को। विभिन्न अन्न देह का पोषण करते हैं और भाषा मन व आत्मा का। भोजन में ज्वार, बाजरा व जौ आदि मोटे अनाज को सम्मिलित करके और नियमित व्यायाम के द्वारा हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकते हैं। हिंदी के विकास के लिए हमारा कर्तव्य है कि इसे अधिक से अधिक व्यवहार में लाएँ, इसकी शुद्धता का भी ध्यान रखें। हिंदी साहित्य का प्रचार व प्रसार करें। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुवाद हो और इसका विपरीत भी, ताकि सभी हिंदी के महत्व व इसकी क्षमता को अनुभव कर सकें। इसी महीने शिक्षक दिवस भी मनाया जाएगा। इसी महीने इंजीनियर दिवस व हृदय दिवस भी आते हैं तथा विश्व शांति दिवस भी। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन गणपति का विसर्जन होगा व अगले दिन से पितृ पक्ष आरम्भ हो जाएगा। सितम्बर के अंतिम सप्ताह में नवरात्रि का उत्सव भी आरम्भ हो रहा है।आने वाला हर दिन सभी देशवासियों के लिए तथा विश्व के हर वासी के लिए मंगलकारी हो।
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Wednesday, August 31, 2022
Friday, September 14, 2018
हिंदी दिवस पर शुभकामनायें
१४ सितम्बर २०१८
आज हिंदी दिवस है. हिंदी
एक सरल, सहज और मधुर भाषा है. यह आसानी से समझी और बोली जाती है. बोलचाल की हिंदी
सीखने में अहिन्दी भाषियों को ज्यादा समय नहीं लगता. यहाँ असम में जहाँ हम रहते
हैं, लगभग हर प्रान्त के लोग रहते हैं. पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली,
मलयालम और असमिया भाषा-भाषी लोग हिंदी को ही सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग में
लाते हैं. हर तबके के लोग हिंदी समझ लेते हैं और बोलने का प्रयास करते हैं. यह सही
है कि राजकाज की भाषा के रूप में हिंदी का समुचित विकास नहीं हो रहा है और न ही
निकट भविष्य में ऐसा होने की आशा है. हिंदी को अपने बलबूते पर ही आगे बढ़ना होगा. जन-जन
में लोकप्रिय होने होने के कारण हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है.
Thursday, July 3, 2014
एक त्रिवेणी हो जीवन में
सितम्बर २००६
ज्ञान
से हम ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाते हैं. योग से कृत-कृतव्य हो जाते हैं और भक्ति से
प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाते हैं. तीन ही तो शक्तियां हैं हमारे पास, जानने की
शक्ति, करने की शक्ति तथा मानने की शक्ति. यदि जीवन में ज्ञान, भक्ति तथा योग नहीं
है तो हम कोल्हू के बैल की तरह एक ही घेरे में चक्कर लगाते हैं जिसकी आँखों पर पट्टी
बंधी है. कहीं भी नहीं पहुंचते, जीवन भर एक ही सीमा में बंधे रह जाते हैं. सद्गुरू
के द्वार पर पहुंचने भर की देर है, वह ज्ञान से हमारे भीतर के चक्षु खोल देते हैं,
भक्ति से हृदय को सरस बना देते हैं तथा सेवा की प्रेरणा देकर करने की क्षमता का
उपयोग करना सिखाते हैं.
Monday, June 2, 2014
तेरा साहिब घट के भीतर
अप्रैल २००६
प्रेम
से प्रभु प्रकटता है, प्रेम विश्वास से, विश्वास ज्ञान से, ज्ञान श्रद्धा से,
श्रद्धा समता से और समता सत्य से और सत्य प्रभु ही है. हमारा हृदय जब समता से भर
जाता है तब ही मानना चाहिए परम में हमारी स्थिति है, वह हम सभी के भीतर अनंत सुख
के रूप में विद्यमान है. जब तक उसका ज्ञान नहीं होता तभी तक सारी बेचैनी है, उसके
बाद तो मन मस्ती में डूब जाता है. हमारे भीतर जो मोती भरे छिपे हैं, जो अमृत भरा
है उसे ध्यान की डुबकी लगा कर हम पा सकते हैं. भीतर उसका प्रकाश है, संगीत है,
ऊर्जा है, आनंद है उस सारी सम्पत्ति को हम सहज ही पा सकते हैं. जगत के अभाव नित्य
हैं, परमात्मा का भाव नित्य है. हमें भाव चाहिए, अभाव नहीं.
Saturday, May 31, 2014
चिरकाल से नाता जिससे
अप्रैल २००६
परमात्मा
सर्व समर्थ है फिर भी जब हम उसे प्रेम करते हैं वह हमारा सखा बनता है. हमें करना
ही क्या है ? मात्र उससे प्रेम ही तो ! और निर्भार हो जाना है, हमारे उर में जो
शांति बन छा जाता है, प्रेम का दरिया बनकर बहने लगता है ! हमारे भीतर का अंधकार
दूर कर देता है. मन में सूक्ष्म वासनाएं छिपी हुई हैं, हम जब उसके सम्मुख होते हैं
तो कुछ देर के लिए लगता है जैसे अंतःकरण पूर्ण निर्मल हो गया है पर पुनः पुनः
संसार का आकर्षण हमें अपनी ओर खींच लेता है, तभी तो बार-बार प्रार्थना की आवश्यकता
है, बार-बार शुभ संकल्पों की जरूरत है. बार-बार सन्त दर्शन की आवश्यकता है. जीवन
में तभी प्रेम का उदय होगा. जैसे एक-एक बूंद को सहेजकर तालाब बनता है वैसे ही एक–एक
क्षण हमें उसकी स्मृति भीतर भरनी है, ताकि वह सदा हमारे द्वारा पूजित होता रहे,
सदा हमारी आराधना का केंद्र रहे. उसका नाम हमारे रोम-रोम में समाँ जाये. उसका
प्रेम हमारे माध्यम से प्रकट होने लगे.
Friday, May 30, 2014
शुभता का ही वरण करे जो
मार्च २००६
शुभ कर्म को आरम्भ करना ही
सबसे कठिन है, एक बार जब साधक शुभ पथ पर चलना आरम्भ कर देता है तब सारी सृष्टि
उसकी सहायक हो जाती है. किन्तु हम आरम्भ को ही टालते रहते हैं. सत्संग सुनते समय
कितने ही शुभ विचार भीतर उपजते हैं पर वे कार्यान्वित नहीं हो पाते, प्रभु मन को
जानते हैं और समय आने पर अनुकूल परिस्थिति भी ला देते हैं यदि हम उसे अनदेखा न कर
दें. यूँ भी साधक के पास परमात्मा से चाहने के लिए एक ही वस्तु है, उसे प्रेम करना
तथा उसका प्रेम पाना. जब तक कोई उस पावन प्रेम से वंचित है तभी तक जगत की दौड़ है,
वह प्रेम भीतर उपजा तो सारे में छा जाता है, फिर जीवन में सहज ही शुभ घटता है. सही
रूप से सेवा का भाव जगता है. मन सारे अभावों से मुक्त हो जाता है और सारे प्रभावों
से भी..अपने स्वभाव में टिक जाता है.
Monday, May 26, 2014
तेरी शरण में आये हैं हम
मार्च 2006
प्रार्थना
में बहुत शक्ति है, पग-पग पर प्रार्थना हमें सहारा देती है. उसका स्मरण भीतर चलता
रहे तो यह अपने आप में ध्यान का ही एक रूप है. हम उसे ही अपने अंतर की कथा-व्यथा
सुना सकते हैं, वह दीखता नहीं पर उसकी हजार आँखें हैं, जैसे दरवाजे पर चिक लगी हो
तो बाहर के लोग भीतर नहीं देख सकते पर भीतर से बाहर देखा जा सकता है, वैसे ही वह
हमारे भीतर से सब कुछ देख रहा है पर हम ही उसे नहीं देख पाते. प्रार्थना में हमारा
अहं गल जाता है. शरण में आने का सुख सारे सुखों से बड़ा है, उसमें कोई मिलावट नहीं,
कोई दुःख भी नहीं. शुद्ध ज्ञान में स्थित होकर ही हम शरण में आते है, शरण का अर्थ
है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसे ही चाहना, जो कल्याणकारी है उसकी ही
कामना करना. तब कोई बोझ नहीं रहता, कोई डर भी नहीं सताता, भक्त को पूर्ण विश्वास
होता है जिसकी शरण में वह आया है, वह सर्व-समर्थ है, उसे तब अपने सुख-दुःख की
परवाह नहीं रह जाती, वह तो उसकी रजा में ही अपनी रजा मानता है.
Monday, August 19, 2013
घट घट में है राम
कोऽहम् ? कुतोऽह्म् ? किम् इदम् च विश्वम् ? ऐसे प्रश्नों के
उत्तर जानने हों तो हमें गुरु, शास्त्र या परमात्मा की शरण में जाना होगा..तभी
ज्ञान होता है अपने सही स्वरूप का, अपने सहज मुक्त स्वभाव से हमारा परिचय होता है,
अपने मूल को हम जानते हैं. पता चलता है, हम कहीं से आये नहीं है, नित्य हैं, जगत
ही हममें आता जाता है. यह जगत त्रिगुणात्मक है, जिस तरह सूर्य का प्रतिबिम्ब जल से
भरे घट में दिखाई देता है, वैसे ही देह रूपी घट में मन, बुद्धि रूपी जल में उस
चैतन्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, जैसे सूर्य, घट, जल या प्रतिबिम्ब से पृथक
है वैसे ही चैतन्य, देह, मन, बुद्धि से
भिन्न है. हम वही चैतन्य हैं, न जाने कितने जन्मों में कितने देह रूपी घट हमने धारण किये हैं, और
कितना मन रूपी जल उसमें भरा है, कितनी बार घट फूटा, पर सूर्य का प्रतिबिम्ब कभी
नहीं बदला. यह ज्ञान होते ही हम अभय को प्राप्त होते हैं क्योंकि मृत्यु का भय चला
जाता है.
Friday, March 2, 2012
श्रद्धा मुक्ति का द्वार है
श्रद्धावान लभते ज्ञानं ! ईश्वर में, सत्य में, शुभ में, श्रद्धा हो तो वह सदा वर्तमान है. हमारे निकट है. साधना में उससे अभिन्नता का अनुभव हमारे मन को फूल सा खिला देता है. हमारे आसपास भी धीरे-धीरे परिवर्तन शुरू हो जाता है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है जब हम अपने भीतर के आनंद को पा लेते हैं., स्वयं की प्रसन्नता के लिये जगत के मोहताज नहीं रहते, पूर्ण मुक्त हो जाते हैं. एकांत में रहने से जो भय भीत नहीं है, मनसा. वाचा, कर्मणा जो सदमार्ग पर स्थित है. अपने सुख-दुःख के लिये जो स्वयं उत्तरदायी है वही साधना के पथ पर आगे बढ़ सकता है.
Thursday, February 23, 2012
कैसे कैसे अनुभव
जनवरी २००३
राम विश्राम में है ऐसा संत जन कहते हैं, सामान्य नींद की जगह शवासन करें तो शरीर में उठने वाली छोटी से छोटी संवेदना को भी महसूस किया जा सकता है. यह एक सुखद अनुभव है. देह में प्राण ऊर्जा का विचरण भी महसूस किया जा सकता है. त्राटक में स्टील के ग्लास के किनारों को कई परतों में बंटते देखना और उस पर प्रकाश के सात रंगों की चमक भी अनोखा अनुभव है. फर्श या दीवार की सतह का आकर्षक रूप धारण करना, प्रकाश के एक बिंदु का विस्तृत होते जाना, एकटक देखने पर किसी वस्तु का हिलना तथा आँखें बंद करके भी टीवी स्क्रीन दिखाई देना और कानों में एक मधुर ध्वनि का निरंतर सुनाई देना यह सारे अनुभव एक साधक को इस जगत में होते हुए भी इस जगत से परे रखते हैं. यह जगत जैसा हमें दिखाई देता है वैसा ही नहीं भी हो सकता. यह हमारी नजर पर ही निर्भर करता है. हमारा मन ही इस जगत की उत्पत्ति का कारण है.
Wednesday, February 22, 2012
चेतनत्व बिखरा चहुँ ओर
दिसंबर २००२
कभी किसी डाली से लगे फूल को सहला कर देखें तो लगता है वह हमारे स्पर्श को महसूस कर रहा है. जीवन कितना अद्भुत है...हर वस्तु में चेतना है, एक ही चेतना का सभी में स्पंदन है. हम वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखें तो सब कुछ कितना सुंदर है. एक नंग-धडंग, मिट्टी से सना अनपढ़ बच्चा भी अपने भीतर वही चेतना छिपाए है, असीम सम्भावनाओं का भंडार...हमारा शरीर, मन, बुद्धि भले ही सीमा से बंधे हों, पर हमारी आत्मा यानि जो हम वास्तव में हैं, वह अपरिमित है. उसके सान्निध्य में हम भी असीम हैं, जीवन मुक्त, चिन्मय और शाश्वत !
Monday, February 20, 2012
वैराग्य महासुख है
दिसम्बर २००२
मन में जब तक दरिद्रता रहेगी, अभाव रहेगा तो जीवन में समृद्धि कैसे आयेगी. मन में समृद्धि का बीज बोना है तब ही जीवन में भी पूर्णता का अनुभव होगा. तृष्णा जब समाप्त होगी तभी वैराग्य टिकेगा. वैराग्य ही हमें दृढ़ता प्रदान करता है, स्वतंत्र व पूर्ण बनाता है. मन तब तृप्त हो जाता है. जो कुछ हमें मिला है उसका सम्मान करते हुए तृप्ति का अहसास बना रहे तभी वैराग्य जीवन में खिलता है. अपने ‘स्व’ का विस्तार भी तब होता है. परम से नाता जुड़ता है, हर वस्तु, यह सम्पूर्ण सृष्टि हमारा कर्मक्षेत्र बन जाती है, पर उस में बंधन नहीं है एक अलिप्तता है, बाहर कार्य करते हुए भी भीतर से बिल्कुल अछूते रहने की कला तभी आती है.
Thursday, February 16, 2012
मन लौट के भीतर आये
दिसम्बर २०१२
जिसे अपने आप का ज्ञान नहीं है, उसे ही अभिमान, ममता, लोभ, मोह आदि के कारण दुःख होते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नहीं होते. हमारा अहं तभी तक है जब तक हम स्वयं को शरीर से भिन्न व मन से अलग नहीं देखते. ऐसा तभी संभव है जब हम स्वयं के कण-कण से परिचित हों, सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब क्या मन में उठ रहा है इसे जानते रहें. जब सजगता खो जाती है तब संसार मन पर अपना अधिकार जमा लेता है. जब सजग रहते हैं तब भीतर से एक रस की धार सदा बहती रहती है उसमें आप्लावित रहते हैं. मन बाहर भी जुड़ा हुआ है और भीतर भी बुद्धि से जुड़ा है. जब वह भीतर लौट आता है नमः हो जाता है.
Thursday, February 2, 2012
ध्यान की महिमा
हम ईमानदार क्यों नहीं रहते, अन्यों के साथ व अपने साथ भी. अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं. दूसरों की दृष्टि में नेक बनने की चाह हमें सच्चा होने से रोकती है. गुणवान होना व गुणवान दिखना दोनों ही सूक्ष्म वासनाएं ही तो हैं. हम अपने सहज स्वरूप में स्थित रहें तो बहुत सारी परेशानियों से बच जाते हैं. आत्म राज्य के अधिकारी होने की पहली शर्त यही है कि हम अपने सहज रूप में रहें. ईश्वर व हमारे बीच जो पर्दे हैं उनमें अहं सबसे प्रमुख है, यही हमें दूसरों की दृष्टि में बेहतर बनने को प्रेरित करता है और हम अपने पथ से भटक जाते हैं. नियमित ध्यान करने से सब कुछ अपने आप होने लगता है, तब हमें अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता. हृदय के सारे कलुष मिटने लगते हैं, अहं से मुक्ति मिलने लगती है, हमें अपने मूल स्वरूप की झलक मिलती है. सात्विक अभिमान जगता है कि हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं, तब जगत से कुछ पाना शेष नहीं रहता. हम आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तब हमारे व परम के बीच पर्दे हटने लगते हैं. इस तरह पहले मन को फिर वाणी को फिर कर्मों को हम शुद्ध करते जाते है, हम से ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे किसी अन्य का अहित हो, सजग रहते हुए अपने समय का सदपुयोग करते हुए हम मुक्ति का जीवन जीते हैं.
Tuesday, January 31, 2012
परम खजाना
नवंबर २००२
रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होते हैं. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.
वह कौन है
परमात्मा हमारा जीवन धन है, हमारा सर्वस्व, हमारे अस्तित्त्व का प्रमाण, वह हमारा हितैषी है. शुभचिंतक और सुहृदयी. वह हमारी अंतरात्मा है. भक्त के पोर-पोर में उसका नाम अंकित है, उसके प्रति वह अपने भीतर इतना प्रेम उमड़ते महसूस करता है कि उसकी गूंज तक उसे सुनाई पड़ती है. उसका नाम लेते ही आँखें नम हो जाती हैं. वह प्रियतम है, अनुपम है और मधुमय है. वही जानने योग्य है. एक उसी की सत्ता कण-कण में व्याप्त है, वही चैतन्य हर जड़-चेतन में समाया है. उसी का प्रकाश सूर्य आदि नक्षत्रों में है और उसी का प्रकाश है जो आँखें बंद करते ही उसे घेर लेता है.
Monday, January 30, 2012
परम पुकारे अपनी ओर
अक्तूबर २००२
यह जगत प्रतिपल बदल रहा है. मनुष्य किसी भी स्थिति में क्यों न हो हँसी और खुशी उसका साथ नहीं छोड़ती जैसे दुःख उसका चिर साथी है. दोनों आते-जाते रहेंगे भिन्न भिन्न रूपों में, पर एक तो वही है अपना आप, जिसे न दुःख व्याप्ता है न सुख, जो प्रेम है, आनंद है, और मधुमय है, रसमय है. जो जीवन को अर्थ देता है, एक चुनौती देता है, लक्ष्य देता है. जो बाहें फैलाये खड़ा है हमें हर पल पुकारता है. जो अपना दिव्य स्वरूप धारे हमें अपनी ओर आकर्षित करता है उसका जैसा बनने की हमें प्रेरणा देता है. वह हमें खुद सा बनाना चाहता है बल्कि उसने हमने खुद सा बनाया ही था, निष्पाप, निर्दोष..पर हम ही उससे दूर चले गये और जगत नाम की उस वस्तु को थामने लगे जो हाथ से मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती जाती हैं, हमारा तन जो दिन रात जरा की ओर बढ़ रहा है, कोई न कोई व्याधि इसे सताती ही है, हमारा मन जो सदा किसी न किसी ताप में जलता ही रहता है. और वह शीतल फुहार सा, अलमस्त झरने सा, प्रेम का सोता हमारे भीतर ही कहीं बह रहा है उससे हम अनजान ही बने रहते हैं.
Friday, January 27, 2012
जीवन उत्सव है
पत्रं पुष्पं फलं तोयं......श्रद्धा रूपी पत्र तथा मन रूपी पुष्प, हमारे कर्मों का फल रूपी फल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही तो हमें कृष्ण को अर्पित करना है. कृष्ण प्रेम का दूसरा नाम है, उसे प्रेम करो तो वह हजार गुणा करके लौटाता है. उसकी ओर जो एक बार चल दे उसे वह भटकने नहीं देता, किसी न किसी तरह अपनी ओर बुला ही लेता है. उसके सम्मुख जाते ही अपना सब कुछ उसे अर्पित करने का मन होता है बल्कि अपना कुछ है ही नहीं यह भाव उदित होता है. और तब यह भी पता चलता है कि हमारे भीतर ही ज्ञान है, प्रेम है, शक्ति है, ऊर्जा है, साहस है....सब कुछ अकारण है जैसे ईश्वर के पास इन सबका भंडार है...अकारण, वह लुटा रहा है. वही भीतर से सामर्थ्य देता है, प्रेरणा देता है, निर्देश देता है. जीवन तब उत्सव बन जाता है.
Thursday, January 26, 2012
पायी संगत जो संतन की पायी पूंजी अपने मन की
अक्तूबर २००२
साधक की एक अनुभूति ऐसी भी होती है जब वह कह उठता है...“पायी संगत जो संतन की पायी पूंजी अपने मन की” सदगुरु ने हमें स्वयं से मिला दिया है और अब हमें स्वयं से प्रेम हो गया है. पहले स्वयं से आँखें मिलाते से डरते थे और दूसरों से भी, अब हर जगह वही दिखता है तो डर किसे और किसका? हमने स्वयं ही अपने लिये बाधाएं खड़ी की हुई थीं और ज्ञान से इन बाधाओं का अंत होता नजर आता है. तन, मन व बुद्धि को स्वयं से अलग देखने की कला ने हमारे सच्चे स्वरूप को उजागर कर दिया है. बुद्धि को पृथक करते ही वह आग्रह तज देती है, मन को तज देने से वह खाली हो जाता है और जैसे खाली घट में जल भर जाता है, खाली मन उस परम की शांति से स्वतः ही भर जाता है. तन को पृथक देखने पर उसकी पीड़ा छूती नहीं उस तरह जैसे पहले छूती थी. कितना अद्भुत है यह ज्ञान.
Tuesday, January 24, 2012
मध्य मार्ग ही उत्तम है
अक्तूबर २०१२
कर्म और ज्ञान दोनों में समन्वय होना चाहिए. प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के मध्य का मार्ग अपनाकर ही हम योग साधना कर सकते हैं. सदगुरु न तो हमें भोग की ओर ले जाते हैं न त्याग की ओर, वे हमें त्याग करते हुए भोग की बात बताते हैं. वे जटिल प्रश्नों का कितना सरल हल बताते हैं. भक्ति व ज्ञान का समन्वय हो तो हम अहंकार व अकर्मण्यता दोनों से मुक्त रहेंगे. भक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, ज्ञान होने पर स्वयं को आत्मा जानकर हम उससे समानता का अनुभव करते हैं. वह और हम दो नहीं हैं, जुदा नहीं हैं, सदा से एक हैं, दोनों अविनाशी, शाश्वत, ज्ञान व प्रेम स्वरूप. उसे खोजने कहीं दूर नहीं जाना है. पहले भक्ति के द्वारा हृदय को शुद्ध करना है, चित्त को निर्मल करना है फिर वह हमें उसी तरह प्राप्त होगा जैसे हवा और धूप...सहज ही. एक एक कर दोषों को निकालने की बजाय एक ही बात करनी है उसका स्मरण... प्रतिपल वह याद रहे तो हम गलत कार्य की ओर उन्मुख ही न हों.
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