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Tuesday, January 21, 2014

खुदी को कर बुलंद इतना

जून २००५ 
जो जिस भी वस्तु का हकदार होता है, उस वह मिल ही जाती है, किन्तु जो आत्मनिर्भर है वह जीवन में सफलता अवश्य पाता है. दुनिया जिसे सफलता कहती है वैसी सफलता न भी पाए पर जो खुद की तलाश में लगा है वही सही अर्थों में सफलता की राह पर है. इन्सान का जीवन खुदा ने इसीलिए बनाया है कि वह खुद को ढूँढे, खुदी के पीछे ही खुदा है, जो खुद से मिल गया वह खुदा को भी पा ही लेता है. जगत में साधारणतया माँ-पिता बच्चों से जो प्रेम करते हैं वह मोह ही कहा जायेगा, वे उन्हें किसी तकलीफ में नहीं देखना चाहते, इसलिए बचपन से ही आत्मनिर्भर होने का पाठ नहीं पढ़ाते, लेकिन तकलीफ पाए बिना कोई नेमत भी नहीं मिलती है. 

Thursday, February 2, 2012

ध्यान की महिमा


हम ईमानदार क्यों नहीं रहते, अन्यों के साथ व अपने साथ भी. अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं. दूसरों की दृष्टि में नेक बनने की चाह हमें सच्चा होने से रोकती है. गुणवान होना व गुणवान दिखना दोनों ही सूक्ष्म वासनाएं ही तो हैं. हम अपने सहज स्वरूप में स्थित रहें तो बहुत सारी परेशानियों से बच जाते हैं. आत्म राज्य के अधिकारी होने की पहली शर्त यही है कि हम अपने सहज रूप में रहें. ईश्वर व हमारे बीच जो पर्दे हैं उनमें अहं सबसे प्रमुख है, यही हमें दूसरों की दृष्टि में बेहतर बनने को प्रेरित करता है और हम अपने पथ से भटक जाते हैं. नियमित ध्यान करने से सब कुछ अपने आप होने लगता है, तब हमें अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता. हृदय के सारे कलुष मिटने लगते हैं, अहं से मुक्ति मिलने लगती है, हमें अपने मूल स्वरूप की झलक मिलती है. सात्विक अभिमान जगता है कि हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं, तब जगत से कुछ पाना शेष नहीं रहता. हम आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तब हमारे व परम के बीच पर्दे हटने लगते हैं. इस तरह पहले मन को फिर वाणी को फिर कर्मों को हम शुद्ध करते जाते है, हम से ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे किसी अन्य का अहित हो, सजग रहते हुए अपने समय का सदपुयोग करते हुए हम मुक्ति का जीवन जीते हैं.