Showing posts with label मूल. Show all posts
Showing posts with label मूल. Show all posts

Friday, January 18, 2019

मानुष जनम अमोल है


१८ जनवरी २०१८ 
संत और शास्त्र जिस बात की ओर संकेत कर रहे हैं, वह अनमोल है. हमारे पास जो भी कीमती वस्तु हो उससे अधिक अनमोल, किन्तु हम उसका महत्व नहीं समझ पाते. वे कहते हैं, देवता भी मानव जन्म के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि इसी जन्म में हम अपने मूल स्रोत तक पहुंच सकते हैं. मन और बुद्धि के जो उपकरण हमें प्रकृति से मिले हैं, उनके द्वारा मानव ने कितनी उन्नति कर ली है, किन्तु वह अपने मूल से दूर निकल गया है. यदि कोई बालक कोई प्रदर्शनी देखने घर से निकल जाये और फिर वापसी का रास्ता भूल जाये तो उसे भटकना पड़ता है, उसके दुःख की कल्पना हम कर सकते हैं. मन रूपी बालक भी आत्मा रूपी माँ से बिछड़ कर संसार की रंगीनियों में खो गया है, उसे तो यह भी याद नहीं कि उसका कोई घर भी है. अपने मूल से जुड़ा हुआ मन उस नाव की तरह होता है, जिसका लंगर उसके साथ है, वह कभी डूबती नहीं. वह उस घर की तरह होता है जिसकी नींव धरती में गहरी खुदी है, जो रेत का महल नहीं है.

Saturday, July 1, 2017

दो के पार ही वह मिलता है

२ जुलाई २०१७ 
बादल बरस रहे हैं, धरती हरी-भरी हो रही है. कुछ लोग इस वर्षा का आनंद उठा रहे हैं तो कितने ही लोग बाढ़ के कारण प्रभावित हुए हैं और अपने घरों से उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा है. जीवन सदा ही विरोधाभासों से घिरा हुआ है. यहाँ दिन के साथ रात और सुख के साथ दुःख मिला हुआ है. हमारी नजर यदि द्वन्द्वों के पार एकरस अस्तित्त्व को देखने में सक्षम नहीं होती है तो हम जीवन को उसके वास्तविक रूप में कभी नहीं देख पाते. कभी हँसना तो कभी रोना यही तो जीवन नहीं हो सकता. सारी आपदाओं के पार भी एक ऐसी सत्ता है जो सदा निर्विकार है, जो हमारा मूल है. उससे मिलना ही जीवन से मिलना है.

Thursday, June 22, 2017

सहज मिले अविनाशी

२३ जून २०१७ 
हमारे मन की गहराई में एक अवस्था ऐसी भी है जहाँ किसी भी बाहरी घटना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. जो आदि काल से एकरस है और जो अनंत काल तक ऐसी ही रहेगी. सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है मन की वह अवस्था, जो जीवन का स्रोत है. विचार का भी स्रोत है. जब तक मन अपनी उस स्थिति से एक नहीं हो जाता, वह अभाव का अनुभव करता ही रहेगा. योग का उद्देश्य मानव को उसी स्थिति का अनुभव कराना है. उस अवस्था तक पहुँचने के लिए ही हम साधना के पथ पर कदम रखते हैं, और जो पहले वहाँ पहुंचा हुआ है वह गुरू ही हमें वहाँ तक ले जा सकता है. उसने वह मार्ग भली प्रकार देखा है, वह मन को भीतर-बाहर से अच्छी तरह समझ गया है. उसके निर्देशन में साधना करते हुए हम सहजता से अपने मूल तक पहुंच जाते हैं. गुरू के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति प्रेम हमारे मार्ग को रसमय व सुंदर बना देते हैं.

Monday, March 27, 2017

भीतर का आकाश मिले जब

२८ मार्च २०१७ 
एक शिशु अपने भीतर खाली आकाश जैसा मन लेकर पैदा होता है. वह सहज ही प्रसन्न होता है, यदि रोता भी है तो किसी न किसी कारण वश और जब कारण दूर हो जाये तो वह पल में हँसने लगता है. जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसका मन भरता जाता है. वस्तुओं, घटनाओं, सूचनाओं, संबंधों की एक कई परतें उसके अंतर आकाश को भरने लगती हैं, सहजता खोने लगती है. यदि घर का वातावरण सात्विक है, सुबह सवेरे भजन आदि कानों में पड़ते हैं, व्रत-उत्सव पर घर में ध्यान पूजा होती है, प्रकृति का सान्निध्य उसे प्राप्त होता है तो  मन को खाली होने का अवसर मिलता रहता है, और वह पुनः-पुनः नया होकर जीवन का अनुभव करता है. किन्तु आज के व्यस्त माहौल में किसी के पास आराम से बैठकर साधना करने का समय नहीं है.  मन को विसर्जित होने का समय  ही नहीं मिलता तब तनाव केअलावा क्या होगा. जिसे जीवन का सबसे सुंदर समय माना गया था, उस अध्ययन काल में  आज विद्यार्थी भी तनाव के शिकार हो रहे हैं, हम बड़ों को ही बैठकर  इसका समाधान खोजना होगा, जीवन में आत्मज्ञान को उसका स्थान देना होगा ताकि मन अपने मूल से जुड़ा रहे और हम बेवजह ही दुःख को अपना साथी न बनाएं.

Tuesday, January 24, 2017

माली सींचे मूल को

२४ जनवरी २०१७ 
जीवन का निर्माण अंधकार में आरम्भ होता है, एक बीज को धरती के नीचे बोया जाता है और एक दिन वह वृक्ष का रूप ले लेता है, जड़ों के रूप में उसका स्रोत छिपा ही रहता है. जड़ों की भी यदि खोद के निकाल लें तो जीवन सूख जाता है. उन्हें वहीँ पोषित करना होता है. इसी तरह हमारा मूल भी भीतर छिपा है, जिसे वहीं पोषित करना है, मूल तक पहुंचने का नाम ही ध्यान है. देह को स्थिर करके पहले मन को देखना फिर मन को शांत करते हुए उस बीज तक पहुंचना जो जीवन का स्रोत है, यह पहला चरण है, फिर उस स्रोत को परम से जोड़ना जिससे वह पोषित हो सके दूसरा सोपान है. प्रार्थना भी ध्यान का विकल्प हो सकती है और नाम जप भी, अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कोई भी मार्ग अपनाकर हम अपने मूल को सींच सकते हैं. 

Thursday, August 11, 2016

माली सींचे मूल को

१२ अगस्त २०१६ 
जब तक स्वयं की सही पहचान नहीं मिलती, जीवन में एक अधूरापन महसूस होता है. सब कुछ होते हुए भी एक तलाश जारी रहती है. देह किसी भी क्षण रोगग्रस्त हो सकती है, मृत्यु को प्राप्त हो सकती है, यह भय भी अनजाने सताता रहता है, शेष सारे भय उसकी की छाया मात्र हैं. स्वयं की पहचान करना इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी हम इस कार्य को टालते रहते हैं, इसका कारण शायद यही है कि हमें लगता ही नहीं कि हम स्वयं को नहीं जानते, तभी हम अक्सर दूसरों से यह कहते हैं, तुम मुझे नहीं जानते. इस जानने में एक बड़ी भूल यह हो रही है कि जन्म के बाद इस जगत में हमने जो भी हासिल किया है, उसी से हम स्वयं को आंकते हैं. वृक्ष का जो भाग बाहर दिखाई देता है उसका मूल भीतर छिपा है. इस जीवन में हमने जो भी पाया अथवा खोया है उसका मूल भीतर है. यदि बाहर को संवारना है तो मूल से परिचय करना ही होगा.  

Saturday, June 21, 2014

मूल को जिसने जाना है

जुलाई २००६ 
हमारा ध्यान मूल पर नहीं जाता, पदार्थ पर जाता है, चेतना भीतर जल रही है, उस पर ध्यान जाने से ही सारी समस्याएँ समाप्त हो सकती हैं. चेतना की मलिनता और शुद्धि पर ध्यान नहीं जाने से ही हम परेशान रहते हैं, बाहर अनेक समस्याएं हैं पर सबसे बड़ी समस्या भीतर की है. हम प्रतिबिम्बों के पीछे भागते हैं, परछाईं पर हमारा ध्यान है जिसकी वह परछाई है वह सुधर जाये तभी परछाई सुधर सकती है. वस्तुएं हमें सुविधा तो दे सकती हैं सुख नहीं, सुख भीतर से आता है. हमारे भीतर जो उलझन है वह इसलिए कि हमें अपने मूल तक पहुंचना नहीं आता, हम छोटे से समाधान को समग्र मानकर भ्रान्ति में फंस जाते हैं. चेतना का विकास ही हमारे जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकता है. 

Tuesday, March 18, 2014

भीतर जाकर ही मिलता वह

अक्तूबर २००५ 
जब हम कुछ पल के लिए शांत होते हैं, तो शांति ऊपरी-ऊपरी होती है और जाती है, पर जब हम अन्तर्मुखी होकर गहराई में जाते हैं तो पता चलता है कि वास्तविक शांति किसे कहते हैं. भीतर जाकर जब पता चलता है कि विकार कैसे जन्मते हैं, कैसे बनते हैं और कैसे एकत्र होते हैं. एक बार जब भीतर कोई विकार जगता है तो दुखी होने का कारण पैदा हो ही गया. ऊपर-ऊपर का चित्त परिमित है और उसके नीचे का वृहत्तर चित्त है. जब तक भीतर वाला चित्त नहीं सुधरता तब तक बाहर का चित्त कभी शांत कभी अशांत होता ही रहेगा. हम बार-बार एक ही गलती करते हैं क्यों कि गलती का बीज तो नीचे है, ऊपर से डाली काट देने से क्या होता है, पुनः नई डाली निकल आती है. जब तक हम जड़ को नहीं काटेंगे तब तक गलती करने का स्वभाव बना ही रहेगा. हमें यदि सदा के लिए सुख-शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो सदा के लिए विकारों से मुक्त होना पड़ेगा. और इसके लिए भीतर की यात्रा करनी ही होगी.  


Tuesday, February 4, 2014

मन तू ज्योति समान अपना मूल पिछान

जुलाई २००५ 
हमारा जीवन जिन वस्तुओं से महत्वपूर्ण बनता है, उनमें सबसे प्रमुख है प्रेम ! भीतर जब प्रेम भरा रहता है तो बाहर सभी कुछ सरल हो जाता है और प्रेम जब हृदय का वासी बन जाता है तो बाहर एक शांति स्वतः ही प्रकट होती रहती है. हमारा मन तब समाधान पाना सीख लेता है. नम्रता से अहंता को, क्रोध को अक्रोध से, हिंसा को अहिंसा से जीतने की कला सीख लेता है. सार्थक चेष्टा से व्यर्थ अपने आप गिर जाता है, सार्थक चिन्तन से विषाद दूर हो जाता है. जो मन असत्य, परदोष दृष्टि तथा आत्मप्रशंसा को त्याग देता है, उसकी वाणी के दोष भी समाप्त होने लगते हैं. भ्रम दोष, प्रमाद दोष और लिप्सा दोष वाणी के दोष हैं. जिसके बारे में पूर्ण जानकारी न हो, ऐसी वाणी बोलना ही भ्रम दोष है, असजग होकर कहे गये वाक्य भूल से भरे होंगे. लोभ बढ़े तो वाणी का असर नहीं होता. ऐसा मन ही हमें भगवद्प्रेम का अनुभव करा सकता है, आत्मा को प्रकट करने के लिए सहायक हो सकता है. वह अपने मूल को पहचानने लगता है, वह भीतर जाने लगता है. 

Friday, September 7, 2012

दीप जले आस्था का भीतर


अगस्त २००३ 
हमारा जीवन निरंतर एक नदी की तरह अपने मूल से निकल कर अपने मूल में ही मिलना चाहता है, नदी का उद्गम व सागर दोनों जल के ही रूप हैं. उसी तरह हम जहां से आये हैं और जहां जाना है दोनों एक ही हैं, यह बीच का समय जो हम धरा पर बिताते हैं, तैयारी का समय है, तैयारी उससे मिलने की. जन्म के समय जैसी निर्दोषता शिशु में होती है वैसी ही निर्दोषता स्वयं में लानी है, शिशु जैसे खाली होता है सारे पूर्वाग्रहों से, वासनाओं से, हमें जगत से गुजर कर, अनुभवों के बाद स्वयं को वहाँ ले जाना है, संसार की वास्तिवकता को जानकर उससे परे हो जाना है. तृष्णा की आग जब जलाये तब जाग कर देखना है, अपनी ही वाणी जब शत्रुता निभाए तब सचेत होना है, भीतर संशय जब फन उठाये तो आस्था का दीप जलाना है. कोई व्यर्थ की चिंतना चले तो पूछना है, क्या अपनी उर्जा इस काम के लिए व्यय करना ठीक है, मन जब अहंकार को लगी ठेस के कारण व्यथित हो जाये तो हँसते हुए उसे देखना है, जैसे नासमझ बच्चे की हरकतें देखकर हम हँसते हैं. आज जो विचार है कल वही वाणी में उतरेगा और परसों वही कर्म में, विचार पर ही रुक जाएँ तो बहुत सारी ऊर्जा बच जाएगी. तभी निर्लिप्त होकर हम इस जगत में रह सकते हैं. तभी उस अवस्था का अनुभव अभी कर सकते हैं जो चिन्मय है, शाश्वत है, अजर है, नित्य है, शांत है, प्रेम है, आनंद है.

Saturday, July 7, 2012

मूल से जुड़ना है


मई २००३ 

जब हम अपने स्थान से, अपने वास्तविक पद से हट जाते हैं तभी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं. निज स्थान से तो यह जग एक खिलौने की भांति प्रतीत होता है, इसका असली चेहरा प्रकट हो जाता है. यह ज्ञान अंतर में उदित होता है कि जिन वस्तुओं के लिये हम दिनरात एक कर देते हैं वे तो जड़ हैं, उनसे हमारी शोभा नहीं है. हमारा असली धन तो हमारे मन की स्थिरता, समता भाव, तथा अखंड शांति है, जो अच्युत है, जिसे कोई बाहरी आधार नहीं चाहिए जो अपने भीतर ही सहज प्राप्य है, जो हमारा मूल है. हमें खोल की नही मूल की परवाह होनी चाहिए. हमारा प्रत्येक कर्म वास्तव में उसी को पुष्ट करे, हम स्वयं के लिये अजनबी न बनें, समता का रस हमें स्थिर रखे, कोई घटना जाने अनजाने हमें मलिन न करे, प्रतिक्रिया नहीं अनुभूति मन में जगे. सहज अनुभूति.

Thursday, February 2, 2012

ध्यान की महिमा


हम ईमानदार क्यों नहीं रहते, अन्यों के साथ व अपने साथ भी. अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं. दूसरों की दृष्टि में नेक बनने की चाह हमें सच्चा होने से रोकती है. गुणवान होना व गुणवान दिखना दोनों ही सूक्ष्म वासनाएं ही तो हैं. हम अपने सहज स्वरूप में स्थित रहें तो बहुत सारी परेशानियों से बच जाते हैं. आत्म राज्य के अधिकारी होने की पहली शर्त यही है कि हम अपने सहज रूप में रहें. ईश्वर व हमारे बीच जो पर्दे हैं उनमें अहं सबसे प्रमुख है, यही हमें दूसरों की दृष्टि में बेहतर बनने को प्रेरित करता है और हम अपने पथ से भटक जाते हैं. नियमित ध्यान करने से सब कुछ अपने आप होने लगता है, तब हमें अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता. हृदय के सारे कलुष मिटने लगते हैं, अहं से मुक्ति मिलने लगती है, हमें अपने मूल स्वरूप की झलक मिलती है. सात्विक अभिमान जगता है कि हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं, तब जगत से कुछ पाना शेष नहीं रहता. हम आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तब हमारे व परम के बीच पर्दे हटने लगते हैं. इस तरह पहले मन को फिर वाणी को फिर कर्मों को हम शुद्ध करते जाते है, हम से ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे किसी अन्य का अहित हो, सजग रहते हुए अपने समय का सदपुयोग करते हुए हम मुक्ति का जीवन जीते हैं.

Saturday, September 10, 2011

मिलन का क्षण


दिसंबर २००१ 

हमारा मूल तो वही है और वही हमें पोषता है. हमने न जाने कितने लेप खुद पर चढा रखे हैं. कभी बेबस और निरीह होकर सहानुभूति बटोरना चाहते हैं, कभी कुछ करके प्रशंसा बटोरना चाहते हैं. स्वयं राजा होकर मंगता बने बैठे हैं. कल्पना और स्मृति की दुनिया में विचरण करने वाले हम खुद से ही अपरिचित हैं. एक क्षण में ही यदि हम यह मुल्लमा उतार फेंके तो वही क्षण मिलन का क्षण होगा. एक पुकार यदि दिल से उठे तो वह सारे पर्दे खोल कर अपनी झलक दिखाता है. वह हमारा हितैषी हर पल बाट जोहता है कि कब हम भूले-भटके वापस घर लौट आयें.

Saturday, June 25, 2011

यज्ञ


जैसे स्वप्न में हम एक से अनेक बन जाते हैं, ऐसे ही एक मूल से सारा जगत बना है. हम जहाँ से आये हैं जब उस मूल को भूल जाते हैं, अपने को एक अलग इकाई मान बैठते हैं, इससे स्वार्थ उत्पन्न होता है. स्वार्थ ही दुःख का कारण है. जीवन को एक यज्ञ मान कर यदि हम सामूहिक चेतना का विकास करें, अपनी समृद्धि का लाभ अपने आस-पास के लोगों को भी मिले ऐसा भाव रखें. समत्वभाव से सुख-दुःख का सामना करें, तो जीवन एक उत्सव बन सकता है.