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Thursday, February 5, 2015

नित नूतन बहे रस धार

जनवरी २००८ 
परम ऊर्जा के साथ एक होने की कला सिखाने के लिए तीन मददगार हैं, परमात्मा, गुरू तथा शास्त्र ! परमात्मा की कृपा तो सब पर है उसने मानव देह प्रदान की है. अन्नमय, प्राणमय तथा मनोमय कोष तो पशु के भी जाग्रत हैं पर विज्ञान मय व आनन्दमय कोष केवल मानव को ही प्राप्त हैं. सद्गुरु के पास जब हम जाते हैं तो वह इन सारे कोशों को जाग्रत करना ही नहीं सिखाता इनके पार ले जाने की कला भी सिखाता है, जहाँ मुक्ति का द्वार खुल जाता है. विज्ञान को नमन कि उसने ज्ञान को कितना सुलभ बना दिया है, गुरू के द्वार यदि कोई नहीं  जा सकता तो टीवी आदि के माध्यम से गुरू ही घर आकर ज्ञान की मोती लुटाते हैं. ऐसा ज्ञान जो नित नवीन है, हमें सरस सहज बनाता है, एकरसता को तोड़ता है.    

Wednesday, October 29, 2014

बलिहारी गुरू आपने

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है. सद्गुरु हमें अनंत की ओर ले जाता है, वह सारी सीमाएं तोड़कर असीम को जानने का, उसे पाने का निमन्त्रण देता है ! तन पवित्र हो, स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, मन निर्द्वन्द्व  हो, निर्भार हो तभी आत्मा अपने पूर्ण रूप में भीतर प्रकट होती है. आत्मा का स्वभाव है आनंद, प्रसन्नता और प्रेम ! वह शांति की सुगंध समोए है जो रह रहकर रिसती है, पर जब न तो तन के स्वास्थ्य का ध्यान हो न मन सजदे में झुका हो तो आत्मा भीतर कैद ही रह जाती है और हम जीवन भर दुर्गन्ध का शिकार होते रहते हैं. ईर्ष्या से जलता हुआ, क्रोध और अहंकार से ग्रसित मन सिवाय दुर्गन्ध के क्या दे सकता है, भीतर यदि प्रेम होगा तो वह प्रकटे बिना रह ही सकता.. कितना सरल है और कितना सहज है उस प्रेम को पाना जो हमारा निज का स्वभाव है. 

Sunday, March 2, 2014

मन निस्पंद हुआ जिस पल

अगस्त २००५ 
जैसे-जैसे हम सरल होते हैं, सहज होते जाते हैं, कोई छल-कपट हमारे भीतर नहीं रहता, कोई चाह हमें पीड़ित नहीं करती. हमारी सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूरी होने लगती हैं, हम उस हाकिम के, उस खुदा के, अल्लाहताला के, परवरदिगार के हाथों में कितने सुरक्षित हैं, कोई भय हमें नहीं सताता, वर्तमान में ही रहने की कला हम सीखते जाते हैं, यह जीवन तब फूल से भी हल्का हो जाता है, जैसे हम हवा में तैर रहे हों, कोई भार नहीं, न मन पर न तन पर, तन हल्का हो तो कार्य भी आनन्द का स्रोत हो जाते हैं. तब कुछ करने के बाद सुखी होंगे अथवा कुछ न करके सुखी होंगे, यह भ्रमणा मिट जाती है. हम बिना कुछ किये या करके हर हाल में ही आनन्द की स्थिति का अनुभव कर सकते हैं. ऐसा तभी होता है जब इस सत्य का पता चल जाता है, इस सत्य का कि हमारे मन का सुख-दुःख एक भ्रम ही है जो हम स्वयं ही खड़ा कर  लेते हैं और जगत को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि ऐसा है नहीं, जगत में हमें वही दीखता है जो हमारे मन में होता है. मन यदि शुद्ध स्फटिक के समान हो निर्मल हो तो उसमें सुंदर छवि ही दिखेगी, और वह छवि आत्मा की होगी, आत्मा जो परमात्मा में स्थित है, वही ब्रह्म है, उसके सिवा कुछ है ही नहीं, एक वही चेतना कण-कण में व्याप्त है, जगत तो मन का स्पंदन ही है, जब कोई स्पंदन नहीं तो मात्र उसी की सत्ता रह जाती है.

Wednesday, February 19, 2014

आनन्द से उपजें जो कर्म

अगस्त २००५ 
हमारे कर्म (मानसिक, वाचिक, कार्मिक) ही हमें बांधते हैं, यदि हम उन्हें किसी आशा पूर्ति के लिए करते हैं अथवा तो प्रतिक्रिया के रूप में करते हैं, अथवा इस कार्य से सुख कभी भविष्य में मिलेगा यह सोचकर करते हैं. यदि कोई किसी कार्य को करते समय आनन्दित हो रहा है और  उस आनन्द पर ही अपना अधिकार मानें तो न तो कर्म बोझिल होंगे न बाँधने वाले होंगे, हम ऐसे कर्म करेंगे जैसे वे सहज ही होते जा रहे हैं. अनावश्यक कर्म अपने आप ही तब झर जाते हैं.

Sunday, February 16, 2014

मिलता वह एक पल में ही है

अगस्त २००५ 
जो सहज अवस्था है वह सभी को नित्य प्राप्त हो सकती है पर अप्राप्त है, जो जानना चाहता है उसी को वह प्राप्त होती है, उसके लिए जब जिज्ञासा जोरदार होगी तभी वह मिलेगी. जो सदा है, हर काल में है तो भी हमें प्रतीत नहीं होता इसका अर्थ है हमारे ही भीतर उसको पाने की तड़प कम है. अंतःकरण की शुद्धि धीरे-धीरे होती है तभी हमें ईश्वर का अनुभव धीरे-धीरे होता हुआ लगता है, किन्तु वह वर्तमान की जरूरत है, वह इतना निकट है कि उससे निकट कुछ और हो भी नहीं सकता, वह इतना दूर भी भी है कि संसार ही दीखता है वह कहीं नजर नहीं आता, फिर लगता है शायद कभी भविष्य में मिलेगा, पर वह वर्तमान में ही मिलेगा, मिलेगा कहना भी ठीक नहीं है, वह तो सदा मिला ही हुआ है हम ही आँखें बंद किये बैठे हैं. ऊपर-ऊपर से ऐसा लगता है ज्ञान से दूर हो रहे है पर भीतर जाते ही वही पुनः प्रकट हो जाता है, जैसा थोड़ी सी धूल को झाड़ देने से ही स्वच्छता प्रकट हो जाती है. 

Wednesday, April 24, 2013

एक ही जीवन रूप अनेक


 अगस्त २००४ 
 जीवन का उपवन कभी एक सा नहीं रहता, कभी वसंत तो कभी पतझड का सामना उसे करना ही पड़ता है, लेकिन इस परिवर्तन के पीछे भी जीवन स्वयं तो एक ही है, उस एक को स्थिर मानकर ही हम अस्थिरता का अनुभव करते हैं. मन है तो कभी उसमें संसार झलकता है कभी आत्मा, अब यह मन पर निर्भर करता है कि वह स्वयं को किस के साथ जोड़े. आत्मा से जुड़कर अपनी ऊर्जा को बचा सकता है, सहज रह सकता है, तब संसार में बिना आसक्ति के रहा जा सकता है. 

Friday, March 15, 2013

कर्म ही आनंद है



हमारे सभी कर्म आनंद की अभिव्यक्ति हैं, कर्मों के द्वारा हम आनंद प्राप्त करने की चेष्टा करें तो वह  व्यर्थ होगी. हमारा हर कृत्य आनंद का कारण है, हम जब भीतर से तृप्त होते हैं तो जो भी होता है वह मुक्ति का कारण बनता है, वरना यदि हम दूसरों की खुशी के लिए अथवा किसी बड़े उद्देश्य के लिए कर्म करते हैं तो वे हमें अभिमान से भर देते हैं, और हम जो जंजीरों से छूटना चाहते हैं, स्वयं को एक और जंजीर से बाँध लेते हैं. जो भी करने की योग्यता हमें मिली है, उसके प्रति कृतज्ञता की भावना से भरने पर हम कायस्थ होते हैं और फिर ध्यानस्थ. एक शांति की शीतल फुहार जैसे भीतर कोई बरसा रहा हो, ऐसी अनुभूति होती है, जब कर्मों के द्वारा हम कुछ प्राप्त करना नहीं चाहते, वे सहज ही होते हैं जैसे हवा का बहना.

Wednesday, December 26, 2012

राधे, राधे ! श्याम मिला दे



कान्हा हमारा परम सुह्रद है, हम उसे भुला देते हैं, प्रकृति के गुणों के अधीन होकर स्वयं को उससे पृथक मानते हैं, पर वह हमें चेताता है. हम उससे बिछड़ जाते हैं फिर मिल जाते हैं. प्रकृति और पुरुष का यह खेल अनन्तकाल से चल रहा है, जीव स्वयं को प्रकृति का अंश मानकर उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है, पर प्रकृति स्वयं पुरुष के अधीन है, वह नित नए खेल दिखाती है ताकि थक-हार कर बंदा उसकी शरण में आ जाये. तब वह हमारी सहायक हो जाती है, गुणातीत होने पर हम नित नवीन आनंद का अनुभव कर सकते हैं, जो हमारा सहज स्वभाव है. सहजता को भुला देने पर हम कल्पनाओं के जाल में खुद को उलझा हुआ पाते हैं, पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.

Thursday, December 20, 2012

चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह


ईश्वर के प्रति अनन्य विश्वास कितना सहज है एक भक्त के लिए पर कितना कठिन है एक अभक्त के लिए, जो हवा, धूप और जल की भांति सहज उपलब्ध है, जो है तो हम हैं, बल्कि वही है जो स्वयं को विभिन्न रूपों में प्रकट कर रहा है, वह लीला प्रिय है. वह स्वयं को भक्त के वश में होने देता है. सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, विशाल से भी विशाल वह अप्रमेय है. उसकी कृपा होते ही मन अपनी सीमाएं तोड़ देता है, क्षुद्र स्वार्थ की सीमाएं, परमार्थ की बात सोचने लगता है. धीरे-धीरे मन अमनी भाव में आ जाता है. तब कोई चाह नहीं रहती, प्रकृति भक्त के साथ हो जाती है, उसके द्वारा अर्थपूर्ण काम होने लगते हैं, भीतर की छिपी शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं. जगत के अधिपति का प्रिय पात्र बन जाने पर जगत का जोर चल भी कैसे सकता है.

Tuesday, October 16, 2012

एक राज है जीवन सारा


सितम्बर २००३ 
मुक्ति को पाना कितना सहज है. मन खाली हो तो मुक्त है. कोई चाह नहीं, कोई संकल्प-विकल्प नहीं उठते तो मन रहता ही नहीं. मन जो व्यर्थ ही हम पर शासन करता है. हम गुलाम बन के रह जाते हैं, और झूठा जीवन जीते हैं जबकि सच्चाई हर वक्त हमारे साथ होती है. वह परम सत्य, परमेश्वर हमारी आत्मा का नित्य संगी है. पर मन हमारे व उसके बीच एक पर्दा डाले रहता है. हम व्यर्थ ही स्वयं को खपाते, रुलाते और सताते, तपाते हैं. हम जीवन के मर्म को जाने बिना ही जीवन जीते हैं. तत्व को जाने बिना मुक्ति नहीं, विकारों से मुक्ति, कुविचारों से मुक्ति, सुविचारों से भी अन्ततः मुक्ति, कोई द्वंद्व नहीं, केवल सहज भाव से अपने होने का अनुभव, कितना विचित्र है यह अनुभव, कितना प्रेम भरा, नित्यता की खोज हमें प्रेम तक पहुंचाती है. हमारी साधना का लक्ष्य प्रेम ही तो है, ईश्वरीय प्रेम, जो हमें उसकी हर वस्तु से प्रेम करना सिखाता है. पुलक फिर रग-रग में भर जाती है और जीवन का रहस्य हथेली पर रखे आंवले सा समझ में आने लगता है.

Tuesday, June 12, 2012

सहज स्वभाव सहज ही मिलता


अप्रैल २००३ 

सहज स्वभाव हमारे जीवन की मांग है, धर्म इस मांग की पूर्ति करता है. सहज स्वभाव हमारे तीनों तापों को हर लेता है मन के संकल्पों-विकल्पों को हर लेता है, इच्छाओं को शुद्ध करता है, विचारों को ऊपर के केन्द्रों में स्थित करता है. भीतर सौम्य मन का जन्म होता है और ऐसे मन से जो वचन निकलता है उसमें पूरा बल होता है. स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन जीने का बल सहज स्वभाव ही देता है. हमें अपने नित्य स्वरूप से परिचित कराता है. यदि हम चेतन हैं तो जड़ के गुलाम क्यों हों, अनित्य की प्रवाह क्यों करें, नश्वर को क्यों चाहें, उस एक को पाकर हम अमूल्य बन जाते हैं, उसमें जो स्वतंत्रता है वही पाने योग्य है. जड़ वस्तुओं के गुलाम बन कर हम अपना मूल्य घटाते हैं. सारी प्रतिकूलताएं तभी तक हैं जब तक हम उससे दूर हैं. एक बार उसका पता मिलने पर हम आनंद के उस सागर में डूबते उतराते हैं, जहाँ प्रेम-भक्ति के सुख-सामर्थ्य के मोती-माणिक पड़े हैं, जो सहज ही हमारे हो जाते हैं. ईश्वर भी हमसे मिलने को उतना ही आतुर है जितना हम उससे मिलने को, हमारे एक कदम के जवाब में वह हजार कदम बढ़ाकर हमें थाम लेता है और एक बार थाम लिया तो फिर छोड़ता नहीं, सहज स्वभाव बन जाता है.

Monday, February 20, 2012

बालवत् ही स्वर्ग का अधिकारी है


दिसंबर २००२ 
शिशु नैसर्गिक होता है. सहज होता है. समाज में रहकर धीरे-धीरे वह निज स्वभाव को भूलता जाता है. उसके मूल स्वरूप पर धूल जमने लगती है. साधना हमारे मूल स्वरूप को उजागर करती है. इस के द्वारा हम पुनः सहजावस्था को प्राप्त होते हैं. बड़े होने के क्रम में जो भी अवांछित हमने सीखा है उसे अनसीखा करते हैं. बच्चे की तरह वर्तमान में रहते हैं, वह एक पल रो रहा है अगले ही पल हँसने लगता है. हम शिशु के रूप में कई योग मुद्राएँ व आसन आदि कर चुके होते हैं, इन्हें पुनः करने पर आसानी से सीख जाते हैं. हमारे शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न भाव व संवेदना जुड़ी है. मूलाधार आसक्ति, जड़ता व उत्साह का केन्द्र है. स्वाधिष्ठान सृजनात्मकता व काम वासना का केन्द्र है. नाभि के पास मणिपुर लोभ, ईर्ष्या, उदारता व संतोष का केन्द्र है. हृदय के निकट अनहत द्वेष, भय व प्रेम का केन्द्र है. कंठ पर विशुद्धि कृतज्ञता व दुःख का केन्द्र है. मस्तक पर आज्ञा, ज्ञान व क्रोध का केन्द्र है. सिर की चोटी पर सहस्रार आनंद का केन्द्र है. साधना से ये सारे केन्द्र जागृत होते हैं सकारात्मकता बढ़ती है.

Thursday, February 2, 2012

ध्यान की महिमा


हम ईमानदार क्यों नहीं रहते, अन्यों के साथ व अपने साथ भी. अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं. दूसरों की दृष्टि में नेक बनने की चाह हमें सच्चा होने से रोकती है. गुणवान होना व गुणवान दिखना दोनों ही सूक्ष्म वासनाएं ही तो हैं. हम अपने सहज स्वरूप में स्थित रहें तो बहुत सारी परेशानियों से बच जाते हैं. आत्म राज्य के अधिकारी होने की पहली शर्त यही है कि हम अपने सहज रूप में रहें. ईश्वर व हमारे बीच जो पर्दे हैं उनमें अहं सबसे प्रमुख है, यही हमें दूसरों की दृष्टि में बेहतर बनने को प्रेरित करता है और हम अपने पथ से भटक जाते हैं. नियमित ध्यान करने से सब कुछ अपने आप होने लगता है, तब हमें अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता. हृदय के सारे कलुष मिटने लगते हैं, अहं से मुक्ति मिलने लगती है, हमें अपने मूल स्वरूप की झलक मिलती है. सात्विक अभिमान जगता है कि हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं, तब जगत से कुछ पाना शेष नहीं रहता. हम आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तब हमारे व परम के बीच पर्दे हटने लगते हैं. इस तरह पहले मन को फिर वाणी को फिर कर्मों को हम शुद्ध करते जाते है, हम से ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे किसी अन्य का अहित हो, सजग रहते हुए अपने समय का सदपुयोग करते हुए हम मुक्ति का जीवन जीते हैं.

Wednesday, July 13, 2011

संत मन

नवम्बर २००० 
चलो सखि, यह मन संत बनाएँ ! यदि यह मन ( जो सारे क्रिया कलापों का केन्द्र बिंदु है) संत बन  जाये तो हम अपने सहज स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं. ऐसा मन जो आलोचना नहीं करता, नुक्ताचीनी से परे है, कुछ चाहता नहीं है, अपेक्षा नहीं रखता, लोभी नहीं है,  जो मुक्त है परम्पराओं से, पूर्वाग्रहों से, जड़ मान्यताओं से. मन जो कहीं अटका नहीं है, गतिमान है, संत की तरह, जल की धार की तरह बहता जाता है तट को भिगोता हुआ पर तट से बंधता नहीं. जिस पर कोई लकीर नहीं पड़ती जो प्रेम से ओत-प्रोत है, जीव मात्र के प्रति प्रेम से, जो अमानी है.