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Thursday, February 5, 2015

नित नूतन बहे रस धार

जनवरी २००८ 
परम ऊर्जा के साथ एक होने की कला सिखाने के लिए तीन मददगार हैं, परमात्मा, गुरू तथा शास्त्र ! परमात्मा की कृपा तो सब पर है उसने मानव देह प्रदान की है. अन्नमय, प्राणमय तथा मनोमय कोष तो पशु के भी जाग्रत हैं पर विज्ञान मय व आनन्दमय कोष केवल मानव को ही प्राप्त हैं. सद्गुरु के पास जब हम जाते हैं तो वह इन सारे कोशों को जाग्रत करना ही नहीं सिखाता इनके पार ले जाने की कला भी सिखाता है, जहाँ मुक्ति का द्वार खुल जाता है. विज्ञान को नमन कि उसने ज्ञान को कितना सुलभ बना दिया है, गुरू के द्वार यदि कोई नहीं  जा सकता तो टीवी आदि के माध्यम से गुरू ही घर आकर ज्ञान की मोती लुटाते हैं. ऐसा ज्ञान जो नित नवीन है, हमें सरस सहज बनाता है, एकरसता को तोड़ता है.    

Sunday, February 24, 2013

खो जाते हैं दुःख तब सारे



ईश्वर के बारे में जितना भी सुनें, मन तृप्त नहीं होता, वह नित नवीन है, रसमय है, उसका नाम भी उसी का रूप है. अंतर में जब उसका सुमिरन चलता रहता है, उसकी याद बनी रहती है तो हम दुःख  से बच जाते हैं, अन्यथा संसार का साथ हमें मिले तो दिन भर में कितनी बार मन कुम्हला जाता है. पर रहना तो हमें संसार में ही है, सो मन को इस तरह ढालना होगा कि जगत में रहकर भी वह प्रभु से जुड़ा रहे, अर्थात अपनी याद बनी रहे. हमारी एक-एक श्वास उसी की दी गयी है, उसकी अध्यक्षता में यह प्रकृति काम करती है, जो इस चराचर का नियम है. वही प्रभु प्रेम करने वाले अपने भक्त की निकटता में आनंद का अनुभव करता है. हम जब संसार में रहते हैं तो खुद को देह मानते हैं पर परमात्मा के साथ तो हम आत्मा रूप में ही मिल सकते हैं. हम न सिर्फ देह नहीं हैं बल्कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार नहीं हैं. हम वास्तव में उसके अंश हैं, उसमें हमारा स्नेह होना स्वाभाविक है. केवल प्रेम अथवा केवल भक्ति अथवा केवल कर्म अधूरे हैं, तीनों का समन्वय होना चाहिए. ज्ञान यही है कि हम देह नहीं है, भक्ति यही है कि हम उसका अंश हैं, वह विभु है हम अणु हैं. कर्म यही है कि हमारे सभी कर्म शुद्ध हों, करणीय कर्म ही करें, मनसा, वाचा, कर्मणा हमसे कोई ऐसा कर्म न हो जो बंधन में डालने वाला हो. सद्गुरु रूपी तीर्थ में हमें अपने मन के मालिन्य को धो डालना है.