Tuesday, July 28, 2026
गुरुतत्व जागे जब भीतर
Friday, July 17, 2026
मन के पार ही वह मिलता है
Monday, April 13, 2026
भावलोक के पार गया जो
भावलोक के पार गया जो
मन का स्वभाव है नीचे की ओर बहना, यह पानी की तरह तरल है। बुद्धि का स्वभाव है ऊपर की उठना, यह अग्नि की भाँति तेजपूर्ण है। इसलिए मन के लिए नदी की तरह बहते रहने की प्रार्थना की जाती है, रुका हुआ मन, एक ही बात पर अटका मन, पोखर में रुके पानी के समान दूषित हो जाता है। बुद्धि के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है। जैसे प्रकाश में सभी कुछ स्पष्ट दिखायी देता है। प्रखर बुद्धि में अपने दोष व कमियाँ स्पष्ट दिखायी दें, जिससे ठोकर खाने व दुख उठाने के अवसर न आयें। बुद्धि के पार ही भावलोक है, भावना से युक्त हुआ मन-बुद्धि जीवन में सरसता का अनुभव करता है, अन्यथा सब कुछ रुखा-सूखा सा प्रतीत होता है। भावना से परे आत्मा का लोक है जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है।
Wednesday, May 8, 2024
एक तलाश सदा जारी है
Sunday, November 26, 2023
जिस पल में मन मुक्त हुआ
संत कहते हैं और यह हमारा अनुभव भी है कि ज्ञान मन को मुक्त कर देता है. जब तक हमें किसी बात की पूरी जानकारी नहीं है, मन में संशय बने रहते हैं, पर ज्ञान होते ही मन ठहर जाता है। ठहरे हुए मन में अपने आप ही आनंद का अनुभव होता है, क्योंकि मन का मूल अथवा आत्मा आनंदस्वरूप ही है। आत्मा का ज्ञान पाकर ही बुद्धि भी वास्तव में बुद्धि कहलाने की अधिकारिणी है. उसके पहले मन तो अज्ञान के पाश में बंधा होता है, बुद्धि भी एक अधीनता का जीवन जीती है. बुद्धि मन की आधीन, इन्द्रियों की आधीन, धन, प्रसिद्धि, प्रशंसा की आधीन, मोह, क्रोध, अहंकार की आधीन होती है। इसके अतिरिक्त अवचेतन मन की सुप्त प्रवृत्तियों की अधीनता भी उसे स्वीकारनी पड़ती है. किन्तु आत्मा का ज्ञान होने के बाद जैसे कोई परदा उठ जाता है. मन, बुद्धि स्वयं को हल्का महसूस करते हैं.
Thursday, July 6, 2023
तोरा मन दर्पण कहलाये
मन उसी का नाम है जो सदा डांवाडोल रहता है, तभी मन को पंछी भी कहते हैं हिरन भी और वानर भी..आत्मा रूपी वृक्ष के आश्रय में बैठकर टिकना यदि इसे आ जाये तो इसमें भी स्थिरता आने लगती है, वास्तव में वह स्थिरता होती आत्मा की है प्रतीत होती है मन में, जैसे सारी हलचल होती बाहर की है प्रतीत होती है मन में।मन तो दर्पण ही है जैसा उसके आस-पास होता है झलक जाता है. संगीत की लहरियों में डूबकर यह मस्त हो जाता है और किसी उपन्यास के भावुक दृश्य में भावुक।ऐसे मन का चाहे वह अपना हो या अन्यों का क्या रूठना और क्या मनाना।क्यों न हर सुबह मन को समझते हुए प्रवेश करें ताकि न किसी से मनमुटाव हो और न किसी का मन टूटे. आत्मा रूपी वृक्ष पर कुसुम की तरह खिला रहे सबका मन.
Thursday, June 29, 2023
जीवन में जब आये योग
शास्त्रों के अनुसार हमार शरीर एक रथ है अथवा तो एक वाहन है। आत्मा इसमें यात्री है, बुद्धि सारथि अथवा वाहन चालक है। मन लगाम या स्टीयरिंग है। इंद्रियाँ घोड़े अथवा पहिये हैं। सामान्य तौर पर यात्री को जहां जाना है वह सारथी से कहता है और अपने गंतव्य पर पहुँच जाता है। किंतु इस आत्मा रूपी सवार को अपना ही बोध नहीं है, इसलिए उसे कहाँ जाना है इसका बोध कैसे रहेगा।चालक का भी लगाम पर नियंत्रण नहीं है, घोड़े भी मनमानी करते हैं। कोई उत्तर जाना चाहता है, जहां से सुंदर ध्वनियाँ आ रही हैं, कोई दक्षिण, जहां से सुंदर गंध आ रही है। इंद्रियाँ ऐसे ही मन को भटकाती हैं, बुद्धि मन के पीछे लगी है। आत्मा कहीं भी पहुँच नहीं पाती, हिचकोले खाती, उन्हीं दायरों में घूमती रहती है। कभी दुर्घटना हो जाती है तो वह चौंक कर जागती है, वाहन को दुरस्त कराती है, योग का जीवन में प्रवेश होता है। सारथि को लगाम पकड़ना सिखाना ही मन का नियंत्रण करना है। सारथि रूपी बुद्धि का ज्ञान से योग होता है तो जीवन की गाड़ी सही मार्ग पर चलने लगती है। मार्ग में सुंदर प्रदेशों के दर्शन करते हुए वह अन्यों का भी सहयोग करती है। जीवन का एक नया अध्याय आरंभ होता है।
Sunday, June 25, 2023
जब स्वीकार जगे अंतर में
यह जगत ईश्वर का ही साकार स्वरूप है। जड़-चेतन सबका आधार एक ब्रह्म है। एक ही ऊर्जा भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जीव और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है, सारे भेद ऊपर के हैं। अंत:करण में चैतन्य का आभास होने से बुद्धि स्वयं को चेतन मानने लगती है, और मिथ्या अहंकार का जन्म होता है।अहंकार हरेक को पृथकत्व का बोध कराता है, यह अलगाव ही जगत में दुख का कारण है। जो व्यर्थ तुलना और स्पृहा के कारण व्यथित हो जाये, जो नाशवान वस्तुओं के कारण स्वयं को गर्वित अनुभव करे, उस अहंकार का भोजन दुख ही है। मन, बुद्धि आदि जड़ होने के कारण स्वतंत्र नहीं है, प्रकृति के गुणों के अधीन हैं।जैसे कोई खिलौना स्वयं को गतिशील देखकर चेतन मान ले ऐसे ही चिदाभास या प्रतिबिंबित चेतना स्वयं को कर्ता मान लेती है। मानव सदा एकरस, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य आत्मा है।वह पूर्ण है, प्रेमस्वरूप है, आनंद उसका स्वभाव है। प्रेम तथा आनंद को व्यक्त करना दैवीय गुण हैं। आत्मा में रहना सदा स्वीकार भाव में होने का नाम है।
Sunday, May 21, 2023
जीवन जब उपहार बनेगा
Sunday, March 19, 2023
हर अभाव से मुक्त हुआ जो
Wednesday, February 8, 2023
जिसने उसको देखा भीतर
संतजन कहते हैं, परमात्मा का मिलना कठिन नहीं है, जो वस्तु हमारे निकट है उसको देखने के लिए कहीं जाना नहीं है, बल्कि उसके प्रति सजग होने की आवश्यकता है. हम अनुष्ठान, जप, तप आदि के द्वारा उसे पाना चाहते हैं, जो हमें मिला ही हुआ है।इनके द्वारा सद्गुरु हमें अहंकार तजने की कला सिखाते हैं, शरणागत होना सिखाते हैं और भीतर ही वह प्रकट हो जाता है जो सदा से ही वहाँ था. वह आत्मा के प्रदेश में हमारा प्रवेश करा देते हैं. आत्मा के रूप में परमात्मा सदा मन को सम्भाले रहता है, उसे रोकता है, टोकता है और परमात्मा के आनंद को पाने योग्य बनाता है, उसको पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता. वह सुह्रद है, हितैषी है, वह नितांत गोपनीय है उसे गूंगे का गुड़ इसीलिए कहा गया है. वह आनंद जो साधक को मिलता है सभी को मिले ऐसे प्रेरणा भी तब भीतर वही जगाता है.भक्ति का आरम्भ वहाँ है जहाँ हमें ईश्वर में जगत दिखता है और चरम वह है जहाँ जगत में ईश्वर दिखता है. पहले पहल ईश्वर के दर्शन हमें अपने भीतर होते हैं, फिर सबके भीतर उसी के दर्शन होते हैं. ईश्वर कण-कण में है पर प्रेम से उसका प्राकट्य होता है. सद्गुरु हमें वह दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे हम परम सत्ता में विश्वास करने लगते हैं. ईश्वर का हम पर कितना उपकार है यह तो कोई सद्गुरु ही जानता है और बखान करता है. शब्दों की फिर भी कमी पड़ जाये ऐसा वह परमात्मा आनंद का सागर है.
Friday, January 20, 2023
माया के जो पार हुआ है
Thursday, January 19, 2023
पूर्णमद: पूर्णमिदं
परमात्मा सर्वत्र है, हर काल में है; इस तरह वह हमारे भीतर भी है और बाहर भी, इस समय भी है। वह सर्वशक्तिमान है। अनंत प्रेम का सागर है। हमारा मन यदि उसमें से कुछ ग्रहण कर भी ले तो भी उसका कुछ घटेगा नहीं, यदि हम उसे अपना सारा प्रेम दे भी दें तो उसमें कुछ बढ़ेगा नहीं।अनादि काल से इस सृष्टि में हज़ारों जीव आए और उसके प्रेम के भागी बने पर वह ज्यों का त्यों है। हमारा मन यदि संकुचित है, लघु है, संकीर्ण है तो उसमें कम ही समाएगा। छोटा मन अहंकार का प्रतीक है और विशाल मन आत्मा का। संतों का मन विशाल होता है, वे मन को अनंत कर लेते हैं और सारा का सारा अनंत उसमें समा जाता है, फिर भी अनंत में कुछ घटता नहीं। वेदों में कहा गया है, संकीर्णता में दुःख है, विशालता में सच्चा विश्राम है। ऐसा ही शान्ति, शक्ति, सुख, ज्ञान, पवित्रता व आनंद के साथ है। वह इन सबका अजस्र स्रोत है और मानव को देने को तत्पर है। मन में यदि उन्हें पाने की चाह हो तो आत्मा के ये गुण अपने आप प्रकट होने लगते हैं।
Sunday, January 15, 2023
चेतन, अमल, अजर अविनाशी
संत कहते हैं “मैं कौन हूँ” इस सवाल का जवाब खोजने जाएँ तो भीतर एक गहन शांति के अतिरिक्त कुछ जान नहीं पड़ता। एक ऐसा भान होता है, जो अनंत है, विस्तीर्ण है, जो होना मात्र है, केवल शुद्ध चिन्मय तत्व है। वहाँ भौतिकता का लेश मात्र भी नहीं।जो मात्र जानने वाला है। न कर्ता है न भोक्ता , न उसे कुछ चाहिए, न उसे निज सुख के लिए कुछ करना है। जो स्वयं पूर्ण है, आनंद स्वरूप है, जो परमात्मा का अंश है। जो हर जगह है, हर काल में है। जिसका कभी नाश नहीं होता। जो सहज ही उपलब्ध है पर जिसके प्रति हम आँख मूँदे हैं। जो मन का आधार है। जो मन को विश्राम देता है। जो प्रेम, शांति, शक्ति व ज्ञान का स्रोत है। वही आत्मा, परमात्मा और गुरू है।
Tuesday, December 27, 2022
दो का भेद जानता है जो
जीवन दो से बना है। यहाँ दिन के साथ रात, सुख के साथ दुःख भी है। देह से जो सुख लिया है, उसकी क़ीमत दुःख से चुकानी पड़ती है। आँखों ने सुंदर दृश्य दिखाए, एक वक्त आता है जब नयन धुंधला जाते हैं। नासिका ने हज़ारों सुगंधियों की खबर दी है, किसी वक्त वह खबर देने से मना कर सकती है, बंद-बंद रहती है। स्वाद चखे होंगे अनेक जिह्वा से, पर कभी कोई स्वाद ही नहीं आता या बिगड़ ही जाता है ज़ायक़ा मुख का। घुटनों ने भी जवाब देना है एक दिन, दाँतों ने भी गिर कर साथ छोड़ना है। कर्ण ऊँचा सुनने लगते हैं। दिल है कि रह-रहकर धड़कता है। पूछता है, यह क्या हो रहा है ? किंतु आत्मा तब भी साक्षी बनी देखती है। वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करती, उसे एक उपकरण मिला था, जो अब पुराना हो रहा है, जिसमें टूट-फूट हो रही है, वह रहेगी जब तक सम्भव होगा, फिर त्याग जाएगी मुक्त पंछी की तरह ! देह के माध्यम से मन व्यक्त होता है, स्थूल का आश्रय लिए बिना सूक्ष्म व्यक्त नहीं हो सकता। बिजली के बल्ब के बिना प्रकाश कैसे होगा, तार में लाख बिजली दौड़ती रहे। वृक्ष हुए बिना फूल कैसे खिलेंगे, लाख जीवन शक्ति छिपी रहे बीज में। हाथों के बिना कैसे ग्रंथ लिखे जाएँगे, विद्वान मन में कितना विचार मंथन करते रहें। सूक्ष्म की अभिव्यक्ति स्थूल से संभव है। विचार स्थूल है, भाव सूक्ष्म; दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। सूर्य की धूप बाहर बिखरी हो पर कमरे के भीतर गर्मी के लिए हीटर चाहिए। परमात्मा हर जगह मौजूद है पर उसकी कृपा को अनुभव करने के लिए मन चाहिए। आत्मा मन से भी सूक्ष्म है, उसके गुण मन में प्रकट होते हैं और बाहर तरंगों के रूप में शांति का प्रसाद मिलता है। जीवन दोनों का समन्वय है।
Friday, July 8, 2022
करे संचयन ऊर्जा का जो
कृष्ण हमारी आत्मा हैं और अष्टधा प्रकृति ही मानो उनकी आठ पटरानियाँ हैं। रानियाँ यदि कृष्ण के अनुकूल रहेंगी तो स्वयं भी सुखी होंगी और अन्यों को भी उनसे कोई कष्ट नहीं होगा। इसी तरह मन, बुद्धि, अहंकार और पंच तत्व ये आठों यदि आत्मा के अनुकूल आचरण करेंगे तो देह भी स्वस्थ रहेगी और जगत कल्याण में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। आत्मा ऊर्जा का स्रोत है। मन से संयुक्त हुईं सभी इंद्रियाँ ऊर्जा का उपयोग ही करती हैं, मन यदि संसार की ओर ही दृष्टि बनाए रखता है तो अपनी ऊर्जा का ह्रास करता है. बुद्धि यदि व्यर्थ के वाद-विवाद में अथवा चिंता में लगी रहती है तब भी ऊर्जा का अपव्यय होता है। जैसे घर में यदि कमाने वाला एक हो और उपयोग करने वाले अनेक तथा सभी खर्चीले हों तो काम कैसे चलेगा. मन को ध्यानस्थ होने के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता है, तब ऊर्जा का संचयन भी होता है. यदि दिवास्वप्नों में या इधर-उधर के कामों में वह उसे बिखेर देता है तो मन कभी पूर्णता का अनुभव नहीं कर पाता. उसे यदि एक दिशा मिल जाए तभी वह संतुष्टि का अनुभव कर सकता है, वरना जो ऊर्जा हम नित्य रात्रि में आत्मा के सान्निध्य में जाकर गहन निद्रा में प्राप्त करते हैं, दिन में जल्दी ही खत्म हो जाती है, और साधना, अन्वेषण या सृजन जैसा कोई महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए हमारे पास शक्ति ही नहीं होती।
Tuesday, May 17, 2022
जीवन का आधार वही है
Sunday, May 15, 2022
जीवन एक यात्रा सुंदर
जैसे जमीन की गहराई में पानी तथा तेल छिपा होता है, गहरी खुदाई करके निकला जाता है, वैसे ही शरीर की गहराई में आत्मा की अनंत शक्ति छिपी है जिसे उजागर करने पर स्वास्थ्य सहज ही मिलता है. खिडकियों पर भारी पर्दे लगे हों तो कमरे में प्रकाश मद्धिम सा ही दीख पड़ता है वैसे ही यदि मन पर प्रमाद छा जाये तो आत्मा की शक्ति ढक जाती है व तन अस्वस्थ हो जाता है. किसी संस्थान को सुचारू रूप से चलाने के लिये अनुशासन बहुत जरूरी है वैसे ही शरीर रूपी संस्थान ठीक रहे इसके लिये सोने, जगने व्यायाम, भोजन का अनुशासन बहुत जरूरी है. प्रकृति में एक गति है, लय है, रात-दिन तथा ऋतु परिवर्तन उसी लय के अनुसार होते हैं वैसे ही तन, श्वास तथा मन में भी एक लय है रिदम है जिसके बिगड़ने पर रोग हो सकते हैं. कार के भीतर ड्राइवर स्टीयरिंग पर से कंट्रोल छोड़ दे तो दुर्घटना होगी ही वैसे ही तन रूपी रथ की सारथी बुद्धि, मन रूपी घोड़े को खुला छोड़ दे, भोजन, नींद, व्यायाम में संयम, तथा सही मात्रा व सही समय का ध्यान न रखे तो हम स्वस्थ कैसे रह सकते हैं.शरीर के भीतर स्वयं को स्वस्थ रखने का पूरा प्रबंध है बस उसे हमारा सहयोग चाहिए जरूरत से ज्यादा उसे थकाएं भी नहीं और आराम भी न दें.नम वातावरण में, गीले मौसम में ठंडी चीजें नुकसान करती हैं, इनसे दूर ही रहें.जैसे हम रेल यात्रा करने जाएँ तो हमारी सीट, कूपा तथा सहयात्री सभी पहले से तय होते हैं वैसे ही जीवन यात्रा में हमें जहाँ-जहाँ जो मिलेगा वह पूर्व निर्धारित है, जैसे हम रेल यात्रा को सुखद बनाना जानते हैं, वैसे ही सही दृष्टिकोण रखकर हम जीवन यात्रा को सुखद बना सकते हैं.