संत कहते हैं “मैं कौन हूँ” इस सवाल का जवाब खोजने जाएँ तो भीतर एक गहन शांति के अतिरिक्त कुछ जान नहीं पड़ता। एक ऐसा भान होता है, जो अनंत है, विस्तीर्ण है, जो होना मात्र है, केवल शुद्ध चिन्मय तत्व है। वहाँ भौतिकता का लेश मात्र भी नहीं।जो मात्र जानने वाला है। न कर्ता है न भोक्ता , न उसे कुछ चाहिए, न उसे निज सुख के लिए कुछ करना है। जो स्वयं पूर्ण है, आनंद स्वरूप है, जो परमात्मा का अंश है। जो हर जगह है, हर काल में है। जिसका कभी नाश नहीं होता। जो सहज ही उपलब्ध है पर जिसके प्रति हम आँख मूँदे हैं। जो मन का आधार है। जो मन को विश्राम देता है। जो प्रेम, शांति, शक्ति व ज्ञान का स्रोत है। वही आत्मा, परमात्मा और गुरू है।
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Sunday, January 15, 2023
Wednesday, February 26, 2014
'मैं' जाये तो 'है' आये
अगस्त २००५
हम क्या हैं, यह तक नहीं
जानते, शरीर, मन, बुद्धि तो जड़ हैं, परमात्मा की अपरा प्रकृति के अंश हैं. आत्मा
परा प्रकृति का अंश है, तो हम मध्य में कहाँ आये. जो ‘मैं’ का आभास होता है, वह
अहंकार है, कर्म संस्कार, कामनाएं और कुछ संकल्प-विकल्प जुड़कर एक पहचान बनी है जो ‘मैं’
है, लेकिन साधक को तो इस मिथ्या अहंकार को त्यागना है, शुद्ध आत्मा के रूप में
पहचान हो जाने पर तो ‘मैं’ बचता ही नहीं, केवल ‘है’ शेष रहता है. जैसे प्रकृति है,
वैसे ही आत्मा है, इस तरह विचार करके हमें अहम् का त्याग करना है, मन खाली हो जाने
पर ही भीतर आत्मा का राज्य होगा.
Thursday, September 19, 2013
'मैं' से' 'मैं' तक
फरवरी २००५
प्रभु !
तू याद आता क्यों नहीं है
इस दिल में समाता क्यों
नहीं है
हमारी सोच ‘मैं’ से
शुरू होती है और ‘मैं’ पर खत्म भी होगी. हम जो भी कर्म कर रहे होते हैं चाहे वे
अपने लिए हों या दूसरों के लिए, ‘मैं’ की धुरी के इर्द-गिर्द ही होते हैं.
अस्तित्त्व से जुड़े बिना हमारे कार्यों, वाणी तथा विचारों में गहराई नहीं आती, हम
सतही स्तर पर ही जीवन जिए चले जाते हैं, पर जब हम अपने भीतर की सत्यता का अनुभव
करते हैं तो हमारा ‘मैं’ जो पहले संकीर्ण था, अब सब कुछ उसमें समा जाता है, जीवन
जैसा आता है उसे वैसा स्वीकारने की क्षमता पैदा होती है. हमारे ‘स्व’ का विस्तार
होता है, सभी के भीतर उसी एक अस्तित्त्व का दर्शन हमें होता है.
Friday, October 28, 2011
आत्मा का संगीत
जून २००२
ईश्वर को जानना हो तो पहले खुद को जानना होगा, अर्थात जो आज तक हम स्वयं को मानते आये हैं, उससे अलग अपने सच्चे ‘मैं’ को जानना, मन व बुद्धि के द्वारा जो खुद को जाना है उससे भी परे जहाँ मन रहता ही नहीं, और खुद को जानने के लिये वर्तमान में रहना होगा. वर्तमान में रहने से ही ध्यान सधता है. ध्यान में हम अपने तन रूपी साज को साध कर मन के पार जाकर आत्मा का संगीत उजागर करते हैं, जिसके द्वारा ईश्वर को रिझाया जाता है.
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