Thursday, August 27, 2026
Saturday, August 8, 2026
जीवन में जब ध्यान सधेगा
यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।
Wednesday, July 22, 2026
जीवन में जब योग सधेगा
Sunday, July 19, 2026
मन जब भीतर मुड़ जाएगा
Sunday, July 27, 2025
ध्यान ही बना जाता है ज्ञान
ध्यान का फल ज्ञान है, कोई जगत में लगाये या परमात्मा में। संसार में जिसका ज्ञान मिल जाता है, वहाँ से ध्यान हट जाता है क्योंकि ध्यान ज्ञान बन गया है। पदार्थ में जोड़ा ध्यान व्याकुलता को जन्म देता है, क्योंकि जब एक पदार्थ का ज्ञान मिल जाता है, दूसरे को जानने की चाह जग जाती है, पर इतने बड़े जगत में कितना कुछ अनजाना है ।अपनी इस व्याकुलता को भूलने के लिए मानव क्या-क्या नहीं करता? वह अपने आप को इतर कामों में लगाकर उस प्रश्न से बचना चाहता है; जो उसे व्याकुल कर रहा है। वह जगत को दोनों हाथों से बटोर कर अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है पर वह भी नहीं कर पाता; क्योंकि जगत में सभी कुछ नश्वर है। वह तब भी जगता नहीं बल्कि नींद के उपाय किये जाता है। जब तक कोई मांग है तब तक भीतर की स्थिरता को अनुभव नहीं किया जा सकता। संसार भीतर का प्रतिबिम्ब है। परमात्मा सदा रहस्य बना रहता है, वह हर कदम पर आश्चर्य उत्पन्न होने की स्थिति पैदा कर देता है! यदि कोई परमात्मा में ध्यान लगाये तो वह ज्ञान होने के बाद भी नहीं हटता क्योंकि परमात्मा का ज्ञान कभी पूरा नहीं होता।
Thursday, May 30, 2024
मध्य मार्ग में चलना होगा
जो प्रसन्नता किसी बाहरी वस्तु पर आधारित नहीं है, उसमें कोई उत्तेजना नहीं है। यह मौन से उपजी है। इसमें मन शांत हो जाता है। यहाँ कुछ भी विशेष नहीं घटता है। यहाँ अहंकार छूट गया है। ऐसी मनोदशा में न ही निराशा है ना आशा, न सुख न दुख। यह वास्तविक मुस्कान है, जिसमें आँसुओं की गहराई भी छिपी है।क्योंकि विपरीत मध्य में एक हो जाते हैं। यदि हम सुख की तलाश करते हैं, तो दुख पीछे आने ही वाला है। यदि शांति, स्थिरता, मौन की तलाश करते हैं, तो भीतर एक स्थिरता का अनुभव होगा। ध्यान में यही घटता है । पल-पल सहजता से आगे बढ़कर उस मौन को पकड़ना है। इसे पोषित करके, इसकी रक्षा करनी है। संतोष का यही अर्थ है, जो कुछ भी है, वह अच्छा है। कोई जहाँ भी है, वह जब कृतज्ञता अनुभव करता है, तब भीतर जो प्रार्थना घटित होती है, वह तत्क्षण फलित होती है।
Thursday, May 2, 2024
ध्यान, मुक्ति में भेद नहीं है
संत कहते हैं, साधक को हर सुबह अपने दिन की शुरुआत ऐसे करनी चाहिए जैसे कि वह पहली बार जगत को देख रहा है। ध्यान का अर्थ ही है, हर पल को गहराई से महसूस करना, हर पल ओस की तरह ताज़ा है, अभी है अभी नहीं रहेगा। अतीत मृत हो चुका है। जब हम अतीत को भुला देते हैं तो भविष्य की आशंका भी नहीं रहती।केवल शुद्ध वर्तमान रह जाता है। परमात्मा की उपलब्धि वर्तमान में ही हो सकती है। अतीत और भविष्य हमें स्मृति या कल्पना से बांधे रखते हैं। जबकि हर आत्मा की पुकार स्वतंत्रता है।शिशु भी मुक्त होना चाहता है और वृद्ध भी, किसी को भी आदेश या शासन में रहना नहीं भाता। अनुशासन का अर्थ है, स्वयं पर स्वयं का लगाया गया प्रतिबंध, जिसके भीतर हम मुक्त हैं। जब अतीत का बोझ नहीं है और आने वाले कल की चिंता नहीं है तभी मन अपने शुद्ध व मुक्त स्वरूप का अनुभव कर सकता है। यही ध्यान है।
Wednesday, March 13, 2024
ध्यान में डूबा हो जब अंतर
एक बार एक व्यक्ति किसी संत के पास गया और दुख से मुक्ति का मार्ग पूछा। संत ने कहा, ध्यान, उसने कहा कुछ और कहें, संत ने दो बार और कहा, ध्यान ! ध्यान ! जब हम स्कूल में पढ़ते थे, अध्यापक गण हर घंटे में कहते थे, ध्यान दो, ध्यान से पढ़ो।घर पर माँ बच्चे को कोई समान लाने को कहे तो पहले कहेगी, ध्यान से पकड़ो। सड़क पर यदि कोई ड्राइवर गाड़ी ठीक से न चलाये, तो कहेंगे, उसका ध्यान भटक गया। इसका अर्थ हुआ ध्यान में ही सब प्रश्नों का हल छिपा है।ध्यान हमारी बुद्धि की सजगता की निशानी है। जब बुद्धि सजग हो तो भूल नहीं होती। इसी तरह जब मन ध्यानस्थ होता है तो सहज स्वाभाविक प्रसन्नता तथा उजास चेहरे पर स्वयमेव छाये रहते हैं, उनके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता. मन से सभी के लिए सद्-भावनाएँ उपजती हैं. यह दुनिया तब पहेली नहीं लगती न ही कोई भय रहता है. ध्यान से उत्पन्न शांति सामर्थ्य जगाती है और सारे कार्य थोड़े से ही प्रयास से होने लगते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो तो अंतर्मन में एक अनिवर्चनीय अनुभूति होती है, ऐसा सुख जो निर्झर की तरह अंतर्मन की धरती से अपने आप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है, जीवन एक सहज सी क्रिया बन जाता है कहीं कोई संशय नहीं रह जाता.
Sunday, April 16, 2023
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
Saturday, February 25, 2023
ध्यान को जिसने साध लिया है
Friday, December 30, 2022
नए साल की शुभकामना
Friday, September 2, 2022
चाह ज्ञान की जगे निरंतर
जीवन अनुभवों का दूसरा नाम है। हर अनुभव हमें कुछ न कुछ सिखाता है। यदि हम सीखने को सदा जारी रखें तो जीवन एक सुंदर यात्रा बन जाता है। यदि कोई कुछ सीखना न चाहे तो उसके लिए जीवन एक संघर्ष बन जाएगा। बच्चा सीखता है, इसलिए उसका मन ताज़ा बना रहता है। विद्यार्थी सीखता है और नए-नए विषयों को जानकर चमत्कृत होता है। प्रौढ़ होते-होते जैसे-जैसे सीखने की चाहत कम होती जाती है और तब सीमित ज्ञान के सहारे जीवन को चलाए जाने में सुरक्षा महसूस होती है। धीरे-धीरे जीवन से रस और आनंद सूखने लगता है। यह दुनिया अति विशाल है, इसके बारे में हम कितना कम जानते हैं। अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान का कोई भी क्षेत्र लेकर हम उसके बारे में पढ़ें, सोचें व मनन करें तो कई नई बातों की ओर हमारा ध्यान अनायास ही जाएगा। कई ऐसी बातें हमें नज़र आ सकती हैं जो पहले नज़र अन्दाज़ कर देते थे। नियमित ध्यान इसमें अति सहायक है। ध्यान हमें एक विषय पर केंद्रित रहने की कला सिखाता है। ज्ञान अनंत है और हमारी चेतना में ही निहित है। उसमें प्रवेश करने का तरीक़ा ध्यान, अध्ययन व मनन ही हो सकता है।
Friday, March 11, 2022
प्रेम गली अति सांकरी
Wednesday, January 5, 2022
ध्यान का जो अभ्यास करे
देह में रहते हुए देहातीत अवस्था का अनुभव ही ध्यान है। स्थूल इंद्रियों से स्थूल जगत का अनुभव होता है, सूक्ष्म इंद्रियों से स्वप्न अवस्था का अनुभव होता है। गहन निद्रा में स्थूल व सूक्ष्म दोनों का भान नहीं रहता। ध्यान उससे भी आगे का अनुभव है, जब निद्रा भी नहीं रहती, चेतना केवल अपने प्रति सजग रहती है। ध्यान के आरम्भिक काल में इस अवस्था का अनुभव नहीं होता है, पर दीर्घकाल के अभ्यास द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। एक बार इसका अनुभव होने के बाद भीतर स्मृति बनी रहती है। इसे ही भक्त कवि सुरति कहते हैं। इस अवस्था में गहन शांति का अनुभव होता है, मन में यदि कोई विचार आता है तो चेतना उसकी साक्षी मात्र होती है। देह में होने वाले स्पंदन और क्रियाएँ भी अनुभव में आती हैं, किंतु साक्षी भाव बना रहता है। जब विचार भी लुप्त हो जाएँ और देह का भान ही न रहे इसी अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि के अनुभव से सामान्य बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है। मन में स्पष्टता और आनंद का अनुभव होता है।
Sunday, November 28, 2021
माटी में मिल जाए माटी
जैसे गागर माटी की बनी है, टूट जाए तो माटी का कुछ नहीं बिगड़ता, वैसे ही मन आत्मज्योति से उपजा है; मन उदास हो, चिंतित हो तो ज्योति का कुछ नहीं घटता। आत्मा का न कोई आकार है न ही उसमें कभी कोई विकार होता है। मन को सुख और पूर्ण विश्राम पाना हो तो कुछ देर के लिए सब कुछ भुलाकर स्वयं से मिलना सीखना होगा। मन का काम है सोचना, वह कभी एक जगह टिककर रहना नहीं जानता, इसी कारण अपनी ऊर्जा को व्यर्थ ही खर्च करता है, आत्मा ऊर्जा का स्रोत है, उससे जुड़कर वह सहज ही अपनी शक्ति को कई गुणा बढ़ा सकता है। मन जब यह जान लेता है तो अपने मूल से जुड़ जाता है, गहरी नींद में व ध्यान में मन वहीं पहुँच जाता है। आत्मा के साथ एक होकर वह उसी तरह अमरता का अनुभव करता है जैसे घड़ा मिट्टी में मिलकर उससे एक हो जाता है, जिसका कभी नाश नहीं होता।
Tuesday, November 9, 2021
जीवन का जो मान करे
जीवन हमें उपहार रूप में मिला है। मन, बुद्धि व संस्कार के रूप में अथवा इच्छा, ज्ञान और कर्म के रूप में हमारे भीतर अस्तित्त्व ने तीन शक्तियाँ प्रदान की हैं। पंच इंद्रियों के माध्यम से हम इस जगत का एक सीमित रूप ही अनुभव कर पाते हैं, जो स्थूल है, किंतु स्वप्न में हम सूक्ष्म जगत की झलक भी पाते हैं। इन दोनों के पार है कारण जगत जो गहरी नींद में जाने पर आत्मा को अनुभव में आता है किंतु मन या बुद्धि को उसकी कोई खबर नहीं मिलती। आत्मा उसके भी पार है जिसका अनुभव केवल ध्यान में किया जा सकता है। संत और शास्त्र इसलिए ध्यान का इतना महत्व बताते हैं। उस अवस्था में हम मन और बुद्धि को अपने अनुकूल व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं अन्यथा वे राग-द्वेष के चलाए चलते हैं और अक्सर अपनी ही हानि कर बैठते हैं। मन में उठने वाला तनाव, चिंता, उदासी अथवा कोई भी नकारात्मक भाव इसी कारण से होता है, जिसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है।
Saturday, November 6, 2021
जीवन में जब उतरे ध्यान
Saturday, September 18, 2021
ध्यान साधना होगा मन को
ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. यह ज्ञात होता है कि हमारे भीतर कितनी सुंदरता छिपी है, जहाँ ईश्वर का वास है वहाँ सौंदर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इन अनुभवों से बल मिलता है. शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो, सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. अनंत धैर्य के साथ धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये भी कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से ईश्वर का स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. संत कहते हैं, मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. जबकि परमशक्ति शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाती नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है. जो
Wednesday, September 1, 2021
मुक्ति का जो मार्ग चुनेगा
जब मन सीमित होता है तब असीम को जान नहीं पाता। उधेड़बुन में लगा रहता है तो विश्राम नहीं पाता । जब कुछ न कुछ चाहता है तब उतना ही पाता है। जिस क्षण भी हर चाह खो जाती है, अस्तित्त्व बरस जाता है। ध्यान का अर्थ है हर चाह, हर क्रिया, हर पहचान खो जाए, वही रहे जो सदा से है और सदा रहेगा। वहीं से प्रेम और शांति का दरिया बहेगा । उन पलों में कोई बोझ नहीं उठाना होगा, किसी को कुछ करके नहीं दिखाना होगा। ऊर्जा निर्बाध तन में बहेगी, प्रकृति जिसका उपयोग सहज ही करेगी। कृत्य होंगे पर कर्ता नहीं होगा। ध्यान मुक्ति का मार्ग दिखाता है और स्वयं से मिलाता है।