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Sunday, December 5, 2021

तोरा मन दर्पण कहलाये

हमारा तन स्वस्थ रहे ताकि हम साधना कर सकें, साधना करें ताकि मन स्वस्थ रहे, मन स्वस्थ रहे ताकि अंतर साधना हो सके, अंतर साधना हो ताकि मन निर्मल हो, मन निर्मल हो ताकि उसमें परम सत्य का प्रकाश हो, परम सत्य को पायें क्यों कि सत्य ही शिव और सुंदर है, शिव को पायें ताकि हम सभी के लिए सुखद हो जाएँ, हमारे होने से जड़-चेतन किसी को कोई उद्वेग न हो, न ही हमें किसी से कोई उद्वेग हो. सौन्दर्य को पाकर हम चारों ओर सुन्दरता बिखेरें. कुछ भी ऐसा न कहें, सोचें, न करें जो इस जगत को क्षण भर के लिए भी असुन्दर बना दे. ईश्वर की इस सुंदर सृष्टि को देख-देख हम चकित होते हैं, विभोर होते हैं, भीतर प्रेम का अनुभव करते हैं तो और भी चकित होते हैं, कैसे अद्भुत भाव भीतर जगते हैं, यह क्या है? कौन है? किसे अनुभव होता है? कौन अनुभव कराता है? कौन प्रेम देता है? कौन प्रेम लेता है ? ये सारे भाव शब्दों की पकड़ में नहीं आते. संतों की आँखों से ये पल-पल झरते हैं.

Wednesday, October 13, 2021

जीवन ही जब बने साधना

साधना के द्वारा जब जीवन से जड़ता और प्रमाद चले जाते हैं, तभी किसी न किसी नवीन  सृजन का कार्य आरम्भ होता है। मन से परिग्रह का उन्माद भी खो जाता है और सहज संतोष अनुभव होता है। भय तभी होता है जब कुछ बचाए रखने की कामना रहे, इसलिए अपरिग्रह सधते ही अभय का जन्म साधक के जीवन में होता है। ऐसा व्यक्ति ही निस्वार्थ  प्रेम दे सकता है। उसके मन में कृतज्ञता की भावना पनपती है और हर उपलब्धि को वह ईश्वर का अनुग्रह मानकर स्वीकार करता है।अब  राग-द्वेष की आँच नहीं जलाती अपितु निरंतर एक सजगता बनी रहती है। उसके कर्म अब बंधन का कारण नहीं बनते बल्कि  मन को शुद्ध करने के हेतु बनते हैं। चित्तशुद्धि होते-होते  साधक एक न एक दिन समाधि के परम आनंद  को प्राप्त होता है। 


Saturday, September 18, 2021

ध्यान साधना होगा मन को

 ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. यह ज्ञात होता है कि हमारे भीतर कितनी सुंदरता छिपी है, जहाँ ईश्वर का वास है वहाँ सौंदर्य  बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इन अनुभवों से बल मिलता है. शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो, सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. अनंत धैर्य के साथ धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये भी कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से ईश्वर का स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष  से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. संत कहते हैं, मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. जबकि परमशक्ति  शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाती नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है. जो

Friday, April 2, 2021

चिर वसन्त की चाह जिसे है

 साधना में कुछ पाना नहीं है, खोना है. तन, मन दोनों से पसीना बहाकर विषैले तत्वों को बाहर निकालना है. जीवन एक पुष्प की तरह खिले इसके लिए मन की माटी में भक्ति का बीज बोना होगा, श्रद्धा का बीज, आस्था का बीज, जो धीरे-धीरे जड़ें फैलाएगा और स्वार्थ के सारे कूड़े-करकट को खाद बनाकर उसे सुंदर आकार, रंग और गन्ध में बदल देगा. धरती में वह क्षमता है , वैसे ही मन की माटी में भी. हम जो भी सच्चे मन से चाहते हैं वह हमें दिया ही जाता है. यहां कोई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती. सुख उत्तेजना का नाम है या आसक्ति का, दुःख द्वेष का नाम है अपनी इच्छा पूरी न होने का. आनंद तो एक विशेष मन:स्थिति है जो किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या घटना पर आधारित नहीं है. वह तो सदा ही एक रस है. साधक को जब अपनी निर्विकार स्थिति का भान होता है, तभी आनंद का अनुभव होता है. हम जो भी देखते हैं वह हमसे बाहर है, यदि हमें स्वयं को देखना हो तो कैसे देखेंगे ? पतंजलि कहते हैं जब देखे हुए और सुने हुए के प्रति आकर्षण न रहे तब चेतना स्वयं में लौट आती है, तब स्वयं के द्वारा ही स्वयं को देखा जाता है. तब साधक के जीवन में चिर बसंत का पदार्पण होता है


Wednesday, April 8, 2020

साध सके जो मन का मौन


आज जबकि हम घरों में बंद हैं, एक कार्य जो हमारे शास्त्र, आचार्य और संत कहते आये हैं, बखूबी कर सकते हैं. वह कार्य है मौन की साधना. दिन भर में चाहे एक घन्टा ही सही, यदि हम पुरे मौन का पालन करें, तो अपनी बहुत सी ऊर्जा को बचा सकते हैं. उस एक घण्टे में हमें न केवल किसी अन्य से वार्तालाप नहीं करना है वरन अपने आप से भी नहीं करना है. जो मन सदा ही कुछ न कुछ योजना बनाता है अथवा पुरानी बात को सामने लाकर उस पर टीका-टिप्पणी करता है, उसे पूरा मौन करना सिखाना है. जो बात वह कई बार सोच चुका है, उसे जुगाली करने की उसकी आदत को तोड़ना है. किसी अप्रिय बात को स्मरण करके जो वह झुंझला जाता है, उसे भी छोड़ना है. वास्तव में अतीत में गया मन एक छाया के सिवा कुछ भी नहीं है, छाया को यदि मिटाना है तो प्रकाश की तरफ आना होगा, वर्तमान के प्रकाश में सारी छायाएं मिट जाती हैं. जो कहीं है ही नहीं हम उससे परेशानी खड़ी कर लेते हैं. जो अभी घटा ही नहीं उसकी आशंका मन जगाये तो फिर उसे वर्तमान में ले आना है और उसका सबसे सरल उपाय है, अपनी श्वास पर ध्यान देना. श्वास सदा वर्तमान में रहती है, वह परमात्मा से जोड़े रखने वाली डोरी है. डोरी भी ऐसी कि यदि श्वास एकतार हो जाये तो परमात्मा की सुवास उसमें से बहकर आने लगती है. शांति का एक बादल हमारे चारों ओर छाने लगता है. हाथ में आये इस समय में से नियमित मौन का अभ्यास करके हम आने वाले दिनों के लिए स्वयं को तैयार रख सकते हैं.  

Monday, July 29, 2019

भीतर बाहर एक हुआ जो


एक जीवन बाहर है और एक जीवन भीतर है. साधना का लक्ष्य है दोनों में समरसता लाना. हम घर में रहते हैं और बाहर भी जाते हैं. साधना का लक्ष्य है दोनों जगह हमारे मन का भाव रसमय बना रहे. यदि भीतर अशांति है तो लाख न चाहने पर भी हमारे व्यवहार में वह झलक ही जाएगी. यदि भीतर शांति है तो बाहर के शोरगुल में भी हमारा व्यवहार सौम्य बना रह सकता है. साधक के जीवन में एक दिन ऐसा भी आता है जब भीतर और बाहर का सारा भेद खो जाता है, तब उसके व्यवहार में सहजता प्रकट होती है. उसी दिन वह अपनी दृष्टि में प्रामाणिक होता है, और जगत में उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. संत व शास्त्र बताते हैं इसके लिए स्वयं को जानना पहला कदम है. ध्यानपूर्वक जब हम अपने मन को देखना आरंभ करते हैं तो वह सारी चतुराई छोड़ने को तैयार हो जाता है. पहले पहल विकार प्रबल होते हुए लगते हैं पर धैर्यपूर्वक उनका दर्शन करने से वे अपना असर खोने लगते हैं. मन की गहराई में छिपा रस प्रकट होने लगता है और सहज ही बाहर जीवन बदलने लगता है.  

Tuesday, July 2, 2019

एक यात्रा है अनंत की



भगवद् गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को अभ्यास और वैराग्य का उपदेश देते हैं. अभ्यास समर्पण का और वैराग्य सांसारिक सुखों से. हमारा समर्पण बार-बार खंडित हो जाता है, और जगत से वैराग्य भी नहीं सधता. जरा सी प्रतिकूलता आते ही भीतर संदेह भर जाता है, अल्प सुख के लिए हम जगत के पीछे निकल पड़ते हैं. गुरु कहते हैं, हजार बार भी टूटे फिर भी समर्पण किये बिना अंतर की शांति को अनुभव नहीं किया जा सकता. इसी तरह एक दिन साधक सुख के पीछे जाना छोड़ देता है क्योंकि उसका सुख बार-बार दुःख में बदल गया है. वह असत्य की राह भी त्यागता है क्योंकि उस पथ पर कांटे ही कांटे मिले. अनुभवों से सीखकर ही हम आगे बढ़ते हैं. साधना का पथ एक अंतहीन यात्रा पर हमें ले जाता है. परमात्मा अनंत है, हमारे सारे प्रयास अल्प हैं, किंतु संतों का जीवन देखकर भीतर भरोसा जगता है, वे भी इसी तरह पग-पग चल कर ही इस अनंत शांति और आनंद  के भागी हुए हैं.

Monday, June 10, 2019

एक साधना ऐसी भी हो



हम जीवन को सुख मानकर चलते हैं पर कदम-कदम पर हमारा सुख बाधित होता है. हमने मान लिया है कि धन में सुख है, यश में सुख है, इन्द्रियों की मांग पूरी करने में सुख है. किंतु जरा गहराई से देखें तो पता चलता है, यह सुख कितना क्षणिक है, इन सबकी प्राप्ति से पूर्व दुःख है, इनके खो जाने के भय में दुःख है. यदि हम यह मानकर चलें कि जिस जीवन से हम परिचित हैं, उसमें सुख नहीं है, तो दुःख मिलने पर हमें कोई धक्का तो नहीं लगेगा. दुःख को हम सहज रूप से स्वीकार कर लेंगे और हमारी ऊर्जा व्यर्थ ही उसका प्रतिरोध करने में नहीं लगेगी. एक बात और होगी, जिस जीवन में सचमुच सुख है क्या कोई ऐसा भी जीवन है, इसकी तलाश भी भी हमारे भीतर जगेगी. उसी तलाश का नाम साधना है, योग है. जिस सुख की प्राप्ति के पहले भी कोई दुःख न हो, जिसके खो जाने का भय भी न हो और जो शाश्वत हो ऐसा सुख केवल ध्यान के द्वारा ही मिल सकता है.

Friday, March 22, 2019

बाँध सके न कर्म जिसे



जीवन के दो ढंग हो सकते हैं. पहले में हम अपने सुख-दुख के लिए स्वयं को जिम्मेदार समझते हैं और दूसरे में जगत को. संसार में रहते हुए जो भी कर्म हमें करने हैं उनके पीछे की चेतना यदि पहले प्रकार की है तो वह कर्म को पूरी निष्ठा के साथ करेगी, व्यक्तिगत हानि-लाभ से ऊपर उठकर जो भी आवश्यक है उसके लिए प्रयत्न करेगी. जबकि दूसरे प्रकार की चेतना वाले व्यक्ति कर्म को भार भी समझ सकते हैं और अपने अहंकार को बढ़ाने का साधन भी. कर्म चाहे कोई भी हो, सेवा, दान, धर्म अथवा खेती, नौकरी और व्यापार, इसे करने वाले के मन की स्थिति कैसी है इस बात पर उस कर्म का फल उसे मिलेगा. स्वयं को जाने बिना हम यह कभी नहीं जान पाएंगे कि किस कर्म का कौन सा फल हमने अपने लिए नियत कर लिया है. इसीलिए योग साधना का इतना महत्व है.

Wednesday, February 20, 2019

खुद से एक हुआ जो साधक


२१ फरवरी २०१९ 
ब्रह्मांड से एकत्व की अनुभूति साधक का लक्ष्य है और स्वयं से एकत्व पहला कदम है. स्वयं से जुड़े बिना यह सम्भव ही नहीं हो सकता कि हम जगत से जुड़ा हुआ महसूस करें. आज समाज में जो बिखराव और संबंधों में दूरियां नजर आ रही हैं इसका कारण है मानव खुद से ही दूर होता जा रहा है. प्रदर्शन और विज्ञापन के इस युग में हर कोई कृत्रिमता को अपना रहा है. सत्य और समर्पण जैसे मूल्य उसके जीवन से विस्थापित हो गये हैं. जो लोग एक स्थान पर टिके रहकर काम नहीं कर सकते, संस्था और व्यक्तियों के प्रति उनके मन में लगाव या निष्ठा ही जन्म नहीं ले पाती. परिवर्तन तो संसार का नियम ही है, लेकिन लोग हर कहीं इतनी शीघ्रता से बदलाव कर रहे हैं कि स्वयं के भीतर जाकर अपने उस मूल स्वभाव को जान ही नहीं पाते जो सदा एक सा है. ध्यान और योग के द्वारा हमें पहला कदम उठाना है और शेष प्रकृति व उसके नियंता के हाथों में छोड़ देना है. इस मार्ग पर चलना आरम्भ करते ही मंजिल से खबर आने ही लगती है.

Wednesday, January 23, 2019

सुख की करे कामना जो भी


२४ जनवरी २०१९ 
एक संत कहते हैं और कितना सही कहते हैं कि अन्य की गलती से जो दुखी हो जाता है, उससे बड़ा बुद्धिहीन कोई नहीं है. यदि इस सूत्र को कोई हृदयंगम कर ले तो वह सदा के लिए सुखी रहना सीख जाता है. हम सुबह से शाम तक अन्यों के कारण ही तो दुखी होते हैं, यदि अपनी गलती पर दुखी हों तो कितनी शीघ्रता से खुद को बदल लें. जब तक हम संसार में व्यवहार कर रहे हैं, द्वैत रहेगा ही, अन्य व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से हमें संबंध निभाना होगा. हमारे प्रतिकूल हो ऐसे व्यवहार का हमें सामना भी करना पड़ेगा. ऐसे में यदि हमें उनकी त्रुटि नजर आती है, और हम व्याकुल हो जाते हैं, तब तो इस जगत में प्रसन्न रहने के अवसर बहुत कम रह जायेंगे. साधक वही है जो एक बार यह निश्चय कर लेता है कि प्रसन्न रहना उसकी सबसे बड़ी साधना है, और यदि दुखी होना ही है तो कम से कम बात अपने हाथ में तो हो, हमारी ख़ुशी ही यदि हम पर निर्भर न हो तो गुनगुनाते हुए झरने और गाते हुए पंछी ही हमसे बेहतर हुए. साधक को दुःख केवल अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का समुचित प्रयोग न कर पाने का होता है. वह स्वयं अन्यों के दुःख का कारण बनना चाहता ही नहीं क्योंकि अज्ञानवश ही कोई ऐसा करता है. उसे तो ज्ञान की साधना करनी है.

Monday, November 26, 2018

छिपा सांत में है अनंत भी


२६ नवम्बर २०१८ 
अध्यात्म हमें देहाध्यास से छुड़ाकर आत्मा में स्थित होने की कला सिखाता है. जन्म के साथ ही सबसे पूर्व हमारा परिचय अपनी देह के साथ होता है. एक प्रकार से देह को ही हम अपना स्वरूप समझने लगते हैं. जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है, उसका परिचय अपने आस-पास के वातावरण व संबंधियों से होता है. उसका नाम उसे सिखाया जाता है, धर्म, राष्ट्रीयता और लिंग के आधार पर उसे उसकी पहचान बताई जाती है. जीवन भर यदि कोई व्यक्ति इसी पहचान को अपना स्वरूप समझता रहे तो वह जीवन के एक विराट सत्य से वंचित रह जाता है. गुरू के द्वारा जब यह पहचान दी जताई है, तब उसका दूसरा जन्म होता है, इसीलिये ब्राह्मण को द्विज कहा जाता है. यह पहचान उसके वास्तविक स्वरूप की है, जो एक अविनाशी तत्व है. स्वयं के भीतर इसका अनुभव करने के लिए ही गुरू के द्वारा साधना की एक विधि दी जाती है. सभी साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य होता है साधक को देहाध्यास से मुक्त कराकर अपने असीमित स्वरूप का भान कराना. यही अध्यात्म विद्या है और यही भारत की जगत को सबसे बड़ी देन है.

Monday, September 25, 2017

घट रहा है सहज सब कुछ

२५ सितम्बर २०१७ 
कर्ताभाव से मुक्त होना ही साधना का लक्ष्य है. जैसे सृष्टि में परमात्मा सब कुछ करता हुआ भी कुछ नहीं करता, उसकी उपस्थिति मात्र से प्रकृति में सब कार्य हो रहे हैं. प्रातःकाल सूर्योदय के होने से ही वातावरण में हलचल होने लगती है, पंछी जाग जाते हैं, वृक्षों पर फूल खिलने लगते हैं. उसी तरह देह में आत्मा की उपस्थिति मात्र से अनेक क्रियाएं हो रही हैं. जिस समय जो भी कर्म साधक के सम्मुख आता है, उसको सहजता से कर देने से न तो उसे कर्म का बंधन होता है न ही विशेष श्रम का आभास होता है. यदि उसी कर्म को करते समय कोई अपने में विशेष भाव मानकर अहंकार जगाये अथवा ठीक से न कर पाने पर दुःख का अनुभव करे, तो कर्म उसे बाँध लेता है. भविष्य में फिर उसी कर्म को करते समय उसे इन्हीं भावों का अनुभव होगा. 

Thursday, September 7, 2017

प्रेम गली अति सांकरी


साधना का पथ अत्यंत दुष्कर है और उतना ही सरल भी. जिनका हृदय सरल है, जहाँ प्रेम है, ऐसे हृदय के लिए साधना का पथ फूलों से भरा है, पर राग-द्वेष जहाँ हों, अभाव खटकता हो, उसके लिए साधना का पथ कठोर हो जाता है. कृपा का अनुभव भी उसे नहीं हो पाता, क्योंकि कृपा का बीज तो श्रद्धा की भूमि में ही पनपता है, अनुर्वरक भूमि में नहीं. जहाँ हृदय में ईश्वर प्राप्ति की प्यास ही नहीं जगी वहाँ उसके प्रेम रूपी जल की बरसात हो या नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता, जब मन में एक मात्र चाह उसी की हो तभी भीतर प्रकाश जगता है. उस चाह की पूर्ति के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता गौण है, वहाँ मन ही प्रमुख है, मन को ही प्रेम जल में नहला कर, भावनाओं के पुष्प अर्पित कर, श्रद्धा का दीपक जला, आस्था का तिलक लगा कर शांति का मौन जप करना होता है. यह आंतरिक पूजा हमें उसकी निकटता का अनुभव कराती है, साधक तब धीरे-धीरे आगे बढता हुआ एक दिन पूर्ण समर्पण कर पाता है.

Thursday, August 3, 2017

अहिंसा परमो धर्मः

४ अगस्त २०१७ 
एक बार यदि साधक यह निर्णय ले लेता है कि उसे योग मार्ग पर आगे बढ़ना है, जीवन के परम लक्ष्य को पाना है अर्थात सर्वदुखों से सर्वकाल के लिए मुक्त होना है तो तत्क्षण उसे साधना आरम्भ कर देनी चाहिए. चाहे आधा घंटा ही की जाये, प्रतिदिन नियमित की गयी साधना फल देने लगती है. भूतकाल में किसी न किसी को दुःख दिया होगा, मन ही मन उससे क्षमा मांगकर भविष्य में किसी को कोई दुःख नहीं देना है अर्थात अहिंसा के पालन का व्रत भी ले लेना चाहिए. क्रोध हिंसा का ही एक रूप है. दोष दृष्टि भी हिंसा है. मन में क्षोभ का भाव जगे अथवा द्वेष का ये सभी हिंसा हैं. मन को शांत रखने के लिए अहिंसा का पालन अति आवश्यक है.


Monday, July 10, 2017

बने पथिक कोई उस पथ का

११ जुलाई २०१७ 
साधना का पथिक अपने भीतर सदा ही उस साम्राज्य में रहना चाहता है जहाँ एक रस शान्ति विराजती है. उसके अंतर से प्रेम की ऊर्जा किसी विशेष वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना के प्रति प्रवाहित नहीं होती, वह निरंतर बहती रहती है जैसे जल से आप्लावित मेघ सहज ही जलधार बहाते हैं. जिस लोक में वह विचरना चाहता है, वह अग्नि सा पावन भी है और हिमशिखरों के समान शीतल भी. वहाँ तृप्ति की श्वास ही ली जा सकती है. जब किसी के भीतर इतनी सात्विक ऊर्जा भर जाये तो वह सहज ही श्रम करने का इच्छुक होगा, इस श्रम में कोई थकावट नहीं होगी, वह सहज होगा जैसे प्रकृति में सब काम सहज हो रहे हैं, क्योंकि प्रकृति सदा ही उस शांति से जुडी है. सेवा का फूल ऐसी ही भूमि में खिलता है. 

हर उलझन के पार हुआ जो

१० जुलाई २०१७ 
योग साधना का उद्देश्य है मोक्ष, अर्थात सारे दुखों से मुक्त हो जाना. जब तक जीवन में एक भी दुःख है, हम बंधे हैं, समस्या छोटी हो या बड़ी..मन को स्वयं तक केन्द्रित रखती है. किसी के जीवन में एक भी समस्या न हो ऐसा होना तो सम्भव ही नहीं है, हाँ यह हो सकता है कोई उनके प्रति सजग ही न हो. जीवन में दुःख है, पहले तो यह स्वीकारना होगा, मन यदि किसी भी बात पर उलझन महसूस करता है तो इसका अर्थ है वह बंधा है. योग हमें संवेदनशील बनाता है, भीतर जाकर ही पता चलता है मन कैसे बंधता है और फिर उसे खोलने के उपाय भी भीतर ही मिलते हैं. 

Wednesday, July 5, 2017

स्वाध्याय का फूल खिले

६ जुलाई २०१७ 
सुबह से शाम तक हम अनगिनत सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, अख़बार, टेलीविजन, पत्रिकाएँ, मित्रों व पुस्तकों के माध्यम से हम जगत का ज्ञान प्राप्त करते हैं. आजकल तो सुबह-सुबह मोबाइल पर ही सुंदर ज्ञान के सूत्र पढने को मिलते हैं किन्तु इस ज्ञान से हमारा आध्यात्मिक विकास नहीं होता. इसके लिए तो साधना के पथ पर कदम रखना ही होगा. जीवन में एक अनुशासन हो, नियमित योगाभ्यास व व्यायाम हो, उचित समय पर सोना व जगना हो और स्वाध्याय हो. स्वाध्याय का अर्थ है केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं है, इसका एक अर्थ है स्वयं का अध्ययन. स्वयं का ज्ञान होने पर ही हम स्वयं का अध्ययन कर सकते हैं. गुरू अथवा शास्त्रों के माध्यम से हमें स्वयं का पता चलता है. स्वयं का ज्ञान ही हमें संसार की दौड़ से मुक्त कर देता है, यही वास्तविक ज्ञान है. इसके होने पर जीवन पूर्ववत् चलता रहता है बस मन जिस शांति व स्थिरता का अनुभव करता है, वह किसी बाहरी घटना से खंडित नहीं होती.

Tuesday, July 4, 2017

मन तू अपना मूल पिछान

५ जुलाई २०१७ 
साधना के पथ पर चलते समय इस बात का निरंतर ध्यान रखना होगा कि हम अपने मूल स्वभाव की और जा रहे हैं या नहीं. ऐसा नहीं कि स्वयं को विशेष मानकर अथवा तो औरों को अपने पथ में बाधा मानकर हम मन में विकार जगा लें. हमारी दिशा सही होनी चाहिए. अध्यात्म के पथ पर जो धैर्यवान है, वह एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुँचेगा. जब तक हम अपन शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते, परमात्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं जान सकते. शांति, प्रेम, आनंद आदि आत्मा का स्वभाव है, हमें इनका उपयोग करना है. ऐसा करने से सबसे पहले उसका लाभ स्वयं को मिलता है तथा बाद में औरों को मिलता है. 

Thursday, May 11, 2017

जग जाये जब शक्ति भीतर

१२ मई २०१७ 
शास्त्रों में कहा गया है, मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है. यहाँ जिस मानव जन्म की बात कही गयी है वह केवल मनुष्य का शरीर धारण करने मात्र से नहीं मिल जाता.यदि कोई अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग केवल देह को बनाये रखने के लिए ही करता है अथवा केवल इन्द्रियों के सुखों की प्राप्ति के लिए ही करता है तो उसका मानव योनि में जन्म लेना सार्थक नहीं कहा जा सकता. मानव के भीतर देवत्व को पाने की जो चाह छिपी है उसे जागृत करके उस मार्ग पर चलना ही सही अर्थों में उसे मानव बनाता है. एक बीज के रूप में सभी के भीतर जो आत्मशक्ति छिपी है, साधना और भक्ति के द्वारा उसे प्रकट कर सकना ही मानव जन्म को दुर्लभ बनाता है. मनुष्य होकर जो भय, क्रोध अथवा शोक पर विजय प्राप्त नहीं कर सका उसने अभी देवत्व की ओर यात्रा आरम्भ नहीं की अर्थात वह मानव होने के वास्तविक अर्थ से वंचित ही रह गया.