Sunday, December 5, 2021
तोरा मन दर्पण कहलाये
Wednesday, October 13, 2021
जीवन ही जब बने साधना
साधना के द्वारा जब जीवन से जड़ता और प्रमाद चले जाते हैं, तभी किसी न किसी नवीन सृजन का कार्य आरम्भ होता है। मन से परिग्रह का उन्माद भी खो जाता है और सहज संतोष अनुभव होता है। भय तभी होता है जब कुछ बचाए रखने की कामना रहे, इसलिए अपरिग्रह सधते ही अभय का जन्म साधक के जीवन में होता है। ऐसा व्यक्ति ही निस्वार्थ प्रेम दे सकता है। उसके मन में कृतज्ञता की भावना पनपती है और हर उपलब्धि को वह ईश्वर का अनुग्रह मानकर स्वीकार करता है।अब राग-द्वेष की आँच नहीं जलाती अपितु निरंतर एक सजगता बनी रहती है। उसके कर्म अब बंधन का कारण नहीं बनते बल्कि मन को शुद्ध करने के हेतु बनते हैं। चित्तशुद्धि होते-होते साधक एक न एक दिन समाधि के परम आनंद को प्राप्त होता है।
Saturday, September 18, 2021
ध्यान साधना होगा मन को
ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. यह ज्ञात होता है कि हमारे भीतर कितनी सुंदरता छिपी है, जहाँ ईश्वर का वास है वहाँ सौंदर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इन अनुभवों से बल मिलता है. शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो, सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. अनंत धैर्य के साथ धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये भी कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से ईश्वर का स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. संत कहते हैं, मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. जबकि परमशक्ति शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाती नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है. जो
Friday, April 2, 2021
चिर वसन्त की चाह जिसे है
साधना में कुछ पाना नहीं है, खोना है. तन, मन दोनों से पसीना बहाकर विषैले तत्वों को बाहर निकालना है. जीवन एक पुष्प की तरह खिले इसके लिए मन की माटी में भक्ति का बीज बोना होगा, श्रद्धा का बीज, आस्था का बीज, जो धीरे-धीरे जड़ें फैलाएगा और स्वार्थ के सारे कूड़े-करकट को खाद बनाकर उसे सुंदर आकार, रंग और गन्ध में बदल देगा. धरती में वह क्षमता है , वैसे ही मन की माटी में भी. हम जो भी सच्चे मन से चाहते हैं वह हमें दिया ही जाता है. यहां कोई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती. सुख उत्तेजना का नाम है या आसक्ति का, दुःख द्वेष का नाम है अपनी इच्छा पूरी न होने का. आनंद तो एक विशेष मन:स्थिति है जो किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या घटना पर आधारित नहीं है. वह तो सदा ही एक रस है. साधक को जब अपनी निर्विकार स्थिति का भान होता है, तभी आनंद का अनुभव होता है. हम जो भी देखते हैं वह हमसे बाहर है, यदि हमें स्वयं को देखना हो तो कैसे देखेंगे ? पतंजलि कहते हैं जब देखे हुए और सुने हुए के प्रति आकर्षण न रहे तब चेतना स्वयं में लौट आती है, तब स्वयं के द्वारा ही स्वयं को देखा जाता है. तब साधक के जीवन में चिर बसंत का पदार्पण होता है