आज जबकि हम घरों में बंद हैं, एक कार्य जो हमारे शास्त्र, आचार्य और संत कहते आये हैं, बखूबी कर सकते हैं. वह कार्य है मौन की साधना. दिन भर में चाहे एक घन्टा ही सही, यदि हम पुरे मौन का पालन करें, तो अपनी बहुत सी ऊर्जा को बचा सकते हैं. उस एक घण्टे में हमें न केवल किसी अन्य से वार्तालाप नहीं करना है वरन अपने आप से भी नहीं करना है. जो मन सदा ही कुछ न कुछ योजना बनाता है अथवा पुरानी बात को सामने लाकर उस पर टीका-टिप्पणी करता है, उसे पूरा मौन करना सिखाना है. जो बात वह कई बार सोच चुका है, उसे जुगाली करने की उसकी आदत को तोड़ना है. किसी अप्रिय बात को स्मरण करके जो वह झुंझला जाता है, उसे भी छोड़ना है. वास्तव में अतीत में गया मन एक छाया के सिवा कुछ भी नहीं है, छाया को यदि मिटाना है तो प्रकाश की तरफ आना होगा, वर्तमान के प्रकाश में सारी छायाएं मिट जाती हैं. जो कहीं है ही नहीं हम उससे परेशानी खड़ी कर लेते हैं. जो अभी घटा ही नहीं उसकी आशंका मन जगाये तो फिर उसे वर्तमान में ले आना है और उसका सबसे सरल उपाय है, अपनी श्वास पर ध्यान देना. श्वास सदा वर्तमान में रहती है, वह परमात्मा से जोड़े रखने वाली डोरी है. डोरी भी ऐसी कि यदि श्वास एकतार हो जाये तो परमात्मा की सुवास उसमें से बहकर आने लगती है. शांति का एक बादल हमारे चारों ओर छाने लगता है. हाथ में आये इस समय में से नियमित मौन का अभ्यास करके हम आने वाले दिनों के लिए स्वयं को तैयार रख सकते हैं.
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Wednesday, April 8, 2020
Sunday, October 7, 2018
छाया से जो डरे नहीं
८ अक्तूबर २०१८
जो अहंकार मानव के दुःख का कारण है, आपसी द्वेष को जन्म देता
है, एक छाया मात्र ही है. वास्तव में हम प्रकाश स्वरूप दिव्य आत्मा हैं. यह प्रकाश
जब प्रकृति रूपी मन, बुद्धि आदि पर पड़ता है, तो अवरोध के कारण जो छाया बनती है, वही
अहंकार है. जब मन खाली होता है, जल की तरह
बहता रहता है, मान्यताओं और पूर्वाग्रहों से युक्त होकर कठोर नहीं होता, तब गहरी छाया
भी नहीं बनती. इसीलिए बुद्धि को निर्मल बनाने पर संत और शास्त्र इतना जोर देते रहे
हैं. अहंकार का भोजन दुःख है, वह राग-द्वेष से पोषित होता है, आत्मा आनंद से बनी है,
वह आनन्द ही चाहती है, लेकिन अहंकार इसमें बाधक बनता है, यही द्वंद्व मानव को सुखी
होने से रोकता है. यह सुनकर साधक अहंकार को मिटाने का प्रयत्न करने लगते हैं,
किन्तु छाया से भयभीत होना ही सबसे बड़ा अज्ञान है, क्योंकि छाया का अपना कोई
अस्तित्त्व नहीं है. छाया को मिटाया भी नहीं जा सकता, हाँ, प्रकाश के बिलकुल नीचे
खड़े होकर छाया को बनने से रोका जा सकता है.
Thursday, January 22, 2015
तोरा मन दर्पण कहलाये
अक्तूबर २००७
मन के पीछे छिपी चेतना निर्मल है, उसके सामने जो भी आता है
उसको उतनी ही देर के लिए वह ग्रहण करती है उसके बाद वह पुनः पहले की तरह निर्मल हो
जाती है. भीतर की वह चेतना दर्पण है, मन में जो इकठ्ठा हुआ है वह उसमें झलकता है
तो हमें लगता है कि वह चेतना का ही अंग है ! चैतन्य में केवल चित्र झलकता है
और इतने समय से झलक रहा है कि भ्रान्ति हो
जाती है कि यह उसी का भाग है, उसी में है ! मन की छाया लगातार आत्मा पर पडती है,
यही गांठ है, उसे खोलने का उपाय है कि हम कुछ देर के लिए मन से परे हो जाएँ, मन से
मुक्त हो जाएँ. जिस क्षण हम कामना से रहित होते हैं, मन नहीं रहता, उसी क्षण आत्मा
में टिक जाते हैं. यही क्षण मुक्ति का क्षण है और ऐसे क्षण जीवन में कई बार आते
रहे हैं.
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