Friday, September 4, 2026
शिक्षक दिशा दिखाते जग को
कृष्णम् वन्दे परमानन्दम वंदेहम्
Thursday, August 27, 2026
मन को जिसने जान लिया है
जब कोई ध्यान करता है तो उसे महसूस होता है, मन बहुत भागता है। भागते हुए मन में उष्णता है, जीवन है, तभी मन भागता है। विरोधात्मक मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं। स्थिर रहना और भागना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हमें भागते हुए मन के साथ भागना है।मन को भगाने से वह स्थिर हो जाता है, रोकने की चेष्टा से भागता है। जब मन भागता है, शरीर असहज होता है, बेचैन होता है। कोई भी बीज जब फूटता है तो दो तरफ़ से फूटता है। बेचैनी का एहसास है, तो जीवन है। बेचैनी इसलिए है कि हम चाहते हैं, सब जल्दी हो जाए। आदमी के सामने कई चुनाव होते हैं, इसके कारण वह भ्रम में पड़ जाता है। भ्रम से दूर होने के दो उपाय हैं, या तो उसे स्वीकार कर लें या उसे छोड़ दें. बुद्धि हो तो भ्रम भी होता है ।बेचैनी से शरीर में व्यर्थ की क्रिया होती है। यह स्वाभाविक है, लेकिन यही प्रगति की निशानी है।मन में भ्रांति होना भाग्यशाली है। आज मैं बहुत उलझन में हूँ, जब ऐसा प्रतीत हो तो आप लक्ष्य के निकट ही हैं। भ्रम अनंत आकाश की तरफ़ खोल देता है। गुरु के पास खुला आसमान है। भ्रम छूटने के लिए भ्रम होना भी ज़रूरी है। भ्रांति भी एक शक्ति है। घूमता हुआ अग्नि का बिंदु, गोला लगता है। घूमता हुआ मन भी कुछ और लगता है। एक पड़ाव छूटा, दूसरी तरफ़ चल पड़ा। खाली होते ही अपने में स्थिर हो जाता है। हमारे पास तीन शरीर हैं, पहला भौतिक या स्थूल शरीर। दूसरा विचार व भावनाओं से बना है, सूक्ष्म शरीर।सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से एक डेढ़ फ़ुट बड़ा है ।वहाँ बिना इन्द्रियों के काम होता है। तीसरा कारण शरीर चैतन्य से बना है। बुद्धि और शक्ति से बना है। गहरी नींद और ध्यान में हम कारण शरीर में होते हैं। जिससे आनंद व शक्ति मिलती है।
Wednesday, August 19, 2026
शक्ति केंद्र जब जागेंगे भीतर
Sunday, August 16, 2026
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं
Monday, August 10, 2026
जीवन एक यात्रा सुंदर
Saturday, August 8, 2026
जीवन में जब ध्यान सधेगा
यदि जीवन में संतुलन हो, तो हर बाधा को आसान से पार किया जा सकता है। वर्तमान जीवन में गति है, पर ठहराव नहीं है। ऐसे में ध्यान एक ऐसा उपाय है जो भीतर संतुलन लाता है। ध्यान का प्रभाव डीएनए स्तर तक होता है. यह शरीर में कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है और सेरोटोनिन व ऑक्सीटोन का स्तर बढ़ाता है. ध्यान मन को शांत करने की या कुछ भी न करने की कला है। जिसमें मन सरलता से एक गहरे मौन में डूब जाता है।यह गति से स्थिरता की और शब्द से नि:शब्द की यात्रा है। ध्यान मन को नियंत्रित करना नहीं है, न ही किसी एक बिंदु पर मन को एकाग्र करना है बल्कि मन के विचारों का साक्षी भाव से अवलोकन करना है।जिससे साधक सहज ही विचारों के पार चला जाता है और एक गहरे विश्राम का अनुभव करता है। वह अपने भीतर स्थित चेतना से जुड़ जाता है और सहज ही आनंद का अनुभव करता है। जब मन शांत और सहज होता है तो बुद्धि अति श्रेष्ठ निर्णय लेने की स्थिति में होती है और भविष्य की योजना बना सकती है। ध्यान चित्त को अतीत में पश्चाताप और भविष्य की आशंका से मुक्त करता है।
Sunday, August 2, 2026
हर विभूति का स्रोत एक है
Tuesday, July 28, 2026
गुरुतत्व जागे जब भीतर
Wednesday, July 22, 2026
जीवन में जब योग सधेगा
Sunday, July 19, 2026
मन जब भीतर मुड़ जाएगा
Friday, July 17, 2026
मन के पार ही वह मिलता है
Wednesday, July 15, 2026
मुक्ति की यदि चाह है भीतर
Monday, July 13, 2026
करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान
Sunday, July 12, 2026
जागे जब अभीप्सा मन में
Monday, April 13, 2026
भावलोक के पार गया जो
भावलोक के पार गया जो
मन का स्वभाव है नीचे की ओर बहना, यह पानी की तरह तरल है। बुद्धि का स्वभाव है ऊपर की उठना, यह अग्नि की भाँति तेजपूर्ण है। इसलिए मन के लिए नदी की तरह बहते रहने की प्रार्थना की जाती है, रुका हुआ मन, एक ही बात पर अटका मन, पोखर में रुके पानी के समान दूषित हो जाता है। बुद्धि के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है। जैसे प्रकाश में सभी कुछ स्पष्ट दिखायी देता है। प्रखर बुद्धि में अपने दोष व कमियाँ स्पष्ट दिखायी दें, जिससे ठोकर खाने व दुख उठाने के अवसर न आयें। बुद्धि के पार ही भावलोक है, भावना से युक्त हुआ मन-बुद्धि जीवन में सरसता का अनुभव करता है, अन्यथा सब कुछ रुखा-सूखा सा प्रतीत होता है। भावना से परे आत्मा का लोक है जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है।
Tuesday, February 3, 2026
तेन त्यक्तेन भुंजीथा
Friday, January 23, 2026
बुद्धियोग जब सध जाएगा
‘मैं’ ‘मेरे’ का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन रहने वाली चार तरह की बुद्धियाँ अनर्थकारी हैं। ऐसी बुद्धि, जो ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसन्धान करने वाली हो, प्रकृति के रहस्यों को समझने वाली, उसको सराहने वाली हो, अर्थकारिणी है। ईश्वर का सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है। ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी पर बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, विशाल वन संपदा उसके ऐश्वर्य के रूप में हमें प्राप्त है और उसका वैभव मीठे फलों, पंछियों की बोली और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है।