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Friday, September 4, 2026

कृष्णम् वन्दे परमानन्दम वंदेहम्

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण इस धरती पर आये और आज तक अपने अनंत प्रेम व अनंत ज्ञान की वर्षा में भिगो रहे हैं। उनका जन्म व हर कर्म दिव्य था, इसलिए आज भी हम उनके प्रेम को अनुभव करते हैं। कृष्ण कितने विनम्र थे, इसका भान उनके  जीवन की कितनी ही घटनाओं से मिलता है। राजसूय यज्ञ में वह अपने लिए जो कार्य चुनते हैं, वह था, यज्ञ में पधारे ब्राह्मणों और अतिथियों के पैरों का प्रक्षालन और उनकी जूठी पत्तलें उठाना। कृष्ण इतने पूज्य और सम्मानित थे कि उनकी अग्रपूजा की गयी थी, फिर भी उन्होंने अपने लिए ये कार्य चुने। ऐसा करके उन्होंने यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य का महत्व उसके पीछे के भाव से होता है, उनके ह्रदय में सभी के लिए अथाह प्रेम था, जिसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने सेवा के ये कार्य चुने। कृष्ण को हम ब्रह्मांड का स्वामी मानते हैं, सृष्टि का कारण मानते हैं, पर वह स्वयं को गोपियों व ग्वालों के प्रेम का ऋणी मानते हैं। उनसे प्रेम करना मानो स्वयं को उनके आत्मीयों में शामिल कर लेना है। सारी प्रकृति उनसे प्रेम करती है, वे स्वयं गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। यमुना नदी, कालिया नाग, कदंब का वृक्ष, गौएँ और बंदर सभी तो उनकी लीला में शामिल हैं। हज़ारों वर्षों से कृष्ण की कथा ने कवियों और भक्तों के दिलों को आकर्षित किया है और यह आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। 

Thursday, December 17, 2020

भक्ति करे कोई सूरमा

 भक्त कहता है हम मरुथल सा रूखा-सूखा दिल लेकर तेरे द्वार पर आये थे, देखते ही देखते तूने वहाँ हरियाली के अंबार लगा दिए। तेरा नाम भर सुना था, तुझे जानते भी नहीं थे पर जो  खाली दामन साथ लाये थे, उसे भर दिया. जो दिखाई नहीं देते पर जिनकी चमक से मन में ज्योति छा गयी है, वैसे मधुर भावों के अनेक हीरे-मोती तू लुटाता है. दो बूँद ही प्रेम की इस उर ने चाही थी पर कितना कृपालु है तू कि प्रेम के  दरिया बहा दिए. कितने विकारों से भरा था मन, अहंकार के हाथी पर चढ़ कर आया था, पर तू पावन करने वाला है. सारे संबंध  तुझसे ही पनपे हैं, तू पिता बनकर पालता है, माँ बनकर संवारता है, गुरू बनकर राह दिखाता है, मित्र बनकर स्नेह लुटाता है, भाई या बहन बनकर जीवन पथ को सुंदर बनाता है. यह सारी सृष्टि तुझसे ही उपजी है. भक्त को किसी दर्शन, किसी वाद, ता किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है, उसे समाधि भी नहीं साधनी है, उसे तो भीतर उमड़ते उस प्रेम को एक दिशा देनी है, उस अनंत पर लुटाना है. प्रेम का आदान-प्रदान ही एकमात्र वह कृत्य है जो उसे अस्तित्त्व से जोड़ता है. 


Monday, June 22, 2020

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

भक्ति के ग्यारह विभिन्न भाव एक दूसरे के साथ जुड़े हैं. हरेक व्यक्ति में इनका कुछ न कुछ अंश होता ही है. कोई एक प्रकार का भाव अलग-अलग व्यक्तित्व में प्रमुखता से दिख सकता है. सदगुरू कहते हैं भक्त लोकलाज की परवाह नहीं करते, जगत की निंदा-स्तुति की परवाह न करने वाले ही भक्त हो सकते हैं. प्रेम से ही ईश्वर तुष्ट होते हैं. हम संसार में अपना बल खोजते हैं, ईश्वर का बल मिल जाने पर किसी और बल की जरूरत ही नहीं है. जगत के साथ संबन्ध बन्धन लगता है ईश्वर के साथ जो बन्धन है वह बन्धन नहीं लगता, वह मुक्ति का द्बार खोल देता है. वह ध्यान के लिए अनुकूल है, भक्ति ध्यान के लिए और ध्यान भक्ति के लिए जरूरी है. किसी के भीतर भक्ति सहसा भी घट सकती है जैसे बिजली का चमकना और अभ्यास से भी जैसे सूर्य का उगना. योग करने, साधना करने से भीतर ध्यान की रूचि जगती है, पूजा में भी रूचि जगती है, और एक दिन भक्ति का उदय होता है. कोई इस पथ पर आरम्भ से ही चल पड़ता है. भक्त की दृष्टि से परमात्मा सारे जगत की सेवा कर रहा है. 

Wednesday, July 11, 2018

मुक्ति की जब चाह जगे


१२ जुलाई २०१८ 
ब्रह्मांड में इतना कुछ हो रहा है पर करने वाला नजर नहीं आता, जिसकी उपस्थिति में सब कुछ होता है, पर जो खुद कुछ नहीं करता वह परमात्मा है. इसी तरह हमारे शरीर में हर पल कितने ही कार्य हो रहे हैं, मन में कितने ही विचार आ-जा रहे हैं, जिन्हें करने वाला दिखाई नहीं देता, पर जिसके होने से ही सब घट रहा है, वही आत्मा है. भक्त को जगत के कण-कण में परमात्मा के दर्शन होते हैं, ज्ञानी को अपने भीतर आत्मा के रूप में. कर्मयोगी सभी कर्मों को परमात्मा के लिए करता है. मार्ग कोई भी हो लक्ष्य एक ही है, मन राग-द्वेष से मुक्त हो और बुद्धि समता को प्राप्त हो. सारे दुःख राग-द्वेष और मोह से ही उपजते हैं. इन दुखों से मुक्ति ही हर साधना का लक्ष्य है, यही मोक्ष है.

Friday, November 10, 2017

एक लक्ष्य जिसने भी साधा

१० नवम्बर २०१७ 
लक्ष्य यदि स्पष्ट हो और सार्थक हो तो जीवन यात्रा सुगम हो जाती है, योग के साधक के लिए मन की समता प्राप्त करना सबसे बड़ा लक्ष्य हो सकता है और भक्त के लिए परमात्मा के साथ अभिन्नता अनुभव करना. कर्मयोगी अपने कर्मों से समाज को उन्नत व सुखी देना चाहता है. मन की समता बनी रहे तो भीर का आनंद सहज ही प्रकट होता है. परमात्मा तो सुख का सागर है ही, और निष्काम कर्मों के द्वारा कर्मयोगी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, जिससे सुख का अनुभव होता है, अर्थात तीनों का अंतिम लक्ष्य तो एक ही है, वह है आनंद और शांति की प्राप्ति. सांसारिक व्यक्ति भी हर प्रयत्न सुख के लिए ही करते हैं, किन्तु दुःख से मुक्त नहीं हो पाते क्योंकि उन्होंने अपने सम्मुख कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रखा. 

Wednesday, May 27, 2015

निंदक नियरे राखिये

अप्रैल २००९ 
जिसने एक को अपना बना लिया है, जिसके लिए यह सारा जगत अपना हो गया है, वह भक्त है. प्रेम और भरोसे के मिश्रण से भावना बनती है और जहाँ यह भावना टिक जाती है, वही भक्त है. परमात्मा पर भरोसा और परमात्मा से प्रेम हो और निंदा में जिसकी रूचि न हो, वह भक्त है. बात को घटाकर बोलना निंदा है, बढ़ाकर बोलना खुशामद है. हम ज्यादातर अधूरा सत्य बोलते हैं, या तो घटाकर या बढ़ाकर. हम दूसरों की निंदा सुनकर और अपनी प्रशंसा सुनकर खुश होते हैं, जो अपनी निंदा सुनकर और दूसरों की प्रशंसा सुनकर खुश हो वही भक्त है. निंदा सदा अपने से ज्यादा आगे रहने वाले की होती है. निंदा सुनके यदि कोई दुखी हो तो स्पष्ट है की उसमें यह बुराइयाँ थीं, वरना दुखी होने का कोई भी तो कारण नहीं है. बुरे को बुरा कहना निंदा नहीं है, अच्छे को बुरा कहना निंदा है. निंदक को पाकर भक्त कहता है यह हमारे मैले कपड़े धोता है, मन की चादर को रसना से धोता है.  

Wednesday, April 22, 2015

सोचे सोच न होइए जो सोचे लख वार

 जनवरी २००९ 
परमात्मा से मिलन हृदय से ही होता है बुद्धि से नहीं. बुद्धि शब्दों में उलझी रहती है, शास्त्रों में उलझी रहती है, हृदय तो आतुर होता है. बुद्धि आत्मरक्षा का उपाय खोजती है, हृदय समर्पण है. बुद्धि संसार में कहीं पहुंचा सकती है पर परमात्मा के राज्य में ले जाने में वह समर्थ नहीं है. बुद्धि और हृदय में फासला अधिक नहीं है पर अपनी बुद्धि पर हम जरूरत से ज्यादा भरोसा करते हैं, उसे त्यागना नहीं चाहते, नहीं तो कब का परमात्मा को अपना बना चुके होते. संसार में हम तृप्ति का अनुभव नहीं करते फिर भी डरते हैं उस डगर पर जाने से. जिस क्षण बुद्धि चुप हो जाती है भीतर शांति छा जाती है. परमात्मा तब आमने–सामने होता है. एकांत में भक्त या साधक के पास परमात्मा के सिवा कोई दूसरा नहीं होता. भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाता है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्द्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो वह कहीं छिप जाता है. परमात्मा एकक्षत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई ठहर नहीं सकता. वह रसपूर्ण परमात्मा नित नूतन रस बरसाता है, वह अनंत है, अपार है !

Tuesday, March 24, 2015

पार सभी के जाना होगा

जुलाई २००८ 
चेतना पूरे शरीर में जग जाये तो वह ज्ञान है और वह ज्ञान फिर झुक जाये वही भक्ति है. भक्ति समय सापेक्ष नहीं है, वह जिम्मेदारी लेना सिखाती है. भक्त पहले भगवान को भीतर देखता है, फिर सारा संसार प्रभुमय देखता है. भक्ति चेतना की पूर्णता है, जहाँ भी हम झुके वहीं भक्ति का आरम्भ होता है. ईश्वर ने हमने यह मानव तन दिया है, सद्गुरु इस में सत्यता का बोध कराता है. जो इन्द्रियों का रस, विचार का रस, भावना का रस, आनंद का रस इन तनों से लेता रहता है तो ऐसे ही तन मिलते है, पर इनसे पार जब शुद्द सुख व शुद्ध रस मिलने लगे तब प्रेमाभक्ति का रस मिलता है.


Monday, March 16, 2015

बीत न जाये फिर बसंत यह

जुलाई २००८ 
हम जो पाना चाहते हैं वह ठीक है लेकिन जिस राह से चल कर पाना चाहते हैं, वह राह गलत है. हमारी हर खोज व्यर्थ हो जाती है क्योंकि जिसे हम खोज रहे हैं वह संसार दे नहीं सकता. हमरा मन कहीं बैठना ही नहीं चाहता क्योंकि वह हर वक्त किसी न किसी तलाश में रहता है. परमात्मा के बिना उसका कोई ठौर नहीं, वह संसार में भी उसी को खोज रहा है, पर संसार के पार ही वह मिलता है.  हम जिसे फूल बनकर चाहते हैं वह काँटा बनकर चुभने लगता है. भक्त संसार के सौन्दर्य को भी परमात्मा का ही मानता है. यह जीवन तो बसंत है और सारा जगत उल्लास से भरा है, पर हम सो रहे हैं. एक बार यदि हम जग जाएँ तो वह बसंत जीवन में आ सकता है जो परम है. साधना में कुछ नया नहीं करते, बस दिशा बदलनी है. हम जिस प्रेम भरी नजर से इस संसार को देखते हैं उसी नजर को हमें परमात्मा को देखने में भी लगाना है. हमारे भीतर प्रेम का जो छोटा सा झरना है उसी को एक दिन सागर से मिलाना है. जीवन कब गुजर जायेगा पता ही नहीं चलेगा, हमारी असली सफलता इसी में है कि भीतर के अमृत से जुड़ जाएँ, अपने असली प्रियतम को रिझा लें. हमारे चित्त का पंछी उसी अमृत का पान करना चाहता है, उसी सखा से मिलना चाहता है, हम संसार में लगाने के लाख उपाय करें यह वहाँ नहीं लग सकता. यह तो शाश्वत को ही चाहेगा. चित्त की बेचैनी का अर्थ है कि वह अपने घर जाना चाहता है. 

Wednesday, March 4, 2015

एक तू न मिला

फरवरी २००८ 
भक्त स्थूल जगत को तो आनंदित करता ही है, सूक्ष्म जगत को भी प्रभावित करता है. उसके आस-पास रहने वाले लोग भी धीरे-धीरे इसी रंग में रंग जाते हैं. आखिर कोई कब तक परमात्मा से दूर रह सकता है. हम अपना जीवन तभी तो प्रेममय तथा शांतिमय बना सकते हैं जब विकारों से दूर हों, और विकारों से दूर होने की शक्ति परमात्मा से मिलती है, जब उसके प्रेम का अहसास होता है. यह जगत अनित्य है इसे हम अपने अनुभव से प्रतिपल जानते हैं. यह स्मरण रहे तो आसक्ति नहीं होती. इस जगत में हमारी कोई शरणस्थली नहीं है. जब तक पुण्य हैं तभी तक शरण है, वरना अशरण ही है. दस की गिनती में हम एक को न लगायें तो शून्य ही शेष रहता है, एक परमात्मा न हो तो संसार शून्य है. उसी एक की शरण में जाना है. 

Sunday, November 30, 2014

नील गगन के पार चलें अब

जून २००७ 
जैसे ईश्वर सभी के हृदयों में निवास करता है वैसे ही प्रत्येक के अंतर में विश्वास भी होता है और संदेह भी. विश्वास बढ़ता रहे तो व्यक्ति भक्त हो जाता है, संदेह बढ़ता रहे तो जिज्ञासु हो जाता है. लेकिन जहाँ विश्वास न बढ़े तो अंधविश्वासी और संदेह न बढ़े तो अज्ञानी रह जाता है. भक्त और जिज्ञासु एक दिन स्वरूप में ही पहुंच जाते हैं. जब अपनी खबर मिलने लगती है तो परिवर्तन शुरू होने लगता है. भक्ति और ज्ञान दो पंख हैं जिनसे हम अनंत आकाश में उड़ सकते हैं. भक्ति जीवन का पंख है और ज्ञान मृत्यु का. मानव रूपी पक्षी को यदि नील गगन में उड़ान भरनी है तो जीवन के साथ मृत्यु का भी वरण करना होगा. दिन उजाला है तो मृत्यु रात्रि है, दिन के साथ रात न हो तो जीना कठिन हो जाये.

Saturday, November 15, 2014

प्रेम गली अति सांकरी

अप्रैल २००७ 
संत कहते हैं हम लाख चाहें, शब्दों से अपनी बात समझा नहीं सकते, जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. हम अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से किसी हद तक अपने विरोधी को भी प्रभावित कर सकते हैं. भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़ें, सुनें, गुनें, तृप्ति नहीं मिलती. वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल तो गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता, फिर उसे सामने बिठाकर पूछता है, पर दो के बीच की दूरी भी उसे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है केवल ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है, और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी एक का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

Sunday, July 6, 2014

असली याद वही करता है

सितम्बर २००६ 
भक्त परमात्मा की कृपा को हर क्षण अनुभव करता है. गुरू के वचन उसके लिए अमृत के समान होते हैं जो भीतर की सारी पीड़ा को धो डालते हैं. वह सद् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं. उनकी दी हुई शक्ति से भर कर वह भविष्य के प्रति आशावान रहता है और वर्तमान के प्रति सजग. भक्त कभी उसे याद न भी करे तो वह स्वयं अपनी याद दिलाता है. कभी-कभी जो भक्त के भीतर आनन्द के फूल बेवजह ही खिलने लगते हैं, गीत स्वतः झरने लगते हैं तो उसी ने किसी रूप में पुकारा होता है. उसकी महिमा के गीत यूँही ही तो नहीं गाए गये. वह क्या है यह तो शायद वह स्वयं भी नहीं जानता.  

Monday, April 28, 2014

रहें भीतर जियें बाहर

जनवरी २००६ 
भगवान की निकटता का अनुभव करना ही भक्त का धर्म है और मन जब उससे दूर जाये तो वही अधर्म है. भगवान के वियोग में बहे आंसू ही भक्त की सम्पत्ति है, अर्थ है. भगवान की कामना ही काम है. उसका सुमिरन ही मोक्ष है. उसकी निकटता का अनुभव गुरू कृपा से होता है, तब धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अर्थ ही बदल जाते हैं. जीवन का उत्थान ही हमारा ध्येय हो जाता है. सन्त कहते हैं, “रहो भीतर, जीओ बाहर”, उनके अनुसार विपरीत तत्व जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ रहते हैं. जीवन के हर पहलू पर वे हमें चिन्तन करना सिखाते है. टुकड़ों में बंटी जिन्दगी से दूर एक पूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करते हैं. सद्गुरु व परमात्मा के आश्रय में हम कितने सुरक्षित हैं. उनकी कृपा का जल मन की सूखी धरती को हरा-भरा कर देता है.   

Monday, December 16, 2013

जुड़ा रहे मन उस अपने से

मई २००५ 
जिसका कार्य और रूचि एक हो, जिसका हृदय और मस्तिष्क एक हो उसमें सख्य भाव होता है. राम और लक्ष्मण में भी ऐसा सख्य भाव है. लक्ष्मण सदा से ही राम के संग हैं. जगे हुए ब्रह्म में जब सृष्टि की इच्छा होती है तो यह शेष उन्हें अपने शीश पर धारण करता है. दोनों में अद्वैत है. इसी तरह का सख्य भाव भक्त और भगवान में होता है, गुरु और शिष्य में होता है. मानसिक रूप से वे साथ रहते हैं, भौतिक दूरी उनके लिए कोई दूरी नहीं होती. जो ईश्वरीय तत्व को जानता है, वह हर क्षण जुड़ा रहता है, दोनों के बीच प्रेम की धारा अविरल बहती रहती है. समाधि का अनुभव दोनों को होता है. आधि, व्याधि, उपाधि से मुक्त होकर भक्त, भगवान के प्रेम का पात्र बन जाता है. अपनी ऊँचाई पर स्थित होते हुए भी वह उसके मन से जुड़ जाते हैं, वे सर्व समर्थ हैं.

Wednesday, November 20, 2013

कितना सुंदर पथ है उसका

अप्रैल २००५ 
भक्त वही है जिसका मन ईश्वरीय भावों से लबालब भरा हुआ है, भीतर एक प्रकाश फैला है जो उसके अस्तित्त्व के कण-कण को भिगो रहा है. शास्त्रों में लिखी बातें उसके लिए सत्य सिद्द हो गयी हैं. आकाश व्यापक है पर आकाश भी भगवान में है, अगर कुछ पल भी उस भगवद् तत्व में कोई टिक जाये तो कभी विषाद नहीं होता. सन्त कहते हैं, स्वस्थ देह, पावन भाव और शुद्ध बुद्धि यह तीन तो साधना के अंग हैं और चौथी अवस्था 'साध्य' है. उसका अनुभव होने पर सुख-दुःख का असर नहीं होता, मन निर्लिप्त हो जाता है, हर परिस्थिति में समता बनाये रखना सम्भव हो जाता है. अपनी स्मृति को बनाये रख सकते हैं. इस पथ पर दूर से ही साध्य की सुगंध मिलने लगती है. उस स्थिति की कल्पना ही कितनी सुखद है, जब हमें  भी वह अनुभव होगा, जो नानक का अनुभव है मीरा का अनुभव है. कई बार हमें भी उसकी झलक मिली है पर अभी बहुत दूर जाना है. मन के दर्पण को मांजना है, पात्रता हासिल करनी है.

Wednesday, September 25, 2013

खाली हुआ जो वही भरा

मार्च २००५ 
निर्मलता शांति को प्रकट करती है. आकाश यदि घनमालाओं से आवृत हो तो इतना विशाल प्रतीत नहीं होता, शुभ्र गगन अनंत शांति को प्रकट करता है. उसी तरह चिदाकाश भी जब वृत्तियों से रहित होता है तो निर्मलता को प्रकट करता है. सहज प्रेम भी उसी से फूटता है. भक्त फूल की तरह, नदी व सूर्य की तरह देना चाहता है, वह अपना आप खाली कर देना चाहता है, क्योंकि वह उसमें अनंत को भरना चाहता है, एक तरफ वह खाली होता जाता है और दूसरी तरफ भरता जाता है. पूर्ण मदा पूर्ण मिदं, पूर्णात पूर्ण मुदच्यत...अपने जीवन में जीता है. सत्य को अपने जीवन में घटते देखता है. शास्त्रों में जो लिखा है, वह अनुभूत सत्य है, जब भक्त के जीवन में वह घटित होता है तो शास्त्र के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है. ईश्वर की यह सृष्टि कितनी अद्भुत है.

Wednesday, May 15, 2013

राधे राधे मन बोले


  सितम्बर २००४ 
  गोपियों ने कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण किया था पर राधा ने स्वयं का विसर्जन कर दिया है. राधा के प्रेम में चीत्कार नहीं है वह स्वयं को मिटा कर कृष्णरूप ही हो गयी है. कृष्ण से वह जब पृथक रही ही नहीं तो कैसा विरह और कैसी पीड़ा. विसर्जन करना बहुत कठिन है, अपने अहम् का विसर्जन, शक्ति, समय, सेवा का विसर्जन, प्रिय के साथ एकाकार हो जाना, द्वैत को मिटाकर एक्य स्थापित करना प्रेम की पराकाष्ठा है. भक्त भगवान को स्वयं से अलग मानकर उसकी पूजा करता है, अपनी निजता बचाए रखता है पर ज्ञानी भक्त स्वयं को मिटा देता है, उसके लिए दो नहीं रहते वह इतनी भी दूरी नहीं चाहता. किन्तु सेवा की यह भावना किसी बिरले को ही प्राप्त होती है. जन्मों के संस्कार हमें अहंकार से मुक्त होने नहीं देते, अहंकार इतना सूक्ष्म है कि कब आकर खड़ा हो जाता है पता ही नहीं चलता. कृपा के अधिकारी बनने पर ही इससे मुक्त हुआ जा सकता है. सजगता ही कृपा पाने की शर्त है.

Friday, March 22, 2013

मुक्त करेगा प्रेम


जून २००४ 
संतजन कहते हैं, परमात्मा अन्तर्यामी है, वह सभी के हृदय का साक्षी है, वे आनन्दस्वरूप हैं, पर भक्तों के प्रेम में वे भी आनंद पाते हैं. जिस तरह भक्त भगवान को प्रेम करते हैं, वे भी करते हैं. प्रेम के इस आदान-प्रदान में भक्त और भगवान एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं. हर वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है, हमारा स्वभाव आनंद है उसमें बाधा आते ही हम विचलित हो जाते हैं, हमारा सहज स्वभाव ही प्रेम पाना व प्रेम देना है, पर यह प्रेम सहज और विशुद्ध होना चाहिए अग्नि की तरह, सूक्ष्म होना चाहिए आकाश की तरह, ईश्वर की तरफ प्रेम भरी नजर उठते ही सद्गुरु की कृपा होती है, वह हमें रसमय, मधुमय बनाते हैं.

Thursday, January 10, 2013

माँ के जैसा ही वह है


जनवरी २००४ 
जैसे माँ बच्चे के रूप में अपना विस्तार करती है, फिर उसे प्रेम देती है व प्राप्त करती है, वैसे ही परमात्मा ने हमें सिरजा है, भक्त और भगवान के बीच प्रेम का आदान-प्रदान ही भगवत्ता को सार्थक करता है. जैसे बच्चे माँ को भुला देते हैं, वैसे ही हम परम को भूल जाते हैं, पर तब भी वह हमें चाहते हैं वह सदा प्रतीक्षा रत हैं कि हम उनके निकट जाएँ जैसे माँ को बच्चों की सदा एक आस बनी रहती है. हमारे भीतर के सद्गुण रूपी देवता उसी परमात्मा की आराधना करते हैं और दुर्गुण रूपी असुर उससे उत्पीड़ित होते हैं. शुभ-अशुभ दोनों को वह ही रचता है और दोनों से परे वह अव्यक्त है. वह हमारे भीतर तीन रूपों में विद्यमान है, क्रिया, ज्ञान और भावना. वही कर्म के लिए प्रेरित करता है, वही हमें हमारे होने का ज्ञान देता है ज्ञान जब भीतर रच-बस जाता है वही भक्ति में बदल जाता है. मुक्त हुए बिना भक्ति सम्भव नहीं. यह त्रिवेणी जब जीवन में उतरती है तो जीवन का हर क्षण सुंदर बन जाता है.