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Friday, June 6, 2014

बहा करे शुभ धारा मन की

अप्रैल २००६ 
ध्यान करने से विश्रांति मिलती है, और विश्रांति से सद्कार्यों के लिए सामर्थ्य उत्पन्न होता है. किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए आवश्यक है भीतर उदारता हो, मन अपने अवगुण तथा अन्यों के गुणों का पारखी हो. जीवन तब अपने आप ही सार्थक प्रतीत होगा. जब मन कमजोर होता है उसकी जड़ में नकारात्मक वृत्तियाँ होती हैं, प्रवाह रुक जाता है, उन्हें सद्विचारों के पानी से बहाकर पुनः प्रवाह को जारी रखना होगा. जीवन में सुख है या दुःख यह मानव के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, एक ही स्थिति को कोई दो तरह से अनुभव कर सकता है.. सद्कार्य का परिणाम सद ही होता है. जीवन को चाहे तो फूलों सा सजा ले, चाहे तो धूल सा पैरों के तले रौंद दे, अच्छे काम के लिए किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता और अच्छे कार्य की प्रेरणा सद्विचारों से ही मिलती है.



Thursday, May 1, 2014

जहाँ अभाव नहीं है कोई

जनवरी २००६ 
कभी-कभी साधक को लगता है कि मन स्थिर नहीं है, ऊपर-ऊपर से देखें तो लगता है कोई विशेष कारण नहीं है पर गहराई में जाकर देखें तो पता चलता है मन किसी अभाव का अनुभव कर रहा है, उसे क्या चाहिए यह भी उसे पता नहीं है, पर अभाव उसी को होता है जिसकी कोई कामना शेष रह गयी है. मानव की सबसे बड़ी कामना होती है खुद को जानने की, आनंद को पाने की, पर मन यह नहीं जानता कि स्वयं को मन के पार जाकर ही पाया जा सकता है. मन को मिटना होगा उस आनन्द को पाने के लिए और मन वास्तव में है भी मरणशील क्योंकि जड़ प्रकृति का अंश है. स्वयं को जानने का अर्थ यही है कि द्रष्टा भाव में रहकर मन में उठने वाली वृत्तियों को देखना, देखने मात्र से वह शांत हो जाता है और स्वयं ही चुप होकर बैठ जाता है.    

Wednesday, September 25, 2013

खाली हुआ जो वही भरा

मार्च २००५ 
निर्मलता शांति को प्रकट करती है. आकाश यदि घनमालाओं से आवृत हो तो इतना विशाल प्रतीत नहीं होता, शुभ्र गगन अनंत शांति को प्रकट करता है. उसी तरह चिदाकाश भी जब वृत्तियों से रहित होता है तो निर्मलता को प्रकट करता है. सहज प्रेम भी उसी से फूटता है. भक्त फूल की तरह, नदी व सूर्य की तरह देना चाहता है, वह अपना आप खाली कर देना चाहता है, क्योंकि वह उसमें अनंत को भरना चाहता है, एक तरफ वह खाली होता जाता है और दूसरी तरफ भरता जाता है. पूर्ण मदा पूर्ण मिदं, पूर्णात पूर्ण मुदच्यत...अपने जीवन में जीता है. सत्य को अपने जीवन में घटते देखता है. शास्त्रों में जो लिखा है, वह अनुभूत सत्य है, जब भक्त के जीवन में वह घटित होता है तो शास्त्र के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है. ईश्वर की यह सृष्टि कितनी अद्भुत है.

Monday, July 1, 2013

करते हो तुम कन्हैया ...

अक्तूबर २००४ 
एक साधक को अपने मन में उठने वाली वृत्तियों का भी परिष्कार करना है, क्योंकि मन में वृत्तियाँ तो निरंतर समुद्र की लहरों की तरह उठती रहती हैं, वे अशुभ न हों, शुभ हों, धीरे-धीरे उन शुभ वृत्तियों को भी कम करते जाना होगा, तब मन शुद्ध तत्व में स्थित रहेगा, वर्तमान में रहेगा. भूत की स्मृतियाँ और भावी की कल्पनाएँ हमें ‘अपने’ होने से दूर रखती हैं, स्वयं में कोई वृत्ति नहीं है, यदि है भी तो वह हमारे द्वारा लायी नहीं गयी है, यदि आ भी गयी है तो हम साक्षी मात्र हैं. अनायास ही हम उसके कर्ता नहीं हो गये हैं, कर्ता बनने पर भोक्ता तो बनना ही पड़ेगा. हम अपने आत्मभाव में स्थित रहकर ही प्रज्ञा, बुद्धि व क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सकते हैं, सामान्य बुद्धि से यदि हम जगत का निर्णय करेंगे तो दुविधा हमें घेर लेगी. जगत से व्यवहार करते समय यदि हम यह याद रखें कि वास्तव में ‘हम कौन हैं’? तो हम किसी भी परिस्थिति से अछूते निकल जायेंगे.


Wednesday, January 2, 2013

वह जो बसे मन में


जनवरी २००४ 
हमारे मन की वृत्तियाँ ही हमें ईश्वर से दूर रखती हैं, कभी स्मृतियों के बादल छा जाते हैं, कुहासा हो जाता है, कभी प्रमाद, निद्रा, आलस्य हमें सजग नहीं होने देते. कभी क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि का धुआँ चिदाकाश को आवृत कर लेता है, तो परमात्मा रूपी सूर्य दिखाई पड़े भी तो कैसे. वह तो सदा सर्वदा हमारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है, देर हमारी तरफ से है, वह तो आनंद में भर कर नृत्य करने लगता है जब कोई साधक मन से मोह का पर्दा हटाकर उसे निहारने का प्रयास करता है, वह  उसकी कुशल-क्षेम का भी जिम्मा उठाने को तैयार है. उसकी कृपा का अनुभव होते ही मन स्थिर हो जाता है, जैसे लहरों में हिचकोले खाती हुई नाव अचानक एक नियमित गति को पा ले. नए वर्ष में क्यों न हम यही संकल्प करें कि जो ऊर्जा आजतक व्यर्थ ही इतर कामों में चली जाती थी, उसे भीतर प्रवेश करने में लगाएंगे, अर्थात ध्यान को जीवन का अंग बनाएंगे. ध्यान पूजा की पराकाष्ठा है. ध्यान में ही उसके होने का अनुभव साधक को पहली बार होता है. उसकी उपस्थिति कितनी मधुर, प्रेरक और मोहक है. जीवन अमूल्य है, क्योंकि उसका एक-एक क्षण उस परमपिता का प्रसाद है. हमारी एक-एक श्वास उसकी ऋणी है. इस सृष्टि के नियंता ने हमें इसका एक छोटा सा पुर्जा बनाया है, हमें एक कार्य सौंपा है, देह, मन व बुद्धि का वरदान दिया है. वह अकारण हितैषी हमारी आत्मा का प्रकाश बनकर सदा हमारे साथ है. वह हमें अपनी ओर खींचता है, वही साधन भी है वही साध्य भी. वह जादूगर है, वह जो स्वयं को स्वयं ही जानता है, वह जो प्रेम की ही भाषा समझता है, जो हमारे सम्मुख स्वयं को प्रकट करने में देर भी नहीं करता, वही हमारा आराध्य है.

Sunday, September 23, 2012

घर जाना है सबको इक दिन


अगस्त २००३ 
अपने मन की वृत्ति को भीतर की ओर ले जाना है, उस स्रोत से जोड़ना है जहां से उसका जन्म हुआ है. हमें घर वापस लौटना है. मनोवृत्ति जब तक बाहर भटकती है तो अशांत होगी और भीतर अपने मूल स्वरूप से मिलेगी तो सुख पायेगी. जब से मानव होश सम्भालता है एक दौड़ शुरू हो जाती है, लेकिन उसे यह होश नहीं रहता यह दौड़ किसलिए है, कहाँ खत्म होगी, क्यों हम तलाश रहे हैं, किसे तलाश रहे हैं वह यह रुक कर पूछता तक नहीं, बस भेड़चालमें चलता रहता है. घूमता रहता है, गिरता है, चोट खाता है फिर उठकर चल देता है, कहीं कोई अच्छा मंजर दिखाई पड़ता है तो उसमें खो जाता है, लगता है इसे ही पाना था, पर वह क्षणिक सुख समाप्त हो जाता है, पीड़ा की सौगातदे  जाता है, फिर एक नई दौड़, लेकिन हमारा मन जब भीतर लौटता है तो असीम शांति का अनुभव करता है, ऐसा आनंद जो क्षणिक नहीं है, सत् है, वही हम हैं हम प्रेम से उपजे हैं, प्रेम हमारा स्वभाव है, अपने शुद्ध रूप को पाकर वह थम जाता है. अब और भटकाव नहीं, ठहराव आता है जीवन में. यह भीतर जाने की प्रक्रिया सद्गुरु हमें सिखाते हैं. इसके लिए मन को शांत करना है, ध्यानस्थ होना है, तटस्थ भाव से भीतर देखना है. 


Tuesday, April 10, 2012

संशय के पार


जनवरी २००३ 
स्वयं पर संशय, समाज पर संशय और परमात्मा पर संशय, ये तीनों हमें प्रयत्नपूर्वक छोड़ने हैं. इनमें से एक भी हमारे प्रगति में बाधक है. इसके लिये मन की वृत्ति बिखरी हुई न हो एक ओर टिकी हो. ध्यान सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम होता जाय, तभी शक्ति व सामर्थ्य उभरता है और अंततः सारे संशयों का नाश होता है. ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है, भौतिक जगत में उसका सत् स्वरूप प्रकट होता है, जीवों में उसका चैतन्य स्वरूप प्रकट होता है और भक्तों में उसका आनंद स्वरूप प्रकट होता है. दुःख का निमित्त बाहर है, दुःख मिलने पर मन में दुखाकार वृत्ति होती है उस वृत्ति से यदि हम एकाकार हों तभी दुःख गहरा होता है, यदि साक्षीभाव से देखना आ जाये तो हम उसके  भागी नहीं  होंगे. साधना के पथ पर जब एक बार कदम रख दें तो मन में उठने वाले प्रश्नों का जवाब किसी न किसी माध्यम से मिल ही जाता है. उस परम सत्ता पर पूर्ण विश्वास हो तो वह हमारी हर पल खबर लेता रहता है.

Thursday, August 25, 2011

निराग्रही मन


नवम्बर २००१ 

सुख-दुःख मन की मान्यता और कल्पना के आधार पर होता है, मन एक वृत्ति है सागर की तरंग की तरह, जो अभी है, अभी नहीं. मन एक चलते फिरते रास्ते की तरह भी है जिस पर तरह-तरह के लोग हर समय चलते रहते हैं. हमें जैसे कोई आग्रह नहीं होता कि सड़क पर इसे ही चलना होगा वैसे ही मन भी अनाग्रही रहे. मन यदि अपने मूल को पकड़े रहे तब उसे कोई सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर सकता जैसे सूर्य की किरणें सभी को छूती हैं पर स्वयं अछूती रह जाती हैं. विशेष परिस्थिति का आग्रह ही हमें बांधता है.