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Wednesday, September 8, 2021

मन जब खाली हो जायेगा

अनात्म का चिंतन न करना ही आत्मा में स्थित रहना है। जो संसार पल भर के लिए भी स्थिर नहीं रहता, उसको कितना भी संभाला जाए वह छूट ही जाएगा, पर जो इसे देख रहा है वह मन मृत्यु के बाद भी साथ जाएगा। मन में यदि कोई अभाव है तो उसे पूर्ण करने के लिए वह संसार का आश्रय लेता है. थोड़ी देर के लिए लगता है मन भर गया पर फिर रिक्त हो जाता है. जैसे भोजन के कुछ घण्टों बाद पुनः भूख सताती है. मन को यदि यह ज्ञात हो जाये कि उसका स्वभाव ही खाली रहना है तो वह उसे स्वीकार लेगा और उस अभाव की गहराई में जाकर पूर्णता का अनुभव करेगा. जब मन को भरने की हर चाह गिर जाती है तब भी कुछ  बचता है, वही आत्मा है. वह एक उपस्थिति मात्र है शांत और आनंद से भरी उपस्थिति. साधक जब संसार का चिंतन छोड़कर कुछ पलों के लिए चुपचाप बैठ जाता है, तो वह खालीपन दिव्यता से भरने लगता है. 


 

Saturday, July 12, 2014

सत्य ही हो लक्ष्य हमारा

सितम्बर २००६ 
कृष्ण व्यापक है, परम सत्य व्यापक है किन्तु हम मद तथा मूढ़ता की कारण उसे देख नहीं पाते. सत्य में स्थित रहकर कोई स्वयं को भूल नहीं सकता. हर हाल में जो शांत है, भीतर की समता बनाये रखता है, वह भक्त कृष्ण का प्रिय है. कृष्ण तथा सद्गुरु हमारे मद को दूर करने के लिए कभी-कभी कठोर हो जाते हैं. जब हम सत्य की खोज में निकलते हैं तो मन भटकाता है, हम केंद्र से दूर हो जाते हैं. सत्य शास्त्र से नहीं मिलता, शास्त्र उसका अनुमोदन भर करते हैं. हम जहाँ हैं वहीं थमकर देखने से मिलता है. सत्य जब प्रकट होता है तो ही भीतर का प्रेम प्रकट होता है, उसी प्रेम के कारण भक्त कभी गाता है, अश्रु बहाता है, नृत्य करता है.


Friday, April 26, 2013

सुख की आस सदा भरमाये


अगस्त २००४ 
कृष्ण कहते हैं, कामना यदि पूरी न हो तो क्रोध को जन्म देती है, क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति लोप और स्मृति विभ्रम से अशांति, अशांत व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता. कामना यदि पूर्ण हो जाये तो मन पर उसका संस्कार गहरा होता जाता है और बार-बार हम उसकी पूर्ति चाहते हैं. अपने सहज सुख को भुलाकर, जो बचपन में हम कांच-मिट्टी के खिलौनों से ही अथवा तो ऐसे ही पाए हुए थे, हम क्षणिक सुखों के गुलाम बनते जाते हैं. लगता है जैसे हम अपनी आँखें बंद किये बैठे हैं. जो दाता है वह भिक्षु बना हुआ है. सुख की परिभाषा ही यदि गलत होगी तो सच्चा सुख हमें मिलेगा भी कैसे? जो किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति पर निर्भर न हो. जो मुक्त करता हो, ऊर्जा से भर देता हो. जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, ऐसा सुख ही हमें पूर्णता की और ले जाता है.

Sunday, September 23, 2012

घर जाना है सबको इक दिन


अगस्त २००३ 
अपने मन की वृत्ति को भीतर की ओर ले जाना है, उस स्रोत से जोड़ना है जहां से उसका जन्म हुआ है. हमें घर वापस लौटना है. मनोवृत्ति जब तक बाहर भटकती है तो अशांत होगी और भीतर अपने मूल स्वरूप से मिलेगी तो सुख पायेगी. जब से मानव होश सम्भालता है एक दौड़ शुरू हो जाती है, लेकिन उसे यह होश नहीं रहता यह दौड़ किसलिए है, कहाँ खत्म होगी, क्यों हम तलाश रहे हैं, किसे तलाश रहे हैं वह यह रुक कर पूछता तक नहीं, बस भेड़चालमें चलता रहता है. घूमता रहता है, गिरता है, चोट खाता है फिर उठकर चल देता है, कहीं कोई अच्छा मंजर दिखाई पड़ता है तो उसमें खो जाता है, लगता है इसे ही पाना था, पर वह क्षणिक सुख समाप्त हो जाता है, पीड़ा की सौगातदे  जाता है, फिर एक नई दौड़, लेकिन हमारा मन जब भीतर लौटता है तो असीम शांति का अनुभव करता है, ऐसा आनंद जो क्षणिक नहीं है, सत् है, वही हम हैं हम प्रेम से उपजे हैं, प्रेम हमारा स्वभाव है, अपने शुद्ध रूप को पाकर वह थम जाता है. अब और भटकाव नहीं, ठहराव आता है जीवन में. यह भीतर जाने की प्रक्रिया सद्गुरु हमें सिखाते हैं. इसके लिए मन को शांत करना है, ध्यानस्थ होना है, तटस्थ भाव से भीतर देखना है. 


Tuesday, August 28, 2012

भक्त वही जो कुछ न चाहे


जुलाई २००३ 
भक्ति स्वयं फलरूपा है, अर्थात भक्ति का फल और भक्ति है, अपरा के बाद परा भक्ति ! जीवन मुक्त ही सच्ची भक्ति कर सकता है ऐसी भक्ति जो कुछ चाहती नहीं, सिर्फ देना चाहती है, अपना एकांतिक प्रेम उस प्रभु को, जो एकमात्र प्रेम करने योग्य है, वह सभी के भीतर है, कण-कण में है, अतः भक्त के लिये कोई पराया नहीं रहता. परमात्मा का प्रेम हमारे अंतर में हजार गुना होकर बल्कि अनंत गुना होकर प्रकाशित होता है. हमें उसके प्रेम का अधिकारी बनना है और उसकी सरल, सहज राह है विनम्रता की राह. वैसे तो परमात्म प्रेम सहज प्राप्य है, पर मन इसे देख नहीं पाता, जब शरणागति की भावना उपजती है, अपने अंतर को शांत बनाने की इच्छा बलवती होती है, तो भक्ति प्रकट होती है और आगे का मार्ग सरल हो जाता है.