अनात्म का चिंतन न करना ही आत्मा में स्थित रहना है। जो संसार पल भर के लिए भी स्थिर नहीं रहता, उसको कितना भी संभाला जाए वह छूट ही जाएगा, पर जो इसे देख रहा है वह मन मृत्यु के बाद भी साथ जाएगा। मन में यदि कोई अभाव है तो उसे पूर्ण करने के लिए वह संसार का आश्रय लेता है. थोड़ी देर के लिए लगता है मन भर गया पर फिर रिक्त हो जाता है. जैसे भोजन के कुछ घण्टों बाद पुनः भूख सताती है. मन को यदि यह ज्ञात हो जाये कि उसका स्वभाव ही खाली रहना है तो वह उसे स्वीकार लेगा और उस अभाव की गहराई में जाकर पूर्णता का अनुभव करेगा. जब मन को भरने की हर चाह गिर जाती है तब भी कुछ बचता है, वही आत्मा है. वह एक उपस्थिति मात्र है शांत और आनंद से भरी उपस्थिति. साधक जब संसार का चिंतन छोड़कर कुछ पलों के लिए चुपचाप बैठ जाता है, तो वह खालीपन दिव्यता से भरने लगता है.