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Wednesday, March 16, 2022

बासन्ती बयार बहे जब

 होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता  है तो परम  उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.

Tuesday, August 28, 2012

भक्त वही जो कुछ न चाहे


जुलाई २००३ 
भक्ति स्वयं फलरूपा है, अर्थात भक्ति का फल और भक्ति है, अपरा के बाद परा भक्ति ! जीवन मुक्त ही सच्ची भक्ति कर सकता है ऐसी भक्ति जो कुछ चाहती नहीं, सिर्फ देना चाहती है, अपना एकांतिक प्रेम उस प्रभु को, जो एकमात्र प्रेम करने योग्य है, वह सभी के भीतर है, कण-कण में है, अतः भक्त के लिये कोई पराया नहीं रहता. परमात्मा का प्रेम हमारे अंतर में हजार गुना होकर बल्कि अनंत गुना होकर प्रकाशित होता है. हमें उसके प्रेम का अधिकारी बनना है और उसकी सरल, सहज राह है विनम्रता की राह. वैसे तो परमात्म प्रेम सहज प्राप्य है, पर मन इसे देख नहीं पाता, जब शरणागति की भावना उपजती है, अपने अंतर को शांत बनाने की इच्छा बलवती होती है, तो भक्ति प्रकट होती है और आगे का मार्ग सरल हो जाता है. 

Wednesday, May 23, 2012

धर्म और विज्ञान


धर्म व्यक्ति का परिमार्जन करता है और विज्ञान वस्तु का परिमार्जन करता है. धर्म अंतर में ले जाता है, विज्ञान बाहर की ओर ले जाता है. अंतःकरण का परिमार्जन करने के बाद उसका उपयोग विज्ञान के लिये भी किया जा सकता है परहित के लिये. ऐसा विज्ञान दोषों के प्रति सजग होगा. और जो भी कार्य उसके द्वारा होगा, उसका कर्ताधर्ता एक ‘वही’ होगा, करने वाला निमित्त मात्र होगा. करने वाले का एक मात्र लक्ष्य तो अंतःकरण का परिमार्जन है सो वह निंदा का पात्र होने पर भी कभी अपमानित नहीं होगा, सुख-दुःख आदि में सम भाव में रहकर वह अपने अंतर आकाश को प्राप्त कर लेता है, जिस पर संसार रूपी बादल आते-जाते रहते हैं. पर वह सदा एक सा ही है.

Tuesday, April 24, 2012

तमसो मा ज्योतिर्गमयः


फरवरी २००३ 
हम प्रकाश के उपासक  हैं. प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है. ज्ञान की उपासना करें तो हृदय में कैसी शांति का अनुभव होता है जो अधरों को सदा खिला रखती है. अंतर में प्रसन्नता का अनुभव तभी हो सकता है जब कोई उद्वेग न हो, मान की चाह न हो, संक्षेप में कहें तो जब मन माया पर विजय प्राप्त कर ले. माया अर्थात जो है नहीं पर दिखता है. जो कुछ भी हमें चारों ओर दिख रहा है प्रतिपल बदल रहा है, नहीं की ओर जा रहा है. जिसका प्रभाव क्षणिक है उसका असर मन पर लेना मूर्खता ही है. उसे सत्य मान कर उसमें स्वयं को लिप्त कर लेना ही अज्ञान है, जितनी शीघ्र इस अज्ञान से मुक्ति मिलेगी उतना शीघ्र हमारे भीतर ज्ञान का सूर्य चमकेगा. यह जो कभी-कभी मन में विक्षिप्तता घर कर लेती है, किसी की कही बात, किसी का किया व्यवहार हृदय को, एक क्षण के लिये ही सही, बींधता है तो इसका अर्थ यही है कि अभी भीतर अँधेरा है. यह जगत जैसा हम चाहते हैं वैसा ही रूप धर लेता है. मन में कोई चाह न हो, तृप्ति हो तभी ज्ञान टिकता है. जहाँ चाह जगी उद्वेग होगा, जबकि वह क्षणिक ही होती है कुछ समय बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता, उसके बिना भी हम बड़े मजे से रह सकते थे, मात्र अपने अहं को पोषने के लिये हम चाहते हैं कि हर चाह पूरी हो. तब निष्कर्ष यही निकला कि अहं ही दोषी है. मिथ्या अहंकार ही हमें अपने को बहुत कुछ मानने की सलाह देता है, हम यदि कुछ हैं तो उस परम सत्ता के अंश मात्र हैं, उसने हमें एक पात्र बनाया है, अपने पात्र को सही ढंग से निबाहें, बस यहीं तक हमारा बस है, उसके आगे वही जाने...वह हमें असीम स्नेह करता है !   

Wednesday, December 7, 2011

सत्य और शुभ

जुलाई २००२ 
ईश्वर हमारा अंतरंग है. उसकी उपासना करने के लिये विधि-विधान की नहीं भाव भरे हृदय की आवश्यकता है. सहज रूप से जब अंतर में उसके प्रति प्रेम की हिलोर उठे तो उसी क्षण पूजा हो गयी, फिर धीरे-धीरे यह प्रेम उसकी सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के प्रति उत्पन्न होने लगता है. शुद्ध प्रेम के कारण ही परमात्मा भक्त के कुशल-क्षेम का वहन करते हैं. मन विश्रांति का अनुभव करता है, हमारा सामर्थ्य बढ़ता है. सत्य और शुभ के प्रति सहज प्रेम ही ईश्वर की राह में उठाया पहला कदम है. 

Tuesday, July 19, 2011

अंतर का संघर्ष

कुछ नया करें, नया सोचें, नया बोलें, कुछ नया होगा तो उस पर चिंतन होगा, मेधा तीव्र होगी. धारा के साथ बहने में कोई शक्ति नहीं लगती धारा के विपरीत बहने में ही संघर्ष है. आदर्शों को यदि जीवन में अपनाना है तो संघर्षो का सामना करना ही होगा. जो बाधाओं को सीढियाँ बना कर ऊपर चढ़ जाता है उसके अंतर में आह्लाद उत्पन्न होता है जो अंतर को सिंचित करता है. जीवन में कोई भी व्रत हो और उसका पालन करने की दृढ़ता हो तभी दीक्षा का जन्म होता है जिससे क्षमता बढ़ती है, क्षमता से श्रद्धा और श्रद्धा से अंतिम सत्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है. उसके बिना जो भी हम करते हैं वह बस तैयारी है.