Showing posts with label अनुराग. Show all posts
Showing posts with label अनुराग. Show all posts

Wednesday, March 16, 2022

बासन्ती बयार बहे जब

 होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता  है तो परम  उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.

Friday, April 20, 2018

प्रीत बिना जग सूना सूना


जिसका अंतर प्रेम से भीग-भीग जाता हो, फिर वह प्रेम चाहे प्रकृति के प्रति हो, देश के प्रति हो या स्वजनों के प्रति, वही परम की राह का राही हो सकता है. मरुथल जैसा हृदय ‘उसके’ किसी काम का नहीं, ‘जो’ रस से ही बना है. हानि-लाभ की भाषा में सोचने वाली बुद्धि हमें मस्त होने ही नहीं देती. बुद्धि का अति प्रयोग ही हमें बच्चों जैसी सहज मुदिता से दूर ले जाता है. भावना से युक्त मन ही उस अनुराग का अधिकारी होता है, जो राग का विरोधी नहीं बल्कि उसे पूर्णता प्रदान करता है. संसार के प्रति राग हो हम द्वेष से बच ही नहीं सकते, क्योंकि यहाँ सब कुछ जोड़े में ही मिलता है, पर परम के प्रति अनुराग हो तो उसका कोई विरोधी नहीं. इस परम को किसी हद में नहीं बाँधा जा सकता, हर किसी के लिए वह निजी हो सकता है, जो एक साथ ही सबका है. जैसे हर बच्चे का माँ से विशेष प्रेम होता है और माँ के लिए सब बच्चे समान होते हैं. वह एक साथ सबके लिए उपलब्ध है, पर हममें से जो उसे अपना मान लेगा, उसे ही वह प्राप्त होगा.