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Wednesday, March 16, 2022

बासन्ती बयार बहे जब

 होली का उत्सव मनों में कितनी उमंग जगाता है, सारा वातावरण जैसे मस्ती के आलम में डूब जाता है. प्रकृति भी अपना सारा वैभव लुटाने को तैयार रहती है. बसंत और फागुन की मदमस्त बयार बहती है और जैसे सभी मनों को एक सूत्र में बांध देती है. उल्लास और उत्साह के इस पर्व पर कृष्ण और राधा की होली का स्मरण हो आना कितना स्वाभाविक है. कान्हा के प्रेम के रंग में एक बार जो भी रंग जाता है वह कभी भी उससे उबर नहीं पाता. प्रीत का रंग ही ऐसा गाढ़ा रंग है जो हर भक्त को सदा के लिए सराबोर कर देता है. मन के भीतर से सारी अशुभ कामनाओं को जब होली की अग्नि में जलाकर साधक खाली हो जाता है अर्थात उसका मन शुद्ध वस्त्र पहन लेता  है तो परम  उस पर अपने अनुराग का रंग बरसा देता है. अंतर में आह्लाद रूपी प्रहलाद का जन्म होता है, विकार रूपी होलिका भस्म हो जाती है और चारों ओर सुख बरसने लगता है. होली का यह अनोखा उत्सव भारत के मंगलमय गौरवशाली अतीत का अद्भुत भेंट है.

Wednesday, December 26, 2012

राधे, राधे ! श्याम मिला दे



कान्हा हमारा परम सुह्रद है, हम उसे भुला देते हैं, प्रकृति के गुणों के अधीन होकर स्वयं को उससे पृथक मानते हैं, पर वह हमें चेताता है. हम उससे बिछड़ जाते हैं फिर मिल जाते हैं. प्रकृति और पुरुष का यह खेल अनन्तकाल से चल रहा है, जीव स्वयं को प्रकृति का अंश मानकर उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है, पर प्रकृति स्वयं पुरुष के अधीन है, वह नित नए खेल दिखाती है ताकि थक-हार कर बंदा उसकी शरण में आ जाये. तब वह हमारी सहायक हो जाती है, गुणातीत होने पर हम नित नवीन आनंद का अनुभव कर सकते हैं, जो हमारा सहज स्वभाव है. सहजता को भुला देने पर हम कल्पनाओं के जाल में खुद को उलझा हुआ पाते हैं, पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.

Saturday, October 22, 2011

वर्तमान में जीना


जून २००२ 

जीवन कितना अनमोल है और कितना मोहक, कान्हा की वंशी की तरह, उसकी मुस्कान की तरह, उसकी चितवन की तरह. मन में कोई उद्वेग न हो, कोई कामना न हो तो मन कितना हल्का-हल्का सा रहता है. किसी से भी कोई अपेक्षा न हो स्वयं से भी नहीं बस जो सहज रूप से मिल जाये उसे ही अपने विकास के लिये साधन बना लें और आगे बढ़ते चलें. होश पूर्वक जीना आ जाये तो हमें अ पने कार्यों, वाणी तथा विचारों के लिये कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ता है. वर्तमान में जीना ही होश में जीना है.