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Monday, February 12, 2024

एक प्रेम ऐसा भी हो

किसी न किसी रूप में प्रेम का अनुभव सभी को होता है, पर उसे शाश्वत बनाने की कला नहीं आती । यह कला तो कोई सद्गुरू ही सिखाते हैं।अध्यात्म ही वह साधन है जिसे अपना कर मन में प्रेम का अखंड दीपक जलाया जा सकता है। ऐसा प्रेम होने के लिए कोई अन्य सम्मुख हो, इसकी भी ज़रूरत नहीं, एक बार मन में प्रकट हो जाये तो सारी सृष्टि के प्रति और उसके आधार परम परमात्मा के प्रति वह सहज ही बहता है। इस प्रेम में प्रतिदान की आशा भी नहीं होती, केवल देने का भाव ही रहता है। संसारी प्रेम में पीड़ा है, ईर्ष्या है, चाह है, अधिकार की भावना है, जो प्रेम के शुद्ध स्वरूप को विकृत कर देती है, आध्यात्मिक प्रेम स्वयं को स्वयं तृप्त करता है इसलिए इसमें मिली पीड़ा भी आनंदकारी होती है, मीरा के ह्रदय की पीड़ा उसके गीतों में ढलकर अमर हो जाती है।तुलसी के प्रेम का बिरवा मानस के रूप में युगों युगों तक मानव को सुवास देता रहेगा।टैगोर के प्रेम गीत उसी अमर प्रेम के चिह्न हैं। 

Tuesday, February 21, 2023

जीना यहाँ मरना यहाँ

उपनिषद कहते हैं सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण ब्रह्म से उपजी है और उसके उपजने के बाद भी ब्रह्म पूर्ण ही शेष रहता है, सृष्टि ब्रह्म के लिए ही है. इस बात को यदि हम जीवन में देखें तो समझ सकते हैं मन पूर्ण है, पूर्ण आत्मा से उपजा है अर्थात विचार जहाँ  से आते हैं वह स्रोत सदा पूर्ण ही रहता है, मन आत्मा के लिए है. विचार ही कर्म में परिणित होते हैं और कर्म का फल ही आत्मा के सुख-दुःख का कारण है. यदि आत्मा स्वयं में ही पूर्ण है तो उसे कर्मों से क्या लेना-देना, वह उसके लिए क्रीड़ा मात्र है. हम इस सत्य को जानते नहीं इसीलिए मात्र 'होने' से सन्तुष्ट न होकर दिन-रात कुछ न कुछ करने की फ़िक्र में रहते हैं. जहाँ  हमें जाना है वहाँ  हम पहुँचे  ही हुए हैं. जैसे मछली सागर में है, पंछी हवा में है आत्मा परमात्मा में है. मछली को पता नहीं वह सागर में है, पंछी को ज्ञात नहीं वह पवन के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा को पता नहीं वह शांति के सागर में है. मीन और पंछी को इसे जानने की न जरूरत है न ही साधन हैं उनके पास पर मानव क्योंकि स्वयं को परमात्मा से दूर मान लेता है और उसके पास ज्ञान के साधन हैं, वह इस सत्य को जान सकता है. यही आध्यात्मिकता है, यही धार्मिकता है, यही साधना का लक्ष्य है.   प्रतिपल जीवन यह याद  दिलाता है, अनन्त ऊर्जा का एक स्रोत चारों और विद्यमान है. कितने ही लोग सूर्य ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं और कितने ही पवन ऊर्जा का. युगों से ये स्रोत मानव के पास थे पर उसे वह उपाय नहीं ज्ञात था जिसके द्वारा मानव इनका लाभ ले सकता था. इसी तरह  ज्ञान, प्रेम, शांति, सुख की अनन्त ऊर्जा भी परमात्मा के रूप में हर स्थान पर विद्यमान है पर कोई जानकार  ही उसका अनुभव कर पाता है. 


Thursday, November 11, 2021

थिरता जब मन में आएगी

अध्यात्म का सबसे बड़ा चमत्कार सबसे बड़ी सिद्धि तो यही है कि हम अपने बिखरे हुए मन को समझ  लें, चित्त को देख लें. मानव होने का यही तो लक्षण है कि साधना के द्वारा मन को इतना केंद्रित कर लें कि मन के परे जो शुद्ध, बुद्ध आत्मा है वह उसमें प्रतिबिम्बित हो उठे. ज्ञान के द्वारा उस आत्मा के बारे में  जानना है, फिर योग और ध्यान के द्वारा उसका अपने भीतर अनुभव करना है तथा भक्ति के द्वारा उसका आनंद सबमें बांटना है. योग अतियों का निवारण है, जो मन व तन को जो प्रसन्न रखता है  तथा भीतर ऐसा प्रेम प्रकटाता है, जिससे जीवन सन्तुलित हो. जब तक अपने लिए कुछ पाने  की वासना बनी है मन स्थिर व ख़ाली नहीं हो सकता, जब सारी इच्छाएं पहले ही पूर्ण हो चुकी हों तो कोई चाहे भी क्या ? व्यवहार जगत में दुनियादारी के लिए लेन-देन चलता रहे पर भीतर हर पल यह जाग्रति रहे कि वे आत्मा हैं, जो अपने आप में पूर्ण है ! ज्ञान के वचनों को समझ लेने मात्र से ही कोई बुद्ध नहीं हो जाता, जब तक स्वयं का अनुभव न हो तब तक उधर का ज्ञान व्यर्थ है. शास्त्र जब कुछ कहते हैं तो वे केवल तथ्य की सूचना भर देते हैं, उनकी उद्घोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे हमें हमारी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं।   


Tuesday, March 16, 2021

हीरा जन्म अमोल है

 जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है। एक ज्ञानी उसे अपना ही विस्तार मानता है, भक्त उसे परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में देखता है।सामान्य जन उसे अपने सुख का साधन मानता है। कोई पत्थर में भी ईश्वर को देख लेता है तो किसी को जीवित मनुष्य में भी  जीवन नजर नहीं आता। यह दुनिया हमें वैसी ही नजर आती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यदि हमारा मन श्रद्धा से भरा है तो ऐसे ही लोगों की तरफ हमारा झुकाव होगा। संतों, महात्माओं व ईश्वर के प्रति सहज ही भीतर आकर्षण होगा। उनकी संगति से भीतर का कलुष धुल जाएगा और एक दिन वह सत्य जो सदा ही सबके भीतर विराजमान है, प्रकट हो जाएगा। अध्यात्म का अर्थ है आत्म जागृति, यानि स्वयं के बारे में सही-सही ज्ञान प्राप्त करना। उस स्वयं के बारे में जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, जिसमें दुनिया का ज्ञान कोई इजाफा नहीं करता, बल्कि जो भी हमने उसके ऊपर परत दर परत चढ़ा लिया है, उसे उतार देना है। जैसे कोई हीरा यदि मिट्टी की परतों से ढका हो तो उसे साफ करते हैं वैसे ही साधना के द्वारा स्वयं पर चढ़े इच्छाओं, अपेक्षाओं आदि के आवरण को धो भर देना है। 


Tuesday, January 5, 2021

कर्ताभाव का त्याग करे जो

भगवद्गीता में एक जगह अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है, ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है ? और कर्म क्या है ? कृष्ण कहते हैं जो परम है अर्थात सर्वश्रेष्ठ है; जो  अक्षर है अर्थात अविनाशी है; वही ब्रह्म है. हम अपने आसपास वस्तुओं को नित्य बनते-नष्ट होते देखते हैं, लोगों को जन्मते व मरते देखते हैं, क्या ऐसा कुछ है जो कभी नष्ट नहीं होता. वास्तव में वस्तुएं अपना रूप बदल लेती हैं, बीज नष्ट होता है तो वृक्ष बन जाता है, वृक्ष नष्ट हो जाता है तो अंततः खाद बनकर मिट्टी में ही मिल जाता है. विज्ञान में हमने पढ़ा है कि ऊर्जा और पदार्थ न बनाये जा सकते हैं न नष्ट किये जा सकते हैं, केवल उन्हें परिवर्तित किया जा सकता है. ब्रह्म ऐसा पदार्थ या ऊर्जा है जो सदा एक सा है. दूसरे प्रश्न के उत्तर में कृष्ण कहते हैं, स्वभाव ही अध्यात्म है. हर प्राणी का मूल स्वभाव जो शिशु जन्म से अपने साथ लेकर आता है, अध्यात्म है. जब तक बच्चा भाषा नहीं सीख लेता वह स्वभाव से ही संवाद करता है, प्रकृति में सभी जीव उसी मूल स्वभाव से जुड़े हैं, एक बिल्ली अथवा कुत्ते को कैसे ज्ञात हो जाता है कि उसे स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए कौन सा पत्ता खाना है. संत मौन से ही वृक्षों के साथ संवाद कर लेते हैं क्योंकि वह निज स्वभाव में रहते हैं. कर्म की परिभाषा में कृष्ण कहते हैं, भूतों के भाव का त्याग ही कर्म है, अर्थात जब हम अपने मूल स्वभाव से हट हो जाते हैं तो कर्ता भाव में आ जाते हैं. कितने ही साधक कहते हैं साधना काल में मन शांत रहता है पर कर्म करते समय मन विचलित हो जाता है. इसका अर्थ है कि हम अध्यात्म से नीचे उतर गए. इसीलिए कृष्ण निष्काम कर्म करने के लिए कहते हैं जो आत्मा में स्थित रहकर किया जा सकता  है तथा जिसका कोई बन्धन नहीं होता. 

 

Wednesday, September 16, 2020

खो जायेगा छोटा मन जब

 महामारी  के इस काल में सब कुछ अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा है. एक भय और असुरक्षा की भावना पहले से बढ़ गयी लगती है. ऐसे में अध्यात्म का आश्रय लेकर हम सहज ही अपने मन को तनाव से मुक्त रख सकते हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ के सीमित दायरे से निकाल कर अध्यात्म हमें औरों के प्रति संवेदनशील होना सिखाता है. तनाव होता है स्वयं के बारे में सोचते रहने से, यदि हम अपनी सोच में बदलाव ले आएं और यह विचारें कि क्या इस दौर में हम अन्यों की किसी भी तरह की मदद कर सकते हैं, तो हमें अपनी चिंता करने का समय ही नहीं मिलेगा. जिस परम शक्ति ने इस विराट सृष्टि का निर्माण किया है, उसके प्रति समर्पण करने से भी मन भय मुक्त हो जाता है. सुबह और शाम आधा घण्टा ध्यान करने से भी हम मन में स्थिरता और शांति का अनुभव कर सकते हैं. ध्यान हमें ऊर्जावान बनाता है, हमारा छोटा मन विशाल मन के साथ जुड़ कर गहन विश्राम का अनुभव कर सकता है, जो मन के साथ-साथ तन को भी स्वस्थ रखने में सहायक है. 

Tuesday, August 18, 2020

स्व के भाव को जानेगा जो


योग और अध्यात्म का आश्रय लेकर ही हम देह और मन को स्वस्थ व प्रसन्न  रख सकते हैं. योग का अर्थ है जुड़ना, स्वंय  का इस सम्पूर्ण अस्तित्त्व के साथ जुड़ाव ही योग है. पतंजलि के अष्टांग योग की साधना के द्वारा इसे अनुभव किया जा सकता है, किन्तु ‘स्वयं’ का सही परिचय हमें अध्यात्म से प्राप्त होता है. शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का अध्ययन करके अपने स्व को पहचानना ही अध्यात्म है. देह एक निश्चित आयु पूर्ण करके मिट्टी में मिल जाने वाली है. मन अधूरी कामनाओं को लेकर एक नए शरीर में प्रवेश करने वाला है, किन्तु स्व अथवा निजता को जिसने जान लिया वह जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर हो जाता है. वह होश में मरता है और होश में ही नयी देह धारण करता है, ऐसे ही मानव जन्म से संत अथवा सिद्ध होते हैं. शास्त्र और संत कहते हैं मृत्यु से पहले जिसने अपने आपको जान लिया, उसने उस कार्य को सिद्ध कर लिया जिसके लिए उसे मानव देह मिली थी.  


Wednesday, May 20, 2020

सदा जानने को उत्सुक जो


मानव सुख का आकांक्षी है, किंतु ऐसा सुख वह नहीं चाहता जो बिना किसी श्रम के उसे उपलब्ध हो जाये. वह अपने सुख का निर्माण भी स्वयं ही करना चाहता है. छोटा बच्चा पालने में आराम से पड़ा है, पर वह स्थिर नहीं बैठता, जितना हो सके हाथ-पैर हिलाता है, यदि ऊपर कोई खिलौना लटका हुआ है, उसे पकड़ना चाहता है. कुछ पाने की उसकी दौड़ पालने से ही आरंभ हो जाती है. करवट बदलना आते ही वह बैठना शुरू कर देता है और चलना सीखते ही जल्दी भागने भी लगता है. मानव के भीतर जो चेतना है वह अग्नि की भांति ऊपर ही ऊपर जाना चाहती है. कुछ वैज्ञानिक अंतरिक्ष का रहस्य खोजने में लगे हैं और कई सागर की अतल गहराइयों का. हमारे ऋषि भी एक वैज्ञानिक की भांति वर्षों तक प्रयोग करते थे, उन्होंने भी कई खोजें की, साथ ही वे उस चेतना को भी जानना चाहते थे जो सदा ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी. यही खोज भारत को अन्य राष्ट्रों से अलग करती है. जो हमें चैन से बैठने नहीं देता आखिर भीतर वह क्या है? कौन विचारता है ? कौन चाहता है ? कौन कर्म के लिए प्रेरित करता है ? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए ही सम्भवतः अध्यात्म शास्त्र की रचना हुई होगी.  

Friday, May 15, 2020

स्वयं को जिसने जान लिया है


अध्यात्म का अर्थ है आत्मा का अध्ययन, आत्मा यानि अपने भीतर की शुद्ध चेतना का अध्ययन. हम देह को जानते हैं, उसकी देख-रेख करते हैं, व्यायाम करके उसे स्वस्थ रखने का प्रयास करते हैं, सन्तुलित भोजन ग्रहण करके दीर्घ आयु पाना चाहते हैं. मन से सोच-विचार करते हैं, संकल्प उठाते हैं, उन्हें पूरा करने का प्रयत्न करते हैं, मन जब थक जाता है, उसका रंजन करने के लिए पुस्तकें पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं और घूमने जाते हैं. बुद्धि के द्वारा धन और यश कमाते हैं, बुद्धि हमें सदा लाभ की तरफ ले जाती है, सदा यही समझाती है कि जितना हो सके संग्रह करें जितना हो सके संबंध बनाएँ ताकि हम सुरक्षित हो सकें. अपनी सुरक्षा के लिए हम जीवन भर प्रयत्नशील रहते हैं क्योंकि हम स्वयं को मरणशील देह ही मानते हैं, जिसे बनाये रखने के लिए धन चाहिए. इस मन-कायिक अस्तित्त्व को ही हम अपना स्वरूप जानते हैं. ‘मै कहकर हम इसे ही प्रस्तुत करते हैं, समाज इसका एक नाम देता है, हम उस नाम को ही अपना परिचय मानकर सन्तुष्ट हो जाते हैं. यदि कभी किसी शास्त्र या सन्त के वचन हमें सुनने को मिलते हैं तो ज्ञात होता है, जो हम स्वयं को मानते हैं वह हैं ही नहीं, हम तो इस देह-मन के पीछे स्थित वह चेतना हैं, जिसे न दीर्घायु के लिए प्रयत्न करना है क्यों कि वह अजर है और न ही रंजन करने के लिए उसे कुछ चाहिए क्योंकि वह स्वयं आनंद स्वरूप है. अध्यात्म इसी चेतना से जुड़ने का नाम है.

Tuesday, May 5, 2020

ज्योति जलेगी जिस पल मन में

जब हम अध्यात्म के क्षेत्र में कदम रखते हैं, जब हम वास्तव में स्वयं के अनंत रूप से परिचित होना चाहते हैं, सारा जगत हमारा घर बन जाता है. हमारे मन में जब किसी बात के प्रति संदेह उत्पन्न होता है तो हमें जानना चाहिए की यह जहाँ से आया है वहाँ गहरा विश्वास है. मन उसी के आधार पर तर्क करता है जो वह जानता है. यदि हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारी छोटी सी बुद्धि जितना जानती है अस्तित्त्व उससे कहीं अधिक है तो हृदय के द्वार खुलने लगते हैं. जब हम किसी भी स्थिति का सामना सहज रूप से कर सकते हैं, मन का संतुलन बना रहता है, तो मानना चाहिए कि उस गहराई से हम जुड़े हैं. जीवन में हम गतिमयता का वरण तभी करते हैं जब जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण अति विशाल होता है. हमारे भीतर एक ऐसी चेतना का जन्म होता है जो साक्षी रहकर जो भी आवश्यक हो उसे करने की प्रेरणा देती है. हमारी खोज यदि सच्ची है तो प्रकृति हमारा मार्गदर्शन करती है. 

Monday, February 24, 2020

जगे प्रार्थना ऐसी मन में


शास्त्र शुद्ध बुद्ध, मुक्त आत्मा का संदेश देते हैं. तन-मन से अशुद्धियाँ निकल जाएँ, यह प्रार्थना  ही हर कोशिका को जीवंत कर देती है जीवन से हर विकार दूर हो, प्रमाद, आलस्य और तमस की नींद से जाकर हम जीवन में नया सवेरा लाएं.परमात्मा की दी हुई शक्तियों को इस्तेमाल कर स्वयं से व्यक्त होने का उन्हें मौका दें. अध्यात्म का अर्थ है आत्मा हमसे प्रकटे, तन और मन उसमें बाधा न बनें तो वह स्वयं प्रकाशित है जैसे कोई खिड़की का पट उढ़का ले तो सूरज का प्रकाश रुक जाता है. प्रकाश के लिए सूरज बनाना तो नहीं है, न ही कहीं से लाना है,आत्मा है, हमने रोक हुआ है उसका मार्ग. देह स्थूल है, मन भी स्थूल है, देह प्रकृति है, मन भी प्रकृति का अंग है, जो पल-पल बदल रही है, आत्मा सदा एक सी  स्वयं में पूर्ण है, उसको मार्ग दें तो वह अपनी मुस्कान से भर देगी तन, मन दोनों को जैसे सूर्य प्रकाशित करता है घर की हर शै को ! 

Wednesday, July 31, 2019

मन तू ज्योति स्वरूप



मानव मस्तिष्क में अद्भुत क्षमता है. आज वैज्ञानिक अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए तत्पर हैं, संचार के साधनों में अत्यधिक वृद्धि हो चुकी है. भारत का पुरातन इतिहास उठाकर देखें तो ऐसे कई आश्चर्यजनक विवरण मिलते हैं उस काल में ऋषियों ने बिना अंतरिक्ष में गये धरती के गोल होने तथा सूर्य की परिक्रमा करने की बात ज्ञात कर ली थी. सौर मंडल के कितने ही रहस्य उन्हें पता थे. धरती तथा अन्य ग्रहों की सूर्य से दूरी का जो अनुमान उन्होंने लगाया था वह आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है. इसी प्रकार जड़ी-बूटियों का ज्ञान उन्हें प्रयोगशाला में जाकर नहीं मन की शक्ति से ही हो जाता था. जब संसार का रचियता स्वयं मानव के इस मन में बैठा है तो भला यह सम्भव भी क्यों न होता. आज छोटी-छोटी बातों के कारण जो युवा आत्महत्या की बात सोचने लगते हैं, उन्हें अपने मन की इस अद्भुत क्षमता का कोई ज्ञान ही नहीं है. भारत में जन्म लेकर अध्यात्म का ज्ञान न होना आज के युवाओं के जीवन में सबसे बड़ी कमी है.

Monday, November 26, 2018

छिपा सांत में है अनंत भी


२६ नवम्बर २०१८ 
अध्यात्म हमें देहाध्यास से छुड़ाकर आत्मा में स्थित होने की कला सिखाता है. जन्म के साथ ही सबसे पूर्व हमारा परिचय अपनी देह के साथ होता है. एक प्रकार से देह को ही हम अपना स्वरूप समझने लगते हैं. जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है, उसका परिचय अपने आस-पास के वातावरण व संबंधियों से होता है. उसका नाम उसे सिखाया जाता है, धर्म, राष्ट्रीयता और लिंग के आधार पर उसे उसकी पहचान बताई जाती है. जीवन भर यदि कोई व्यक्ति इसी पहचान को अपना स्वरूप समझता रहे तो वह जीवन के एक विराट सत्य से वंचित रह जाता है. गुरू के द्वारा जब यह पहचान दी जताई है, तब उसका दूसरा जन्म होता है, इसीलिये ब्राह्मण को द्विज कहा जाता है. यह पहचान उसके वास्तविक स्वरूप की है, जो एक अविनाशी तत्व है. स्वयं के भीतर इसका अनुभव करने के लिए ही गुरू के द्वारा साधना की एक विधि दी जाती है. सभी साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य होता है साधक को देहाध्यास से मुक्त कराकर अपने असीमित स्वरूप का भान कराना. यही अध्यात्म विद्या है और यही भारत की जगत को सबसे बड़ी देन है.

Friday, November 23, 2018

भीतर ही वह सागर मिलता


२४ नवम्बर २०१८ 
जो ‘है’ वह शब्दों में नहीं कहा जा सकता, जो ‘नहीं’ है उसके कहने का कोई अर्थ नहीं. किन्तु इतना कहना भी कुछ कहने में ही आता है. संत कहते हैं, परमात्मा को जाना नहीं जा सकता, उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता हाँ, उसके साथ एक हुआ जा सकता है, उसके होने को अनुभव किया जा सकता है. उसकी उपस्थिति को उसी तरह दूसरे को नहीं दिखाया जा सकता जैसे कोई दूर बैठे मित्र को अपने मुल्क की हवा का स्पर्श नहीं करा सकता, सूरज की किरणों की नरमाई-गरमाई को नहीं भेज सकता, उसके लिए तो उसे स्वयं ही आना पड़ेगा. इसी तरह हरेक को अपने भीतर स्वयं ही जाना पड़ेगा, जो भीतर जायेगा वही वापस नहीं आएगा, क्यों कि जो आयेगा वह भी कुछ कह नहीं पायेगा. अध्यात्म का पथ कितना रहस्यमय है इसलिए ही इसका आकर्षण भी इतना अधिक है. यहाँ जो गया वह जगत में रहकर भी निज स्वभाव में ही बना रह सकता है.

Sunday, September 16, 2018

स्वयं से मिलना होगा जब

१६ सितम्बर 2018
अध्यात्म के मार्ग पर चलने के लिए जो सबसे पहली पात्रता है, वह है स्वयं का ज्ञान. अध्यात्म शब्द का अर्थ है-आत्म संबंधी. स्वयं को जानने के लिए पहले हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्त्व - शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व आत्मा, हरेक का ज्ञान करना होगा. इसमें प्रथम यानि देह स्थूल है और शेष सभी सूक्ष्म. आत्मा इन सबको प्रकाशित करता है, अर्थात जिसके होने से ही देह आदि का अस्तित्त्व है. हमारा जीवन यदि देह तक ही सीमित है, अर्थात देह को स्वस्थ रखना, उसे आराम देना, सजाना-संवारना ही यदि हमारे लिए प्रमुख है तो हम अध्यात्म से बहुत दूर हैं. यदि हम मानसिक चिन्तन मनन अधिक करते हैं, साहित्य, कला आदि में हमारी रूचि है, या हम मनोरंजन के लिए लालायित रहते हैं तो भी हम अभी अध्यात्म से दूर हैं. बौद्धिक चिंतन भी हमें आत्मज्ञानी नहीं बनाता. इसके लिए तो इन छह स्तरों को पार करके स्वयं के होने का अनुभव करना होगा. स्वयं की सत्ता को जिसने जान लिया उसने अध्यात्म के पथ पर कदम रख दिया. अब धीरे-धीरे मन के संस्कारों का दर्शन आरम्भ होगा, तत्पश्चात उसका शुद्धिकरण आरंभ होगा.

Thursday, March 15, 2018

एक तू जो मिला


१५ मार्च २०१८ 
हमारे जीवन की दिशा हमारे ज्ञान से ही निर्धारित होती है. निज ज्ञान के अनुरूप धर्म का पालन करते हुए हम यथासम्भव जगत के व्यवहार निभाते रहते हैं. जब जगत के विषयों से कोई ऊब जाता है तब उसकी नजर स्वयं की ओर मुड़ती है. यहाँ से अध्यात्म का आरम्भ होता है. धर्म के मार्ग पर ईश्वर हमारा सहायक है, उसके माध्यम से हमें जगत को पाना है. अध्यात्म के मार्ग पर ईश्वर हमारा लक्ष्य है, उसके माध्यम से उसी को पाना है. जब तक ईश्वर से हम सुख के लिए प्रार्थना करते हैं, दुःख साथ में आते ही रहेंगे, क्योंकि संसार द्वंद्वों का ही दूसरा नाम है. जब ईश्वर ही हमारा प्राप्य होगा तब जीवन से सारा विषाद चला जायेगा, क्योंकि ईश्वर आनंद स्वरूप है.

Tuesday, October 24, 2017

मुक्त हुआ जो सभी दुखों से

२५ अक्तूबर २०१७ 
जगत में रहते हुए हम इसके प्रभावों से अलिप्त कैसे रहें, अध्यात्म विद्या इसी कला को सिखाती है. हर जीव को अपने पूर्व कर्मों के अनुसार जन्म और जीवन की अच्छी-बुरी परीस्थितियां मिली हैं. साथ ही उसे नये कर्म करने की स्वतन्त्रता भी मिली है. यदि कोई इस बात से अनभिज्ञ है अथवा संस्कारों के अनुसार ही जीवन प्रवाह में बहता जा रहा है, तो वह अपने भावी जीवन को भी उन्हीं के अनुसार ढाल रहा है. इसी को जन्म-मरण का चक्र कहते हैं, जिसमें गति तो है पर दोहराव है. अध्यात्म ऊपर उठने की कला सिखाता है, जिससे हम भविष्य में उन दुखों से बच सकते हैं जो पूर्व में मिले थे. परमात्मा के प्रति प्रेम और स्वयं के चिन्मय स्वरूप का बोध हमें इसी विद्या से होता है. जिसके कारण सद्कर्मों को करते हुए हम अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करना सीखते हैं.


Wednesday, August 16, 2017

अध्यात्म की डगर सुहानी

१६ अगस्त २०१७ 
जीवन प्रतिपल बांट रहा है. हजारों युगों से एक क्षण भी रुके बिना पवन का संचार हो रहा है. तेज गति से पृथ्वी सूर्य का परिभ्रमण कर रही है. सूर्य की रश्मियाँ नित नये प्राणियों को जन्माने में सहायक हैं. मानव के भीतर कल्पना और बुद्धिमत्ता के अद्भुत संयोग से नित नये अविष्कार हो रहे हैं. कला और विज्ञान की ऊंचाईयों को इस युग ने स्पर्श किया है. इतना सब कुछ होने पर भी अपने आस-पास देखने पर एक निराशा और अभाव का दर्शन होता है, जिसके लिए बढती हुई जनसंख्या तथा मानव का बढ़ता हुआ लोभ, आपसी मतभेद और सम्प्रदायों के नाम पर होती हुई हिंसा जैसे कुछ कारण गिनाये जा सकते हैं. अध्यात्म के पास इन सभी समस्याओं का इलाज है. अध्यात्म मानव को  मानव, प्रकृति तथा सम्पूर्ण सृष्टि से एकत्व की भावना का अनुभव कराता है. अध्यात्म आज के समय की मांग है.   

Wednesday, May 24, 2017

सहज मिले जब सुख का मोती

२५ मई २०१७ 
पंच इन्द्रियों से मिलने वाला सुख हमारी ऊर्जा को कम करता है, जब तक मन में प्रमाद और बुद्धि में जड़ता रहती है, अर्थात रजो गुण और तमो गुण अधिक होते हैं, हमें इस बात का आभास नहीं होता. सात्विक सुख की झलक मिल जाने के बाद ही समझ में आता है कि आज तक जिन्हें हम सुख के साधन मान रहे थे वास्तव में हमें दुर्बल बना रहे थे. अध्यात्म किसी भी तरह के प्रमाद और जड़ता को तोड़ने के लिए है. योग के द्वारा जब सतोगुण बढ़ता है भीतर सहज ही प्रसन्नता का अनुभव होता रहता है. ध्यान इस ऊर्जा को बढ़ाने का साधन है. 

Friday, January 6, 2017

हर कदम पर साथ है वह


अध्यात्म के पथ पर हम सजग होकर चलते हैं तो कोई अदृश्य हमारा हाथ थाम लेता है. लक्ष्य यदि स्पष्ट हो तो रास्ते  खुदबखुद बनते जाते हैं. मानव जन्म पाकर भी यदि परम को लक्ष्य नहीं बनाया तो हमने अपने भीतर की संपदा को पहचाना ही नहीं। भारत में जन्म लिया और सन्तों की हवा में श्वास भरे तो उनकी मस्ती को पा लेने की सहज प्यास भीतर क्यों न जगे? एक ललक उन जैसा होने की यदि मन में बीज की तरह पड़ गयी तो एक न एक दिन वृक्ष बन ही जाएगी, जिस पर भक्ति के फूल लगेंगे। परमात्मा की सत्ता पर अटल विश्वास और उससे एक संबन्ध, ये दो ही  इस मार्ग के पाथेय हैं, मार्ग मधुर है और संगी वह खुद है जिस तक हमें जाना है.