Monday, February 12, 2024
एक प्रेम ऐसा भी हो
Tuesday, February 21, 2023
जीना यहाँ मरना यहाँ
उपनिषद कहते हैं सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण ब्रह्म से उपजी है और उसके उपजने के बाद भी ब्रह्म पूर्ण ही शेष रहता है, सृष्टि ब्रह्म के लिए ही है. इस बात को यदि हम जीवन में देखें तो समझ सकते हैं मन पूर्ण है, पूर्ण आत्मा से उपजा है अर्थात विचार जहाँ से आते हैं वह स्रोत सदा पूर्ण ही रहता है, मन आत्मा के लिए है. विचार ही कर्म में परिणित होते हैं और कर्म का फल ही आत्मा के सुख-दुःख का कारण है. यदि आत्मा स्वयं में ही पूर्ण है तो उसे कर्मों से क्या लेना-देना, वह उसके लिए क्रीड़ा मात्र है. हम इस सत्य को जानते नहीं इसीलिए मात्र 'होने' से सन्तुष्ट न होकर दिन-रात कुछ न कुछ करने की फ़िक्र में रहते हैं. जहाँ हमें जाना है वहाँ हम पहुँचे ही हुए हैं. जैसे मछली सागर में है, पंछी हवा में है आत्मा परमात्मा में है. मछली को पता नहीं वह सागर में है, पंछी को ज्ञात नहीं वह पवन के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा को पता नहीं वह शांति के सागर में है. मीन और पंछी को इसे जानने की न जरूरत है न ही साधन हैं उनके पास पर मानव क्योंकि स्वयं को परमात्मा से दूर मान लेता है और उसके पास ज्ञान के साधन हैं, वह इस सत्य को जान सकता है. यही आध्यात्मिकता है, यही धार्मिकता है, यही साधना का लक्ष्य है. प्रतिपल जीवन यह याद दिलाता है, अनन्त ऊर्जा का एक स्रोत चारों और विद्यमान है. कितने ही लोग सूर्य ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं और कितने ही पवन ऊर्जा का. युगों से ये स्रोत मानव के पास थे पर उसे वह उपाय नहीं ज्ञात था जिसके द्वारा मानव इनका लाभ ले सकता था. इसी तरह ज्ञान, प्रेम, शांति, सुख की अनन्त ऊर्जा भी परमात्मा के रूप में हर स्थान पर विद्यमान है पर कोई जानकार ही उसका अनुभव कर पाता है.
Thursday, November 11, 2021
थिरता जब मन में आएगी
अध्यात्म का सबसे बड़ा चमत्कार सबसे बड़ी सिद्धि तो यही है कि हम अपने बिखरे हुए मन को समझ लें, चित्त को देख लें. मानव होने का यही तो लक्षण है कि साधना के द्वारा मन को इतना केंद्रित कर लें कि मन के परे जो शुद्ध, बुद्ध आत्मा है वह उसमें प्रतिबिम्बित हो उठे. ज्ञान के द्वारा उस आत्मा के बारे में जानना है, फिर योग और ध्यान के द्वारा उसका अपने भीतर अनुभव करना है तथा भक्ति के द्वारा उसका आनंद सबमें बांटना है. योग अतियों का निवारण है, जो मन व तन को जो प्रसन्न रखता है तथा भीतर ऐसा प्रेम प्रकटाता है, जिससे जीवन सन्तुलित हो. जब तक अपने लिए कुछ पाने की वासना बनी है मन स्थिर व ख़ाली नहीं हो सकता, जब सारी इच्छाएं पहले ही पूर्ण हो चुकी हों तो कोई चाहे भी क्या ? व्यवहार जगत में दुनियादारी के लिए लेन-देन चलता रहे पर भीतर हर पल यह जाग्रति रहे कि वे आत्मा हैं, जो अपने आप में पूर्ण है ! ज्ञान के वचनों को समझ लेने मात्र से ही कोई बुद्ध नहीं हो जाता, जब तक स्वयं का अनुभव न हो तब तक उधर का ज्ञान व्यर्थ है. शास्त्र जब कुछ कहते हैं तो वे केवल तथ्य की सूचना भर देते हैं, उनकी उद्घोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे हमें हमारी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं।
Tuesday, March 16, 2021
हीरा जन्म अमोल है
जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है। एक ज्ञानी उसे अपना ही विस्तार मानता है, भक्त उसे परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में देखता है।सामान्य जन उसे अपने सुख का साधन मानता है। कोई पत्थर में भी ईश्वर को देख लेता है तो किसी को जीवित मनुष्य में भी जीवन नजर नहीं आता। यह दुनिया हमें वैसी ही नजर आती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यदि हमारा मन श्रद्धा से भरा है तो ऐसे ही लोगों की तरफ हमारा झुकाव होगा। संतों, महात्माओं व ईश्वर के प्रति सहज ही भीतर आकर्षण होगा। उनकी संगति से भीतर का कलुष धुल जाएगा और एक दिन वह सत्य जो सदा ही सबके भीतर विराजमान है, प्रकट हो जाएगा। अध्यात्म का अर्थ है आत्म जागृति, यानि स्वयं के बारे में सही-सही ज्ञान प्राप्त करना। उस स्वयं के बारे में जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, जिसमें दुनिया का ज्ञान कोई इजाफा नहीं करता, बल्कि जो भी हमने उसके ऊपर परत दर परत चढ़ा लिया है, उसे उतार देना है। जैसे कोई हीरा यदि मिट्टी की परतों से ढका हो तो उसे साफ करते हैं वैसे ही साधना के द्वारा स्वयं पर चढ़े इच्छाओं, अपेक्षाओं आदि के आवरण को धो भर देना है।
Tuesday, January 5, 2021
कर्ताभाव का त्याग करे जो
भगवद्गीता में एक जगह अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है, ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है ? और कर्म क्या है ? कृष्ण कहते हैं जो परम है अर्थात सर्वश्रेष्ठ है; जो अक्षर है अर्थात अविनाशी है; वही ब्रह्म है. हम अपने आसपास वस्तुओं को नित्य बनते-नष्ट होते देखते हैं, लोगों को जन्मते व मरते देखते हैं, क्या ऐसा कुछ है जो कभी नष्ट नहीं होता. वास्तव में वस्तुएं अपना रूप बदल लेती हैं, बीज नष्ट होता है तो वृक्ष बन जाता है, वृक्ष नष्ट हो जाता है तो अंततः खाद बनकर मिट्टी में ही मिल जाता है. विज्ञान में हमने पढ़ा है कि ऊर्जा और पदार्थ न बनाये जा सकते हैं न नष्ट किये जा सकते हैं, केवल उन्हें परिवर्तित किया जा सकता है. ब्रह्म ऐसा पदार्थ या ऊर्जा है जो सदा एक सा है. दूसरे प्रश्न के उत्तर में कृष्ण कहते हैं, स्वभाव ही अध्यात्म है. हर प्राणी का मूल स्वभाव जो शिशु जन्म से अपने साथ लेकर आता है, अध्यात्म है. जब तक बच्चा भाषा नहीं सीख लेता वह स्वभाव से ही संवाद करता है, प्रकृति में सभी जीव उसी मूल स्वभाव से जुड़े हैं, एक बिल्ली अथवा कुत्ते को कैसे ज्ञात हो जाता है कि उसे स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए कौन सा पत्ता खाना है. संत मौन से ही वृक्षों के साथ संवाद कर लेते हैं क्योंकि वह निज स्वभाव में रहते हैं. कर्म की परिभाषा में कृष्ण कहते हैं, भूतों के भाव का त्याग ही कर्म है, अर्थात जब हम अपने मूल स्वभाव से हट हो जाते हैं तो कर्ता भाव में आ जाते हैं. कितने ही साधक कहते हैं साधना काल में मन शांत रहता है पर कर्म करते समय मन विचलित हो जाता है. इसका अर्थ है कि हम अध्यात्म से नीचे उतर गए. इसीलिए कृष्ण निष्काम कर्म करने के लिए कहते हैं जो आत्मा में स्थित रहकर किया जा सकता है तथा जिसका कोई बन्धन नहीं होता.
Wednesday, September 16, 2020
खो जायेगा छोटा मन जब
महामारी के इस काल में सब कुछ अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा है. एक भय और असुरक्षा की भावना पहले से बढ़ गयी लगती है. ऐसे में अध्यात्म का आश्रय लेकर हम सहज ही अपने मन को तनाव से मुक्त रख सकते हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ के सीमित दायरे से निकाल कर अध्यात्म हमें औरों के प्रति संवेदनशील होना सिखाता है. तनाव होता है स्वयं के बारे में सोचते रहने से, यदि हम अपनी सोच में बदलाव ले आएं और यह विचारें कि क्या इस दौर में हम अन्यों की किसी भी तरह की मदद कर सकते हैं, तो हमें अपनी चिंता करने का समय ही नहीं मिलेगा. जिस परम शक्ति ने इस विराट सृष्टि का निर्माण किया है, उसके प्रति समर्पण करने से भी मन भय मुक्त हो जाता है. सुबह और शाम आधा घण्टा ध्यान करने से भी हम मन में स्थिरता और शांति का अनुभव कर सकते हैं. ध्यान हमें ऊर्जावान बनाता है, हमारा छोटा मन विशाल मन के साथ जुड़ कर गहन विश्राम का अनुभव कर सकता है, जो मन के साथ-साथ तन को भी स्वस्थ रखने में सहायक है.
Tuesday, August 18, 2020
स्व के भाव को जानेगा जो
योग और अध्यात्म का आश्रय लेकर ही हम देह और मन को स्वस्थ व प्रसन्न रख सकते हैं. योग का अर्थ है जुड़ना, स्वंय का इस सम्पूर्ण अस्तित्त्व के साथ जुड़ाव ही योग है. पतंजलि के अष्टांग योग की साधना के द्वारा इसे अनुभव किया जा सकता है, किन्तु ‘स्वयं’ का सही परिचय हमें अध्यात्म से प्राप्त होता है. शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का अध्ययन करके अपने स्व को पहचानना ही अध्यात्म है. देह एक निश्चित आयु पूर्ण करके मिट्टी में मिल जाने वाली है. मन अधूरी कामनाओं को लेकर एक नए शरीर में प्रवेश करने वाला है, किन्तु स्व अथवा निजता को जिसने जान लिया वह जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर हो जाता है. वह होश में मरता है और होश में ही नयी देह धारण करता है, ऐसे ही मानव जन्म से संत अथवा सिद्ध होते हैं. शास्त्र और संत कहते हैं मृत्यु से पहले जिसने अपने आपको जान लिया, उसने उस कार्य को सिद्ध कर लिया जिसके लिए उसे मानव देह मिली थी.