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Monday, February 12, 2024

एक प्रेम ऐसा भी हो

किसी न किसी रूप में प्रेम का अनुभव सभी को होता है, पर उसे शाश्वत बनाने की कला नहीं आती । यह कला तो कोई सद्गुरू ही सिखाते हैं।अध्यात्म ही वह साधन है जिसे अपना कर मन में प्रेम का अखंड दीपक जलाया जा सकता है। ऐसा प्रेम होने के लिए कोई अन्य सम्मुख हो, इसकी भी ज़रूरत नहीं, एक बार मन में प्रकट हो जाये तो सारी सृष्टि के प्रति और उसके आधार परम परमात्मा के प्रति वह सहज ही बहता है। इस प्रेम में प्रतिदान की आशा भी नहीं होती, केवल देने का भाव ही रहता है। संसारी प्रेम में पीड़ा है, ईर्ष्या है, चाह है, अधिकार की भावना है, जो प्रेम के शुद्ध स्वरूप को विकृत कर देती है, आध्यात्मिक प्रेम स्वयं को स्वयं तृप्त करता है इसलिए इसमें मिली पीड़ा भी आनंदकारी होती है, मीरा के ह्रदय की पीड़ा उसके गीतों में ढलकर अमर हो जाती है।तुलसी के प्रेम का बिरवा मानस के रूप में युगों युगों तक मानव को सुवास देता रहेगा।टैगोर के प्रेम गीत उसी अमर प्रेम के चिह्न हैं। 

Tuesday, April 2, 2019

पुरुषार्थी बने जब कोई


पुनर्जन्म और कर्म फल सिद्धांत हिन्दू धर्म की बुनियाद में है जो इसे विशिष्ट बनाते हैं. इनके कारण ही यह धर्म मानव को परम स्वाधीनता भी प्रदान करता है. परमात्मा यहाँ किसी शासक के रूप में न होकर मात्र द्रष्टा है, जिसकी उपस्थिति मात्र से सब कुछ हो रहा है. कोई व्यक्ति जैसे कर्म करता है उसके अनुसार ही उसे फल मिलता है और मन पर संस्कार के रूप में उस कर्म की जो छाप पड़ जाती है, वह उसे वैसा ही कर्म भविष्य में करने के लिए प्रेरणा भी देती है. इसीलिए बचपन से शुभ संस्कारों को देने की बात कही जाती है. जो अशुभ संस्कार मन पर गहरे हो जाते हैं, उन्हें बदलने के लिए योग साधना से बढ़कर कोई उपाय नहीं है. यदि कोई आत्मा की अमरता में विश्वास करता है तो उसे इन संस्कारों को बदल कर अपने जीवन को निर्मल बनाने की पूर्ण स्वतन्त्रता है. धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के द्वारा कोई भी परम अवस्था को प्राप्त कर सकता है.


Sunday, December 8, 2013

शरण में आये हैं हम तुम्हारी

अप्रैल २००५
गुरु हमारी संवेदनाओं और भावनाओं को परिष्कृत करते है. वे हमें प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर ले जाना चाहते हैं. मन को देह से ऊपर उठाना सिखाते हैं. मन के पार जाते ही भीतर अपने आप परिवर्तन होने लगता है. हमारे भीतर सत्य को जानने के लिए जो कुछ भी होता है अपने आप ही होता है, वह कृपा के कारण ही है, हम केवल साक्षी मात्र बनते हैं. हमारा कार्य केवल शरण में जाना है, हमारे इर्द-गिर्द न जाने कितने बंधन घेरा डाले खड़े हैं, इन बन्धनों को तोड़ना हम नहीं जानते. अपने मन के हाथों हम बार-बार दुःख पाते हैं. अपनों से लड़ाई करना कितना कठिन है. सद्गुरु हमारे मन को मजबूत करते हैं, उसे सही मार्ग देते हैं, ध्यान, प्राणायाम की विधियाँ बताते हैं. मन तब सजग होता है, नित्य-अनित्य को पहचानने लगता है, भीतर प्रज्ञा जगती है, हम आत्मा को जानने के अधिकारी बनते हैं.