Friday, September 11, 2026

विसर्जन


विसर्जन 

राजमहल में ‘गणेश उत्सव’ की तैयारी हर वर्ष की तरह ज़ोर-शोर से चल रही थी। राज्य के मुख्य मंदिर से निकाल कर मूर्ति को दालान में रखा जाता था और उसकी सार्वजनिक पूजा होती थी। दस दिनों के बाद उसे पुनः मंदिर में स्थापित कर दिया जाता था। सदा से ऐसा ही होता आ रहा था। किंतु इस बार देश का वातावरण बदला हुआ था। आज़ादी का संग्राम धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रहा था। यह ज़रूरी था कि सभी जातियों के लोग इसमें भाग लें। महामंत्री ने पेशवा से कहा, जन सैलाब उमड़ा चला आ रहा है, सभी के भीतर गणपति के दर्शनों का उत्साह है। जनता अपने अधिकारों के प्रति जाग रही है, ऐसे में केवल कुछ लोगों को ही दर्शन के लिए आने देना उचित नहीं होगा। पेशवा ने मंज़ूरी दे दी, और उस वर्ष जनता बिना किसी भेदभाव के गणपति उत्सव में सम्मिलित हुई। अब दसवाँ दिन आ गया था, जब पुरानी प्रथा के अनुसार मूर्ति को पुनः उसके मूल स्थान पर ले जाना था। किंतु पंडितों ने कहा, दर्शन के समय मूर्ति को स्पर्श करने वालों में हर जाति के लोग थे, अब मूर्ति पवित्र नहीं रह गयी है, इसे मंदिर में स्थापित नहीं कर सकते। समस्या गंभीर थी, पेशवा के समझाने पर भी नियम के पक्के पंडित मान नहीं रहे थे।अंततः इसका उपाय खोजा गया विसर्जन में, पंडितों ने कहा, इस मूर्ति को जल में विसर्जित कर दिया जाये और मंदिर में दूसरी मूर्ति की स्थापना हो। उस वर्ष के बाद ही मूर्ति विसर्जन की प्रथा का सूत्रपात हुआ।   


Friday, September 4, 2026

शिक्षक दिशा दिखाते जग को

हर नया दिन अपने साथ एक नयी प्रेरणा और नया संदेश लेकर आता है। आज शिक्षक दिवस है, बचपन से लेकर आज तक न जाने कितने ही शिक्षकों ने हमारे जीवन को गढ़ा है। सर्वप्रथम हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता और भाई-बहन हमारे शिक्षक होते हैं,। जीवन की पहली पाठशाला अर्थात घर,  जो भी संस्कार बालमन पर डालता है, वह जीवन भर उसके साथ रहते हैं। ईमानदारी, सत्य, पुस्तकों से प्रेम, भक्ति, सेवा और अनुशासन का जो बीज बचपन में माता-पिता बच्चे के मन में रोपते हैं, उसी को शिक्षक अपने स्नेह से सींचते हैं। स्कूल और कॉलेज में जो शिक्षा दी जाती है, वह मात्र आजीविका प्राप्त करने के लिए सक्षम बनाने की नहीं होती, वह जीवन में अपने पैर थिर करके खड़े होने की शक्ति भी प्रदान करती है। आज उन सभी शिक्षकों के प्रति आदर व सम्मान व्यक्त करने का दिन है, जिन्होंने अपने ज्ञान और प्रेम से हमारे मनों को प्रशस्त किया है। आज समाज में शिक्षा एक व्यापार बनती जा रही है,।मंहगे स्कूलों में जाने वाले बच्चे स्वयं को एक अभिमान से भर लेते हैं और उनके वे साथी जो ऐसे स्कूलों में नहीं पढ़ सकते, हीनभावना का शिकार हो जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस काल में आज शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। किंतु कंप्यूटर से कितनी भी सही जानकारी मिल जाये, एक शिक्षक की सजग दृष्टि विद्यार्थी के ह्रदय की भावनाओं को समझ लेती है, और बिना मानवीय स्पर्श से प्राप्त की गई उच्च से उच्च शिक्षा व्यक्ति को एक संवेदनशील नागरिक नहीं बना सकती।  

कृष्णम् वन्दे परमानन्दम वंदेहम्

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण इस धरती पर आये और आज तक अपने अनंत प्रेम व अनंत ज्ञान की वर्षा में भिगो रहे हैं। उनका जन्म व हर कर्म दिव्य था, इसलिए आज भी हम उनके प्रेम को अनुभव करते हैं। कृष्ण कितने विनम्र थे, इसका भान उनके  जीवन की कितनी ही घटनाओं से मिलता है। राजसूय यज्ञ में वह अपने लिए जो कार्य चुनते हैं, वह था, यज्ञ में पधारे ब्राह्मणों और अतिथियों के पैरों का प्रक्षालन और उनकी जूठी पत्तलें उठाना। कृष्ण इतने पूज्य और सम्मानित थे कि उनकी अग्रपूजा की गयी थी, फिर भी उन्होंने अपने लिए ये कार्य चुने। ऐसा करके उन्होंने यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य का महत्व उसके पीछे के भाव से होता है, उनके ह्रदय में सभी के लिए अथाह प्रेम था, जिसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने सेवा के ये कार्य चुने। कृष्ण को हम ब्रह्मांड का स्वामी मानते हैं, सृष्टि का कारण मानते हैं, पर वह स्वयं को गोपियों व ग्वालों के प्रेम का ऋणी मानते हैं। उनसे प्रेम करना मानो स्वयं को उनके आत्मीयों में शामिल कर लेना है। सारी प्रकृति उनसे प्रेम करती है, वे स्वयं गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। यमुना नदी, कालिया नाग, कदंब का वृक्ष, गौएँ और बंदर सभी तो उनकी लीला में शामिल हैं। हज़ारों वर्षों से कृष्ण की कथा ने कवियों और भक्तों के दिलों को आकर्षित किया है और यह आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है।