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Sunday, April 4, 2021

जब आवै संतोष धन

 कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा  सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है. 


Monday, June 22, 2020

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

भक्ति के ग्यारह विभिन्न भाव एक दूसरे के साथ जुड़े हैं. हरेक व्यक्ति में इनका कुछ न कुछ अंश होता ही है. कोई एक प्रकार का भाव अलग-अलग व्यक्तित्व में प्रमुखता से दिख सकता है. सदगुरू कहते हैं भक्त लोकलाज की परवाह नहीं करते, जगत की निंदा-स्तुति की परवाह न करने वाले ही भक्त हो सकते हैं. प्रेम से ही ईश्वर तुष्ट होते हैं. हम संसार में अपना बल खोजते हैं, ईश्वर का बल मिल जाने पर किसी और बल की जरूरत ही नहीं है. जगत के साथ संबन्ध बन्धन लगता है ईश्वर के साथ जो बन्धन है वह बन्धन नहीं लगता, वह मुक्ति का द्बार खोल देता है. वह ध्यान के लिए अनुकूल है, भक्ति ध्यान के लिए और ध्यान भक्ति के लिए जरूरी है. किसी के भीतर भक्ति सहसा भी घट सकती है जैसे बिजली का चमकना और अभ्यास से भी जैसे सूर्य का उगना. योग करने, साधना करने से भीतर ध्यान की रूचि जगती है, पूजा में भी रूचि जगती है, और एक दिन भक्ति का उदय होता है. कोई इस पथ पर आरम्भ से ही चल पड़ता है. भक्त की दृष्टि से परमात्मा सारे जगत की सेवा कर रहा है. 

Sunday, June 21, 2020

भक्ति एक रूप अनेक


जैसे सूर्य की किरण श्वेत है पर उसमें सात रंग छिपे हैं, वैसे ही भक्ति का रूप प्रेम है पर उसमें ग्यारह प्रकार की सुगंध छिपी है. पहला प्रकार है प्रेमास्पद की गुण महिमा गाना, जिससे हम प्रेम करते हैं, उसके गुणों का बखान करना स्वाभाविक है. दूसरा प्रकार है उसके रूप के प्रति आसक्त होना. सौंदर्य के प्रति समर्पित व्यक्ति आक्रामक नहीं होता. जहाँ भी सुंदरता है भक्त को उसके पीछे वही दिखता है. अरूप के प्रति समर्पित होकर रूप का दर्शन करना है, रूप से फिर अरूप की और जाना है.  जैसे प्रकृति में विविधता है, वैसे ही मानव भी विभिन्न कलाओं के माध्यम से उस रूप को व्यक्त करता है. मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तु हर सृजन के पीछे भक्ति है. पूजासक्ति भक्ति का तीसरा प्रकार है. भीतर पूर्णता का अनुभव करके जो भी कृत्य किया जाता है वह पूजा है. स्मरणासक्ति अर्थात स्मृति में बने रहना,  जिसे प्रेम करते हैं उसकी याद बने रहना भी भक्ति का एक रूप है. दास्यभाव भक्ति का अगला प्रकार है,भक्त ईश्वर के दास हैं,  इस भाव में एक निश्चिंतता है, स्वामी को सब समर्पण कर दिया है, अब उसके कुशल-क्षेम की रक्षा वही करेंगे. सख्यासक्ति में भक्त भगवान को अपना सखा मानता है. सखा भाव में हर भेद मिट जाता है, वे हर वस्तु बांटते हैं. वात्सल्यासक्ति में भगवान को अपना शिशु मानकर प्रेम जताना भी भक्ति है. कांतासक्ति में ईश्वर में प्रियतम भाव को आरोपित किया जाता है. ईश्वर को अपना प्रियतम मैंने से उससे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता. तन, मन, धन सब कुछ उसे समर्पित कर देना ही कांतासक्ति है. इसके बाद आती है आत्मनिवेदनासक्ति जिसमें सभी भावों को उन्हें समर्पित कर देता है. तन्मयासक्ति में भक्त भगवान के स्मरण, उसके रस में, उनकी स्मृति में पूरी तरह से डूब जाता है. परमविरहासक्ति में प्रियतम के अभाव से ही भक्ति का अनुभव होता है. विरह की पीड़ा ही भक्त के हृदय में दर्द भरा आनंद भर देती है.  

Monday, February 25, 2019

बुद्धियोग में टिक जाये मन


२५ फरवरी २०१९ 
भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं, कर्म करो किन्तु फल की इच्छा मत करो. बुद्धि को समता में स्थित करके कर्म करो. इस पर अर्जुन ने कहा, यदि बुद्धि का महत्व अधिक है तो हम कर्म ही क्यों करें,  कृष्ण ने कहा क्योंकि कर्म किये बिना कोई पल भर भी नहीं रह सकता. स्वभाव के वशीभूत होकर हर व्यक्ति कोई न कोई कर्म करता ही है, यदि वह अपने कर्म का फल भी चाहता है तो कर्म उसके लिए बंधन बन जाता है. फल मिलने से पूर्व उसका मन समता में स्थित नहीं रह पाता और फल यदि सुखद हुआ तो वह अपने भीतर लोभ जगाता है दुखद हुआ तो शोक करता है. लोभ और शोक दोनों ही मन के विकार हैं. इसके विपरीत फल की इच्छा त्याग कर कर्म करने से मन विकारों से मुक्त होता है, भीतर स्थिरता का अनुभव होता है. भक्त सभी कर्मों को भगवान की पूजा मानकर करता है और ज्ञानी कर्ताभाव से मुक्त होकर कर्म करता है. ज्ञानी स्वयं को आत्मा जानकर अकर्ता भाव में स्थित हो जाता है और प्रकृति में कर्म हो रहे हैं ऐसा जानकर सदा समता में रहता है.

Tuesday, February 12, 2019

जड़-चेतन का भेद जगे जब


१३ फरवरी २०१९ 
कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग तीनों जैसे एक त्रिकोण के तीन कोने, एक दूसरे से जुड़े हुए और एक केंद्र से समान दूरी पर. पहले के अनुसार कर्म को भगवान की पूजा समझकर करना है, दूसरे के अनुसार स्वयं को अकर्ता जानकर साक्षी होकर कर्म को प्रकृति के द्वारा होते हुए देखना है. भक्तियोग के अनुसार सारे कर्म भगवान के लिए करने हैं. कोई किसी भी पथ को अपनाये अंत में सभी एक ही जगह पर पहुंच जाते हैं. ईश्वर की पूजा समझ कर कर्म करने से कर्मयोगी की बुद्धि शुद्ध होती जाती है, वह अपने भीतर स्वयं से भिन्न चैतन्य को अनुभव करने लगता है, अर्थात  परमात्मा का अनुभव उसे हो जाता है. निरंतर साक्षी भाव में रहने से ज्ञान योगी का चैतन्य का अनुभव दृढ़ होता जाता है. परमात्मा के लिये कर्म करने से भक्तियोगी का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और वह भी चैतन्य का अनुभव अपने भीतर कर लेता है.

Tuesday, September 11, 2018

विश्वाधारा विनायका


१२ सितम्बर २०१८ 
जो भी अभाव प्रतीत होता है, वह प्रकृति में है, चैतन्य पूर्ण है, लेकिन वहाँ सदा नहीं रहा जा सकता. उस पूर्णता को हृदय में भरकर रहना तो इसी प्रकृति में है. गणेश पूजा का उत्सव इसी बात का स्मरण कराता है. देवता को पूजा के स्थान पर बैठाकर उसकी आराधना करनी है फिर उससे वरदान पाकर जीवन को भर लेना है और अंत में देवमूर्ति को भी विसर्जित कर देना है. गणेश शुभता के प्रतीक हैं, ज्ञान और विवेक के भी. वे विघ्न हर्ता हैं और मंगलकारक भी. हमें अपने जीवन में उनकी उपस्थिति हर पल चाहिए. शुभ की कामना करते हुए यदि हम ज्ञान धारण करें, वही मंगलकारी हो सकता है. वास्तविक ज्ञान हमें विनम्र बनाता है. गणपति के हाथ में मोदक है अर्थात आह्लाद और उल्लास सदा उनके अपने हाथ में है, उसके लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है. जिस दिन हमारा सुख भी सदा अपने पास ही नजर आने लगेगा, उसी दिन हमें गणपति की पूजा का फल मिला है, ऐसा मानना होगा. गणेश के रूप की हर बात कुछ न कुछ संदेश अपने पीछे छिपाए है. हमें उन संदेशों को गुनना है और स्वयं तथा जगत के लिए मंगल कामना करनी है.

Thursday, August 24, 2017

गणपति बप्पा मोरया

२५ अगस्त २०१७ 
आज गणेश चतुर्थी है. भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि ! प्रथम पूजनीय गणपति को सम्मानित करने की तिथि ! गणेश सभी देवताओं में अग्र हैं, वे मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता हैं, विघ्न विनाशक हैं. उनके जन्म और कर्म के साथ कितनी कथाएं जुड़ी हैं, जिनका गहरा आध्यात्मिक अर्थ संतजन बताते हैं. गणेश भक्तों को अपने लगते हैं, अपने परिवार के सदस्य की तरह उनकी घर-घर में तथा सार्वजनिक स्थानों पर स्थापना की जाती है. वैसे तो वर्ष भर ही किसी न किसी रूप में गणेश की पूजा होती है पर आज के दिन विशेष आयोजन होते हैं. वे ज्ञान और कुशलता के प्रदाता हैं. रिद्धि और सिद्धि को देने वाले हैं. गणेश तत्व का अर्थ है शुभता और सात्विक शक्ति से ओतप्रोत ज्ञान. जब शुभ और मंगल के दाता गणेश की पूजा करने वाला स्वयं भी उन गुणों को स्वयं में धारण करता है तभी सही अर्थों में  गणेश चतुर्थी का उत्सव सफल होता है.

Wednesday, June 28, 2017

भाव बनें जब पावन अपने

२८ जून २०१७ 
हमारी पूजा और प्रार्थना मन के किस स्तर से आती हैं, साधक को इसका ध्यान रखना होगा. यदि पूजा से हम कुछ पाना चाहते हैं और प्रार्थना हम इसलिए करते हैं कि लोग हमें धार्मिक कहें, तो दोनों व्यर्थ हैं. पूजा को अहंकार बढ़ाने का नहीं उसे नष्ट करने का साधन बनाना है. जब तक मन पूर्ण संतोष व विश्राम का अनुभव नहीं कर लेगा उसे कुछ न कुछ बनने अथवा पाने का रोग लगा ही रहता है. ध्यान के बिना पूर्ण विश्राम सम्भव नहीं, अथवा तो मन जब श्रद्धा से ओतप्रोत हो जाये. भावशुद्ध हों तभी ध्यान घटता है. देह को पूर्ण शांत अवस्था में बैठाकर गहरी लम्बी श्वासें लेते हुए जब साधक स्वयं को परम के सम्मुख छोड़ देता है तब वही शांति और संतोष बनकर उसके मन व देह पर आच्छादित हो जाता है. 

Friday, March 28, 2014

भेद-अभेद का खेल अनूठा

नवम्बर २००५ 
स्वरूप में अभेद है पर संबंध में भेद होगा ही. भक्ति में भेद का अर्थ है मर्यादा, भक्त और भगवान के मध्य भी द्वैत का अर्थ एक मर्यादा है, एक सुव्यवस्था है. जब हम पूजा करते हैं तो भी एक दूरी रहती है. जब हम प्रभु के साथ कोई संबंध बनाते हैं तो भी एक भेद रह जाता है. वह हमारी माँ, पिता, सखा, गुरू कुछ भी हो सकता है, एक भेद तब भी रहता है. गुरु शिष्य के बीच में भी एक भेद रहता है, तभी भक्ति रहती है. जिसकी भक्ति करें वहाँ विश्वास है और भक्त में श्रद्धा है. जिस श्रेष्ठ का हम वरण करें तो उसमें विश्वास हो तथा हममें श्रद्धा हो, यह भी भेद है. वह अंशी है तथा हम अंश हैं, वह गगन सदृश है हम जड़ पृथ्वी हैं. यह जगत ब्रह्म है हम सेवक हैं, यह भेद है. पर जो इस भेद का राज जानता है वह अभेद को पार करके ही आता है.

Wednesday, June 5, 2013

जहाँ दम-दम पे होती है पूजा

सितम्बर २००४ 
ज्ञान मुक्त करता है और मुक्ति ही भक्ति को जन्म देती है. जब भीतर कोई गाँठ नहीं रहती, मन खाली हो जाता है तो स्वतः ही जिस शांति का अनुभव होता है, वही भक्ति है, अथवा जब सहज कर्म के द्वारा हम जिस तृप्ति का अनुभव करते हैं, वह कर्म भी वहीं पहुंचाता है. भाव ही पूजा है, पूजा में किये जाने वाले कृत्य यदि भाव से नहीं भरे हैं तो प्रभु तक नहीं पहुंच सकते. हमारी हर श्वास जब उसकी स्मृति में आती है, तभी हम वास्तव में पूजा करते हैं. कृपा से भक्ति टिकती है, समर्पण ही उसका आधार है.

Thursday, October 25, 2012

यहाँ दम दम पे होती है पूजा...


सितम्बर २००३ 
प्रतिपदा है नवरात्रि का शुभारम्भ, दुर्गापूजा का महोत्सव आरम्भ होता है इसी दिन से. अमावस्या को पितरों को जल अर्पण करने का दिन. हमारी संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए भी कितना आयोजन है, हम ही हैं जो अपनी शुभ संस्कृति को भूलते जा रहे हैं. हमारे जीवन का जो परम लक्ष्य है, सभी शुभकर्म उस तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होते हैं. किन्तु पूजा भी यदि सामान्य कर्म बन जाये तो उतना लाभ नहीं होगा जितना तब यदि हमारे सारे कर्म ही पूजा बन जाएँ. हम भी कह सकें कि यहाँ दम दम पे होती है पूजा सर उठाने की फुर्सत नहीं है....संतजन यही तो कहते हैं, हमें उनके ज्ञान के उजाले से अपने भीतर उजाला भरना है, उनके वचन अनमोल मोतियों की तरह उनके भीतर के अकूत खजाने से झरते हैं, यदि हम उसका शतांश भी ग्रहण कर सकें तो अपने लक्ष्य को पा सकते हैं. हमारे जीवन को शुभतर तथा शुभतम बनाने के लिए जितने उपाय वह बताते हैं, वह अनंत ज्ञान सहज ही उनके मुख से झरता है, उनकी आँखों से प्रेम झरता है तथा पोर-पोर से कृपा झरती है यदि कोई भाग्यशाली उसे पा ले तो धन्य हो जाये. लेकिन गुरु का सान्निध्य विरलों को ही मिलता है क्योकि वे ही उसकी आकांक्षा करते हैं, भौतिक दूरी अध्यात्म में कोई मायने नहीं रखती यह भाव लोक है, जिसमें वे सदा हमारे साथ हैं, उनका प्रेम हमारे साथ ही है, उसी से हमें अपने भीतर के ढके  छिपे ज्ञान को उभारना है, जोत जलानी है, अंतर के तिमिर को हरना है. माँ दुर्गा हमारे विकार रूपी असुरों का दमन करें, जिससे शरद की शुभ्र चांदनी रूपी ज्ञान की ज्योति जगमगा उठे.

Wednesday, April 18, 2012

सबमें वही समाया है


साधना के आरम्भ में एक भक्त अथवा साधक के लिये उसका इष्ट ही एकमात्र आराध्य होता है, उसी में उसे सभी देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं. जैसे वृक्ष की जड़ों को सींचने से उसके हर अंग तक जल पहुँच जाता  है वैसे ही एक की पूजा करने से सबकी पूजा हो जाती है. आगे जाकर वह सबमें उस एक को देखने लगता है. वह जान जाता है कि कहीं भी बंधना नहीं है, मुक्ति के पथ पर चलना शुरू किया है तो  जंजीर सोने की भी हो तो उसे कटवा देना चाहिए. सतोगुण तक जाकर उससे भी पार जाना होता है. अस्तित्त्व हमारी हर छोटी बड़ी इच्छा को पूर्ण करना चाहता है, पर हम उसका प्रतिदान नहीं दे पाते हैं. प्रेम हमें संसार की हर जड़-चेतन वस्तु के प्रति सजग बनाता है. परम को प्रेम करें तो वही प्रेम उसकी सृष्टि की ओर प्रवाहित होने लगता है.  

Saturday, April 7, 2012

निर्बल के बल राम


जनवरी २००३ 
हमारे भीतर आत्मा का सूरज चमक ही रहा है, उसका प्रकाश बाहर आये यही साधना है. आत्मनिंदा साधना के लिये ठीक नहीं, आत्म पूजा ही हमारी रीत होनी चाहिए. अंतर शुद्धि और बाह्य शुद्धि इसके लिये पहला कदम है. संतोष, सरलता तथा प्रेम को धारण करते हुए सदा आनंदित रहना दूसरा.. क्रोध तभी आता है जब हम ज्ञान के बल से विहीन होते हैं, अविद्या और अज्ञान ही हमें जन्मों से दुःख व पीड़ा दे रहे हैं. यदि कभी क्रोध आ जाये तो “निर्बल के बल राम” को याद रखना होगा. पूर्ण समर्पण हो अस्तित्त्व के प्रति अथवा सदगुरु की शरणागति. मन को खाली करना है ताकि वहाँ प्रकाश भर सके. ऐसा प्रकाश जो प्रेम मय है, आनंद मय है शांति मय है...
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