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Tuesday, September 11, 2018

विश्वाधारा विनायका


१२ सितम्बर २०१८ 
जो भी अभाव प्रतीत होता है, वह प्रकृति में है, चैतन्य पूर्ण है, लेकिन वहाँ सदा नहीं रहा जा सकता. उस पूर्णता को हृदय में भरकर रहना तो इसी प्रकृति में है. गणेश पूजा का उत्सव इसी बात का स्मरण कराता है. देवता को पूजा के स्थान पर बैठाकर उसकी आराधना करनी है फिर उससे वरदान पाकर जीवन को भर लेना है और अंत में देवमूर्ति को भी विसर्जित कर देना है. गणेश शुभता के प्रतीक हैं, ज्ञान और विवेक के भी. वे विघ्न हर्ता हैं और मंगलकारक भी. हमें अपने जीवन में उनकी उपस्थिति हर पल चाहिए. शुभ की कामना करते हुए यदि हम ज्ञान धारण करें, वही मंगलकारी हो सकता है. वास्तविक ज्ञान हमें विनम्र बनाता है. गणपति के हाथ में मोदक है अर्थात आह्लाद और उल्लास सदा उनके अपने हाथ में है, उसके लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है. जिस दिन हमारा सुख भी सदा अपने पास ही नजर आने लगेगा, उसी दिन हमें गणपति की पूजा का फल मिला है, ऐसा मानना होगा. गणेश के रूप की हर बात कुछ न कुछ संदेश अपने पीछे छिपाए है. हमें उन संदेशों को गुनना है और स्वयं तथा जगत के लिए मंगल कामना करनी है.

Monday, January 7, 2013

कुछ नहीं या सब कुछ हैं हम


जनवरी २००४ 
किसी कवि ने कहा है - पथ सोचे आमि देव, रथ सोचे आमि देव, मूर्ति सोचे आमि देव, ऊपर हँसे अन्तर्यामी..हमारा कर्ता भाव क्या कुछ ऐसा ही नहीं है, शरीर सोचता है बड़ा श्रम किया, मन सोचता है बहुत चिंतन किया बुद्धि स्वयं को क्या नहीं माने बैठी है...पर भीतर बैठा वह आत्मदेव यदि न हो तो..जैसे सूर्य कुछ नहीं करता पर सृष्टि मात्र उसके होने से ही तो है. करने वाले सब प्रकृति का अंश हैं, जिसके कारण सब होता है वह परमात्मा है, तो हम क्या हैं ? कुछ हमारा भी हिस्सा है कि नहीं...जब मुनि मौन में यह पूछता है तो पाता है प्रकृति के साथ उसका मेल नहीं बैठता...जो खुद पल-पल बदल रही है वह उसे कैसे धारण करेगी, परमात्मा की ओर निहारता है तो पाता है कि वह  बचा ही नहीं ..यही तो रहस्य है जिसे भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं. 

Tuesday, February 7, 2012

अपना उसे बनाएँ हम


दिसम्बर २००२ 
आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से हम सभी ग्रसित हैं जो क्रमशः मन, तन, और धन के रोग हैं. इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन समाहित रहे तो सारे रोग विलीन हो जाते हैं, क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है जिसे क्रोध छू भी नहीं सकता, भीतर एक ठोस आधार पर हम खड़े रहते हैं चट्टान की तरह दृढ़. हमें कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसीको हमसे भय रहता है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, मन सात्विक भावों की आश्रय स्थली बनकर रह जाता है. सभी नकारात्मक विचार तथा द्वंद्व को हटकर परम की शुभ्र विमल मूर्ति की स्थापना तब मन में होती है. उसके बाद तो वह स्वयं ही आकर हमारा हाथ थाम लेता है.एक बार उसे अपना मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग नहीं होने देता.