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Thursday, October 25, 2012

यहाँ दम दम पे होती है पूजा...


सितम्बर २००३ 
प्रतिपदा है नवरात्रि का शुभारम्भ, दुर्गापूजा का महोत्सव आरम्भ होता है इसी दिन से. अमावस्या को पितरों को जल अर्पण करने का दिन. हमारी संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए भी कितना आयोजन है, हम ही हैं जो अपनी शुभ संस्कृति को भूलते जा रहे हैं. हमारे जीवन का जो परम लक्ष्य है, सभी शुभकर्म उस तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होते हैं. किन्तु पूजा भी यदि सामान्य कर्म बन जाये तो उतना लाभ नहीं होगा जितना तब यदि हमारे सारे कर्म ही पूजा बन जाएँ. हम भी कह सकें कि यहाँ दम दम पे होती है पूजा सर उठाने की फुर्सत नहीं है....संतजन यही तो कहते हैं, हमें उनके ज्ञान के उजाले से अपने भीतर उजाला भरना है, उनके वचन अनमोल मोतियों की तरह उनके भीतर के अकूत खजाने से झरते हैं, यदि हम उसका शतांश भी ग्रहण कर सकें तो अपने लक्ष्य को पा सकते हैं. हमारे जीवन को शुभतर तथा शुभतम बनाने के लिए जितने उपाय वह बताते हैं, वह अनंत ज्ञान सहज ही उनके मुख से झरता है, उनकी आँखों से प्रेम झरता है तथा पोर-पोर से कृपा झरती है यदि कोई भाग्यशाली उसे पा ले तो धन्य हो जाये. लेकिन गुरु का सान्निध्य विरलों को ही मिलता है क्योकि वे ही उसकी आकांक्षा करते हैं, भौतिक दूरी अध्यात्म में कोई मायने नहीं रखती यह भाव लोक है, जिसमें वे सदा हमारे साथ हैं, उनका प्रेम हमारे साथ ही है, उसी से हमें अपने भीतर के ढके  छिपे ज्ञान को उभारना है, जोत जलानी है, अंतर के तिमिर को हरना है. माँ दुर्गा हमारे विकार रूपी असुरों का दमन करें, जिससे शरद की शुभ्र चांदनी रूपी ज्ञान की ज्योति जगमगा उठे.

Thursday, July 19, 2012

भीतर का संसार अनोखा


जून २००३ 
ध्यान उस परमात्मा से मिलने का द्वार है, और ध्यान तभी टिकता है जब मन खाली हो, उसमें इस नश्वर जगत की उधेड़-बुन न चल रही हो, कोई संशय न हो और कोई कामना भी न हो. जगत आत्मा को दे भी क्या सकता है, साधक को अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कामना के अतिरिक्त कुछ याद नहीं रहता. सत्य की सत्ता में अटूट विश्वास, उसके प्रति अनन्य श्रद्धा, और असीम प्रेम यही उसकी पूंजी होती है. इन सबको हृदय में धर कर वह ध्यान में बैठता है तो भीतर जैसे अमृत कलश छलक उठता है. वे पल अनुपम होते हैं, फिर समय का ध्यान नहीं रहता, भीतर से जैसे कोई तार जुड़ जाता है, वास्तव में क्या होता है उसे भी ज्ञात नहीं होता. वह अकथनीय है, अवर्णनीय है. लेकिन उर में एक विश्रांति का अनुभव होता है, उस के प्रेम का अनुभव उसकी निकटता का अनुभव, भीतर का संसार अनोखा है वहाँ उजाला ही उजाला है, संगीत है. परमात्मा रसमय है, प्रेममय है.

Thursday, May 24, 2012

भीतर सूरज चमक रहा है


मार्च २००३ 
आत्मनिर्माण करना है तो मन पर चौकीदार रखना होगा और उसके नाम से अच्छी चौकीदारी कौन कर सकता है. परमात्मा का नाम अंतर को शुद्ध करता है और कितनी ही विघ्न-बाधाओं को पलक झपकते हटा देता है. आत्मनिर्माण का अर्थ है आत्मा में रस का अनुभव करना, आत्म साक्षात्कार इस पथ की मंजिल है. ज्ञान, ध्यान और अभ्यास के द्वारा धीरे-धीरे इसको अनावृत करते जाना है और एक दिन वह सूर्य की तरह अपनी पूरी दिव्यता के साथ चमकती है. उसके प्रकाश की झलक तो यात्रा के आरम्भ से ही मिलने लगती है. जीवन में उजाला छा जाता है कार्य में रूचि बढ़ जाती है, परहित का ख्याल आने लगता है, परिवार में सुख-शांति छाने लगती है और सब काम अपने आप सही समय पर होने लगते हैं. उसके इतने सारे उपकार हैं हम पर, अंधकार में रास्ता खोजते व्यक्ति का हाथ पकड़ कर जैसे कोई प्रकाश में ले आये, ज्ञान जीवन में हो वही जीवन जीवन है. हमें मुक्त करता है ज्ञान, फूल सा हल्का बना देता है, सारी जंजीरें काट कर उसके समक्ष पहुँचा देता है.

Thursday, January 12, 2012

विश्वास ज्योति है


सितम्बर २००२ 
जो परमात्मा का प्रिय भक्त होता है वह अपने अंतर में विश्वास की ज्योति जला कर रखता है, उसी की लौ के सहारे-सहारे वह अंदर बाहर दोनों ही जगह उजाला पाता है. विश्वास तभी गहरा होता है जब अनुभूति हो जाये अनुभव साधना से ही आता है, अनुभव के बाद कृतज्ञता से मन भर जाता है, और हम जीवन निश्चिंत होकर एक-एक क्षण का आनंद लेते हुए जीते हैं. साधना की अग्नि में तपकर ही हम अपनी सम्भावनाओं को तलाश सकते हैं. देह और मन हमें साधन रूप में मिले हैं, जिन्हें स्वस्थ रखना हमारा कर्तव्य है, ताकि आत्मा स्वयं को प्रकाशित कर सके, वही तो परमात्मा का प्रतिबिम्ब है जो मन के दर्पण में झलकना चाहता है.