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Monday, April 2, 2018

तमसो मा ज्योतिर्गमय


२ अप्रैल २०१८ 
जीवन हमें कुछ देना चाहता है, और हमारी झोली छोटी है. जीवन बंटना चाहता है और हमने सीमाएं बना ली हैं. जीवन सत्य है, अमृत है और प्रकाश है, हम असत्य, मृत्यु और अंधकार का वरण करके ही संतुष्ट हैं. हमारी झोली यदि पहले से ही भरी हो तो उसमें और क्या समाएगा, हमने यदि स्वयं को अपनी मान्यताओं और धारणाओं में ही कैद कर लिया हो तो यथार्थ का बोध हम क्योंकर कर पाएंगे. असतो मा सदगमय...के रूप में ऋषियों ने जो प्रार्थना वेदों में गाई है, वह हर आत्मा की भीतरी अभीप्सा है. हम आजतक जिसे जीवन मानते आये हैं, वह सुख-दुःख, जरा-मृत्यु और क्षुधा-तृष्णा के दायरों में ही सीमित है. मानव के द्वारा देह, मन और प्राण के अतिरिक्त अपने भीतर एक ऐसी स्थिति का अनुभव भी किया जा सकता है जिसमें होना मात्र ही पर्याप्त है, जो जीवन का स्रोत है. साधना का यही ध्येय है.

Tuesday, December 16, 2014

सोच वही जो उसको भाए

जुलाई २००७ 
साधना के द्वारा मन की शक्तियाँ जब बढती हैं तो दैवीय सत्ता भीतर जगने लगती है. पहली बार जब हम इस धरा पर आये थे, तो भीतर देवत्व था, वह ढक गया है पर भीतर वह पूर्ण जाग्रत है, रह-रह कर वह अपनी सत्ता से परिचित कराता है. हमें उसे बाहर निकालना है. हम देवताओं के वंशज हैं, अमृत पुत्र हैं. सद्विवेक हमारा स्वभाव है. व्यर्थ के विचारों को यदि सार्थक विचारों में बदल दें तो हमारी क्षमता पांच गुणी बढ़ जाएगी. जब मन शांत होता है तब परमात्मा के प्रति भीतर सहज प्रेम जगने लगता है. उससे एक संबंध बनने लगता है. उसके प्रेम से हम सशक्त हो जाते हैं और वह हमें राह दिखाता है. तब हम संसार के लिए उपयोगी बनने लगते हैं. परमात्मा हमारे द्वारा काम करने लगता है. 

Friday, May 24, 2013

पानी विच मीन प्यासी

सितम्बर २००४ 
जो स्वयं मुक्त है वही दूसरों को मुक्त कर सकता है. जीवन मुक्त होने की क्षमता हम सभी के भीतर छिपी है, कोई सद्गुरु मिल जाये जो स्वयं मुक्त हो तो वह हमें मार्ग दिखा सकता है. कामनाओं का अंत नहीं है, भीतर सात्विक संकल्प जगा के ही इनसे मुक्त हुआ जा सकता है, ऐसे संकल्प जो हमें तृप्त करें, क्योंकि यदि हम पूर्णकाम होंगे तो हमारे आस-पास के वातावरण को हमसे कोई भय नहीं होगा, हमें उससे कुछ भी न चाहिए तो वह हमारी ओर विश्वास से देखेगा. हमारी तृप्ति अन्यों के संतोष का कारण भी बनती है, वास्तव में हमें कोई अभाव नहीं है, जब हम स्वयं से दूर हो जाते हैं तो विरह की अग्नि हमें जलाती है, भीतर कोई कसक उठती है, हम संसार से उसका समाधान चाहते हैं, पर जो स्वयं ही उसी अग्नि में जल रहा है, वह हमारी प्यास क्या बुझाएगा. जैसे ही हम भीतर उतरते हैं, अमृत का निरंतर बहता स्रोत नजर आता है. यही देखकर तो कबीर ने गाया है- पानी विच मीन प्यासी..आखिर अस्तित्त्व क्या यूँ ही अपनी सृष्टि को भटकने के लिए छोड़ देगा, वह जो प्रेम स्वरूप है, नहीं, वह तो निरंतर हमारे साथ है, भीतर जाकर उससे मिलना हमारा काम है.

Wednesday, November 7, 2012

एक तू जो मिला...सारी दुनिया मिली


अक्तूबर २००३ 
संत कहते हैं कि उन्हें और हमें काम ईश्वर से ही होना चाहिए, जगत यदि रूठता है तो रूठने दें. ईश्वर को भुलाकर जगत को प्रसन्न करने में लगे रहे तो वक्त हाथ से निकलता ही जायेगा, सिर पर न जाने कितने-कितने विचारों, मान्यताओं और आकाँक्षाओं का बोझ हम ढोते आ रहे हैं, एक अथाह सागर है हमारा मन. जिसका मंथन करो तो कितना कुछ ऊपर आता है, अमृत की एक बूंद पाने से पहले व्यर्थ का कचरा ही मिलता है. हमें स्वयं ही पता नहीं चलता कि अगले पल मन में कुछ देखकर या सुनकर क्या आने वाला है, कैसी बेहोशी में हम जीते हैं. वातावरण का भी असर होता है और भोजन का भी. ज्ञान ही हमें इससे मुक्त कर सकता है. मन रूपी अश्व की लगाम पकड़ना ही सत्संग है, यदि हम मन रूपी अश्व की पूंछ पकड़ते हैं तो कष्ट सहने पड़ते हैं, अभी हम अश्व की पूंछ पकड़े हुए हैं, संत लगाम पकड़ते हैं, उनका अनुसरण करें तो यात्रा कितनी सहज हो जाती है.

Monday, October 8, 2012

ज्ञान साधना है


सितम्बर २००३ 
ज्ञान हमें मुक्त करता है. आत्मभाव में स्थित रहें यही तो ज्ञान है. ज्ञान में स्थित रहकर यदि कोई सत्य का अनुसंधान करता है, जगत उसके लिए अमृत बन जाता है. अनन्य निष्ठा तथा अनवरत सुमिरन और उसे पाने की चाह यदि बनी रहे तो ज्ञान हृदय में स्थिर होगा. हमारा मन उन्मुक्त गगन में विचरण करेगा. भीतर जो कतरा है वही दरिया बन जायेगा. कभी ऐसा भी प्रतीत हो कि कहीं न कहीं हमारे कर्त्तव्य निर्वाह में त्रुटि हो रही है, पर इससे मन की प्रसन्नता तथा शांति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह अखंड है, वह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती. आत्मभाव में रहने वाला मन अब यूँही विषादग्रस्त कैसे हो सकता है. वह निर्भार, निर्दोष और सहज होकर पल-पल आनंद में जीता है.

Sunday, September 16, 2012

कहते हैं किसको मुक्ति


अगस्त २००३ 
आजादी का अर्थ क्या है, आजादी यानि हमारे मन की आजादी, कोई बंधन नहीं, पूर्ण मुक्त, जीवन मुक्त, न इच्छाओं का बंधन न कामनाओं का, न लोभ का, न मोह का न ईर्ष्या का न अहंकार का. हम हैं ही क्या इस विशाल ब्रह्मांड के सम्मुख और हममें या अन्य किसी में अंतर ही क्या है तो हम किसका अहंकार करें और किससे  ईर्ष्या करें. यह जगत हमें दे ही क्या सकता है जो हमारे पास पहले से ही नहीं है, तो हमें लोभ भी क्यों हो. कौन यहाँ पूर्ण है तो क्रोध किस पर करें. जब हम ही अपूर्ण हैं तो हमें क्या अधिकार है कि क्रोध करें. यही सारे विकार ही तो हैं जो हमें गुलाम बनाते हैं. सद्गुरु हमें आजाद करते हैं, सारे बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं. हम बिन पंखों के मुक्त गगन में उड़ने लगते हैं. हम उस देश के वासी हैं जहां रोग नहीं, शोक नहीं, आनंद ही आनंद है. जहां करुणा है, प्रेम है, जहां अपनत्व है, जहां अद्वैत है, जो ब्रह्म का देश है, जो कृष्ण का वृन्दावन है, गोकुल है, जहां प्रेम की वंशी बजती है. जहां विकारों के असुरों का कृष्ण नाश कर देते हैं. जहां अंतर में मन की राधा का मन के कृष्ण से निरंतर मिलन होता है. ऐसी मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है जिसे एक बार पाने के बाद पुनः हमें गुलाम नहीं बनना है. मुक्ति का एक बार स्वाद जो ले ले फिर उसे सोने की जंजीरें भी बांध नहीं पाएंगी वह तो अमृत पान कर चुका है फिर क्यों पोखर के पास जायेगा. संत तभी हमें साधना, सेवा, सत्संग और स्वाध्याय के मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं, यही पथ मुक्ति का पथ है.

Thursday, August 2, 2012

विचार के पार ही अमृत है


जून २००३ 
विचार ही हमारा संसार है, स्वप्न में भी यही विचार प्रकट होते हैं. स्वप्न भी हमारा खुद का बनाया  संसार है. धर्म विचारों से मुक्ति का नाम है. हमारे मन में यदि पूर्ववत् विचार चलते रहे तो हम धार्मिक कहाँ हुए. विचार जब हमारे चाहने से उठे और चाहने से शांत हो जाये तभी हम साधना के पथ पर आगे बढ़ते हैं, विचार से मुक्ति, स्वप्न से मुक्ति और कल्पनाओं से मुक्ति ही साधना है. जिस प्रकार गंध हर जगह है पर सूंघने का काम नासिका ही करती है उसी प्रकार ईश्वर सर्वत्र है पर उसे अनुभव करने का सामर्थ्य जागृत होने के बाद ही होता है. मन जब खाली हो, संकल्प-विकल्प न चलते हों, चित्त निर्मल हो तो वह अमृत रस भीतर प्रकट होता है. इस जगत में सुख-दुःख के झूले में बहुत झूल लिये, माँगने की कला को पीछे छोड़कर नित्य उस परम आनंद में स्थित रहने की कला हमें सीखनी है.   


Thursday, July 19, 2012

भीतर का संसार अनोखा


जून २००३ 
ध्यान उस परमात्मा से मिलने का द्वार है, और ध्यान तभी टिकता है जब मन खाली हो, उसमें इस नश्वर जगत की उधेड़-बुन न चल रही हो, कोई संशय न हो और कोई कामना भी न हो. जगत आत्मा को दे भी क्या सकता है, साधक को अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कामना के अतिरिक्त कुछ याद नहीं रहता. सत्य की सत्ता में अटूट विश्वास, उसके प्रति अनन्य श्रद्धा, और असीम प्रेम यही उसकी पूंजी होती है. इन सबको हृदय में धर कर वह ध्यान में बैठता है तो भीतर जैसे अमृत कलश छलक उठता है. वे पल अनुपम होते हैं, फिर समय का ध्यान नहीं रहता, भीतर से जैसे कोई तार जुड़ जाता है, वास्तव में क्या होता है उसे भी ज्ञात नहीं होता. वह अकथनीय है, अवर्णनीय है. लेकिन उर में एक विश्रांति का अनुभव होता है, उस के प्रेम का अनुभव उसकी निकटता का अनुभव, भीतर का संसार अनोखा है वहाँ उजाला ही उजाला है, संगीत है. परमात्मा रसमय है, प्रेममय है.